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शुक्रवार, 12 अक्तूबर 2012

बनाना रिपब्लिक में आम आदमी का स्टेटमेंट !

१२ /१०/२०१२ को 'नई दुनिया' में प्रकाशित !

 

अजी,इस देश के लोगों के पास न कोई काम है और न धेले भर की समझ। हम पिछले इक्कीस सालों से व्यापार के क्षेत्र में हैं और लोग समझते हैं कि हम केवल मक्खी मार रहे हैं। अरे,आज दो-सौ,तीन सौ करोड़ की रकम भी कोई रकम होती है ?हमने जिससे सौदा किया,उसमें केवल आपसी लेन-देन हुआ है बस। इसमें दोनों पक्षकारों को कोई तकलीफ भी नहीं है,पर दूसरे लोगों के पेट में अनायास मरोड़ उठ रही है।सबसे ज़्यादा ऐंठन आम आदमी की टोपी पहनकर उसे ही टोपी पहनाने वाले लोगों के पेट में मची हुई है। हम चुपचाप अपना काम करने में लगे हुए हैं पर कुछ लोग हैं कि उन्हें दूसरों की ढंकी उठाने में परमानन्द की अनुभूति होती है।

हम सबसे ज़्यादा निराश इसलिए हैं कि इस देश के लोग मजाक भी नहीं समझते। हम अपने व्यापारिक सहयोगी के साथ जो भी करते हैं,वह हमारा हँसी-मजाक भी तो हो सकता है। जब ऐसे मजाक पर हम दोनों को कोई आपत्ति नहीं है तो फ़िर जाँच-जाँच की रट क्यों लगाई हुई है ?हमने तो सरकार जी से कह भी दिया कि करवा लो भई ,एक जाँच और सही। उसमें कौन-सा हम पाप से सने निकलने वाले हैं ?पर सरकार जी ने भी साफ़-साफ़ कह दिया कि यह जाँच लायक रकम ही नहीं है। इसके ऊपर जाँच बिठाने से उसकी बदनामी होगी। सरकार जी के इस तर्क से हम सहमत हैं कि जब तक पूर्ववर्ती रकम से ज़्यादा धनराशि नहीं होती तब तक जाँच बैठाना फ़िज़ूल है। इत्ते में उसका खर्चा भी तो नहीं निकलेगा।

देश के लोगों में मजाक को लेकर बहुत ही रूढ़िवादी सोच है। एक खालिस मजाक को फेसबुक से लेकर तूफ़ान खड़ा कर दिया गया है। एक सीधे-सादे व्यापारी को केवल उसकी रिश्तेदारी से मारा जा रहा है। हम कोई नेता भी नहीं हैं कि बयान देने का हमारा अभ्यास हो फ़िर भी हमारे मजाक को हमारा बयान समझा जा रहा है। हमने तो मजाक में ही देश को बनाना रिपब्लिक कहा था पर पिछले साठ-पैंसठ सालों से सहते आ रहे मजाक को न समझने वाला आम आदमी फ़िर गच्चा खा गया। बनाना रिपब्लिक का उसने अपनी समझ से कुछ और ही मतलब निकाल लिया। इसका अर्थ यह भी तो हो सकता है कि देश को रिपब्लिक बनाना,ऐसा कहकर हम आम आदमी को बना नहीं रहे हैं। हम तो स्वयं आम आदमी की खाल में देश-सेवा करने को प्रयत्नशील हैं पर हम यह  भूल गए थे कि ये देश विकासशील है और अभी यहाँ उच्च-स्तर की समझ विकसित नहीं हुई है।

हमारे आपसी करार को लेकर कुछ लोग उसमें दरार डालने की कोशिश कर रहे हैं,जबकि हमारी डील  बिलकुल पारदर्शी और कानून के मुताबिक है। इस सन्दर्भ में हमने स्टेटमेंट दे रखा है जिसे सरकार जी और उसके अधिकारियों ने पढ़ लिया है और उनकी समझ में भी आ गया है। जो लोग हमारे स्टेटमेंट को पढ़ या समझ नहीं पा रहे हैं उनके लिए कानून मंत्री जी ने उन्हें पाठ पढ़ाने की गारंटी भी दी है,सो बात यहीं खत्म हो जानी चाहिए। हमारा कानून मंत्रालय भ्रष्टाचारियों और अपराधियों की तरफ से बिंदास है क्योंकि ये तबका खूब पढ़ा-लिखा है। हम तो केवल स्टेटमेंट देते हैं,उसे समझाने का काम सरकार जी और उसके अधिकारियों का है। अब मैं यह स्टेटमेंट फ़िर से दे रहा हूँ ,आप लोग यह न कहना कि आपने पढ़ा नहीं है ।

 

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