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रविवार, 4 मई 2014

दो कारोबारियों से ख़ास इंटरव्यू !

04/05/2014 को जनसन्देश में !

कल शाम अचानक चौपाल में गहमागहमी बढ़ गई थी।मैंने सोचा,चुनाव का सीजन है,नेताजी पधारे होंगे।किसी क्रान्तिकारी बयान की उम्मीद में मैं भी भीड़ में शामिल हो गया।आश्चर्य हुआ कि दो भद्रजन हाथों में रजिस्टर लिए लोगों को कुछ दिखा रहे थे ।मैंने फ़िर भी अंदाज़ा लगाया कि किसी पार्टी के एजेंट होंगे,संशोधित घोषणा-पत्र समझा रहे होंगे;पर जब उनके पास पहुँचा तो मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई।पता चला कि ये कोई मामूली या जमीनी नेता नहीं बल्कि विशुद्ध जमीनी कारोबारी हैं।जमीन से गहरे जुड़ाव होने के कारण दोनों चुनावी हमलों के शिकार हो रहे हैं।भ्रष्टाचार,मंहगाई और साम्प्रदायिकता को परे धकेलकर इस समय यही दोनों सबसे बड़े मुद्दे बन गए हैं।इसलिए लोगों के सामने अपना अपना पक्ष रखने को आतुर हैं।बस,मुझे और क्या चाहिए था,मैंने दोनों से उनका पक्ष जानने की कोशिश की।

सबसे पहले मैंने तेल-फुलेल का धंधा करने वाले अघानी जी से सवाल किए :
मैं :आप किस तरह राजनीति की चपेट में आ गए ?
अघानी जी :देखिए,मैं एक छोटा कारोबारी हूँ।मुझे राजनीति से खास फायदा नहीं पहुँचा,बल्कि मैंने तो पहुँचाया ही है।अगर हम कारोबार में न आते तो राजनीति ही करते।यह त्याग कम है क्या ?
मैं:लेकिन आप पर टॉफियों के दाम पर जमीन लेने का आरोप है ?
अघानी जी :बस इसी बात की सफाई देने यहाँ आया हूँ।दरअसल,यह बात बिलकुल निराधार है क्योंकि हमने टॉफियों के दाम पर नहीं बल्कि चाकलेट के दाम पर ज़मीन ली है।इसका प्रमाण है कि यह जमीन एक-डेढ़ रूपये नहीं,पन्द्रह रूपये की दर पर ली गई है।आप चाहें तो रसीदें देख सकते हैं।
मैं: यह तो वाकई आपके साथ बड़ा अन्याय है।आप इसकी भरपाई कैसे करेंगे ?
अघानी :देखिए जी,हम ज़मीन या धन से नहीं बल्कि इस तरह के आरोपों से अघा गए हैं।अब इसकी भरपाई तो जनता ही करेगी।जैसे नेताओं के जनहित कार्यों की भरपाई जनता करती है,वैसे ही यह भी कर लेगी।हमें भारत के लोकतंत्र पर पूर्ण आस्था है।
मैं :और आप बघेरा जी ! तमाम सुरक्षा और सहूलियतों के बावजूद आप कैसे इस पिंजड़े में सॉरी पचड़े में फँस गए ?
बघेरा जी : दोष धंधे का नहीं रिश्ते का है जी।जिसे हम कारोबार समझते रहे ,वे इसे सरकार समझ रहे हैं।जब हम सरकार के हैं तो सरकार हमारी क्यों नहीं हो सकती ? यही बात समझाने हम यहाँ आए हैं।
मैं :आप पर पूरी ‘फिलम’ बन चुकी है,दामादश्री के नाम से।इस पर आपको क्या कहना है ?
बघेरा जी : हम तो इतना ही जानते हैं कि भारतीय संस्कृति में दामाद को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। हम उसी स्थान को ज़मीन के माध्यम से फैला रहे हैं,समृद्ध कर रहे हैं तो इसमें बुरा क्या है ? वे लोग उसी परम्परा को फिलम बनाकर आगे बढ़ा रहे हैं।
मैं : मगर आप पर सीधा आरोप है कि आप करोड़ों की ज़मीन डकार गए हैं ?
बघेरा जी : यह बात तथ्य से परे है।डकार तो पेट भरने पर ली जाती है और अभी तक आपको ऐसा कोई लक्षण दिखा हो तो बताओ ?
मैं : क्या सरकार और खास परिवार से जुड़े होने के कारण आपके कारोबार को कोई लाभ मिला है ?
बघेरा जी : हमको तो इत्ता ही लाभ समझ में आया है कि उसी के कारण यहाँ चौपाल में खड़े हैं और आप चुनावी माहौल में किसी नेता के बजाय हमारा इंटरव्यू ले रहे हैं।रही बात आरोपों की,सो हर सफल आदमी के हज़ार दुश्मन होते हैं,हमारे तो करोड़ों हो गए।
मैं : आप दोनों की परेशानियाँ एक-सी लग रही हैं।साथ में मिल क्यों नहीं जाते ?
इतना सुनते ही अघानी जी और बघेरा जी ने अपना-अपना हाथ मिलाया और चलते बने। हम भी एक्सक्लूसिव इंटरव्यू से लैस होकर अपने स्टूडियो की ओर भागे।

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