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बुधवार, 22 जनवरी 2014

सरकार धरने पर !



जनसन्देश में 22/01/2014 को
देश में यह हो क्या रहा है ? घोर अराजकता की हालत है।यहाँ एक सरकार ही धरने पर बैठ गई है।इसे चलाने वाला अपने को आम आदमी कहता है।पहले तो उसने हमें सत्ता से बेदखल किया,हमारी सरकार बनने से रोकी और अब हमें विपक्ष में भी नहीं बैठने दे रहा है।ऐसा कैसे चलेगा कि वही आदमी सरकार में रहे और वही विपक्ष में ?उसने खुलेआम संविधान का उल्लंघन किया है।सरकारें कभी सड़क पर नहीं चलतीं।उनके लिए बकायदा राजपथ का निर्माण किया गया है।यह आदमी गणतंत्र की रैली को राजपथ से जन-पथ पर लाना चाहता है।क्या देश के विकास की झाँकी वीआईपी दीर्घाओं से देखने के बजाय फुटपाथ पर खड़े होकर निहारी जा सकती है ? सर्दी में ठिठुरते हुए लोग हमारे गणतंत्र के आदर्श नहीं हो सकते।हम ऐसी व्यवस्था के लिए राजनीति में नहीं आये हैं जो खाते-पीते आदमी को सड़क पर ले आये।यह आदमी हमारी रोजी-रोटी पर लात मारने के बाद वातानुकूलित कमरों में हमें चैन से सोने भी नहीं दे रहा।

आम आदमी आखिर क्या चाहता है ? उसकी वजह से हमें अपनी गाड़ियों का काफिला छोटा करना पड़ा।अपनी लालबत्ती-गाड़ी में बैठने में अब डर लगता है।वह हमारे बंगले का साइज़ भी छोटा करने पर आमादा है।बिजली कम्पनियों का मुनाफ़ा घटाना पड़ा और यहाँ तक कि रंग बदलकर टोपी भी लगानी पड़ रही है।अब सर्द रात में खुले आसमान के नीचे सरकार सो रही है,ऐसा कैसे चलेगा ?जब हमें कुर्सी पर बैठकर शासन करने का जनादेश मिला है तो हम सड़क पर क्यूं आयें ? बहुत दिन संघर्ष किया है तब इस मुकाम पर पहुंचे हैं।ऐसी नौटंकी हमें बिलकुल सूट नहीं करती।हम तो मनोरंजन के लिए फ़िल्मी-सितारों को बुलाकर उन्हीं का नाच-गाना देख-सुन सकते हैं।इसके लिए सड़क नहीं,बंद कमरों में गर्मागर्म माहौल होना चाहिए।

वैसे भी धरने पर सरकार कैसे बैठ सकती है ? यह सोचकर ही हमारे हाथ-पाँव फूल रहे हैं।धरने-प्रदर्शन तो विपक्षियों का विशेषाधिकार है,उन्हीं को करने देना चाहिए।धरने तो हम भी करना चाहते हैं,पर इसके लिए आधुनिक सुविधाएँ ज़रूरी हैं।बारिश और सर्दी में धरना देना गणतंत्र के खिलाफ़ है।हमें खुले में कुछ भी करने की आदत नहीं है।इस तरह किसी सरकार का धरने पर बैठना हम नेताओं की छवि को कमजोर कर रहा है।सड़क पर खड़े होने की जगह रेहड़ी-पटरी वालों की है,नेताओं की नहीं।यह राम-राज नहीं ,बल्कि आम-राज है जो कि पूरी तरह से अराजक है।हम राजनीति में राज करने आये हैं न कि सड़क पर अपना तमाशा बनाने।सरकार आलीशान कार्यालयों से चलती है न कि सड़क से।यह सरकार ही नहीं संविधान का भी अपमान है।संविधान ने आम आदमी की सेवा के लिए हमें अधिकार दिया है,यह काम आम आदमी आम तरीके से नहीं कर सकता।आम आदमी को जब सरकार बनाने का काम दिया गया है तो वह सचिवालय में बैठकर सरकार चलाये।सत्ता की कुर्सी तो हमसे छूट ही गई ,हमें कम से कम धरने पर तो बैठने दो !

 

2 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

स्माल इज़ ब्यूटीफ़ुल

Kailash Sharma ने कहा…

बहुत सटीक व्यंग...