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रविवार, 12 नवंबर 2017

स्वर्ग से अवतरित महापुरुष !

फिर से पेपर्स लीक हुए हैं।ये बच्चों के क्वेश्चन पेपर्स नहीं हैं जो रद्द होकर दोबारा सामने आ जाते हैं।बड़ों के कारनामे हैं।लीक होते ही सीधे रद्दी की गोदी में बैठ जाते हैं।इस बार वे स्वर्ग से लीक होकर सीधे न्यूज़पेपर्स में अवतरित हुए।यह उनका ग्लोबल-अवतार है।दुनिया ने उन्हें पैराडाइज पेपर्स के रूप में पहचाना है।वे सर्वत्र हैं,शक्तिमान भी।बड़ों की बात हो तो ख़बर बनती है।उनकी भी बनी।बड़े न हों तो हम ख़बरों से वंचित रहें।वंचित लोग ख़बरें बनते नहीं बाँचते हैं।ख़बरों के लिए उनका बने रहना ज़रूरी है।हमें ऐसे ही ‘टूटती हुई ख़बर’ की तलाश थी।स्वर्ग से आए ख़ज़ाने को लूटने के लिए हम ख़बर पर टूट पड़े।’लीक-लिस्ट’ हमारे सामने थी।उसमें शामिल एक ‘लीकधारी’ से पुरानी जान-पहचान थी।उनकी प्रगति हमारी प्रगति लगने लगी।ऑड-इवन माहौल में घर से बाहर निकलने का हौसला न जाने कहाँ से आ गया ! उनसे मिलने की बेताबी इतनी ज़बरदस्त थी कि धुंध से भरे लुटियन-जोन में भी उनकी बनाई ‘लीक’ हमें साफ़-साफ़ दिख रही थी।हम उसी ओर बढ़ लिए।

लीकित-पुण्यात्मा के प्रवेश-द्वार में ही संतरी ने हमें रोक लिया।बड़े ठस्से से हमने अपना कॉर्ड उसकी ओर बढ़ाया।दो मिनट बाद ही वह रिटर्न-गिफ़्ट लेकर लौट आया।एक काग़ज़ का टुकड़ा उसने हमारे सामने डाल दिया।हम मानसिक रूप से इसके लिए तैयार नहीं थे,फिर भी झुककर उसे उठाया।उसमें उस पुण्यात्मा-प्राणी का संक्षिप्त संदेश था,‘हम देशहित में पंद्रह दिवसीय मौन-व्रत पर हैं।’जैसे ही संदेश पढ़ चुके,संतरी ने एक मौखिक संदेश अपनी तरफ़ से भी हमें प्रेषित कर दिया-‘साहब,मॉस्क लगाकर जाना।आजकल बाहर हवा बड़ी ख़राब चल रही है।’

हम अनमने होकर लौटने ही वाले थे कि सामने एक भद्र आकृति खड़ी थी।वे वही महापुरुष थे,जिनसे मिलने के लिए हम आचारसंहिता तक तोड़ने को तैयार थे।उनके दाहिने हाथ में एक पेपर लहरा रहा था,जिसमें लिखा था कि हमारे सवालों का वे लिखकर ज़वाब दे सकते हैं बशर्ते वे ख़ुद पढ़कर पहले चिंतामुक्त हो जाएँ।अंधे को क्या चाहिए-दो आँखें ! हम तो ऐसी महान विभूति के साक्षात्कार के लिए उतावले हो रहे थे,जिसने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश को पहचान दी थी।हमने बिना किसी शर्त उनकी यह शर्त मान ली।

बेहद आत्मीय माहौल में उनसे संवाद हुआ।जवाब देने के लिए उन्होंने केवल चालीस पन्ने ख़र्च किए।कुल जमा चार सवालों के ही जवाब आए,पर बाक़ी पन्ने उनके बयान को दुरुस्त करने में शहीद हो गए।इसे हम अपने पाठकों के लिए ज्यों का त्यों प्रस्तुत कर रहे हैं :

लीक होकर आप कैसा महसूस कर रहे हैं ?

‘जो रास्ता हमारे अग्रजों ने हमें दिखाया था,उस पर चलने को हम बचपन से ही ‘लीकातुर’ थे।शुरू में ही कहीं हमने पढ़ लिया था, ‘महाजनो येन गत: स पंथ:’अर्थात् महाजन जिस रास्ते जाएँ ,वही सही पथ है।वह सीख ऐसी चढ़ी कि कोई नई राह बनाने की बात सूझी ही नहीं।लीक पर चलना तभी से उद्देश्य हो गया।इस तरह ‘जन’ से ‘महाजन’ बनने का सफ़र शुरू हो गया।और देखिए,ऊपरवाले की असीम अनुकंपा हम पर बराबर बनी रही।हम बिना डामर वाली खुरदरी सड़क से चलकर राजपथ तक पहुँच गए।वहाँ ख़ूब बैठकी की।इसके बाद और ऊँचे उठे।आज हमारी उठान यह कि हम सीधे देवलोक से,आई मीन पैराडाइज से लीक हो रहे हैं।ज़ाहिर है,बेहद गौरवान्वित महसूस कर रहा हूँ,पर घमंड रत्ती भर भी नहीं।’

इस महत्वपूर्ण उपलब्धि का श्रेय आप किसे देंगे ?

देखिए,हम कुछ मामलों में ही परंपरावादी हैं,नहीं तो हम मुख्यतःपरिवर्तनवादी हैं।औरों की तरह हम अपने बड़ों और गुरुओं पर अपने किए का बोझ नहीं डालना चाहते थे।इसीलिए हमने अपनी मौलिक प्रतिभा विकसित की।ऊपर उठने के कई उदाहरण हमारे सामने थे पर उनमें लीक होने की संभावना काफ़ी कम थी।हम अधिक ऊँचाई से गिरना चाहते थे ताकि जल्द से जल्द अधोगति को प्राप्त हों।आज मैं दुनिया के चुनिंदा ‘लीकुओं’ के साथ हूँ,इसका श्रेय सिर्फ़ और सिर्फ़ मुझे जाता है।
इस मुक़ाम तक पहुँचने के लिए आपने क्या किया ? इस पर कुछ प्रकाश मारें तो अंधेरों में बैठे हमारे वंचित भाई भी दीपित हो सकें।

यहाँ तक पहुँचने की यात्रा बेहद रोमांचकारी रही है।पहले हम फ़र्श से अर्श पर पहुँचे और फिर अर्श से फ़र्श पर।आज हम फ़र्श पर ज़रूर दिखाई दे रहे हैं पर पूरी धमक के साथ।देश और विदेश में सीमित संख्या में ‘लीकेज’ होने के कारण हमारा लीक होना कितना महत्वपूर्ण है,यह ‘भांड मीडिया’ नहीं समझ सकता।यहाँ तक पहुँचने में ‘तन,मन,धन’ से जुटा तब जाकर पूर्णकालिक सेलेब्रिटी बन पाया हूँ।’लीक-पूर्व’ युग में बोलता था तो कोई सुनता नहीं था और अब ‘लीकोत्तर’ युग में प्रवेश करते ही मेरा मौन होना भी ख़बर बन रहा है।रही बात वंचितों पर टॉर्च मारने की,तो इसकी चिंता मत करें।हम पॉवरहाउस हैं।हमेशा चार्ज रहते हैं,इसीलिए ‘बोलते’ नहीं।

मौन के महत्व को ज़रा खुलकर बताइए।क्या आप ‘मौनं हि स्वीकृति लक्षणम’ में भरोसा करते हैं ?

बिलकुल।मौन होने से स्वीकार बढ़ता है।यहाँ तक कि हमारी लोकप्रियता मौन-व्रत के बाद ही बढ़ी है।जब मौन होकर दस सालों तक बेरोक-टोक शासन किया जा सकता है तब लीक होकर चुप्पी क्यों नहीं साधी जा सकती ? मौन का महत्व गाँधीजी ने भी बख़ूबी बताया है।उनका एक बंदर ‘बुरा मत बोलो’ के माध्यम से यही संदेश देता है कि आलतू-फ़ालतू और बुरी बातों पर कोई जवाब मत दो।इससे विकास-यात्रा बाधित होती है।मौन ने ही हमें ‘लीकनायक’ बनाया है।कृपया सवाल पूछकर हमारी मौन-साधना भंग न करें।

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