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बुधवार, 7 नवंबर 2012

खुलासों की साप्ताहिक मंडी !



DLA 19 Nov 2012

दैनिक ट्रिब्यून में १५/११ /२०१२ को !

श्रीटाइम्स में १६/११/२०१२ को !

खुलासा जी ने अपने प्रकट होने का समय बता दिया था, इस वज़ह से सबके दिल की धुकधुकी बढ़ती जा रही थी।शुरू में तो ऐसे खुलासों से आनंद आ रहा था पर जब आये दिन ऐसे आयोजन होने लगे तो कई लोग आतंकित हो उठे कि किसी रोज़ उनका पुराना हिसाब न खुल जाय ! हमें भी रोज़-रोज़ कई जगह से बयान उठाने पड़ते थे । इस कारण प्रेस-वार्ता के नज़दीक आने पर हमारा भी हलक सूखने लगा था।बहरहाल, जब हम वहाँ पहुँचे तो देखा कि खुलासा जी पूरे मूड में थे।वे अपनी पूरी टीम के साथ आए थे।नियत समय पर खुलासा जी कैमरों से मुखातिब हुए।

खुलासा जी ने विस्फोटक मुद्रा को अख्तियार करते हुए देश के एक बड़े व्यापारी और उसके घराने को लपेटे में ले लिया।उनके द्वारा किया गया अविकल खुलासा इस तरह रहा ;’देश को वे चला रहे हैं।उनकी मुख्य जेब में देश की दोनों पार्टियाँ पहुँच चुकी हैं।अन्य छोटी पार्टियाँ उनकी आस्तीन के नीचे छिपी हुई हैं।उनके चौड़े और लंबे कोट के नीचे कइयों के पेट पल रहे हैं।उनका जब मन होता है तो वे अपनी जेबों को बाहर निकालकर किसी बड़ी दुकान का शोरूम बना देते हैं।इस तरह वे देश को सेल में लगाकर अपनी गैस और अपना तेल इन्हीं दुकानों से हम सबको बेच रहे हैं।’हम अपने मनमाफिक खबर पाकर,उनके द्वारा चिन्हित की गई दोनों जेबों की पुष्टि के लिए उनके गोदामों की तरफ बढ़ चले।

पहले हम दायीं जेब के पास पहुँचे तो उन्होंने हमसे निपटने की पूरी तैयारी कर रखी थी।हमारे कुछ पूछने  से पहले ही वे बिलबिला उठे,’अजी,खुलासा जी ने साप्ताहिक मंडी लगा रखी है।कई बार तो हफ्ता भी नहीं होता और वे टोपी लगाकर बैठ जाते हैं।यह तो सरकार जी को देखना चाहिए कि उनको इस तरह की साप्ताहिक हाट लगाने का लाइसेंस कैसे दे दिया ? रही बात ज़वाब देने की ,सो हम केवल पाँच साल बाद ही जवाब देते हैं और जिनको देते हैं उनके पास भी दो विकल्प हैं ;या तो हमारा ज़वाब सही माने या हमारे ही सहोदर बायें जी का।’इतना कहकर वे बिना हमारी प्रतिक्रिया लिए चल दिए।

बाएं जी के गोदाम में कुछ ज़्यादा ही गहमागहमी थी।कुछ लोग अंदर का माल बाहर कर रहे थे तो कुछ को टोकन बाँटकर प्रतीक्षा में खड़ा किया गया था।पता चला कि व्यापारी जी के कोट की ऊपरी बटन टूट गई थी सो उसके लगवाने के लिए टेंडर भरा जाना था ।बमुश्किल से बाएं जी से मुलाक़ात हुई तो उन्होंने उवाचा,’देखिए,हम इत्ते सालों से काम पर हैं,घोटालों के शतक तक लगा चुके हैं ,ऐसे में इन टुच्चे खुलासों पर कब तक जूझते रहेंगे ?हमारे लिए यह अब रूटीन वर्क बन गया है और हम अब इनकी परवाह भी नहीं करते।आप हमारे नए सेल्समैनों की भर्ती और उनकी पदोन्नति से यह बात समझ सकते हैं।’

उनकी बात पूरी भी नहीं हुई थी कि व्यापारी जी का एक प्रतिनिधि हमारी ओर लपका।वह ज़बरन अपना बयान देने पर उतारू था।हमने भी उसकी ओर ताका तो उसने ये ब्रह्मवाक्य कहे,’देश को चलाने का जो इलज़ाम हमारे ऊपर लगाकर हमारी थू-थू की जा रही है,इसमें हमारी क्या गलती है ? जब इसे चलाने का ईंधन हमारे ही पास है तो और कौन चलाएगा? भाई साहब ! शुक्र मनाइए कि यह काम हम कर रहे हैं नहीं तो देश को कोई अदना-सा आदमी उसे गड्ढे में लिए पड़ा होता।आज जो भी आर्थिक रफ़्तार है,हमारी वजह से है।’हमें इस बयान में तनिक भी सच्चाई नज़र नहीं आई और हमने अगले खुलासे तक अपना पैक-अप कर लिया ।

 जनसंदेश में ०७/११/२०१२ को प्रकाशित