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शुक्रवार, 28 अगस्त 2015

बाजार का बचना जरुरी है !

बाज़ार धड़ाम से गिरा है और इसकी गूंज भी चौतरफ़ा सुनाई दे रही है। चढ़ते-चढ़ते वह एकदम से बैठ गया है। इस पर न मीडिया चुप है न सरकार।बाजार के भाव गिरे तो खलबली मच गई जबकि आम आदमी की थाली से दाल-रोटी कब गिरी, किसी को खबर ही नहीं।इसका सीधा कारण यही है कि बाजार भारी है सो उसके गिरने पर आवाज आती है। आम आदमी का क्या है, वह मजे-मजे में ही गिर लेता है। वह उठकर भी क्या कर लेगा, इसलिए अर्थशास्त्री या सरकार उसकी ओर से बेफिक्र है।

विकसित हो रही अर्थव्यवस्था पर अचानक अंदेशे के बादल घिर आए हैं। यहाँ तक कि सरकार भी अपने मौन-कक्ष से बाहर निकल आई है। उसने बताया है कि बाजार जल्द ही गुलजार होगा। बड़े लोगों को उस पर वैसा ही भरोसा है जैसे छोटों को ‘अच्छे दिनों’ पर था.बहरहाल सरकार के एक मंत्री ने इसी दौरान यह बता दिया कि ‘अच्छे दिनों’ को लाना उनकी तरफ से कोई वादा नहीं नारा था। और यह भी उनका नहीं सोशल मीडिया में बैठे कुछ निठल्लों का। अब सरकार निठल्ली थोड़ी बैठी है! उसे तो बाजार के साथ चलना होता है।इसीलिए बाजार का बैठना उसे नहीं भा रहा।

पर क्या करें, रुपया और शेयर बाजार बैठ रहा है। इसे चलाने की उसे अधिक चिन्ता है। प्याज और दाल लगातार उठ रहे हैं। उसे उठने से परहेज नहीं है,सिवाय खुद के उठ जाने से। सरकार को फ़िक्र है कि बाजार इसी तरह बैठा रहा तो उसकी डोली भी जल्द उठ सकती है। बुलेट ट्रेन का वादा नारा बनकर हवा में उड़ सकता है। विदेशी दौरों से प्राप्त होने वाली हजारों बिलियन की धनराशि ‘कालेधन’ की तरह जुमला बन सकती है। प्याज और दाल का बढ़ना वैसे भी विकास का प्रतीक है। उसे लगता है कि इससे आम आदमी की क्रय-शक्ति और मज़बूत होगी। उसे इस समय पेट की नहीं ‘मन की बात’ सुननी चाहिए।'किरपा' वहीं से आएगी।

बाज़ार इस वक्त बुलिश नहीं बियरिश हो चला है। हम सबको ‘बियर’ करना ही होगा।कतई चिन्ता नहीं करनी चाहिए। बाज़ार को जल्द पैकेज मिलेगा।सरकार आवाज देगी ,’कितना कर दूँ...? पचास हज़ार...नहीं...साठ हज़ार....नहीं, लो सौ हज़ार करोड़ दिया’ और इस पैकेज के मिलते ही दड़बों में घुसे लोग सरपट दौड़ने लगेंगे। जिनके पेट और पीठ एकाकार हो चुके हैं,वे बैठे-बैठे योग करें।उन्हें 'भूख-मारक आसन' को दिन में तीन बार करना होगा। फिलहाल बाजार का बचना जरूरी है।

1 टिप्पणी:

Kavita Rawat ने कहा…

एक जरुरी सामयिक चिंतन