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सोमवार, 16 नवंबर 2015

पकड़ में डाॅन !

आज के समय में चोर-उचक्का होना बहुत बुरा है।पुलिस तो पुलिस पब्लिक तक हाथ-पैर तोड़ देती है।छोटी-मोटी हेराफेरी जहाँ जिंदगी तबाह कर देती है,वहीँ हवाला रैकेट चलाकर जेड प्लस सिक्योरिटी हासिल हो जाती है।एक ओर अपहरण और फिरौती का सतत अभ्यास जनतंत्र के मंदिर के कपाट खोल देता है वहीँ दूसरी ओर उठाईगिरी समाज से आपका सम्मान उठा लेती है।इसलिए करो तो कुछ बड़ा करो।गली के मुस्टंडे गुंडे नहीं देश-दुनिया के डॉन बनो।सफलता आपके कदम चूमेगी।चोर से एक अदना-सा सिपाही भी निपट लेता है और डॉन से बड़ी से बड़ी रणनीतियाँ पिटती और निपटती हैं।जेबकतरी,लूटमार आपको खतरे में डालती है पर आतंक और हत्याओं की जुगलबंदी आपको सेलेब्रिटी बनाता है।डॉन बाहर होता है तो राजनीति उपकृत होती है,अंदर होता है तो कारागार धन्य होता है।

डॉन पकड़ा नहीं जाता।वह अपने पकड़े जाने की बकायदा मुनादी करवाता है।जो पकड़ा जाए,वो डॉन नहीं।वह किसी चोर-उचक्के की तरह पांच या छह फीट का सींकिया पहलवान नहीं होता बल्कि गठीले किस्म का रोबदार रोल-मॉडल होता है।उसकी भूमिका सिनेमाई नायक या खलनायक जैसी होती है,किसी कॉमेडियन की तरह नहीं।छुटभइये से ‘भाई’ बनने का सफर ज्यादा लम्बा भी नहीं होता।पूत के पाँव पालने में ही दिख जाते हैं।किसी अपराधी को पकड़ने से पहले ही पुलिस को पता चल जाता है कि उसमें आगे बढ़ने की कितनी सम्भावनाएँ मौजूद हैं।पुलिस उन्हीं पर अपना हाथ साफ़ करती है जो छोटी-मोटी जेबें साफ़ करते हैं।लम्बे हाथ मारने वाले ‘माफिया’ श्रेणी में अपग्रेड हो जाते हैं।उनके ऊपर हाथ डालने में पुलिस के भी हाथ बंधे होते हैं।उठाईगीर इस मामले में पुलिस से पूरा सहयोग करते हैं।पुलिस भी इसलिए उनकी यथोचित आवभगत करती है।

चोर और डॉन का ट्रीटमेंट न एक सा होता है न हो सकता है।न पुलिस इच्छुक होती है न ही डॉक्टर।हट्टी-कट्टी देह पुलिस के संसर्ग में आते ही डायलिसिस पर आ जाती है।डॉन हमेशा हवाई रास्तों से आता है।बिजनेस क्लास में मुफ्त की डकार मारते और हवाई सुन्दरी से पेपर नैपकिन ग्रहण करते हुए वह सभी को कृतार्थ करता है।तमाम कैमरों के सामने एयरपोर्ट पर अवतरित होने के बाद कैमरों के फ्लैश देखकर ‘फ्लाईंग किस’ देता है।और इस तरह वह पूरी धज के साथ हमारी ‘पकड़’ में आता है।

वहीँ चोर-उचक्के और इलाकाई बदमाश परिवहन निगम की बस में खड़े-खड़े ही और मटमैले रूमाल से मुंह बाँधे हुए आ लेते हैं।हाँ,रास्ते में हवलदार साहब को उनका  साथ देने के लिए पकौड़े और जलेबियाँ ज़रूर बेमन खानी पड़ती हैं।उनके लिए अखबार में खबर का एक कोना भी बमुश्किल से नसीब होता है जबकि डॉन कई दिनों तक प्राइम टाइम के विमर्श को कब्जा लेता है।डॉन बाहर हो या अंदर,बाज़ार उसके साथ होता है।उसकी खबरों के प्रायोजक ‘भारत-निर्माण’ में लगी सीमेंट होती है।एक तरफ जेबकतरा अँधेरे कमरे में हवलदार से माँगी हुई बीड़ी सुलगाता है,वहीँ दूसरी तरफ डॉन विशेष कक्ष में मूंग की खिचड़ी में घी डालने की मनाही करता है।

डॉन का फिट और सुरक्षित होना सबसे ज़रूरी होता है।जो लोग उसके पकड़े जाने को लेकर जाल फैलाते और जान गँवाते हैं,वही उसकी चाक-चौबंद सुरक्षा में मुस्तैद हो जाते हैं।जो डॉन बाहर रहकर हमेशा चौकन्ना रहता है,पुलिस के हाथ लगकर आला दार्शनिक बन जाता है।चोर बमुश्किल इंसान होता है जबकि डॉन हिन्दू या मुसलमान होता है। चोर अपनी हैसियत के मुताबिक ‘थर्ड डिग्री’ से पास होता है जबकि डॉन न केवल सम्मान सहित उत्तीर्ण होता है,बल्कि राष्ट्रीय चैनल पर हमें दर्शन-सुख भी करवाता है।इसीलिए डॉन की पकड़ इतनी मानीखेज है।

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