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बुधवार, 5 सितंबर 2012

संसद जी रुकी हुई हैं !

  

दैनिक ट्रिब्यून में ०५/०९/२०१२ को प्रकाशित
 
मॉल में घुसते ही माननीय मिल गए।वे अपने चुन्नू-मुन्नू के साथ चहचहाई-मुद्रा में खिलखिला रहे थे। मैंने माननीय से उनका हालचाल पूछा तो उन्होंने कहा कि देखिये इस समय प्रश्नकाल नहीं है और मैं देशहित में ऐसे स्थगित समय में न कुछ पूछता हूँ और न बताता हूँ।जो कुछ भी पूछना या बताना है मैं संसद जी को ही बताऊँगा। मैंने पूछा कि वो कहाँ मिलेंगी,उन्होंने अगले चौराहे की तरफ इशारा किया कि इस समय वो वहीँ पर हैं और खाली हैं।ऐसा कहकर माननीय सपरिवार मल्टी-प्लेक्स में घुस गए,जहाँ से हलकट जवानीजैसा शोर सुनाई दे रहा था।

मैं चौराहे पर पहुँचा,बड़ी भीड़ लगी थी।आदमी जी से कारण पूछा तो उसने बताया,”जनाब,यह भीड़ चौराहे पर जाम के कारण लगी है।सुनते हैं कि संसद जी रुकी हुई हैं।मेरी उत्सुकता बढ़ गई और मैं किसी तरह वहाँ तक पहुँच गया।देखा तो संसद जी आराम की मुद्रा में बैठी हुई थीं और पास में देश जी निढाल हुए पड़े थे।मैंने संसद जी को पूरा सम्मान देते हुए सवाल दागा,’मैडम, ऐसा क्या हो गया है कि आपको यहाँ बीच चौराहे रुकना पड़ा ? उन्होंने बहुत गंभीर होकर कहा कि देखिये ,यह जाम तो लगेगा ही क्योंकि मुझे चलने नहीं दिया जा रहा है।मैं रुकी हुई हूँ तो देश जी भी रुक गए हैं क्योंकि अगर मैं नहीं चलूंगी तो ये भी नहीं आगे बढ़ेंगे।आज़ादी के समय ही हमारा ऐसा गठबंधन कर दिया गया था कि यदि माननीय हमें रोक लेंगे तो रुक जायेंगे और इस तरह देश जी भी।

तब तक पास पड़े देश जी को भी थोड़ा होश आ गया था।भ्रष्टाचार जी और मोटामाल जी तबीयत से उनकी देखरेख में लगे हुए थे। एक सेवक कोयले का डिब्बा पैक करा के लाया था और दूसरा नोटों का हार दुरुस्त कर रहा था।देश जी ने दूर खड़े आदमी जी को गुहार लगाई कि उन्हें चुल्लू भर पानी दे दे क्योंकि बाकियों का स्टॉक खत्म हो चुका था । उनको इसलिए भी परेशानी हो रही थी क्योंकि उनकी सेवा का टेंडर लेने वाले माननीय वहाँ से गैरहाजिर थे।पानी पीकर देश जी शुरू हो गए,”भई ,हम तो पिछले पैंसठ सालों से ऐसे ही रुक-रूककर चल रहे हैं।हमारी अपनी कोई चाल नहीं है।जब माननीय जी का पिकनिक का प्रोग्राम बनता है तब वे चलते हैं तभी संसद जी चलती हैं और हमें भी चलना पड़ता है।हमने सुना है कि हमारी सेवा के लिए हमें ही खोदकर माननीयों ने अपने चूल्हे के लिए कोयले का इंतजाम किया है।मैं तो कुछ कह भी नहीं सकता क्योंकि सबके सामने उन्होंने हमारी सेवा का वचन लिया है।हम उन पर भरोसा तोड़ने या चोरी का इलज़ाम भी नहीं लगा सकते हैं।ऐसा करने पर संसद जी ही नाराज़ हो जाएँगी,सो हम चुप हैं।

मैंने देश जी को तसल्ली देते हुए कहा कि आप नाहक परेशान हैं।एक बार संसद जी को चलने दीजिए,आपकी तबीयत भी ठीक हो जायेगी और माननीय के लिए कोयले के अलावा किसी और क्षेत्र में हुनर दिखाने का मौका मुहैया होगा अलग ! संसद जी मुस्कुराते हुए बोलीं,”सच में ,मैं भी चाहती हूँ कि मैं चलती रहूँ ताकि माननीय कुछ-न-कुछ खेल-तमाशा करते रहें क्योंकि मेरे रुकने से सब कुछ स्थगित हो गया है । मैंने थोड़ा-सा संशोधन किया ,हाँ मैडम ! आपके रुकने से देश जी,आदमी जी,उन्नति जी और सपना जी सभी रुक गए हैं,सिवाय माननीय  के ! यह गति बाधित न हुई होती तो अब तक देश जी न जाने कहाँ पहुँच जाते !


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०४/०९/२०१२ के 'जनसंदेशटाइम्स' में ...


डीएलए  में २१/०९/२०१२ को !
 
 
 
दैनिक मिलाप में ०७/०९/२०१२ को प्रकाशित

1 टिप्पणी:

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

यह ब्लॉग तो बढ़िया है जी। जन्म के साथ ही उँगली टेढ़ी किये है तो सफलता भी मिलनी ही है। हमारी शुभकामनाएं स्वीकार कीजिए जी।:)