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शुक्रवार, 3 जनवरी 2014

ठण्ड से कोई नहीं मरता !


हरिभूमि और जनसन्देश में 03/01/2014 को
हमारा देश किसी मामले में आत्मनिर्भर हुआ हो या नहीं पर बयानों के मामले में कम से कम पूर्णतः आत्मनिर्भर हो चुका है।देश में पहले यह काम नेताओं के ही जिम्मे रहा करता था,पर अब उनसे प्रेरणा पाकर अफसरों ने यह ज़िम्मेदारी उठाने की सराहनीय पहल की है।इससे कम होती जा रही नेताई नस्ल और उनकी घास चरती अक्ल से जनता को चिंता करने की ज़रूरत नहीं है।नेता जी के बयानों का भरपूर लाभ आम आदमी तक पहुँचाने के लिए ह्रदय में संवेदना और आँखों में शर्म का समुद्र भरने की कुछ अफसरों ने प्रतिज्ञा कर ली है।नेता जी को अपने से कहीं ज्यादा चिंता उस आदमी की है,जिसने अपनी उँगली से वोटिंग मशीन को एक बार दबाकर अपनी सारी जिंदगी उनके नाम लिख दी है।अब यह नेता जी का फ़र्ज़ बन जाता है कि ऐसी परजा का वे ध्यान रखें।

नेताजी हालिया हुए दंगों से बहुत आहत हैं।ये दंगे हुए भी थे या किसी विरोधी की साजिश,अभी इस बात की भी जाँच होनी है पर शुरूआती तौर पर उन्होंने सरकारी आंकड़े को मानने की महानता दिखाई है।नेता जी आम आदमी के प्रति बड़े रहमदिल हैं और वो यह कतई नहीं मान सकते कि उनके राज में लोग तम्बुओं और टेन्टों में जीवन गुजारें।इसीलिए जब युवराज उन तम्बुओं को एक पर्यटन-स्थल समझ कर भ्रमण करते हैं तो उनकी जनसेवा का ज्वार हिलोरे मारने लगता है।नेता जी का साफ़ मानना है भीषण ठण्ड में तम्बुओं में रहने वाले पीड़ित नहीं हैं।उनके एक अफसर ने खुलासा किया कि वे सारे लोग भू-माफियाओं की तरह भूखंड कब्जाने के लिए वहां डटे हैं।उनके नवाबी मंत्री ने तो उन सबको युवराज के लिए कूड़ेदान में पड़े वोट भर कह दिया।इससे साफ़ ज़ाहिर हो गया कि वहां मरने-खपने वाली जनता और ठण्ड से मरने वाले बच्चे केवल ज़मीन हथियाने के चक्कर में मारे गए।

नेता जी के एक अफसर ने तो ठण्ड में बच्चों के मरने पर ऐतिहासिक और भौगोलिक शोध का परिचय दिया है।उसने अपनी आँखों में गज़ब की धूर्तता ओढ़ी और सरकार को बेपर्द होने से बचा लिया।उस अफसर ने सबके सामने खुलासा किया कि ठण्ड से कोई नहीं मरता ।अगर ठण्ड से कोई मरता होता तो साइबेरिया में कोई न बचता।उसका ऐसा तर्क सुनकर कई लोग वहीँ ज़मीन पर लोट गए।सुनते हैं कि अफसर के इस रह्स्योद्घाटन के बाद सरकार साइबेरिया जाने के लिए आम आदमी को अनुदान देने पर विचार भी कर रही है।इस बयान के बाद कई अफसरों ने वातानुकूलित गाड़ियों में बैठकर ठण्ड से काँपती राजधानी का रात में निरीक्षण भी किया और यह पाया कि पुलों के नीचे और सड़कों के किनारे लोग बड़े ही आराम से सोये पड़े हैं।यहाँ तक कि उनकी नींद तब भी नहीं टूटी जब किसी साहबजादे की गाड़ी उनमें से कुछ को रौंदकर चली गई।इससे स्पष्ट होता है कि ठण्ड से मरने वाली बात निहायत बेतुकी है।

नेता जी खुश हैं कि उनकी सरकार चल रही है।अफसर खुश हैं कि सरकार उनकी सुन रही है और जनता खुश है कि सरकार उन्हे मरने पर भी अनुदान दे रही है।कम से कम इसी बहाने वह साइबेरिया तो देख लेगी।


 

 

1 टिप्पणी:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

आत्मा ने कम्बल ओढ़ा है