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बुधवार, 26 दिसंबर 2012

मैं तो बारह था,आगे तेरह है !

६/०१/२०१३ को जनसत्ता में

8/01/2013 को पंजाब केसरी में

नैशनल दुनिया में २९/१२/२०१२ को !
28/12/2012 को जनवाणी में !
 

मैं पुराना हो गया हूँ और जाने वाला हूँ,इस बात से आम आदमी खुश है। नए के स्वागत में घर से लेकर बाज़ार सज रहे हैं पर मुझे भूलना सबसे बड़ी भूल होगी। मैंने अपने कार्यकाल में लगातार ऐसे काम किये हैं जिन्हें आसानी से भुलाया नहीं जा सकता। मेरी उपलब्धियों की सूची बहुत लंबी है पर मुझे खासकर आम आदमी के लिए याद किया जायेगा। यह साल उसके लिए बड़ा भारी रहा ,इसलिए मेरा मूल्यांकन कही से भी हल्का नहीं किया जा सकता।

साल के शुरू में ही मुझे बड़ी पीड़ा पहुंची थी,जब मेरे आने का स्वागत करने में आम आदमी ने ढिलाई बरती थी। संभ्रांत और उच्च वर्ग के लोग मुझे इसीलिए पसंद हैं क्योंकि वे ही मेरे आने को सेलिब्रेट करते हैं । यही लोग आगे आने वाले समय के असली हक़दार होते हैं,जबकि आम आदमी अपनी रोटी-दाल के जुगाड़ में ही सारा साल गुजार देता है। इस साल इसने अपने काम से काम न रखकर कुछ ज़्यादा ही सक्रियता दिखानी चाही और उसका परिणाम यह हुआ कि मैंने उसे चुन-चुन कर सबक सिखाने का संकल्प कर लिया।

सबसे पहले मैंने मंहगाई बहन को भरोसे में लिया और उन्हें ताकीद दी कि आम आदमी को साल बीतते-बीतते इस हाल में ले आया जाय कि वह नए साल का स्वागत,निकले हुए कचूमर के साथ करे। यकीन मानिए,बहन ने भाई को निराश नहीं किया और सब्जी,तेल ,राशन आदि पर समभाव से अपनी कृपा बनाये रखी। आम आदमी को गैस का सातवाँ सिलेंडर तो दुनिया के सातवें अजूबे की तरह दिखाई देने लगा और इस लिहाज से मंहगाई बहन का यह कदम तारीखी साबित हुआ। आम आदमी भूखा रहने में बड़ा माहिर है,उसकी इस उपलब्धि में मंहगाई बहन का योगदान उल्लेखनीय है।

पूरे साल भ्रष्टाचार को लेकर आम आदमी हलकान रहा। हमने राजनीति प्रसाद से गठजोड़ करके अपनी सत्ता को ऐसा मजबूत किया कि जनलोकपाल की माँग करने वाले आम आदमी को झुनझुना तक नसीब नहीं हुआ। बड़े-बड़े प्रदर्शन हुए,लाठियाँ बरसीं,बूढ़े आदमी को बारह दिन उपवास रखना पड़ा पर अन्ततः हुआ क्या ? संसद में ऐसा उधम मचाया गया कि आम आदमी देश में खलनायक बन गया। हम वहाँ से यह सन्देश देने में सफल रहे कि देश विकास चाहता है और आम आदमी इसमें नाहक रोड़ा बन रहा है। इसके बाद हम चुप नहीं बैठे और राजनीति प्रसाद के कार्यकर्ताओं ने आम आदमी से जुड़े बूढ़े को किनारे लगा दिया। आख़िरकार आम आदमी आजिज होकर इसी दलदल में कूद गया। अब इस अखाड़े में हमारे अपने दाँव हैं और सभी पहलवानों में एक राय है कि इस आम आदमी का फलूदा बना दिया जाय । मैं तो जा रहा हूँ पर इसका पूरा इंतजाम कर दिया गया है। इसके लिए देश की अर्थव्यवस्था को सँभालने के लिए एफ़डीआई भौजी आ रही हैं। इससे राजनीति प्रसाद को अपना एजेंडा पूरा करने में मदद मिलेगी।

मैं इस बात से बेहद खुश हूँ कि कार्यकाल के अंतिम दिनों में भी मैंने अपनी अमिट छाप छोड़ दी है।  भ्रष्टाचार के सगे भाई बलात्कार ने जाते-जाते मुझे ऐसा उपहार दिया है जो भूले नहीं भुलाया जा सकेगा। आम आदमी की ऐसी चीर-फाड़ किसी और समय में नहीं हुई है। वह अपनी लुटी हुई अस्मत के साथ सड़कों पर है और कुर्सियों पर बैठे लोग नई सत्ता और नए साल के जश्न में मदहोश हैं। मैं तो जा रहा हूँ पर आम आदमी इससे राहत न महसूस करे। मैं बारह था,इस नाते गनीमत रही,अगला तो तेरह है,जिसमें आम आदमी की तेरहवीं निश्चित है।
 
'जनसंदेश टाइम्स ' में २६/१२/२०१२ को प्रकाशित

1 टिप्पणी:

Kailash Sharma ने कहा…

वर्ष का कटु सत्य...