शुक्रवार, 31 मई 2024

योगिराज का ध्यान !

बहुत गंभीर था।यह गंभीरता उसकी हालत के बारे में नहीं थी।उसने एक नया प्रण लिया था,उसी को लेकर वह गंभीर था।पिछले दिनों उसने नीलकंठ की साधना की थी पर अधर्मियों के कारण उसमें तनिक व्यतिक्रम आ गया।विष पीने के बजाय वह विष उगलने लगा।यह उस पर परमात्मा का प्रताप ही था कि सारा विष जिह्वा के माध्यम से बहने लगा था।विष भले ही शरीर से निकल गया था,पर आत्मा में अब भी धँसा था।वरिष्ठ चिकित्सक ने परामर्श दिया, “योगिराज ! इस बार ग्रह-दशा अनुकूल नहीं है।आप पीले वस्त्र धारण कर दक्षिण-दिशा की ओर प्रस्थान करें।अनुकूल परिणाम आएँगे।”


योगिराज ने दक्षिण दिशा की ओर प्रस्थान किया।उसने देवताले की कविता का मनन नहीं किया था।इसलिए वह न कवि को जानता था,न कविता को।वह बिना डरे एक कंदरा में प्रविष्ट हुआ।जाने से पहले कैमरे को उसने आवश्यक निर्देश दिए;


चूँकि वह ध्यान में रहेगा,इसलिए उसका ध्यान सिर्फ़ उसकी ओर होना चाहिए।

चूँकि वह मौन रहेगा इसलिए चित्र बोलता हुआ हो !

चूँकि वह सत्य की जगह असत्य के प्रयोग करेगा इसलिए उसके दृष्टिकोण को हर कोण से दिखाना होगा।

चूँकि वह प्रतिक्षण आसन बदलेगा इसलिए कैमरे की दृष्टि उसकी ओर होगी।

इनमें से यदि कुछ भी भंग हुआ,उसका ध्यान-भंग होगा।


यदि किसी भी तरह उसका ध्यान-भंग हुआ,फिर उसकी दृष्टि से न कैमरा बचेगा न सृष्टि।


इतना कहकर योगी कंदरा में प्रवेश कर गया।


अभी तक योगी कंदरा में है

और मठ वसुंधरा में सुलग रहा है !


रविवार, 26 मई 2024

साहित्य को उठाने हेतु ज़रूरी सुझाव

कल सुबह मेल खोली तो ख़ुशी के मारे उछलने ही वाला था,पर घुटनों ने साथ नहीं दिया।किसी इनामी संस्था के सचिव का पत्र था।उन्होंने इस वर्ष के सम्मान देने के लिए मुझसे सुझाव माँगे थे।उत्सुकतावश संस्था का परिचय पढ़ने लगा।उसमें साफ़ लिखा था कि संस्था बहुत पुरानी है।विगत चालीस वर्षों से साहित्य-सेवा में अहर्निश जुटी हुई है।इस दौरान वह अनगिनत लेखकों और कवियों की झोली में सम्मान उड़ेल चुकी है।जो अपने लेखन से साहित्य-जगत में हलचल मचाने में असमर्थ होते हैं,संस्था तन और मन से उनकी सहायता करती है।जिस दिन उन्हें सम्मान की पुड़िया दी जाती है,उस दिन इंटरनेट मीडिया क्रैश हो जाता है।संस्था का दावा था कि उसके द्वारा सम्मानित साहित्यकार हर गली-मुहल्ले में मिल जाएँगे।इस वर्ष उनकी संस्था इक्कीस साहित्यकारों की भूख शांत करने के लिए प्रतिबद्ध है।इस पवित्र कार्य में आपसे सुझाव आमंत्रित हैं।आप अपनी संस्तुति भी दे सकते हैं।हम उस पर उदारतापूर्वक विचारेंगे।


पत्र पढ़कर घुटनों को भी ‘फीलगुड’ हुआ।इतनी ऐतिहासिक संस्था मुझसे सुझाव माँग रही है।मुझे भी सम्मानित करने का हौसला रखती है।यह मुझ पर ऊपर वाले की कृपा है।शहर के साहित्यकारों ने कभी मेरी सुध नहीं ली।ज़रूर इस साहित्य-सरगना को मुझमें ऐसा कुछ दिखा होगा,जो कभी मुझे नहीं दिखा।मैं उनकी उम्मीद नहीं तोड़ूँगा।मैंने साहित्य-सेवा करने का संकल्प उठा लिया।संस्था-सचिव को कई सुझाव लिख डाले ‘खटाखट-खटाखट’।व्यापक साहित्य-हित में उसी को यहाँ जारी कर रहा हूँ।


आपकी संस्था बड़ा नेक काम कर रही है।साहित्य की सबसे ज्वलंत समस्या का समाधान करने के लिए आप बधाई के पात्र हैं।बिलकुल सही जगह आपने संपर्क साधा है।वरना आजकल पता नहीं लोग किस-किस को साध रहे हैं ! रही मेरी बात,कई सम्मानार्थियों से मेरे वैध संबंध हैं।वे मुझे उठाते हैं,मैं उन्हें।आप नाहक परेशान हो रहे हैं।एक खोजेंगे,इक्कीस मिलेंगे।यह मेरी गारंटी है।अव्वल तो अब आपको बीस ही खोजने हैं।मैं आपके प्यार भरे अनुग्रह को इंकार नहीं कर सकता।इन दिनों लेखक और कवि कण-कण में सम्मान खोज रहे हैं।इससे साहित्य खूब फल-फूल रहा है पर साहित्यकारों में सम्मान की भीषण कमी है।उनकी इस क्षतिपूर्ति के लिए आपकी संस्था का प्रयास स्तुत्य है।इसके लिए सर्वप्रथम संस्था सम्मान की पात्र है।इसकी संस्तुति मैं कर रहा हूँ।प्रशस्ति-पत्र भी मैं ही लिखूँगा।एक सच्चा लेखक अहसानफ़रामोश नहीं होता।


बहरहाल,मेरे पास कुछ अनुभव हैं,जिन्हें आपसे साझा कर रहा हूँ।सम्मान-रहित जीवन कैसा होता है,यह मुझसे बेहतर कौन जानता है!आपके पास जो भी संस्तुति आए,ध्यान से देखना कि उसे पहले कोई सम्मान मिला है कि नहीं।अगर नहीं मिला तो फिर रिस्क न लें।हो सकता है,उसे इसीलिए न मिला हो कि सम्मान देने वालों का वह लिहाज़ न करता हो।साहित्यिक-गैंगस्टर को साहित्यकार न मानता हो।ऐसे लोगों को सम्मान बाँटना कुल्हाड़ी पर पैर मारना है।वह संस्था का असली उद्देश्य उजागर कर सकता है।ऐसे को सम्मानित करने का कोई औचित्य नहीं,जो सम्मान तक ठीक से हज़म नहीं कर सकता।इससे बेहतर है,अपने गैंग का विस्तार करें।सम्मानार्थी को व्हॉट्स-अप ग्रुप का सक्रिय सदस्य होना अनिवार्य हो।परिवारदार आदमी हो तो सोने पर सुहागा।समारोह में श्रोताओं की संख्या की चिंता भी नहीं करनी पड़ेगी।


अब दूसरे पहलू पर ज़्यादा गौर करिए।जिसके परिचय में जितने ज़्यादा सम्मान हों,उन्हें वरीयता दें।इनके मुँह में सम्मान लगा होता है।नहीं मिलने पर और ख़ूँख़ार हो उठते हैं।पक्षपात का आरोप और लगायेंगे।ऐसे ‘सीरियल-रिसीवर’ सरोकार से ज़्यादा सम्मान के प्यासे होते हैं।बारात में फूफा के बाद सम्मान का कोई भूखा होता है तो यही हैं।ये भले कठिन काव्य के प्रेत हों,पर इनकी सूरत एकदम सपाट और सरल होती है।गोष्ठियों में ये अपने लेखन को छोड़कर लिफ़ाफ़े और शॉल पर गर्व करते हैं।इनकी झोली कितनी भी भर जाए,पुष्पक-विमान में एक सीट की तरह एक लिफ़ाफ़े की गुंजाइश हमेशा रहती है।ये अनुभवी लोग होते हैं।दरअसल, सम्मान लेने की एक तमीज़ होती है।ये इसमें निपुण होते हैं।अख़बार के लिए स्वयं रपट भी ख़ुद लिख देते हैं।अगर भूखे-नंगों को सम्मान दोगे तो बड़ी थू-थू होगी।मेरी बात और है।मैं ऑलरेडी सम्मान-हीन हूँ।साहित्य के लिये पूरा जीवन होम कर चुका हूँ।बस,सम्मान पाने भर के लिए प्राण अटके हैं।मैंने भी बीड़ा उठाया है कि बिना अपने हिस्से का सम्मान लिए संसार नहीं छोड़ूँगा,साहित्य क्या चीज़ है ! हाँ,बाक़ियों के बारे में थोड़ा सतर्कता बरतना।सब मेरे जैसे संकल्पशील नहीं हैं।सम्मान न पाने पर गैंग और ग्रुप से भी भाग सकते हैं।संस्था चलानी है तो सहेजना और समेटना सीखिए।ईमानदारी से सरकार तक नहीं बचती,संस्था कैसे बचेगी ! 

एक आख़िरी सुझाव।सभी सम्मानयाफ़्ता लोगों की सूची बना लें।सम्मान की टोपी इन्हीं के इर्द-गिर्द घूमनी चाहिए।इनसे सहयोग वसूला जाए ताकि संस्था के साथ इनका ‘परमानेंट बॉण्ड’ स्थापित हो सके।ध्यान रहे,समय-समय पर ‘बॉण्ड’ कैश भी कराते रहें !


संतोष त्रिवेदी 


रविवार, 21 अप्रैल 2024

चुनावी-दौरे पर नेताजी

मेरे पड़ोस में एक बड़का नेताजी रहते हैं।आमतौर पर उनकी हरकतें सामान्य नहीं होती हैं पर जैसे ही चुनाव की घोषणा हुई,उनकी काया में अजीब-सी हरकत होने लगी।आँखें सुनने लगीं और कान देखने लगे।उनकी ज़ुबान में मिसरी-सी घुल गई।उन्होंने ऐलान कर दिया कि बहुत हुआ।अब वह जनता से मिले बिना नहीं रह सकते।पूरे पाँच साल हो गए जब वह आख़िरी बार लोगों के बीच गए थे।देश-सेवा में ऐसा फँसे कि जेल जाने तक की नौबत आ गई थी।यह तो कहो समय रहते वह सही समय पर जाग गए और साथ ही उनकी क़िस्मत भी।जागते ही मंत्री-पद की क़सम उठा ली।और फिर उसके बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा।इस व्यस्तता में उनका चुनाव-क्षेत्र भी लपेटे में आ गया।उसका नाम तक भूल गए।फिर क़िस्मत ने पलटी खाई।चुनावी-शंखनाद ने उनका स्मृति-दोष अचानक दूर कर दिया।अब उसी क्षेत्र से मिलने की चाहत में वह एकदम से छटपटा उठे।

अपने वातानुकूलित कक्ष से बाहर आकर उन्होंने फ़ौरी तौर पर मुआयना किया।मौसम में गर्मी तो बहुत थी पर सत्ता की गर्मी के आगे कुछ भी नहीं।उन्होंने तुरंत अपने सगे कार्यकर्ताओं को नसीहत दी कि वे मैदानी-कार्यकर्ताओं से तमीज़ से पेश आएँ।चुनाव संपन्न होने तक अपने जोश पर क़ाबू रखें।उनका क्षेत्र इस बार अति संवेदनशील घोषित हुआ है।वह स्वयं भी पर्याप्त संवेदनशील हैं।उन्होंने पहला संकल्प यही लिया कि जनता की वेदना को ज़रूर छुएँगे।अपने क्षेत्र को पर्यटन-केंद्र बनाकर ही दम लेंगे।उनके दौरे का इंतज़ाम फ़ौरन से पेश्तर किया जाए।वह किसानों,ग़रीबों,पीड़ितों और शोषितों से भरी-दुपहरी में मिलना चाहते हैं।अपने क़रीबियों से उन्होंने अपने मन की बात बता दी।


नेताजी अपना जीवन देश के लिए पहले ही समर्पित कर चुके हैं।उसी ‘समर्पण’ को फिर से ऊँचे रेट पर ‘रिडीम’ करवाने का ‘टैम’आ गया है।उन्हें ख़ुद से ज़्यादा अपनी जनता पर भरोसा है।उसके पास नेताजी की तरह याददाश्त लौटने की न कोई दवा है और न ही कोई विकल्प।यह सोचकर नेताजी को बड़ा सुकून मिला और वह मिशन ‘बेड़ापार’ के लिए जुट गए।


सूरज अभी निकला नहीं था पर नेताजी जन-संपर्क के लिए निकल पड़े।उनका क़ाफ़िला बड़ा सामान्य-सा था।महज़ दस कैमरे और बीस पत्रकार ही जुट पाए थे।नेताजी को ज़्यादा तामझाम पसंद नहीं था।क़ाफ़िले में सबसे आगे सौ मोटरसाइकिलें धूल उड़ा रही थीं।इसके ठीक पीछे पचासेक गाड़ियाँ धूल साफ़ करते हुए आगे बढ़ रहीं थीं।क्षेत्र के विकास की तरह इनकी गति भी मद्धम थी।नेताजी का निर्देश था कि क्षेत्र के साथ कदम से कदम मिलाकर चलना है।इन गाड़ियों में नेताजी की एक भी निजी गाड़ी नहीं थी।वह सालों से जनसेवा में कट्टरता से इतने लीन थे कि स्वयं की कभी सुध ही न ली।।इस कमी को उनके परिवारी जनों ने पूरा किया।चार-चार हाथों से विकास का साथ दिया।नेताजी ने उन्हें सड़कें और खदाने दीं,पुल दिए।बदले में उन्हें ‘मिशन’ पूरा करने के लिए मशीनरी मिली और जनता को मिले ढेर सारे वादे।वादों की सबसे बड़ी ख़ासियत यह है कि वे एक्सपायरी डेट के साथ आते हैं।नए वादे आते ही पुराने स्वतः पूरे हुए मान लिए जाते हैं।आज ऐसे ही नए वादों का जन्मदिन था।


गाँव की सीमा आते ही नेताजी पैदल हो गए।कई कार्यकर्ता पीछे छूट गए पर मीडिया के दिव्य नेत्रों से वह नहीं बच सके।बड़ी मुश्किल से नेताजी एक खेत में प्रकट हुए।वहाँ फ़सल कट रही थी।यह देखकर नेताजी को धक्का लगा।उनके रहते दूसरा कोई फसल कैसे काट सकता है।उन्होंने झट से एक हाथ से हँसिया झटक लिया।अगले पल गेहूँ की दो-तीन बालियाँ ज़मीन पर थीं।साथ में ख़ून भी।हँसिया के मालिक की चीख निकल गई।सरकार ज़ख़्मी हो गए हैं।इस ख़बर से घटनास्थल पर हड़कंप मच गया।ज़मीनी रिपोर्ट करने के लिए मैं बिलकुल पास में ही खड़ा था।अद्भुत दृश्य था।नेताजी लहुलुहान थे पर चेहरे पर तनिक भी शिकन नहीं थी।हँसिया पूरी तरह निर्दोष था।फसल की पत्तियों ने ही उनके हाथ को छलनी कर दिया था।मैंने नेताजी को आश्वस्त देखकर सवाल किया,‘फसल काटते हुए आपको गंभीर चोट लगी है।इससे आपके मंसूबों पर पानी तो नहीं फिरेगा ?’


‘अरे बंधु,यही मेरी जीत का टीका है।रक्त की एक-एक बूँद से जनता इसका जवाब देगी।’ कहते हुए नेताजी ने हँसिया उसके मूल स्वामी को सौंप दिया।‘सरकार,आप भूखे होंगे।मैं आपका पेट भी नहीं भर सकता।ऊपर से इतना रक्तपात हो गया।मैं बहुत बड़ा पापी हूँ।’ कहते हुए किसान बिलख उठा।नेताजी ने उसे गले लगा लिया।मन ही मन वह खुश थे कि उनकी ‘पंचवर्षीय-भूख’ का इंतज़ाम हो गया है।वह किसान के गले पड़े ही थे कि सहसा एक साथ कई आवाज़ें आईं, ‘खच्च ! खच्च ! खच्च !’ सबकी आँखें चौंधिया गईं।नेताजी ने अपनी मशीनरी को संकेत दिया।वे सब अगले ‘टारगेट’ की तरफ़ धुँआ छोड़ते हुए बढ़ चले।


अगले दिन सभी अख़बारों के मुखपृष्ठ पर सचित्र खबर छपी, ‘नेताजी ने अपने क्षेत्र में श्रमदान में भाग लिया और रक्तदान का शुभारंभ किया।उनसे मिलकर किसान खूब रोए !’


संतोष त्रिवेदी 


संघर्ष का नया तरीका

आंदोलन ख़त्म हो चुका था।आँसू गैस के गोले और लाठी - डंडे तनिक विश्राम के लिए सुस्ताने लगे थे।सड़क का शोर बैरिकेड तोड़कर ...