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मंगलवार, 22 जनवरी 2013

युवराज का पहला साक्षात्कार !

नई दुनिया में २२/०१/२०१३ को !

दिल्ली में बर्फीली हवाएं चल रही थीं,पर जयपुर से चिंतन की गर्मी पाकर लौटे युवराज प्रसन्न-चित्त लग रहे थे।अमूमन वे किसी पत्रकार को सीधे मुंह नहीं लगाते क्योंकि इससे सलमान खुर्शीद बन जाने की आशंका रहती है । वैसे भी पत्रकारों की प्रेस-वार्ता बड़ी खतरनाक हो गई है,इसमें जूते-चप्पल से लेकर पानी पीने तक की गुंजाइश निकल आती है। हमारी बात और है, हम उनके मुंहलगे जो ठहरे ,सो चिंतन-शिविर की ख़ास उपलब्धियों को आम जनता तक पहुँचाने के लिए हमें बुलावा मिल गया ।

हमने उनसे पहला और सीधा सवाल यही किया कि अब आप पहले से अधिक आत्म-विश्वास महसूस कर रहे हैं ? वे चहकते हुए बोले,’यह सब हमारे कार्यकर्ताओं का किया - धरा है। हमारी पिछली नाकामियों की जानकारी के बावजूद,उनको लगता है कि हमारे अन्दर कहीं कुछ बचा हुआ है जो उन सबको बचा लेगा ।बस,यही सोचकर मेरे अन्दर भी आत्म-विश्वास लौट आया है ’। 'आपको अब पार्टी में उपाध्यक्ष पद की जिम्मेदारी सौंप दी गई है,इस पर आपका क्या कहना है ?'युवराज जरा सा भावुक होते हुए बोले,’मेरी माँ ने मुझे रोते हुए यह जिम्मेदारी दी है और मैं भी उनके गले लिपटकर खूब रोया हूँ । मैंने अपनी कमजोरी को ज़ाहिर न करते हुए उन्हें भरोसा दिलाया है कि सत्ता के जहर को हम पियेंगे भी और जीकर भी दिखायेंगे.इसके बाद उन्होंने कहा,बेटा,अब यह पूरा देश तुम्हारे हवाले है । तुम्हें आम आदमी से चिंता करने की कोई ज़रुरत नहीं है क्योंकि हमने पहले से ही ऐसी व्यवस्था कर दी है कि वो बस अपनी चिंता में ही डूबा रहेगा।'

इतना कहकर युवराज ने रूमाल निकालकर हमें पेश किया और हमने सूखी हुई आँखों पर ही उसे फेर लिया।थोड़ी निस्तब्धता के बाद हमने अपने कर्तव्य को तरजीह देते हुए इंटरव्यू का अगला सवाल किया,’अब आपकी प्राथमिकतायें क्या होंगी?’
युवराज ने शून्य की तरफ निहारते हुए और अपने दायें हाथ को चलायमान करते हुए कहा,’मैं अब आम आदमी के लिए काम करूंगा और इसी पर ध्यान दूंगा।विपक्ष से हमें तनिक भी डर नहीं है क्योंकि उसकी प्राथमिकताओं में देश की समस्याओं से कहीं अधिक खुद की हैं।आम आदमी पर ध्यान देना इसलिए भी आवश्यक हो गया है कि अब वह गूंगा नहीं रहा,बोलने लगा है.यहाँ तक कि पिछले दिनों एक पार्टी भी बन गई है।हम चाहेंगे कि जो सौ पैसे हम आम आदमी तक भेजते हैं,उसमें निन्यानवे पैसे वहां तक पहुंचें, इससे वह नियान्न्वे के चक्कर में ही उलझ कर रह जायेगा और हम आसानी से अपना कार्यकाल पूरा कर लेंगे ।’पर आपने एक पैसा क्यों बचा लिया?’हमने बीच में ही टोंका ।

वे हमें लगभग अन्दर की बात बताते हुए बोले,’भई !अब कम-से कम एक पैसा तो हम अपने कार्यकर्ताओं के लिए रखेंगे,नहीं तो पार्टी का काम कैसे चलेगा ?’पर एक पैसे से क्या होगा ?हमने अभी भी बात नहीं समझी थी ।वे अब फुसफुसाते हुए बोले,’वैसे तो वो निन्यानवे पैसे भी कौन-सा आम आदमी संभाल पायेगा ?वो उसके पास कागजी रूप से ही पहुंचेगा और वह इसे अपने पास रख भी नहीं पायेगा ।हमारे प्रबंधक दूसरे तरीकों से उस पैसे को अपनी अर्थ-व्यवस्था में ही खींच लायेंगे ।’
तबतक मैडम की आवाज़ सुनाई दी,’बेटा,अब सो जाओ ।बाकी बातें अगले चुनावों के बाद करना और हाँ,उस पत्रकार से अपना रूमाल ज़रूर वापस ले लेना,आगे काम आएगा ’। इतना सुनते ही हम बाहर आ गए।



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