बुधवार, 6 मार्च 2013

मिशन,कमीशन और आम आदमी !



०६/०३/२०१३ को नैशनल दुनिया व जनसंदेश में !







सुबह-सुबह मंदिर के चबूतरे पर जैसे ही कदम रखा कि वहाँ पर पहले से ही खड़े दो लोगों ने मुझे आगे बढ़ने से रोक दिया।मैंने इसका कारण जानना चाहा तो दोनों ने एक साथ जवाब दिया कि उनके रहते मंदिर का प्रसाद कोई और उड़ा ले जाए,यह संभव नहीं है।मैंने कहा ,भई,मैं तो आम आदमी हूँ और मंदिर के प्रसाद पर मेरा भी हक है पर वे दोनों अपनी बात पर अड़ गए । मुझे जबरन रुकना पड़ा तो सोचा कि अब इस बात का पता लगना ज़रूरी है कि मुझे मंदिर का प्रसाद न मिलने के पीछे इनका क्या उद्देश्य है ?
मंदिर के बाहर ही एक बेंच पर हम उन दोनों के साथ बैठ गए।एक मेरे दायें बैठा और दूसरा मेरे मध्य में ;मैं बिलकुल किनारे था।मुझे गुस्सा आ रहा था कि उन दोनों ने मुझे मौलिक अधिकार से वंचित किया है।सबसे पहले मैंने दायीं तरफ़ वाले बंदे से पूछा कि वह  कौन है और मंदिर में प्रसाद लेने से उसका क्या नुकसान हो जायेगा ?

अपने भगवे पट्टे को लहराते हुए वह बन्दा बोला,’मैं मिशन हूँ और मेरा एकमात्र मिशन यही है कि इस बार मंदिर का ताला जब खुले तो सारा प्रसाद मैं ही चखूँ।इसके लिए मैंने लंबा इंतज़ार किया है और राम की कृपा से वह दिन अब आ गया है।तुम जैसे आम आदमी बीच में अड़ंगा न डालें,तो मेरा बहुप्रतीक्षित मिशन जल्द पूरा हो जायेगा’। ’और तुम कौन हो,क्या चाहते हो ?’ अब मैंने मध्य में बैठे हुए बंदे से भी यही सवाल किया।

वह बंदा बोला ,’मुझे सब लोग कमीशन के नाम से जानते हैं,इसलिए मैंने भी अब यही नाम धर लिया है।दरअसल यह हमारा पुश्तैनी धंधा है और हम इस काम में माहिर हैं।पिछले साठ-पैंसठ सालों से हम मंदिर की सेवा करते चले आ रहे हैं इसलिए प्रसाद पर बुनियादी हक हमारा ही बनता है।ये मिशन वाले नासमझ हैं।हर बार सुबह की आरती के वक्त मंदिर के चक्कर लगाने लगते हैं पर मंदिर के भक्तगण इन्हें कोई भाव नहीं देते।ये भगवान का नाम तो लेते हैं पर नज़र केवल प्रसाद पर रहती है,इसलिए अब तक इनका मिशन अधूरा है।’

अब वार्ताकार की मेरी हैसियत छिन गई थी।मिशन और कमीशन दोनों आपस में ही उलझने लगे थे।मैं आम आदमी की तरह केवल श्रोता भर रह गया था।मिशन जी ने कमीशन जी की पोल खोलते हुए कहा,’तुमने सारा प्रसाद अपने परिवार में ही बाँट लिया है।काफ़ी मात्रा में तुमने इस प्रसाद की सप्लाई बाहर भी की है।अगर हमने इस मंदिर को ही बचाने के लिए इसका एक खम्भा गिराया है तो तुम तो दीमक की तरह सारे मंदिर में चिपट गए हो।अब हम प्रसाद बंटने का इंतज़ार नहीं करने वाले हैं,बल्कि पूरा हड़प लेंगे,यही हमारा मिशन है।’

कमीशन जी बिलकुल शांत बैठे रहे।मिशन जी की बातों से बिना उत्तेजित हुए कहने लगे,’बेटा,यह बहुत बड़ा मंदिर है।किसी छोटे-मोटे मंदिर के पुजारी बनकर यह दंभ पाले बैठे हो कि बड़े मंदिर को भी संभाल लोगे,तो ये तुम्हारी भूल है।तुम्हारा जो भी मिशन है,कमीशन से ही बना है।हमने हमेशा कमीशन खाया और बिठाया है,इसलिए इस क्षेत्र के सबसे बड़े तजुर्बेकार हमीं है।अबकी बार तुम्हारे इस मिशन पर ही कमीशन बिठा दूंगा,फ़िर मंदिर के प्रांगण में नहीं,कच्छ के रण में ही नज़र आओगे।’

बहस बढ़ती देखकर मैंने प्रसाद खाने का जोखिम लेना उचित नहीं समझा और वहाँ से चला आया।


 

मिर्ची-पाउडर का मंदिर के प्रसाद में बदलना !

जनता की आँखों में धूल झोंकने के अभ्यस्त रहे लोग यदि अपने लोगों की आँखों में मिर्च झोंकते हैं तो यह महज तकनीकी मसला भर है। इस पर नैतिकता का मुलम्मा चढ़ाकर बड़े-बड़े अश्रु बहाना निहायत पारंपरिक और स्थायी कर्म है,जो अब बंद होना चाहिए। पिछले कई वर्षों से ऐसे कर्णधार,जो धूल और कोयला झोंकने में निपुण हैं ,निरंतर अपनी उपयोगिता सिद्ध कर चुके हैं ।साथ ही,वे दल-बल सहित सदन में स्थायी आसन जमाकर बैठ गए हैं। ऐसे में अगर एकाध मिर्ची झोंकने वाला भी सदन में एंट्री मार लेता है तो हमारे दिल में अचानक नैतिकता की घंटियाँ क्यों बजने लगती हैं ? यह तो लोकतान्त्रिक प्रक्रिया का एक छोटा-सा अंग है ,जिसमें एक पाकेटमार या चेन-स्नैचर की तरह एक मिर्चीमार और चक्कूबाज को अपना हुनर दिखाने का मौका मिल जाता है। इसको सकारात्मक नजरिये से देखा जाये तो यह बाहुबलियों और माफिया डॉन के बीच अदने से लफंगे की हल्की-सी घुसपैठ भर है।

हमारी संसद एक पवित्र मंदिर की तरह है और इसमें पुजारी बनकर प्रवेश करने वाले देवताओं की जगह विराजमान हैं। यह सब कुछ नितांत लोकतान्त्रिक तरीके से हुआ है,इसलिए इसमें कुछ भी गलत नहीं है। मंदिर में देवताओं और पुजारियों के विशेषाधिकार होते हैं,भक्तों के नहीं। इसलिए वे वहाँ भरतनाट्यम करें,मल्ल-युद्ध करें या माइक उखाड़ें,सब उनकी नित्यलीलाओं में शुमार माना जाता है। भक्ति से ओत-प्रोत भोली जनता को क्या चाहिए ?। बस,उसे समय-समय पर सब्सिडी के रूप में प्रसाद मिल जाता है और वह फिर से अगली लीला देखने की आतुरता से प्रतीक्षा करने लगती है। इसलिए मंदिर में होने वाले  पूजा-पाठ पर सड़क से उँगली उठाना अनैतिक तो है ही,बेहद असंवैधानिक भी है। मन्दिर के अंदर के विषय पर अंदर के लोग ही अंतिम निर्णय ले सकते हैं। यह उन पर निर्भर है कि मन्दिर के अंदर वे गुलाब-जल का छिड़काव चाहते हैं या मिर्ची-पाउड
हमें अपने युग के प्रभुओं और परमेश्वरों पर पूर्ण आस्था है। हम किसी आम आदमी को पूरी व्यवस्था पर उँगली उठाने और सनातन काल से चली आ रही परम्परा को ठेंगा दिखाने नहीं दे सकते। आम आदमी हमेशा से भक्त रहा है और बाय डिफॉल्ट बना रहेगा। मन्दिर में किया गया स्प्रे हमें आगामी भविष्य के प्रति पूरी तरह आश्वस्त करता है कि इसके इर्द-गिर्द मक्खी-मच्छरों को टिकने नहीं दिया जायेगा। सदन की पवित्रता बरकरार रहे इसके लिए जल्द ही देवता बने पुजारियों की एक समिति गठित की जाएगी,जिससे दिक्-भ्रमित भक्तों में पुनः विश्वास का संचार किया जा सके ! अब इसके बाद
संतोष त्रिवेदी

 

जे 3/78 ए ,पहली मंजिल,

खिड़की एक्स.,मालवीयनगर

नई दिल्ली-110017

 



9818010808

 



 

मिर्ची-पाउडर का मंदिर के प्रसाद में बदलना !

जनता की आँखों में धूल झोंकने के अभ्यस्त रहे लोग यदि अपने लोगों की आँखों में मिर्च झोंकते हैं तो यह महज तकनीकी मसला भर है। इस पर नैतिकता का मुलम्मा चढ़ाकर बड़े-बड़े अश्रु बहाना निहायत पारंपरिक और स्थायी कर्म है,जो अब बंद होना चाहिए। पिछले कई वर्षों से ऐसे कर्णधार,जो धूल और कोयला झोंकने में निपुण हैं ,निरंतर अपनी उपयोगिता सिद्ध कर चुके हैं ।साथ ही,वे दल-बल सहित सदन में स्थायी आसन जमाकर बैठ गए हैं। ऐसे में अगर एकाध मिर्ची झोंकने वाला भी सदन में एंट्री मार लेता है तो हमारे दिल में अचानक नैतिकता की घंटियाँ क्यों बजने लगती हैं ? यह तो लोकतान्त्रिक प्रक्रिया का एक छोटा-सा अंग है ,जिसमें एक पाकेटमार या चेन-स्नैचर की तरह एक मिर्चीमार और चक्कूबाज को अपना हुनर दिखाने का मौका मिल जाता है। इसको सकारात्मक नजरिये से देखा जाये तो यह बाहुबलियों और माफिया डॉन के बीच अदने से लफंगे की हल्की-सी घुसपैठ भर है।

हमारी संसद एक पवित्र मंदिर की तरह है और इसमें पुजारी बनकर प्रवेश करने वाले देवताओं की जगह विराजमान हैं। यह सब कुछ नितांत लोकतान्त्रिक तरीके से हुआ है,इसलिए इसमें कुछ भी गलत नहीं है। मंदिर में देवताओं और पुजारियों के विशेषाधिकार होते हैं,भक्तों के नहीं। इसलिए वे वहाँ भरतनाट्यम करें,मल्ल-युद्ध करें या माइक उखाड़ें,सब उनकी नित्यलीलाओं में शुमार माना जाता है। भक्ति से ओत-प्रोत भोली जनता को क्या चाहिए ?। बस,उसे समय-समय पर सब्सिडी के रूप में प्रसाद मिल जाता है और वह फिर से अगली लीला देखने की आतुरता से प्रतीक्षा करने लगती है। इसलिए मंदिर में होने वाले  पूजा-पाठ पर सड़क से उँगली उठाना अनैतिक तो है ही,बेहद असंवैधानिक भी है। मन्दिर के अंदर के विषय पर अंदर के लोग ही अंतिम निर्णय ले सकते हैं। यह उन पर निर्भर है कि मन्दिर के अंदर वे गुलाब-जल का छिड़काव चाहते हैं या मिर्ची-पाउडर का !

हमें अपने युग के प्रभुओं और परमेश्वरों पर पूर्ण आस्था है। हम किसी आम आदमी को पूरी व्यवस्था पर उँगली उठाने और सनातन काल से चली आ रही परम्परा को ठेंगा दिखाने नहीं दे सकते। आम आदमी हमेशा से भक्त रहा है और बाय डिफॉल्ट बना रहेगा। मन्दिर में किया गया स्प्रे हमें आगामी भविष्य के प्रति पूरी तरह आश्वस्त करता है कि इसके इर्द-गिर्द मक्खी-मच्छरों को टिकने नहीं दिया जायेगा। सदन की पवित्रता बरकरार रहे इसके लिए जल्द ही देवता बने पुजारियों की एक समिति गठित की जाएगी,जिससे दिक्-भ्रमित भक्तों में पुनः विश्वास का संचार किया जा सके ! अब इसके बाद भी किसी को मिर्ची लगे तो कोई क्या करे ?

 

संतोष त्रिवेदी

 

जे 3/78 ए ,पहली मंजिल,

खिड़की एक्स.,मालवीयनगर

नई दिल्ली-110017

 



9818010808

 




 

मिर्ची-पाउडर का मंदिर के प्रसाद में बदलना !

जनता की आँखों में धूल झोंकने के अभ्यस्त रहे लोग यदि अपने लोगों की आँखों में मिर्च झोंकते हैं तो यह महज तकनीकी मसला भर है। इस पर नैतिकता का मुलम्मा चढ़ाकर बड़े-बड़े अश्रु बहाना निहायत पारंपरिक और स्थायी कर्म है,जो अब बंद होना चाहिए। पिछले कई वर्षों से ऐसे कर्णधार,जो धूल और कोयला झोंकने में निपुण हैं ,निरंतर अपनी उपयोगिता सिद्ध कर चुके हैं ।साथ ही,वे दल-बल सहित सदन में स्थायी आसन जमाकर बैठ गए हैं। ऐसे में अगर एकाध मिर्ची झोंकने वाला भी सदन में एंट्री मार लेता है तो हमारे दिल में अचानक नैतिकता की घंटियाँ क्यों बजने लगती हैं ? यह तो लोकतान्त्रिक प्रक्रिया का एक छोटा-सा अंग है ,जिसमें एक पाकेटमार या चेन-स्नैचर की तरह एक मिर्चीमार और चक्कूबाज को अपना हुनर दिखाने का मौका मिल जाता है। इसको सकारात्मक नजरिये से देखा जाये तो यह बाहुबलियों और माफिया डॉन के बीच अदने से लफंगे की हल्की-सी घुसपैठ भर है।

हमारी संसद एक पवित्र मंदिर की तरह है और इसमें पुजारी बनकर प्रवेश करने वाले देवताओं की जगह विराजमान हैं। यह सब कुछ नितांत लोकतान्त्रिक तरीके से हुआ है,इसलिए इसमें कुछ भी गलत नहीं है। मंदिर में देवताओं और पुजारियों के विशेषाधिकार होते हैं,भक्तों के नहीं। इसलिए वे वहाँ भरतनाट्यम करें,मल्ल-युद्ध करें या माइक उखाड़ें,सब उनकी नित्यलीलाओं में शुमार माना जाता है। भक्ति से ओत-प्रोत भोली जनता को क्या चाहिए ?। बस,उसे समय-समय पर सब्सिडी के रूप में प्रसाद मिल जाता है और वह फिर से अगली लीला देखने की आतुरता से प्रतीक्षा करने लगती है। इसलिए मंदिर में होने वाले  पूजा-पाठ पर सड़क से उँगली उठाना अनैतिक तो है ही,बेहद असंवैधानिक भी है। मन्दिर के अंदर के विषय पर अंदर के लोग ही अंतिम निर्णय ले सकते हैं। यह उन पर निर्भर है कि मन्दिर के अंदर वे गुलाब-जल का छिड़काव चाहते हैं या मिर्ची-पाउडर का !

हमें अपने युग के प्रभुओं और परमेश्वरों पर पूर्ण आस्था है। हम किसी आम आदमी को पूरी व्यवस्था पर उँगली उठाने और सनातन काल से चली आ रही परम्परा को ठेंगा दिखाने नहीं दे सकते। आम आदमी हमेशा से भक्त रहा है और बाय डिफॉल्ट बना रहेगा। मन्दिर में किया गया स्प्रे हमें आगामी भविष्य के प्रति पूरी तरह आश्वस्त करता है कि इसके इर्द-गिर्द मक्खी-मच्छरों को टिकने नहीं दिया जायेगा। सदन की पवित्रता बरकरार रहे इसके लिए जल्द ही देवता बने पुजारियों की एक समिति गठित की जाएगी,जिससे दिक्-भ्रमित भक्तों में पुनः विश्वास का संचार किया जा सके ! अब इसके बाद भी किसी को मिर्ची लगे तो कोई क्या करे ?

 

संतोष त्रिवेदी

 

जे 3/78 ए ,पहली मंजिल,

खिड़की एक्स.,मालवीयनगर

नई दिल्ली-110017

 



9818010808

 

 


सोमवार, 4 मार्च 2013

'व्यंग्य यात्रा' में राम कथा !






'व्यंग्य यात्रा' के अक्टूबर -दिसम्बर २०१२ के अंक में पहली बार  

भगवान राम आज कुछ प्रसन्न-मुद्रा में दिखाई दे रहे थे।सीता जी ने उनकी इस प्रसन्नता का कारण पूछा ,'प्रभु ! आज आपकी मुख-मुद्रा अलग सन्देश दे रही है,क्या बात है ?' राम बोले ,'देवि,आज नारद मुनि मिले थे और कह रहे थे कि हम जब से धरती-लोक से आये हैं,काफी बदलाव हो गया है।मुझे अरसे से यह बात याद आ रही थी पर स्वर्ग के काम-काज से फुरसत ही नहीं मिल रही थी।यदि आपकी इच्छा हो तो अपनी कर्मभूमि के दर्शन फिर से कर आयें !'सीता ने बिना देरी किए ही झट-से हाँ कर दी और फ़िर उन दोनों ने मानव-रूप में धरती में प्रवेश किया।


संयोग से वे दोनों जहाँ उतरे ,वह पंचवटी का इलाका था।जिस स्थान पर कभी वे पर्णकुटी में रहे थे,उस जगह अब आलीशान महल था।राम और सीता उस महल से आकृष्ट हुए बिना नहीं रह सके।सहसा उन्हें अत्याधुनिक वेशभूषा में एक स्त्री दिखाई दी।राम और सीता उसको देखते ही रह गए।वे दोनों कुछ बोल पाते कि उस स्त्री ने जोर से आवाज़ दी,'पहचाना मुझे ? मैं सूपनखा हूँ।'राम विस्मित होते हुए बोले,' सूपनखा !तुम यहाँ '? लक्ष्मण ने तो तुम्हारी नाक काट दी थी ,पर तुम तो बिलकुल ठीक-ठाक और सम्पूर्ण हो !'सूपनखा ने उत्तर दिया,'आप किस युग की बात कर रहे हैं ?यह आपका त्रेता नहीं है।इस युग में हमारी नाक कटने का कोई जोखिम नहीं है,अब तो स्लट-वॉक का ज़माना है ।यह नाक-वाक से स्त्री को भयभीत करना दरअसल आप की चाल थी जो अब कामयाब नहीं होगी।'इतना सुनकर तो राम सन्नाटे में आ गए,पर सीता से न रहा गया।उन्होंने कहा,'सूपनखा !तुम मत भूलो कि तुमने केवल कपड़े बदले हैं,आचरण अभी भी तुम्हारा वही है।तुम इस तरह मेरे स्वामी का अपमान नहीं कर सकती हो ।'तब तक राम ने अपने को सँभाल लिया था।उन्होंने कहा,'सीते ! इन्हें कहने दो क्योंकि कभी हमारे द्वारा इनको कष्ट पहुँचा था।’



राम ने शांत होकर सूपनखा से अगला सवाल किया,'अच्छा यह बताओ,तुम यहाँ किसके साथ रह रही हो? मेरे द्वारा विवाह-प्रस्ताव ठुकराने के बाद तुम्हें कोई मिला ?'सूपनखा तमककर बोली,'क्या समझते हो ? यह आपका समय नहीं है।मैं तब से कई युगों तक भटकती रही।अंतत इस कलियुग में आकर मुझे राहत मिली है ।यहाँ विवाह जैसा बंधन ज़रूरी नहीं है।हम दोनों 'लिवइन रिलेशन ' को मान्यता देते हैं।कोई किसी को पूजता नहीं है।हम जीवन भर एक-दूसरे को ढोने को अभिशप्त भी नहीं हैं।अब मैं फेसबुक पर चैटिंग करती हूँ और मेरा पार्टनर किचन में सब्जियाँ पकाता है।हम पूरी तरह आजाद हैं।मैं तो सीता से भी कहूँगी कि वह अपने साथ किये गए दमन को नहीं भूले और हमारे साथ आ जाये'.




सीता ने उसकी किसी बात पर ध्यान नहीं दिया और राम से कहा,'प्रभु ! यहाँ से जल्दी चलो,मेरा दम घुट रहा है।' राम और सीता आगे बढ़ने को तैयार ही थे कि अचानक उन्हें ताड़का नज़र आई।उनके पीछे-पीछे खर-दूषण भी आ गए।उन लोगों ने आते ही सूपनखा से सवालों की बौछार कर दी,'बहन ! ये तपस्वी इतने दिनों बाद यहाँ कैसे ? सूपनखा ने कहा,'ये हमें देखने आये थे कि हमारा सर्वनाश हो गया कि नहीं।मैं तो सीता को लेकर दुखी हूँ कि यह इनके चंगुल से कैसे छूटे ?'अब उत्तर देने की बारी सीता की थी।उन्होंने ज़रा कड़ककर कहा,'सब लोग इस तरह हमें घेरकर क्यों खड़े हो गए हैं ? मैं अपने स्वामी के साथ बहुत खुश हूँ।मुझे त्रेता में भी उनमें कोई बुराई नज़र नहीं आई थी । मैं एक राजा के परिवार में ब्याह कर आई थी,उस समय इनके साथ वनवास जाने का निर्णय मेरा था। मैं कागजी रिश्तों में विश्वास नहीं करती ।ऐसे समय में मेरे पति ने मेरा साथ दिया और मैं जंगल में इनके साथ रही।अगर मुझे इनसे कोई शिकायत होगी भी तो हमारे रिश्तों में इतनी गर्मी बची है कि आपस में बातकर समझा जा सकता है ।और हाँ,ताड़का व खर-दूषण !तुम सब यहाँ कैसे आ गए ?किसने बुलाया तुम्हें ?' उत्तर सूपनखा ने दिया, 'ताड़का को मैंने ईमेल किया था और खर-दूषण को हमारे फेसबुक-स्टेटस से पता चला।’




अब तक चुप रहे राम बोल उठे,'सीते !तुम इनसे बहस न करो.आओ यहाँ से चलते हैं।'खर-दूषण ने तड़ से जवाब दिया,'हाँ ,इसी में भलाई भी है अब आपके पास न तो दैवीय शक्ति है और न ही वानर-सेना।हमने अगर एक भी स्टेटस और लगाया तो हमारे सभी सदस्य सक्रिय हो उठेंगे।'राम ने स्थिति की गंभीरता को समझते हुए वहाँ से चले जाना ही उचित समझा।सूपनखा ,ताड़का और खर-दूषण ने पहली बार राम को हरा दिया था।




राम और सीता अभी कुछ ही दूर पहुँचे थे कि एक कुटिया देखकर रुक गए।वहां एक बुढ़िया चारपाई पर बैठी दाल-चावल में पड़े कंकड़ बीन रही थी।राम को देखते ही पहचान गई और उठकर बोली,'प्रभु ! इतने दिनों बाद आपको पाकर धन्य हो गई। आपने मेरे जूठे बेर खाकर बहुत पहले मुझे कृतार्थ किया था।'राम इस जंगल में अचानक शबरी को पाकर प्रफुल्लित हो गए और गले लगा लिया।सीता भी शबरी से मिलकर बहुत खुश हुईं।शबरी ने कहा,'अभी मैंने खिचड़ी पकाई है,यदि आप बुरा न मानें...' ,राम ने बात बीच में ही काटकर कहा,'हम दोनों खाकर ही जायेंगे।'




खिचड़ी खाकर जैसे ही राम जाने को तैयार हुए,एक बुजुर्ग उनके पैरों पर गिर पड़े।शबरी ने बताया ,'प्रभु ! ये तुलसी हैं।इन्होंने आप पर कथा लिखकर बड़ा कष्ट भोगा है।कई लोग इनकी जान के पीछे पड़े हैं,सो मैंने इन्हें शरण दे रखी है।‘राम ने तुलसी को उठाकर गले से लगाया और कहा,'अब आप नए सिरे से राम-कथा लिखें।पिछली कथा अब इस युग में प्रासंगिक नहीं रह गई है।'तुलसी ने भाव-विह्वल होते हुए उत्तर दिया ,'भगवन ! मैंने जो भी लिखा था,भक्तिभाव से लिखा था।मुझे क्या पता था कि कालांतर में लोग मानस में भी जाति ,धर्म और लिंग का चश्मा लगाकर देखेंगे।अब मैं कोई कथा नहीं लिख सकूँगा।'



इसके बाद राम और सीता ने धरती पर ठहरना उचित नहीं समझा और बिना अतिरिक्त क्षण गँवाए वे दोनों स्वर्गलोक लौट गए !




व्यंग्य यात्रा के अक्टूबर-दिसम्बर २०१२ के अंक में प्रकशित

शुक्रवार, 1 मार्च 2013

जादुई है रेल-बजट !


01/03/2013 को मिलाप में !

 

लो जी,रेल बजट आ गया और बड़े कमाल का रहा। सरकार के ऊपर बार-बार यह आरोप लगते रहे हैं कि वह आम जनता के लिए कुछ नहीं करती पर इतना तो तय है कि उसके मंत्रिमंडल में मंत्री कम जादूगर ज्यादा हैं। रेल बजट में मंत्री ने ऐसी जादूगरी दिखाई कि किराया भी नहीं बढ़ा और अपनी झोली भी भरने का इंतज़ाम कर लिया। सीधे-सीधे किराये में बढोत्तरी न करके सर्विस चार्ज और अन्य तकनीकी मदों के जरिये जनता को लूट लिया गया । यह सब ठीक वैसे ही हुआ,जैसे सामने की जेब से पैसे न निकालकर पीछे वाली पाकेट को नोंच लिया जाय।

मंत्री जी अपने नाम के अनुरूप बजट-बयार लेकर आए और सबको बता दिया कि इसे बसंत-बहार समझने की भूल न करें। वे बजट पेश करने के लिए बकायदा तैयार होकर आए थे। सबसे मजेदार बात तो यह रही कि उन्होंने ऐसी लूट-पाट करते हुए शेरो-शायरी सुनाने का पुराना नुस्खा भी आजमाया। इसका सीधा सन्देश यही है कि बजट को जिन्हें भुगतना है ,वे भुगतें मगर इससे उनको तो सत्ता की महक मिल रही है और सरकार को फुल कांफिडेंस है। उन्होंने अपने छुपे इरादों को इस शेर के बहाने ज़ाहिर भी कर दिया ;‘न बहारों से बात करनी है,न सितारों से बात करनी है,जब दरिया को पार करना है तो किनारों से बात करनी है’। अब उनके कहे का सामान्य अर्थ यही है कि वे कोई बहार लुटाने नहीं आए थे,बल्कि दरिया यानी चुनाव को पार करने के लिए किनारे यानी आम आदमी को और किनारे लगाना है।

विपक्ष इस रेल बजट से कुछ नहीं निकाल पा रहा है। वह इसे रेल-बजट के बजाय ‘रायबरेली-बजट’ कहकर केवल हल्की तुकबंदी और हास्य पैदा करने की कोशिश में लगा है। मंत्री जी ने बजट से एक महीने पहले ही जो निकालना था,निकाल लिया। अब इससे जो भी निकल के आएगा वह बोनस में होगा। रेलगाड़ियों की बढ़ी हुई संख्या यात्री कम मंहगाई अधिक ढोएगी। आगे चुनाव आने वाले हैं और इस सरकार का हाथ आम आदमी के साथ है इसलिए वह कभी भी उसकी जेब में प्रवेश कर सकता है। मंत्री जी यहाँ पूरी तरह व्यावहारिक हैं।

रेल-बजट को आम आदमी के अलावा युवाओं के लिए भी क्रान्तिकारी बताया जा रहा है। अब यात्रा करते समय वे वाई-फाई के माध्यम से निःशुल्क चैटिंग और स्टेट्स अपडेट करते रहेंगे। इससे कोच के अंदर का माहौल भी अति सुरक्षित रहेगा। उनके इस तरह मोबाइल या लैपटॉप में व्यस्त रहने से महिलाओं से छेड़खानी की आशंका भी कम हों जायेगी और खिड़की के बाहर की तांक-झाँक भी रुक जायेगी। अगले चुनावों में सोशल मीडिया का उपयोग कर रही यह युवा पीढ़ी बड़े काम आ सकती है।

इस बजट की बाजीगरी के बाद आम बजट भी आ रहा है। उसको पेश करने वाले मंत्री जी खासे  अनुभवी हैं और सरकार निश्चिन्त है कि रेल के बाद इसमें भी मंत्री जी कोई खेल दिखा देंगे। मतलब साफ़ है कि अपना हिस्सा पूरा वसूल हो जाए और वसूली की उँगली भी उसकी ओर न उठे। जिस तरह किराया न बढ़ने के बाद भी सफ़र मंहगा हो गया है,वैसे ही अगर अगले चुनावों में वोट बढ़ने के बावजूद सीटें न बढ़ें तो कैसा रहेगा ? सरकार का इस पर अभी जवाब नहीं आया है। 

 

संघर्ष का नया तरीका

आंदोलन ख़त्म हो चुका था।आँसू गैस के गोले और लाठी - डंडे तनिक विश्राम के लिए सुस्ताने लगे थे।सड़क का शोर बैरिकेड तोड़कर ...