बुधवार, 20 मार्च 2013
बुधवार, 13 मार्च 2013
मुआवज़ा चाहिए या लैपटॉप ?
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| 13/03/2013 को जनसंदेश और जनवाणी में ! |
राजधानी जगह–जगह तोरण द्वारों से पट गई थी।बड़े-बड़े
होर्डिंग्स बता रहे थे कि कुछ भी सामान्य नहीं है।पहले तो मुझे शंका हुई कि कहीं
यह फागुनी-बयार का असर तो नहीं है पर अखबार में बड़े पन्ने में इश्तहार देखकर समझ
में आया कि प्रदेश में नई सरकार एक साल पूरा करने
जा रही है ।सरकार ने इस मौके पर ऐतिहासिक कदम उठाते हुए लैपटॉप बांटने का अभियान शुरू
किया है।युवा मुख्यमंत्री का उत्साही चेहरा इस पोस्टर में देखते ही बनता था। मेरे
मन में आया कि ऐसी अभूतपूर्व उपलब्धि के लिए उनको बधाई दे दूँ,सो मुख्यमंत्री जी
के आवास पर गुलदस्ता लेके पहुँच गया।
दरबान ने बिना कुछ पूछे ही सवाल दागा ‘लैपटॉप
लेने आए हो कि मुआवजा ? अगर लैपटॉप लेना है तो उसके लिए अपना नंबर लिखवा दो,अभी लाइन
लंबी है और अगर मुआवजा लेना है तो लिस्ट हमें दे दो।’ इस तरह के प्रश्न के लिए मैं
एकदम से तैयार नहीं था।मैंने अचकचाकर उत्तर दिया,’क्या मतलब? अरे भई ! मैं लैपटॉप
लेने या मुआवजे की लिस्ट लेकर नहीं आया हूँ।मैं तो बिना कुछ लिए ही इस सरकार को
शुभकामनाएँ देने आया हूँ।’दरबान ने मुझे ऊपर से नीचे तक निहारा और कहा,’फ़िलहाल
मुख्यमंत्री जी लैपटॉप और मुआवजे का ही वितरण कर रहे हैं,बहुत व्यस्त हैं।’मैंने
अपना परिचय दरबान को दिया तो उसने झट-से कहा,’पहले क्यों नहीं बताया ?
वितरण-समारोह की प्रक्रिया पत्रकारों के बिना थोड़ी पूरी होगी।आप बेधड़क जाइये।’
बड़े-से हॉल में दाखिल हुआ तो अंदर जश्न-सा माहौल
था।मुख्यमंत्री ने हाथ में कई लिस्टें थाम रखी थीं।मैं उन्हें गुलदस्ता सौंपने ही
जा रहा था कि एक अति-सक्रिय कार्यकर्त्ता ने सुरक्षा-कारणों का हवाला देकर उसे हथिया लिया । मैंने उन्हें
मौखिक रूप से ही एक-वर्षीय शुभकामनाएँ दीं ।उनका संकेत पाकर मैं पास वाली सीट पर
ही बैठ गया । अपने गुलदस्ते के साथ हुई घटना से आहत हुए बिना मैंने सहज होकर
मुख्यमंत्री जी से पूछा,’आप इस एक साल को किस तरह से देखते हैं ?’
मुख्यमंत्री जी ने उत्तर दिया,’यह बहुत ही गंभीर
प्रश्न है।हम इस साल के बजाय आगे की ओर देख रहे हैं । इसके बारे में भुक्त-भोगी
जनता ही बेहतर उत्तर दे सकती है ।इतने कम समय में ही हमने बड़े-बड़े अनुभव पा लिये
हैं । कुम्भ-हादसे की जिम्मेदारी लेते हुए मंत्री से हमने इस्तीफ़ा लिया फ़िर वापस
करके अपने आप दामन भी साफ़ कर लिया। पीडितों को मुआवजों के चेक देकर खून के धब्बे बड़ी
आसानी से धो लिए।सबसे बड़ी उपलब्धि तो हमें तब मिली जब हत्यारोपी होने पर अपने प्रिय
मंत्री को कुर्बान कर दिया ।उसने अपने पद के जाने और ट्रांसफर-पोस्टिंग में मिलने
वाले भत्ते के नुकसान की भरपाई के लिए मुआवजा तक नहीं माँगा ।उसे अपने संसाधनों पर
पूरा भरोसा है। पीडितों के लिए हमने मुआवजा देने के लिए हाथ खुला छोड़ दिया है ताकि
भविष्य में हमें कोई पीड़ा न हो।विपक्षी दल जहाँ झूठ-मूठ का लॉलीपॉप दे रहे
हैं,वहीँ हम बेरोज़गारी-भत्ते के बाद लैपटॉप बांट रहे हैं । इससे शिक्षित युवा
बेरोजगार नहीं होगा,उसका भी ‘टाइम-पास’ हो जायेगा।’
हमारी बातचीत बीच में ही रुक गई ।एक
कार्यकर्त्ता मुआवजे की लेटेस्ट-लिस्ट लेकर हाज़िर था और मुख्यमंत्री उसे अपने हाथ
में लेकर पढ़ने लगे ।उन्होंने अपने सचिव को आदेश दिया कि लगे हाथों एक-साला उपलब्धि
में इसे भी नत्थी कर दिया जाय !
शनिवार, 9 मार्च 2013
संसद से कुछ काम की ख़बरें !
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| 09/03/2013, nai dunia |
भारी शोर-शराबा,वॉक-ऑउट और हंगामे की खबरों के बीच संसद से अच्छी खबर आई है।बहुत दिन बाद संसद में सरकार और विपक्ष ने एक-दूसरे को सुना।इस सुखद शुरुआत का श्रेय हमारे प्रधानमंत्री को जाता है।मौन के ठप्पे को अचानक उन्होंने उतार फेंका और वे सदन में ज़बरदस्त बोले।इस बोलने की ऊर्जा का स्रोत उसके अगले दिन फूटा,जब युवराज ने साफ़ कह दिया कि वे न घोड़ी पर चढेंगे और न ही सिंहासन पर।हो सकता है,इसी बात से हमारे प्रधानमंत्री को अपनी ऐतिहासिक चुप्पी को तोड़ने का साहस मिला हो।
प्रधानमंत्री दार्शनिक अंदाज़ में विपक्ष पर टूट पड़े।उन्होंने बिना रुके,बिना थके ,विपक्ष पर केवल नकारात्मक सोचने का आरोप लगाया।उन्होंने आंकड़े देकर सदन के अंदर सिद्ध किया कि यूपीए के कार्यकाल में देश की विकास-दर एनडीए के समय से कहीं अधिक रही ।यह बात और है कि इतनी ऐतिहासिक ग्रोथ के बावजूद देश के आम आदमी का चेहरा लगातार सिकुड़ रहा है ,पर इसको विपक्ष साबित नहीं कर पाया।प्रधानमंत्री यही नहीं रुके।उन्होंने विपक्ष पर भावनात्मक चोट भी की और बिलकुल शातिराना और शायराना अंदाज़ में।संसद में असली काम-काज तभी शुरू हुआ जब उन्होंने यह शे’र पढ़ा,’हमको वफ़ा की है उनसे उम्मीद,जो नहीं जानते वफ़ा क्या है?’
सुनने वालों को तो पहले लगा कि प्रधानमंत्री अपनी निजी दर्द बयान कर रहे हैं क्योंकि उनकी वफादारी किसके साथ है,यह सब जानते हैं।पर विपक्ष की नेता ने इसे अपने ऊपर लिया और सरकार के हर कदम की तरह इसका भी जवाब देना ज़रूरी समझा।उन्होंने आक्रामक तेवर अख्तियार करते हुए बताया कि प्रधानमंत्री जी के एक शे’र का उधार नहीं रखेंगी,बदले में एक शे’र की उधारी और चढ़ा देंगी।यहाँ विपक्ष की नेता ने इस तथ्य को पूरी तरह से नज़रंदाज़ किया कि देश पर पहले से ही काफ़ी उधारी चढ़ी हुई है।बहरहाल,उन्होंने भी शेरो-शायरी के मजमे में अपनी तरफ़ से ये शे’र पढ़ा,’कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी,यूँ ही नहीं कोई बेवफा होता’।इसके बाद तो पूरा माहौल ही बदल गया।उन्होंने दूसरे शे’र में वफ़ा और ज़फा दोनों को घसीटते हुए तालियाँ बटोरी।
इस सुखद माहौल का फायदा उठाते हुए विपक्षी दल के नव-निर्वाचित अध्यक्ष जी भी बोले ।उन्होंने कहा कि वे प्रधानमंत्री जी के बोलने से बहुत प्रसन्न हैं।आखिर उन्होंने नौ साल बाद अपना मौन तोड़ा है।इसके बाद वे भी दार्शनिक अंदाज़ में बोले कि तेल खत्म होता हुआ दिया अचानक बड़ी ज़ोर से कुछ पलों के लिए टिमटिमाता है,उसके बाद उसकी लौ शांत हो जाती है और इसी तरह आने वाले समय में यह सरकार भी निष्प्राण हो जायेगी।दिये की तरह इसका भी तेल खत्म हो गया है।उन्होंने आगे यह नहीं कहा कि तेल का ड्रम और कुप्पी लिए वे तैयार बैठे हैं।इसकी वज़ह यह भी हो सकती है कि इसे लोग गंभीरता से ले लेते और उनका शायराना मूड खराब हो जाता।
सदन में बैठे लोग कुछ समय के लिए भूल गए कि वे वहाँ बैठे हैं जहाँ अकसर माइक फेंके जाते हैं,हाथापाई होती है और बिल फाड़े जाते हैं।ऐसे माहौल के लिए निश्चित ही सत्तापक्ष व विपक्ष बधाई के पात्र हैं।इसके लिए फागुन की उपस्थिति को किसी प्रकार से दोषी नहीं कहा जा सकता है।चाहे कारण जो भी रहे हों,कम-से कम इस बहाने संसद में कुछ काम की बातें होने की खबर आई।चर्चाकारों को टीवी चैनलों पर बोलने का विषय मिला।इससे आम आदमी में यह सन्देश बिलकुल नहीं गया कि भंग होने से पहले संसद अपनी उपस्थिति का भान करा रही है।
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