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सोमवार, 8 जनवरी 2018

पलटने का मुफ़ीद मौसम !

वे हमारे पुराने मित्र हैं।इससे भी बड़ी बात कि वे बड़े लेखक हैं।साल की तरह खुद भी पलट लेते हैं।कल मिले तो पिछले दिनों की गई अपनी उस स्थापना से पलटने लगे जिसके लिए कभी उन्होंने जबर्दस्त जंग लड़ी थी।मैंने टोका तो कहने लगे-लेखक को हमेशा जल की तरह बहना चाहिए।वह एक जगह टिक जाएगा तो काई लग जाएगी।और तुम तो जानते ही हो कि काई लगा जल न पीने के काम आता है न अभिषेक के।ऐसी दृढ़ता किस काम की,जो एक जगह टिकने पर विश्वास करे।इसलिए अपने कहे और लिखे से जितनी जल्दी हो सके ,पलट लो।इससे संभावनाओं के नए द्वार खुलते हैं।विकल्पों की गुंजाइश बढ़ जाती है।'

'पर आपने अपनी पिछली पुस्तक में इस बात पर ज़ोर दिया था कि व्यक्ति को अपने कहे पर टिकना चाहिए।शास्त्रों में भी लिखा है कि नीति और सिद्धांत पर हमें अडिग रहना चाहिए।हम नीति पर टिकें या नीयत पर ? अचानक ऐसे हम पलटेंगे तो दस सवाल उठेंगे।साहित्य क्या सोचेगा ?' मैंने आशंका ज़ाहिर की।

मित्र एकदम से सोशल मीडिया के मंच पर उतर आए।लेखकीय-ढाल पहनकर हम पर भड़क उठे-‘तुम सरकार से ऊपर हो क्या ? देख नहीं रहे हो कि देशहित में सरकार रोज पलट रही है।नीति 'फ़िक्स' होती है।उसके खिसकने या बदलने को लेकर तुम चिंतित न हो।इसीलिए नीति-आयोग बनाया गया है,नीयत का नहीं।नीयत लचकदार यानी फ़्लेक्सिबल होनी चाहिए।साहित्य का नुक़सान तुम्हारे जैसे जड़ लोगों ने ही अधिक किया है।प्रगतिवादी लेखक मौक़ा सूँघकर पलट लेते हैं।तुम सरोकारों की कंठी बनाकर गले में लटकाए घूमते रहो।गली-मोहल्ले की लेखक सभाएँ भी तुम्हें भाव नहीं देंगी।लेखक वही है जो समय,सरकार और सरोकार के साथ घालमेल कर ले।एक भूखा और राजपथ से भटका लेखक न अपना भला कर सकता है न समाज का।इसलिए उसे कभी भी पलटने से परहेज नहीं करना चाहिए।इस काम को केवल नेताओं के भरोसे छोड़ना ठीक नहीं है।देखते नहीं हो,इसी विशिष्ट गुण के कारण वे जननायक बने हुए हैं !’

मैंने पुनःप्रतिवाद किया-‘अपने साहित्यिक और व्यक्तिगत जीवन में हमने कभी ऐसा प्रयोग किया नहीं।हमने कभी रात में करवट तक नहीं बदली।पता नहीं कब कोई पलटने का इल्ज़ाम लगा दे !’ वे पूरे आत्मविश्वास से बोले-अव्वल तो कोई बोलेगा ही नहीं क्योंकि जो वरिष्ठ हैं,वही नीति-आयोग के संस्थापक-सदस्य हैं।और छोटों की बात पर बड़े नोटिस नहीं लेते।फिर भी कुछ शोर हुआ तो पत्रिका के सम्पादकीय या पुस्तकीय-समीक्षा में ध्वस्त कर देंगे।फ़िलहाल,नए साल का संबल तो है ही।नए संकल्पों के कंबल में पुराने पाप यूँ ही ढक जाते हैं।मौसम है,मौक़ा भी है, दस्तूर भी।पलटने के लिए कोहरे का मौसम सबसे मुफ़ीद होता है।आँखों में धूल झोंकने की ज़रूरत भी नहीं पड़ती।इसलिए सरकार और कलेंडर की तरह अपने सरोकार पलट लो,समाज में सम्मान भी मिलेगा और स्पेस भी।’

इतना सुनकर हम आश्वस्त हो गए।अब निश्चिन्त होकर पलट सकते हैं।दिन में भी,रात में भी।गोष्ठी में भी,बिस्तर में भी।पलटना अब शारीरिक क्रिया भर नहीं है,सामाजिक बदलाव का प्रतीक है।साल पलट गया है तो हमारे लिए भी संदेश है,अवसर है।सो,नए साल में पलटने वाले नए संकल्पों की सूची बना रहा हूँ।इस बीच कंबल पहले से अधिक गर्म हो गया है।

1 टिप्पणी:

HARSHVARDHAN ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन नंदा और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।