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शुक्रवार, 27 मई 2016

उपलब्धियों का आतंक

दो साल पूरे हो गए हैं।विज्ञापनों में विकास और दरबार में फूल बरस रहे हैं।जनता के सेवक जनता की खातिर तपती गर्मी में दुशाले ओढ़ रहे हैं।यह सब इसलिए हो रहा है कि जितनी उम्मीद थी,उससे ज्यादा हुआ है।विरोधी तो विरोधी जनता का भी मुँह बंद हो गया है।मुँह केवल सरकार का खुला हुआ है जो गैर-इरादतन चुनाव से पहले खुल गया था।सरकार बड़ी कारसाज है।रेडियो,टीवी,अख़बार वह सब जगह दिख रही है ताकि जनता को शिकायत न रहे कि वह केवल चुनावों के समय ही दिखती है।मंहगाई,भ्रष्टाचार और कालेधन के लिए कहीं जगह नहीं बची है।सारा ‘स्पेस’ उपलब्धियों ने ले लिया है।‘दो साल-बेमिसाल’ की चपेट में कई चीजें आ गई हैं। जो प्याज पहले हमें रुला रहा था,अब स्वयं खून के आँसू बहा रहा है।आम जनता को रुलाने वाली दाल आज तिरस्कृत-सी पड़ी है।उसे कोई भर-नज़र भी नहीं देख पा रहा।लोग खाना और खरीदना दोनों भूल गए हैं।इससे भारी बचत हो रही है।रेलयात्रा का लेवल तत्काल-प्रभाव से ऊँचा हो गया है।इस वजह से ‘कैटल-क्लास’ को नियंत्रित करने में आसानी हुई है।ट्रेनें विलम्बित सुर में चल रही हैं,ताकि यात्री सफ़र का अधिकतम आनन्द ले सकें।
राजधानी में इस ‘दो-साला’ उपलब्धि पर राज-महोत्सव हो रहा है।देश के बाकी हिस्से भी सूखे की तरह इससे वंचित न रहें,इसके लिए चप्पे-चप्पे पर उत्सव-दल गठित कर दिए गए हैं।मंत्री और अफसर जनता के द्वार पर जाकर नगाड़ा बजा रहे हैं ताकि बहरे और अंधे लोग भी विकास की बहती गंगा में डूबने का अहसास कर सकें।सरकार के लिए जनता एक अच्छे ग्राहक की तरह है।अगर वह हो रहे विकास से अचेत है तो उसे सचेत करने का काम सरकार का ही है।इसीलिए ‘जागो ग्राहक जागो’ की तर्ज पर सरकार विकास की विज्ञापनबाजी कर रही है।
‘अबकी बार’ के दम पर आई सरकार ने अबकी बार विज्ञापन भी आदमकद कर दिए हैं।पूरा विकास दिखने के लिए यह ज़रूरी है कि सूरत पूरी दिखे।'अबकी बार’ के इतने सीक्वल बने हैं कि अख़बार का पन्ना अकिंचन-सा महसूस कर रहा है।बदलाव की बयार आने के बाद से ही यह जानने में सुभीता हुआ कि हमने अपने अगल-बगल कितने देशद्रोही पाले हुए हैं ! यह सबसे बड़ी उपलब्धि है।अब सरकार को केवल एक मिसकॉल देने की ज़रूरत है।वह अपनी कुशल-क्षेम हमें बताती रहेगी ताकि टीवी और अख़बारों में उसकी उपलब्धियों को देखकर हम आतंकित न हों।

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