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बुधवार, 10 अक्तूबर 2012

चिंतन-बैठक के बाद का चिंतन !


१०/१०/२०१२ को जनसंदेश में !
 

चिंतन-बैठक के बाद से ही हमें उनकी तलाश थी,पर वो कहीं नज़र नहीं आ रहे थे।हमारे मन में इस बैठक को लेकर बड़ी उत्सुकता थी क्योंकि इसी से हमारे मुलुक का लुक भी निर्धारित होना था।अमूमन नुक्कड़ और चौराहे पर उनसे भेंट हो जाती थी और मिलते ही वे इस मुलुक के प्रति अपनी चिंता हमसे साझा करते थे।वे पिछली बार भारत-बंद के दौरान चौराहे पर डंडा लिए हुए हमसे टकराए थे।उस वक़्त कई दुकानों के शीशे तोड़ने का गर्व और राष्ट्र के प्रति कुछ करने का योगदान उनके चेहरे पर साफ़-साफ़ झलक रहा था।बस,उसके बाद ही उनकी पार्टी की चिंतन-बैठक हुई थी और इसी का हाल जानने के लिए मैं उतावला था।आख़िरकार हमने उनके घर की ओर का रुख किया और सौभाग्य से वो बरामदे में ही हमें टहलते दिखाई दे गए !

आइये,आइयेहमको देखते ही चेहरे पर ज़बरिया हँसी लादकर वे बोले।मैंने बड़े ही आत्मीय स्वजन की तरह चिंता व्यक्त की,’सब ठीक तो है ? चौराहे और नुक्कड़ आपके बिना सूने-सूने से हैं।वे सपाट भाव लिए हमसे मुखातिब हुए, ’’ऐसी कोई बात नहीं है।दर-असल जबसे हमारी चिंतन-बैठक हुई है तभी से मैं चिंतन में लगा हुआ हूँ।वहाँ हमारे नेता ने एक बात ज़ोर देकर कही थी कि हमें दूसरों की तरह अपने लिए भी कठोर बनना होगा।जो बात कठोरता से हम दूसरों के लिए कहते हैं,उसको अपने लोगों पर भी लागू करना होगा।तबसे मैं यही सोच रहा हूँ कि अपनों की खातिर कैसे कठोर बना जाए ।ऐसा करेंगे तो कर्नाटक और गुजरात हमारे हाथ से निकल जायेंगे। हम नई परम्परा कैसे चालू करें ?

मैंने उन्हें घोर चिंतित देखते हुए आश्वस्त किया,’बस इत्ती सी बात और आप हलकान हुए जा रहे हो ?अरे भई,नेता जी ने केवल यह कहा है कि भ्रष्टाचार और घोटालों के प्रति कठोरता का भाव रखो।आपने उनके कहे को गंभीरता से ले लिया।देखिए,साठ-पैंसठ सालों से दूसरे लोग कितनी शिद्दत और कठोरता से देश की सेवा में लगे हुए हैं।एक के बाद एक घोटाले सामने आ रहे हैं और जनता भी इनके प्रति पत्थर की तरह कठोर हो गई है।थोड़े समय के लिए इनके पास ममता थी जिससे प्रगति में बाधा पड़ रही थी,पर ममतारहित होते ही सब कुछ कठोरता से सबके हित में फ़िर होने लगा है।’ ‘पर इस कठोरता का मेरे लिए क्या अर्थ है?’वो समझने की कोशिश करते हुए बोले।

मैंने उन्हें अब स्पष्ट करते हुए बताया,‘आप शायद भूल रहे हैं।इस देश की जनता मूलरूप से घोटालापसंद है।एक कच्चे अनुमान के अनुसार हर परिवार में कम से कम एक घोटालेबाज तो है क्‍योंकि उन्‍हें घुट्टी में घोटाला ही घोलकर पिलाया जाता है तभी तो दशकों से शीर्ष पर भी घोटालेबाज जमे हुए हैं।आज़ादी के बाद से बिला नागा यह सिलसिला चला आ रहा है।दूसरे लोग इसी के चलते पूरे आत्मविश्वास के साथ काम कर रहे हैं।जनता ने तो आपको भी एक बार मौका दिया था पर उसमें आप अनाड़ी निकले।कफ़न व ताबूत जैसे टुच्चे सेक्टर भला क्या छवि बनाते ?आपके अनुभवहीन अध्यक्ष के चलते जनता में यह सन्देश गया कि ये लोग कोई भी काम ढंग से नहीं कर सकते हैं।तब से लेकर अब तक कोई बुनियादी अंतर नहीं आ पाया है।सुनते हैं कि वर्तमान अध्यक्ष जी भी महज़ सत्तर हज़ार करोड़ की सिफारिश करते पकड़े गए हैं।अब उछाल भरती अर्थ-व्यवस्था के दौर में यह गिनती मामूली लगती है।इसलिए आपके नेता जी ने जिस कठोरता की बात की है,उस पर अमल करिये और जी कड़ा करके घोटालों की गिनती बढ़ाइए तभी जनता का आप पर भरोसा बढ़ेगा।आखिर गुजरात और गडकरी के बल पर आप पूरे देश पर शासन नहीं कर सकते!

अब वे सामान्य दिख रहे थे।इस बीच हमारे चिंतन से वे काफ़ी-कुछ आत्मविश्वास बटोर चुके थे।मैंने देखा कि उनके चेहरे पर चिंतन-बैठक का खुमार उतर चुका था।

1 टिप्पणी:

Arvind Mishra ने कहा…

चिंतन पर चिंतन -सूक्ष्म व्यंग !