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मंगलवार, 17 दिसंबर 2013

घोड़ों के गधे बनने का समय !

हिन्दुस्तान में 17/12/2013 को। 


ख़ास आदमी पहली बार भौचक है।उसे सूझ नहीं रहा कि क्या किया जाए ? अदने से आदमी ने उसे हलकान कर दिया है।अभी तक ख़ास के पास ही यह जिम्मेदारी रहती थी कि वह आपस में अदल-बदल करके आम को अपने शतरंजी चालों से चित्त करता रहे,पर इस बार बाज़ी बिलकुल पलट गई है।आम आदमी ने पासा फेंकना कब सीख लिया,ख़ास को पता ही न चला।उसमें भारी कसमसाहट है।वह आम आदमी को लोटा बता रहा है।उसे यह याद नहीं है कि उसने कई बार घोड़ा-मंडी लगाकर आम आदमी को अंगूठा दिखाया है।उसे यह बात पच नहीं पा रही है कि जिस आदमी को कंडीशंस अप्लाई के साथ जीने की मोहलत दी थी ,वही उस पर भारी शर्तें लाद रहा है।घोड़े आज गधे बनने पर मजबूर हैं,यह कैसा समय आ गया है ?

राम लीला मैदान में भूखों मरने वाला और लाल किले पर लाठी-गोली खाने वाला आम आदमी राजपथ पर सीना तानकर चले,यह बात ख़ास आदमी को नागवार गुजर रही है।वह चाहता है कि ख़ास व्यंजनों पर वह हाथ साफ़ करता रहे और आम आदमी बस टुकुर-टुकुर निहारता रहे। इस आम आदमी की जुर्रत तो देखिये।उसने साफा-पगड़ी बांधकर मंच पर माइक सम्भाल लिया है और ख़ास आदमी महज़ श्रोता बन गया है।उसे अब भी यकीन नहीं हो रहा है कि आम आदमी उसे निर्देश दे सकता है।सड़क पर मजमा लगाने वाला आदमी संसद की दहलीज़ तक आ जायेगा,यह देश के लोकतांत्रिक ढाँचे के लिए नुकसानदेह है।संसद के अंदर होने वाले नाटकों का यदि सड़कों पर खुलेआम मंचन होने लगेगा तो देश की संवैधानिक संस्थाओं की प्रतिष्ठा का क्या होगा,जिसे अब तक ख़ास आदमी ने बड़े जतन से बचा रखा है।

आम आदमी अब भार लादने की हैसियत में आ गया है,पर घोड़े इतनी आसानी से गधे की तरह रेंकने लगेंगे,ऐसा नहीं लगता है।

2 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

सच है, आम भी ख़ास हो लिया।

girish pankaj ने कहा…

धमाकेदार व्यंग्य है