पृष्ठ

सोमवार, 13 जून 2016

चूजे बांग दे रहे हैं क्योंकि मुर्गे यात्रा पर हैं !

पहले अंडा हुआ या मुर्गी,यह सवाल आदिकाल से चला आ रहा है पर उसका दो टूक उत्तर अभी तक नहीं मिला।इस बीच एक अनहोनी और हो गई।ताज़ा ताज़ा पैदा हुए चूजों ने वरिष्ठ मुर्गों को ही फोड़ना शुरू कर दिया।हालत यह हो गई है कि चूजे बांग दे रहे हैं और मुर्गे परम्परा और सम्मान का हाँका लगा रहे हैं।पर यह साहित्य की व्यंग्य-परम्परा ठहरी।वो स्वयं को भी नहीं बख्शती।बुजुर्ग मुर्गे बरसों से केवल मंच पर चढ़ने व नारियल फोड़ने के अभ्यासी रहे हैं।पिछले दिनों एक चूजे ने ऐसे ही एक मंच से अपनी तोतली-भाषा में कुछ सवाल उठाये तो व्यंग्य के मुर्दा-मुर्गों को प्राण-वायु मिल गई।वे तब से यहाँ-वहाँ खुद के मुर्ग-मुसल्लम बन जाने का अफसाना बयां कर रहे हैं।


व्यंग्य को अपनी चांदनी रात बनाने वालों के पेट में मरोड़ तभी से शुरू हुई जब कुछ खद्योतों ने उनकी कृत्रिम रोशनी लेने से इनकार कर दिया।उनकी सम्मान-यात्रा में पटाखे जलाने के बजाय अंगार बरसाने शुरू कर दिए।वे वरिष्ठ हैं और घर के बूढ़े हैं,इस ओट में वे अब तक बचे रहे पर इधर उजाला कुछ जल्दी फट गया।उनको लगा कुछ और फटा।वे सोच रहे थे कि उनके बांगने से ही व्यंग्य में भोर होगी पर इन नामुराद चूजों ने सब बिगाड़ दिया।अब वे सनीचर को बांग देते हैं तो भी ‘भास्कर’ उदित नहीं होते।तो क्या हुआ,उनके थैले में पड़े बासी पुष्प-पत्र फिर भी मुदित होते हैं।वे ‘वाह-वाह’ करके बाहर कूद पड़ते हैं।

व्यंग्य की इतनी लम्बी और दुसह यात्रा करना बुजुर्ग व्यंग्य-यात्री के लिए आसान नहीं है।इसकी साधना के लिए पहाड़ों में जाना पड़ता है।सम्मान का टोटा न पड़ जाए इसलिए वे हमेशा एक कोटा साथ रखते हैं।दिनोंदिन दुर्गम होती इस यात्रा में एक-दो एनजीओ और एकाध मुटल्ले प्रकाशक हमेशा उनके बगलगीर होते हैं।यही उनके सम्मान की ‘शोभा’ बढाते हैं और उन्हें रीचार्ज करते हैं।बीच-बीच में वे अपने लम्बे झोले से व्यंग्य के सिपाही निकालने का जादुई कारनामा अंजाम देते रहते हैं।सम्मान-समारोहों में यही सिपाही शाल ओढ़ाने और ताली बजाने सॉरी स्टैंडिंग ओवेशन के काम आते हैं।जादूगर खुश होता है,यात्रा आगे बढ़ती है।सुनते हैं कि इस यात्रा का अंतिम पड़ाव राष्ट्रपति-भवन का प्रांगण हैं,जहाँ पद्मश्री अपने प्रेमी का वरमाला लिए इंतज़ार कर रही है।इसके लिए बस किसी कमलगट्टे की तलाश है।

व्यंग्य में ‘क से कबूतर’ लिखकर गायब हो जाने वाले आजकल ‘उ का दास यानी उदास’ की टूटी माला जप रहे हैं।व्यंग्य की छाती पर चढ़े हुए सनीचर अब उन्हें व्यंग्य के उद्धारक नज़र आते हैं।समकालीन व्यंग्य में नई भोर तब आई जब व्यंग्य के पप्पुओं ने अचानक बांग देकर सोए हुए महारथियों की नींद हराम कर दी।हाँ,इससे थके-हारे लेखन के पुनर्वास की समस्या ज़रूर पैदा हो गई है।यह शिष्टाचार के विरुद्ध है पर हर पुराने को एक न एक दिन विसर्जित होना पड़ता है।यदि उसके लेखन में नयापन है तो इसके लिए आर्तनाद करने या हाहाकार मचाने की नहीं केवल लिखने की ज़रूरत है।कुछेक वरिष्ठ हैं भी जो बांह चढ़ाकर ज्ञान नहीं बघारते।वे नहीं उनकी कलम दहाड़ती है।

जो कलम अपनी विसंगतियों पर न चले,वो अधूरी है।जिन अंडों को आमलेट बनना था,सनातनी-भूखों के दुर्भाग्य से वे चूजे बन गए।व्यंग्य के भोर में चूजों की बस इतनी भर बांग है कि बुजुर्ग मुर्गे अपनी सम्मान-यात्रा के बीच में थोड़ा सुस्ताकर यह भी सोचें कि व्यंग्य के सम्मान के लिए वे कब बांग देंगे !



डिस्क्लेमर : अ-व्यंग्यकार इसे इग्नोर कर सकते हैं पर व्यंग्य का चूजा भी किसी विसंगति को बर्दाश्त नहीं कर सकता।



कोई टिप्पणी नहीं: