पृष्ठ

शनिवार, 20 दिसंबर 2014

धरती का आँचल उड़ गया !

पहला दृश्य

स्कूल की घंटी उदास है।आज उससे मिलने न कोई हथौड़ा आया और न ही कोई बजानेवाला।उसे लगता नहीं कि फिर कभी वह पहले जैसा बज पायेगी।पहले उसे अपने बजने पर बहुत दर्द होता था,पर अब तो कोई दर्द ही महसूस नहीं होता।उसे लगता है कि कोई उसे जोर से बजाये ताकि वह अपने होने का अहसास कर सके पर हथौड़ा भी तो उसके पास नहीं आ रहा है।वह दूर कहीं चुपचाप पड़ा सुबक रहा है।हथौड़े को लगता है कि वह वार करना ही भूल गया है।उसका सारा जोर एकदम से कमजोर पड़ गया है।उसे उठाने वाले नन्हें हाथ कहीं बिला गए हैं।वह भारी बोझ तले दबा जा रहा है।

दूसरा दृश्य

कक्षा में चिर शांति है।दरवाजे खुले हैं पर कोई हलचल नहीं नज़र आती।जो शोर कभी तमाम प्रयासों के बाद भी काबू में नहीं आता था,आज बिलकुल नदारद है।बेंच सपाट पड़े हैं।उनने दरवाजे की तरफ से आँखें फेर ली हैं।वैसे उन पर मक्खियों के बैठने की भी जगह नहीं बची है।डेस्क उखड़े हुए हैं और उनकी गोद पथराई हुई है।ब्लैकबोर्ड रंगीन होकर पूरी कक्षा में छितर गया है।रोशनदान में एक उल्लू बार-बार फड़फड़ा रहा है।

तीसरा दृश्य

आँगन टकटकी लगाये ताक रहा है।अरसा हुआ नन्हें पांवों से उसे ठोकर खाए हुए।उसके सन्नाटे को चीरने के लिए उसके आर-पार कोई नहीं आ-जा रहा।गेंद दालान में बल्ले से चिपटी हुई पड़ी है।सामने खूँटी पर बस्ता टंगा है,जिस पर एक बदरंग टाई लटक रही है।किताबें बस्ते से झाँक रही हैं पर उनका मुँह बंद है।वे बस्ते के अंदर से छटपटा रही हैं पर निकल नहीं पा रहीं।किताबों के पन्ने हमेशा के लिए बंद हो चुके हैं और ड्राइंग कॉपी के सारे रंग उड़ गए हैं।

चौथा दृश्य

आले पर रखा दिया टिमटिमा रहा है।चूल्हा खामोश है और आग पहले से अधिक सर्द हो गई है।दूध की कटोरी बताशे के बिना बिन पिए ही पड़ी है।अम्मा का अंजन डिबिया में ही सूख गया है और बाबा की छड़ी टांड़ पर हमेशा के लिए पसर गई है।घर की डेहरी पर दो आँखें अभी भी टंगी हुई हैं और उनका रुख बाहर की ओर है।ऐसा लगता है जैसे स्थाई रूप से वे वहीँ गड़ गई हों।घर के दरवाजे कभी न बंद होने के लिए खुले पड़े हैं पर वहाँ किसी भी मौसम के आने के आसार नहीं दिखते।लगता है,बयार ने भी रास्ता बदल लिया है।

इन चार दृश्यों को देखने के बाद किसी और दृश्य को देखने की ताक़त हममें नहीं बची है।आखिरी बार देखता हूँ कि धरती ने अपने आँचल को हवा में जोर से उछाल दिया है और आसमान ने अपना कद झुकाकर खूँटी पर टंगे बस्ते को अपने कंधे पर लाद लिया है।धीरे-धीरे वह क्षितिज में कहीं विलीन हो गया है।दूर कहीं सियारों के रोने की आवाजें आ रही हैं।इससे इतना तो ज़रूर पता चलता है कि धरती पर कुछ बचा हुआ है।

2 टिप्‍पणियां:

Kavita Rawat ने कहा…

एक चिर चुपी के साथ खामोश घड़ियां रुला रही है ..

jyoti dehliwal ने कहा…

ईश्वर दुख सहने की शक्ति दे...!