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रविवार, 12 फ़रवरी 2017

बस एक सम्मान का सवाल है !

लंबे इंतज़ार के बाद अंततः इस साल का साहित्य-भूषण सम्मान घोषित हो गया।साहित्य सेवक जी भारी सदमे में हैं।इस बार भी वे थोड़े अंतर से चूक गए।उनको लग रहा है कि सम्मान-प्रदाता कमेटी में उनका कोई ख़ास शुभचिंतक ज़रूर है,जो उनकी कटिया को मेन-लाइन से जुड़ने नहीं दे रहा है।सम्मान का करंट पाने को वे इतने कटिबद्ध रहे हैं कि उन्होंने अब तक केवल कटिप्रदेश प्रधान रचनाएँ ही लिखी हैं।फिर भी कमेटी के कुछ सदस्यों की आँखों पर पट्टी बँधी हुई है।इसका पहला नुक़सान तो हिन्दी साहित्य को ही हुआ,जो इतनी बड़ी संभावना से वंचित हो गया।दूसरा और महत्वपूर्ण यह कि सम्मान-समिति के वरिष्ठ सदस्य उनके लेखन की गहराई में बहुत अंदर तक डूब गए और इस तरह उनका सम्मान भी।

साहित्य-सेवक जी को मलाल इस बात का है कि साहित्य-भूषण न्योछावर करने वाली संस्था में उनकी अच्छी घुसपैठ के बावजूद उनसे कनिष्ठ साहित्य-द्रोही बाजी कैसे मार सकता है ! इससे उनको गहरा साहित्याघात लगा है।फलस्वरूप उसकी रचना को वे दैनिक रूप से पटक रहे हैं।उनका पक्ष है कि सिफारिश में भी अनुभव को प्राथमिकता मिलनी चाहिए पर संस्था ने इसकी अनदेखी कर परंपरा तोड़ी है।यह साहित्यिक-इतिहास का अब तक का सबसे बड़ा घपला है।साहित्य-सेवक जी इसीलिए आजकल घपलों का नाम आते ही भड़क उठते हैं।उनका मानना है कि सम्मान संभालने के लिए भी एक शऊर और सलीक़ा होना चाहिए,जो उनके पास बरसों से धरा हुआ है।


उनके साथ हुए इस साहित्यिक घात का विरोध पूर्व में चूके कई सम्मान-पिपासुओं ने भी किया है।उनका मानना है कि ऐसी मौलिक और मालिशयुक्त प्रतिभा के साथ हो रहे अन्याय से साहित्य की अपूरणीय क्षति हो रही है।इससे तो प्रशस्ति-पत्र इकट्ठा करने वाले वरिष्ठों का सम्मान-संग्रहालय एकदम सूना हो जाएगा।यदि केवल लिखकर सम्मानित होने की परंपरा चल निकली तो सम्मान-संस्थाओं की क़ाबिलियत पर प्रश्न-चिह्न ही लग जाएगा।जिस साहित्य में घुसपैठ करके एकाध नारियल और शाल दबोचने की गुंजाइश न हो,वो साहित्य न लेखकसेवी है और न ही समाजसेवी।साहित्य को समाज का दर्पण यूँ ही नहीं बताया गया है।अब सम्मानरहित लटका हुआ मुँह लेकर लेखक उस दर्पण में कैसे झाँके ! इससे साहित्य की ही बदनामी होगी।


जब से साहित्य-सेवक जी इस सम्मान से चूके हैं,बिलकुल कांतिहीन हो चुके हैं।अपने सम्पर्कों को फिर से टटोलने लगे हैं।कोई तो है जो उनके पास बैठकर उनके ही मान-पथ पर काँटे बिछा रहा है।पिछले काफ़ी समय से वे इस सम्मान पर टकटकी लगाए हुए थे पर सब व्यर्थ रहा।सम्मान-कस्तूरी पाने के लिए वे अंडमान-निकोबार तक न केवल दौड़ सकते हैं बल्कि इस इवेंट में सेल्फ़-फ़ाइनैन्स-स्कीम के तहत इंवेस्टमेंट भी कर सकते हैं।यह संस्था की बदनसीबी है कि उसने सही जगह पर टॉर्च नहीं मारी।और न ही किसी सुपारी-समीक्षक ने उन पर समुचित प्रकाश डाला।लेकिन इस बात से कई साहित्य-रंजक इत्तेफाक नहीं रखते।वे इसका अंदरूनी कारण कुछ और बताते हैं।उनका कहना है कि साहित्य-सेवक जी पर टॉर्च न मारने की बात एकदम गलत है।दरअसल,उनके टॉर्च की बैटरी ही कमजोर थी।ऐसे में नई व चकमक-बैटरी बाजी मार ले गई।लब्बो-लुबाब यह कि समुचित सम्मान पाने के लिए साहित्य-सेवक जी या तो अपनी टॉर्च बदलें या उसे चमत्कारिक बैटरी से चार्ज करवा लें।तभी सम्मान में लगी साढ़ेसाती से मुक्ति मिलेगी।

सम्मान के प्रति उनके इस समर्पण को देखकर कई अन्य साहित्यसेवी घोर अवसाद में चले गए हैं।उनके जैसी ऊर्जा और मज़बूत इरादे का स्तर बनाए रखने में अपने को असहाय पा रहे हैं।इसके लिए कुछ लोग 'सम्मानातुर-संघ' बनाकर अपनी दावेदारी बनाए रखना चाहते हैं।यह संस्था हर वर्ष अपनी वरिष्ठता-सूची को अपडेट करती रहेगी।इसमें सदस्य होने की पात्रता केवल उन्हीं की होगी जो गली-मोहल्ले के सम्मान बटोरकर भी प्रादेशिक या राष्ट्रीय सम्मान से अभी तक वंचित हैं।इस सम्मान-भूख को मिटाने के लिए संस्था के सभी सदस्य मर-मिटने के लिए तैयार हैं।इसके लिए वे सामूहिक रूप से भूख-हड़ताल पर जा सकते हैं।कम से कम एकाध सम्मान तो उनके पास भी ऐसा हो,जिसे वापस कर वे भी मौक़े पर चौका जड़ सकें।


इस बीच साहित्य भूषण धारी लेखक से जब सम्पर्क किया गया तो उन्होंने इस फ़ैसले पर कुछ भी कहने से इंकार कर दिया।उनका साफ मानना है कि उनके मुँह में सम्मान लग चुका है और वे अब सम्मान-रहित लोगों के मुँह नहीं लगना चाहते।सम्मानों की वज़ह से वे लिखने के लिए समय खैंच नहीं पा रहे थे,अब आए दिन ऐसी असाहित्यिक अफ़वाहें सुन-सुनकर उनके कान भी पिराने लगे हैं।सुना है कि इस ख़बर से साहित्य-सेवक जी और उखड़ गए हैं।वे अब शिल्प तोड़ने वाली नई रचना पर हथौड़ा लेकर जुटे हैं।

2 टिप्‍पणियां:

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

आज की ब्लॉग बुलेटिन जन्मदिन भी और एक सीख भी... ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

बहुत खूब:)