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बुधवार, 23 अक्तूबर 2013

सच्चे वादे,झूठा सपना।

जनवाणी में 23/10/2013 को।
खजाने की आस लगाने वाले निराश होने लगे हैं। पहले ख़ूब हल्ला मचा;अख़बारों ने कई पन्नों में खजाने और सपने को ख़ूब परवान चढ़ाया और टीवी चैनलों ने विमर्श से अधिक विज्ञापन बटोरे । अब हल्ला ज़रा-सा शिफ्ट हुआ है। विमर्शकार लोग अब बाबा की आलोचना करने में जुट गए हैं,जो निहायत ज्यादती है।

हमारे देश में आज़ादी के बाद से ही नेता आए दिन वादे करते रहे हैं। वे सब वादे खुली आँखों से और दिन-दहाड़े किए गए,पर उनमें से एक भी सच नहीं हुआ।हमने भी ज़्यादा उफ़ नहीं की ।फ़िर यह तो महज एक सपना था,जो एक बाबा ने बंद आँखों से देखा था। यदि यह सच नहीं भी निकलता है तो एक सामान्य बात होगी। बंद आँखों से देखे सपने का टूटना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। तुलसीदास बाबा ने पहले ही सचेत कर दिया था,’सपने होई भिखारि नृप,रंक नाकपति होय’,अब इसके बाद भी सरकार गैंती और फावड़ा लेकर कूद जाय तो उसका ही दोष है। उसे सब दोषों की तरह इस दोष को भी अपने मत्थे लेने पर कोई गुरेज नहीं है। सरकार ने इस बहाने सिद्ध कर दिया है कि वह बाबा और धर्म-विरोधी नहीं है।

हमारा देश सनातन काल से चमत्कारों और आस्थाओं में विश्वास रखने वाला रहा है। बीच में कुछ समय के लिए इसे सोने की चिड़िया भी कहा गया । बाद में कुछ बाहरी आक्रमणकारियों ने सारा सोना उड़ा दिया । आज़ादी के बाद लोगों के सपनों का भारत बना और हमारे रहनुमाओं ने अपने सपने सच्चे कर लिए। लोगों के सपने हवा में ही तैरते रहे ।इस तरह आम आदमी की धीरे-धीरे सपनों से आस्था डगमगाने लगी। नेताओं को लगा कि यदि ये लोग सपने देखना बंद कर देंगे तो उनका जीवन कठिन हो जायेगा। ऐसे में सपनों को पुनर्जीवित करने का मौका बाबा ने दे दिया और नेताओं ने उसे लपक लिया ।

गड़े खजाने की खुदाई से कुछ मिले या न मिले,कई लोगों के सपने ज़रूर पूरे हो गए हैं । बाबा अहर्निश चैनलों पर प्रकट हो रहे हैं । आर्थिक तंगी से जूझ रहे मीडिया को तगड़ा आर्थिक पैकेज मिल गया है  और जनता को भी कुछ समय के लिए मनहूसियत की खबरों से निजात। खुदाई वाली जगह में कई तरह के कुटीर-उद्योग भी विकसित हुए हैं,जिनमें ढेर सारा रोज़गार सृजित हुआ। इसमें विशेषकर जलेबी ,पकौड़े और समोसे वालों ने सक्रिय भागीदारी की।

जो लोग सपने के आधार पर की गई खुदाई की आलोचना कर रहे हैं,वे नादान हैं। अगर खुदाई में सोना निकलता है तो हम फ़िर से जादूगरों और बाबाओं वाले देश होने का गौरव पायेंगे और नहीं, तो हजारों वादों की तरह इस सपने को भी सब भूल जायेंगे । जनता नेताओं के वादे के साथ बाबा के सपने को भी भुला देगी और इस तरह नेता और बाबा सब बराबर हो जायेंगे ।

1 टिप्पणी:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

जन क्षमताओं का इतना बड़ा खजाना है यहाँ, उसे संदोहित करने में असफल रहे हैं हम।