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रविवार, 29 अक्तूबर 2017

साहित्य के आकाश में सफल प्रक्षेपण !

वे एक बड़े लेखक-कम-संपादक हैं।इसका विन्यास करके आप यह कतई अंदाज़ा लगा लें कि वे एक कमतर संपादक हैं।बल्कि यूं कहिए कि वे संपादन की चौसठ कलाओं से युक्त होकर ही लेखन में लगातार अपनी बत्तीसी निकाले हुए हैं।वे खाँटी भारतीय नेता की तरह सर्वसुलभ हैं और दुर्लभ भी।सौभाग्य से अपन के अंशकालिक मित्र भी हैं अंशकालिक यूं कि घोर मित्रता के पलों में कई बार अर्ध-विराम लग जाता है पर अंतरंग मित्रता अभी तक अटूट है।उनसे जब बात नहीं होती है,तब भी उनकी ही बात होती है।वे भी अपने सम्पर्कों से लगातार हमारी खोज-ख़बर रखते हैं।इसके पीछे मुख्य उद्देश्य यह होता है कि विरोधी गुट से हमारे तार तो नहीं जुड़ गए ! उन्हें शायद यह नहीं मालूम कि जनसम्पर्क का इस समय सबसे बड़ा साधन बेतार का तार है,जो चौबीसों घंटेमोबाइलरहता है।कई दिनों के बाद उन्हें फोन मिलाया।हालचाल का आदान-प्रदान होता,इससे पहले कहने लगे-“फोन कर लिया करो भाई।मित्रता में इतना लम्बा अंतराल ठीक नहीं।नियत समय पर इसे रीचार्ज करना ज़रूरी होता है।समय और साहित्य किसी का इंतज़ार इन्हीं करते।मैं तो लेखक हूँ।इसी रूप में अवतरित हुआ हूँ।ईश्वर ने इसी काम के लिए हमें यहाँ भेजा है।हम तो मात्र निमित्त हैं।अपने मिशन में हम किसी को बाधक नहीं बनने देते।तुम भी मत बनो।इस बीच हमने दो कहानी-संग्रह,तीन कविता संकलन और पांच चुनिंदा लेखक निपटा दिए हैं।तुम्हें भी कहीं कहीं अब तक खपा देता पर तुममें आसक्ति की कमी है।लेखन में यह सबसे ज़रूरी चीज़ है।तुमसे हमारा विशेष स्नेह है,सो बता रहा हूँ।रसों का अध्ययन करिए,रसीले बनिए और साहित्य को उसी तरह बनाइए जैसे हमबनारहे हैं।

मेरे गले से आवाज उसी तरह नहीं निकल पा रही थी,जैसे नोटबंदी के वक़्त एटीएम से रुपये नहीं निकल रहे थे।फिर भी कालेधन-सी चपलता दिखाते हुए मैंने आशा का आँचल नहीं छोड़ा।उसे अपनी ओर खींचते हुए बोला-“मुझे साहित्य के छूटने का दुःख नहीं है।यह तो साहित्य का दुर्भाग्य है कि वह मुझसे अभी तक वंचित है।मेरे लिए तो आप ही साहित्य हैं।मैं आपके पिछले संग्रह पर शोधकार्य में जुटा हुआ था।ईश्वर की कृपा से वह काम लगभग तैयार भी हो गया है।यह तो बीच में नोटबंदी ने मार दिया।दिन में एटीएम की कतार में लगता और रात में शोध-पत्र की तैयारी करता।बस इसी सब में मैं कब साहित्य-विमुख हो गया,पता ही नहीं चला।मालूम नहीं मुझे इसका कितना दंड भुगतना पड़ेगा,पर इसकी चिंता नहीं है।साहित्य-विमुख होकर तो केवल यश-हानि होती पर आपसे विमुख होकर मेरा सर्वनाश निश्चित है।यकीन मानिए,मेरे पास कोई चकमक पत्थर भी नहीं है पर मैं रोज सोते समय आपकी किताब सिरहाने रखकर सोता हूँ।पता नहीं कब उसमें लिखे पन्नों पर मेरे भाग जाग जाएँ !”

लेखक बड़े हैं,इसलिए पर्याप्त मात्रा में भले भी हैं और दयालु भी।तुरंत द्रवित हो उठे।कहने लगे-किताबों का क्या है ! कहो तो पुस्तक-मेले में एक साथ दस की दस उतार दूँ ! पर इससे तुम्हारी सेहत बिगड़ सकती है।साहित्य का इतनाअटैकतुम सह नहीं पाओगे।तुम्हें सदमा लग सकता है।फिर भी तुम अपना बजट देख लो,मैं विमोचन करवा दूँगा।तुम तो हमारे अनुज भी हो।हमेशा मेरे पीछे चलते हो।स्वजन तो हो ही।राजनीति और साहित्य में स्वजन ही सज्जनता धारण करते हैं।इसीलिए तुम सभी तरह से सुपात्र हो।जो पुस्तकें प्रेस में चली गई हैं ,कहो तो उन्हें भी रुकवा दूँ।इसके लिए बस एक 'दुर्जन' साहित्यकार को निपटाना पड़ेगा।पर इससे साहित्य का ही भला होगा।वह पहले भी कई बार छपकर साहित्य को घेर चुका है।इससे समाज में कौन-सी क्रांति गई ! तुम छ्पोगे तो साहित्य को एक उदीयमान लेखक मिलेगा।वरिष्ठ आलोचकों को साहित्य में संभावनाओं की झलक दिखाई देगी।आलोचना को भी संबल मिलेगा।जिस संग्रह में तुम आओगे,वह आने से पहले ही विवादित कर दूँगा।ऐसी-ऐसी जगह तुम्हें 'हिट' करूँगा कि प्रकाशित होने से पहले ही किताब 'हिट' हो जाएगी।विमोचन के बाद तो साहित्य भी आतंकित होगा।प्रकाशक को आत्मतुष्टि होगी कि उसका छापना सुफल हुआ।मेरा क्या,मैं तो लेखक हूँ।तुम जैसे साहित्य-सेवियों और सौन्दर्य-मूर्तियों की सेवा में ही पूरा जीवन लगा रखा है।साहित्य को अब तक इसी आग ने धधका रखा है।आओ तुम भी इसमें अपनी आहुति दो !”

उनसे इतनी भावुकता की अपेक्षा नहीं थी।पर महान लोग वही हैं जो अपेक्षा से बढकर काम करें।गेंद उन्होंने मेरे पाले में फेंक दी थी,मुझे सिर्फ़ लपकना भर था।मैंने अंगार बनने की पुष्टि करते हुए दो-चार वरिष्ठों के माता-पिता को सादर याद किया और ख़ुद को साहित्य के सुनहरे भाड़ में झोंकने का संकल्प ले डाला।अगली शाम हम दोनों कॉफ़ी-हाउस में टकराए।थोड़ी देर बाद गिलास टकराने लगे।साहित्य के फलने-फूलने काफ़ुलइंतज़ाम था।हमने दो-दो जाम गटककर साहित्य की जड़ता पर जमकर प्रहार किया।चलते समय मित्र से गले मिलकर रोने लगा।वो ज़िंदगी में दोबारा भावुक हो गए।कहने लगे-“आज तुम्हें एक मंत्र दे रहा हूँ।दिमाग़ में बाँध लो।जब भी तुम पर साहित्य से विमुख होने का अश्लील आरोप लगे,बस यही दोहराना कि मैं तो लेखक हूँ।तुम्हारे सात ख़ून माफ़ हो जाएँगे।साहित्य निखर उठेगा।अब इससे ज़्यादा मुझसे उम्मीद मत करो।मैं स्वयं एक लेखक हूँ।

बस तभी से हम यह जाप कर रहे हैं और साहित्य की सीढ़ियाँ लगातार चढ़ रहे हैं।उनकीनिर्मल-किरपासे अब मैं भी लेखक हूँ।

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