रविवार, 30 सितंबर 2018

राफेल भाई और बोफोर्स बहन से एक्सलूसिव बातचीत !

राफ़ेल को लेकर इधर पूरे देश में रार मची हुई थी,उधर ख़ुद राफ़ेल भाई की हालत ख़राब थी।अचानक उसकी उड़ान पर लगाम लग गई।दिन में उसे नेता मारते,रात मेंप्राइम-टाइमराफ़ेल को लगने लगा कि इंडिया पहुँचने से पहले जब उसका यह हाल है ,जब वहाँ पधारेगा तो क्या होगा ? हिंदुस्तान के लोग उसे स्वीकारेंगे भी या नहीं ? इसी उधेड़बुन में वह वह फँसा हुआ था।कुछ सूझ नहीं रहा था,तभी एक पहुँचे हुए संकटमोचक ने सलाह दी कि वह बोफ़ोर्स बहन से मिल ले।उसे लड़ाई में दगने से ज़्यादा चुनाव में चलने का लम्बा अनुभव है।राफ़ेल भाई को यह बात जँच गई और वह बोफ़ोर्स बहन से मिलने उसके ठिकाने पर पहुँच गया।दोनों के बीच अज्ञात क्षेत्र में हुई वह बातचीत हमारे संवाददाता चौपट चौरसिया के हाथ लग गई।बिना किसी काट-छाँट के उसे यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है ताकि सब अपने-अपने हिसाब से काट-छाँट कर लें:

राफ़ेल : बोफ़ोर्स बहन ! बड़ी उम्मीद से तुम्हारे पास उड़कर आया हूँ।सीमाओं की रक्षा करने का दायित्व भले मेरा हो पर इस वक़्त मुझे स्वयं रक्षा की ज़रूरत है।और हाँ,हमारी यह मुलाक़ात गुप्त रहनी चाहिए,नहीं तोप्राइम-टाइमका एक और अटैक मुझे झेलना पड़ेगा।लोग भरे बैठे हैं।

बोफ़ोर्स: अरे नहीं राफ़ेल भाई ! तुम कुछ ज़्यादा ही सेंटिया रहे हो।लड़ाकू लोग दिल से नहीं दिमाग़ से काम करते हैं।वे विरोधियों की नहीं सुनते बल्कि उन्हें सबक़ सिखाते हैं।जबसे तुम्हारे आने की गड़गड़ाहट सुनी है,मैं बेहद ख़ुश हूँ।बहुत दिनों बाद लगा कि और भी कोई है जो हमारी टक्कर का है।वैसे तो हम हमेशा दुश्मन को निशाने पर लेते रहे हैं पर यहाँ तो हमीं निशाने पर गए थे।फिर भी देखिए,इतनी चर्चा और ख़र्चा के बाद हम अभी तक स्लिम और फ़िट बने हुए हैं।तुम अपनी चर्चा से नाहक परेशान हो।यह तो सफलता की पहली निशानी है।लड़ाई के मैदान में तुम्हारा स्वागत है।

राफ़ेल : बहन ! मेरी ज़िंदगी में पहली बार ऐसा हो रहा है,जब हम बिना उड़ेहिटहो रहे हैं।सोच रहा हूँ कि कहीं उड़ने के पहले ही मेरे पंख कट जाएँ ! यहाँ तक कि हमारे अपने देश में उबाल आया हुआ है।मैदान से ज़्यादा मीडिया में मार-काट मची है।मेरे जाने से पहले ही वह युद्धक्षेत्र बन गया है।बहना,तुमने तो ऐसी मार ख़ूब झेली है।कुछ अपने अनुभव हमें भी बताओ जिससे हमको सुकून मिल सके।

बोफ़ोर्स :हा हा हा।सुकून तो तुम्हें भरपूर मिलेगा।हम दोनों लड़ाकू प्रजाति के हैं।यह साफ़ तौर पर हमारी सफलता है कि लड़ाई के मैदान में शामिल होने से पहले ही लोग हमको लेकर आपस में लड़ने लगते हैं।मेरा क़िस्सा तो अजीब ही है।एक मंत्रीजी तो केवल इधर से उधर चिट्ठी ले जाने पर खेत रहे।चुनाव से पहले जो नेताजी जेब में हमारे नाम की पर्ची लेकर घूमते थे,उन्हें सत्ता-सुख की प्राप्ति हुई,भले ही देशवासियों को पर्ची में लिखे नाम को देखने का सुख कभी नहीं मिला।विरोधियों द्वारा हमारे नाम का बार-बार मंत्रोच्चार करने से असमय ही एक युवा नेता ऐतिहासिक बहुमत से अल्पमत में गया पर मजाल कि हमारे हितैषियों का बाल भी बाँका हुआ हो।हमने सबकी रक्षा की।पिछले तीस सालों से मैं हिंदुस्तान की सियासत संभाल रही हूँ।हमसे मार खाने वाले दुश्मन देश तो घबराते ही हैं,हमें अपनाने वाले हमारे ज़िक्र भर से काँपते हैं।ऐसा सौभाग्य कहीं और नहीं मिलेगा।इसलिए तुम बेखटके जाओ।उड़ो और दूसरों को उड़ाओ।

राफ़ेल : मेरी घबराहट का कारण कुछ और है।कहा जा रहा है कि मेरे सौदे में कुछ लोगों ने खाने-पीने के बाद डकार भी नहीं ली।यह बात विरोधियों को हज़म नहीं हो रही है।इसी पर सारा बवाल मचा हुआ है।जिन्हें खाने को नहीं मिला,उनका हाज़मा तो ख़राब होगा ही।सबके पेट भरने का इंतज़ाम मैं अकेले कैसे कर सकता हूँ ! हमने तो सुना है वहाँ नाले से भी गैस बनती है।सरकार को चाहिए कि इसका ठेका अपने विरोधियों को दे दे।उनके मुँह में भी ढक्कन लग जाएगा।तुम क्या सोचती हो इस बारे में बहन ?

बोफ़ोर्स : मैं तो बिंदास हूँ।शुरू-शुरू में मुझे भी झटका लगा था पर अब सब नॉर्मल लगता है।धीरे-धीरे तुम भी अभ्यस्त हो जाओगे।रही बात खाने-पीने की,तो इस मामले में भारतीय ज़्यादा चूज़ी नहीं हैं।जहाँ भी मिलता है,जो भी मिलता है,खा लेते हैं।हम किसी के पेट भरने का निमित्त बनें,यह हमारे लिए गौरव की बात है।हम दगते हैं,दग़ा नहीं देते।हम ख़ास मिशन के लिए बने हैं,‘कमीशनतो हम हथियारों का प्राण-तत्व है।ये हो तो हम कहीं -जा नहीं सकते।विकास के असली सारथी हम हथियार हैं।इसीलिए सभी विकसित देश हथियार संपन्न हैं।वास्तव में शांतिकाल विकास-विरोधी होता है।लड़ाई रोज़गार का प्रमुख साधन है और हमारे तुम्हारे रहते इसमें किसी प्रकार की कमी नहीं आएगी।माहौल पूरी तरह से तुम्हारे पक्ष में है।जितना तुम परअटैकहोगा,उतना ही अटैक करने की तुम्हारी क्षमता बढ़ेगी।

इस बातचीत के बाद से ही राफ़ेल की लोकेशन नामालूम है।ख़बर है कि मीडिया जल्द ही इस परसर्जिकल स्ट्राइककरने वाली है।

संतोष त्रिवेदी





रविवार, 9 सितंबर 2018

गिरकर उठने का सुख !

वे फिर से गिर गए।अबकी बार गहरे गड्ढे में गिरे।सड़क पर चलते हुए वे देश के प्रति चिंतन कर रहे थे।इस बीच बरसाती पानी से लबालब छोटे-मोटे गड्ढों ने कई बार उन्हें अपनी गोद में बैठाना चाहा पर वे सफल नहीं हो पाए।वे ज़रा गहरे मिज़ाज के आदमी ठहरे,इसलिए गहराई में चले गए।दृढ़-निश्चयी इतने कि बारिश की तरह उनका चिंतन भी मूसलाधार बरस रहा था।वह बंद नहीं हुआ।वे सोचने लगे,उनके गिरने के पीछे भी कोई उद्देश्य है।ईश्वर ने कुछ सोचकर ही गिराया होगा।सरकार तो उनकी अपनी है।वह उन्हें कैसे गिरा सकती है।हाँ,भले ही कुछ देश-विरोधी ताक़तें सरकार गिराने की साज़िश रचें।उनके गिरने में तो कोई साज़िश भी नहीं है।यह संयोग है।सहमति से ‘गिरना’ वैसे भी कोई अपराध नहीं है।यहाँ तो वे सड़क,सरकार और ईश्वर सब उनके साथ हैं।वे गिरे हैं तो इसमें भी देश का ही भला है।गिरने में काहे की लाज और शर्म ! वे तो फिर भी खुलेआम गिरे हैं।अब वे खुलकर चिंतन करने लगे।

बाज़ार में रुपया गिर रहा है।रोज़ गिर रहा है।पहले जब कभी-कभी गिरता था,ख़ूब चिल्ल-पों होती थी।अब रोज़ गिरता है,कोई नोटिस नहीं लेता।रुपया भी चल रहा है,बाज़ार भी और सरकार भी।कोई दिक़्क़त ही नहीं।सब अपने-अपने ट्रैक पर सरपट हैं।जिसको लगता है कि गिरने से गति बाधित होती है,वे किताबी-दुनिया के जीव हैं।बाहरी दुनिया विज्ञान के भरोसे नहीं चलती।यहाँ सबके अपने-अपने ज्ञान हैं।सोशल मीडिया में ख़ूब चलते भी हैं।गिरावट तो आदमी की मूल प्रकृति है।वह गिरकर ही उठता है।ऐसे में कोई समझदार आदमी गिरने का नोटिस नहीं करता।वह कितना उठा है,यह देखा जाता है।वे भले आज गड्ढे में हैं पर गिरकर उठने के मामले में काफ़ी वरिष्ठ हो चुके हैं।

और ज़्यादा दूर क्यों जाएँ ! पिछली बार साहित्य में गिरे थे।क्या गिरे थे ! पूरे साहित्य-जगत में हाहाकर मच गया था।सारे सम्मान उन्हीं के सिर पर आकर गिरे थे।उनके कलापक्ष की ख़ूब तारीफ़ हुई थी।उन्होंने एक इंटरव्यू में ही एक स्थापित लेखक को उखाड़ फेंका था।ऐसी कलाबाज़ी एक दिन के कमाल से नहीं आती।इसके लिए निरंतर गिरना होता है।गिरना एक कला है,इसे उन्होंने ही स्थापित किया है।जब कलाबाज़ी विकसित हो जाती है,बुद्धिजीवी इसे कलावाद कहते हैं।

‘वाद’ से उन्हें याद आया कि गिरावट का यही प्राणतत्व है।यह ‘वाद’ सेफ़्टी-वॉल्व का काम करता है।हमारी अर्थव्यवस्था बाज़ार के भरोसे रहती तो कब की बर्बाद हो जाती।जब से बाज़ारवाद आया,पीछे मुड़कर देखने का समय ही नहीं मिला।गिरता हुआ रुपया बाज़ारवाद की गोद में उसी तरह सुरक्षित है जैसे वे गड्ढे में।जब तक वे गड्ढे में हैं,साहित्य भी पूरी तरह सुरक्षित है।उनके बाहर आते ही सड़क की तरह साहित्य की भी पोल खुल जाएगी।वे साहित्यप्रेमी हैं।उसके सम्मान के लिए अपना सम्मान दाँव पर लगा देंगे।इस बार का गड्ढा गहरा है तो सम्मान भी गहरा होना चाहिए।सरकार ने अबकी बार ‘पद्म’ सम्मान के लिए खुलेआम आमंत्रण दिया है।कोई किसी का नाम भेज सकता है।सम्मान का हरण ,माफ़ कीजिएगा ,वरण वे ही करेंगे।साहित्य में उनसे ज़्यादा गिरा हुआ कोई दूसरा नहीं।यहीं रहकर वे प्रगतिशील और सहिष्णु बने हैं ।गिरने को लेकर कभी उनके मन में दुविधा नहीं रही।जब मौक़ा मिलता है,गिर लेते हैं।संयोग देखिए कि वे आलरेडी कीचड़ से भरे गड्ढे में हैं।उनसे अधिक सुपात्र कोई और कैसे हो सकता है ! कीचड़वाद के वे ही अगुआ हैं।इस बात की तस्दीक़ वहाँ उपस्थित सभी केंचुओं से की जा सकती है।कुछ केंचुओं ने तो उनके कीचड़ में गिरने को एक क्रांतिकारी क़दम बताया है।अब इससे बाहर वे तभी निकलेंगे,जब उनके कीचड़-सने हाथों में ‘पद्म’ होगा।

अचानक गड्ढे के बाहर हलचल सुनाई देने लगी।उन्हें लगा कि उनके सम्मान में साहित्यिक-बिरादरी भी उनके साथ आ गई है।वे गड्ढे में थे,इसलिए दूर का दिख नहीं रहा था।आँखों में लगे चश्मे को उन्होंने ललाट पर चढ़ा लिया।उन्हें दूरदृष्टि की प्राप्ति हुई।गिद्धदृष्टि से वे मामले को समझने की कोशिश करने लगे।पता चला कि उन्हें उठाने के लिए क्रेन आई हुई है।वे साहित्य में अचानक इतना उठ जाएँगे,नहीं सोचा था।काश और पहले गड्ढे में गिरे होते।वे कुछ और चिंतन करते कि क्रेन के लंबे-लंबे हाथों ने उन्हें बाहर ला पटका।मगर यह क्या ! यहाँ तो साँड़ और गायों का जमघट लगा था।वे इस बात के लिए आंदोलन कर रहे थे कि गड्ढे में आदमी ने कैसे घुसपैठ कर ली।कुछ वरिष्ठ साँड़ तो उन्हें सींग मारने वाले थे,तभी एक बूढ़ी गाय उनके सामने आ गई।उस समय उनकी दशा उससे भी जर्जर थी।आख़िरकार गाय को ही उन पर दया आ गई।बोली,’बेटा तुमने हमें घर से,जंगल से सब जगह से निकाल दिया है।अब सड़क के गड्ढे ही हमारा आसरा हैं।यहाँ भी तुमने क़ब्ज़ा कर लिया तो हम कहाँ जाएँगे ? पर तुम्हारी हालत देखकर तो मुझे तरस आ रहा है।तुम भले हमें भूल जाओ,माँ कभी अपने बेटों को नहीं भूल सकती।उन्हें गड्ढे में गिरा हुआ नहीं देख सकती।’

यह सब सुनकर उनका सारा चिंतन कीचड़ में मिल गया।वे घर की ओर भागे।इस समय उनको अपनी बूढ़ी माँ की बहुत याद आ रही थी।

संतोष त्रिवेदी

रविवार, 12 अगस्त 2018

भीख माँगने की आज़ादी !

तमाम बुरी ख़बरों के बीच बड़े दिनों बाद आख़िरकार एक अच्छी ख़बर आई है।देश की राजधानी में भीख माँगना अब अपराध नहीं है।इसके शुरुआती संकेत बड़ी उम्मीद पैदा कर रहे हैं।भीख माँगने वाले अब अपने पात्र रुपयों से ही नहीं सम्मान से भी भर पाएँगे।कोई भी कहीं भीख माँगने बैठ सकता है।हवलदार साहब अब हर ‘हफ़्ता’ उसे परेशान नहीं कर सकते।अगर इस फ़ैसले से उनका हाथ तंग होने लगे तो वह ख़ुद भी चौराहों पर,बाज़ारों में हाथ पसार कर आत्म-निर्भर हो सकते हैं।बशर्ते पकड़े जाने पर उन्हें यह बताना ज़रूरी होगा कि यह विशुद्ध भीख है।इसके सिवा कुछ नहीं।कुछ लोग बक़ायदा प्लान करके सपरिवार भिक्षाटन पर भी जा सकते हैं।इससे देश की अर्थव्यवस्था तो मज़बूत होगी ही,सरकार का सरदर्द भी कम होगा।

इस सेक्टर में अचानक नयी सम्भावनाएँ दिखने लगी हैं।पारंपरिक भिखारी भीख माँगने के नए ‘फ़्रंट’ खोल सकते हैं।वे ‘डिजिटल-भीख’,’पॉलिटिकल-भीख’और ‘इंटरनेशनल भीख’ के ज़रिए देश की तक़दीर बदल सकते हैं।डिजिटल-भीख के ज़रिए जहाँ ऑनलाइन ठगी को वैधता मिलेगी,वहीं ‘इंटरनेशनल-भीख’ बड़े-बड़े क़र्ज़दाताओं और डिफ़ॉल्टरों को कर्जमुक्ति के साथ-साथ संपूर्ण सुरक्षा भी देगी ।सबसे क्रान्तिकारी परिवर्तन तो ‘पॉलिटिकल-भीख’ के ज़रिए आने वाला है।पहले नेताओं को वोट के बदले कुछ वादे देने की ज़हमत करनी पड़ती थी,इस ‘स्कीम’ के लागू हो जाने के बाद अपनी झोली में वोट लेना उनका बुनियादी हक़ होगा।वे इसे अब भीख के रूप में ही स्वीकार करेंगे ताकि आश्वासन चुकाने का भी कोई झंझट न हो।और हाँ,वसूली की आस तो ‘जीवित’ प्राणियों से होती है।मुर्दे किसी भी तरह की देनदारी से बरी होते हैं।भिखारियों के बारे में रहीम जी बहुत पहले कह गए हैं;’रहिमन वे नर मर चुके जो कछु माँगन जाँहि’।माँगते समय नेता बिलकुल ‘नर’ जैसा होता है।ऐसे में ‘पॉलिटिकल-भीख’ सेक्टर में अपनी सम्भावनाएँ तलाश रहे एक घुटे हुए नेता से भेंट हुई।उन्होंने हमें बताया कि भीख माँगने का एक स्टार्ट-अप भी खोल दिया है।इससे भिखारियों की ’मैनपॉवर’ बढ़ जाएगी।नेताजी ने आगे बताया,’हम ज़मीनी स्तर पर तो भीख माँग ही रहे हैं,डिजिटल-भीख को भी प्रोत्साहित करने जा रहे हैं।जो भी हमें डिजिटल-भीख देगा,हम उसे इनाम में  ‘भीखबैक’ देंगे।यानी ठीक ढंग से भीख देने लायक बनाएँगे।यह हमारी ऐसी योजना है जिसमें भीख देने वाला लालच से मुक्त होगा।जनता को भिखारी बनाने का टारगेट हम समय से पहले पूरा करके दिखाएँगे।’

‘तो क्या अब आप संकल्प-पत्र भी नहीं पेश करेंगे ?’ हमने बहुत झिझकते हुए उनकी ओर सवाल फेंका।नेताजी अनुभवी थे।इतने वज़नदार सवाल को हवा में ही लपक लिया।कहने लगे-आज़ादी के सत्तर साल बीत गए हैं।आज तक हमारे मतदाता भाई आत्मनिर्भर नहीं हो पाए हैं।हर चुनाव से पहले उन्हें नामुराद वोट के बदले कुछ पाने की तलब मचने लगती है।यह बात न लोकतंत्र के लिए ठीक है न भारतीयता के लिए।हमारे यहाँ पेड़ फल के बदले कुछ नहीं लेते,नदियाँ निःस्वार्थ भाव से जल देती हैं।हम तो फिर भी आदमी ठहरे।पाँच साल तक शांति से क्यूँ नहीं ठहर सकते ? हम संकल्प लेते हैं कि अपने वोटर को चुनावों से पहले अपना मुँह नहीं दिखाएँगे।क्या यह कम त्याग है इस ज़माने में ? उनके कहने के अंदाज़ से हम बिलकुल लाजवाब हो गए।

तभी एक आर्थिक भिखारी न जाने कहाँ से प्रकट हो गए ! कहने लगे,‘देश की आज़ादी सेलिब्रेट करने के लिए लंदन के ठंडे मौसम को छोड़कर यहाँ आया हूँ।देश हमसे और उम्मीद न करे।हमें ज़रूर देश से उम्मीद है।राजधानी में भीख माँगने की आज़ादी हमारी आर्थिक आज़ादी की ओर महत्वपूर्ण क़दम है।हम चाहते हैं कि इसे पूरे देश में लागू किया जाय।इससे सरकार की बेरोज़गारी की एक बड़ी समस्या बैठे-ठाले हल हो सकेगी।पढ़े-लिखों के लिए इस क्षेत्र में कई मौक़े आने वाले हैं।वे अपने इलाक़े की सीमा के पार भी जाकर ‘भीखबारी’ कर सकते हैं।इस कार्रवाई से बेरोज़गारी के कई अड्डे तो तबाह होंगे ही भीख की क्वॉलिटी सुधरेगी सो अलग।सरकार चाहे तो हमें ‘इंटरनेशनल भीख’ का ब्रांड एंबेसडर घोषित कर सकती है।देशी-विदेशी फ़ंड हड़पने का हमें व्यापक अनुभव है।’ हम देश और आज़ादी के प्रति उनकी प्रतिबद्धता के आगे नतमस्तक हो गए।

हमारी यह एक्सक्लूसिव बातचीत साथ बैठे बुज़ुर्ग ने सुन ली।उन्होंने कुछ बोलने की आज़ादी माँगी।हम आज़ादी के फ़ुल मूड में थे,दे दी।बुज़ुर्ग कहने लगे,‘भाई,आज हम सब हर तरह से आज़ाद हैं।जिसे देखो वही ‘हम लेके रहेंगे आज़ादी’ के मिशन में लगा हुआ है।सब अपनी-अपनी आज़ादी चाहते हैं।भीड़ को इंसाफ़ करने की आज़ादी चाहिए,बलात्कारी को पशु से भी अपनी हवस पूरी करने की आज़ादी हो।सड़कों पर पूजा-पाठ और हुड़दंग करने की आज़ादी हो।भ्रष्ट आचरण को देश-भक्ति समझने की आज़ादी हो।जब इतनी सारी आज़ादियाँ हमारे इर्द-गिर्द नाच रही हों,ऐसे में भीख माँगने की आज़ादी मिलना कम बड़ी उपलब्धि नहीं है।’

इतना कहकर बुज़ुर्ग अंतर्धान हो गए।शायद मारे ख़ुशी के वे अपना चश्मा ले जाना भूल गए।तभी से हम उनको ढूँढ़ रहे हैं ताकि वे आज़ादी के जश्न को अपने चश्मे से भलीभाँति देख सकें।

संतोष त्रिवेदी

संघर्ष का नया तरीका

आंदोलन ख़त्म हो चुका था।आँसू गैस के गोले और लाठी - डंडे तनिक विश्राम के लिए सुस्ताने लगे थे।सड़क का शोर बैरिकेड तोड़कर ...