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रविवार, 26 अक्तूबर 2014

दीवाली पर दो लघुकथाएँ !


ग़लतफ़हमी !
आले पर रखा दीया जल कम इतरा ज़्यादा रहा था।बाती को यह बात नागवार गुजर रही थी।उसने दीये के कान में धीरे से कहा-रोशनी का सारा श्रेय तुम ले रहे हो इसका मतलब यह नहीं कि तुम्हीं रोशनी दे रहे हो।मैं लगातार जल रही हूँ,अँधेरा इसलिये भाग गया है।मेरे बिना तुम केवल माटी के पुतले हो और कुछ नहीं।दीया कुछ कहता,इसके पहले तेल तपाक से बोल पड़ा-जल तो मैं रहा हूँ।तुम दोनों मेरे समाप्त होते ही कूड़े के ढेर में डाल दिए जाओगे।रोशनी का सारा खेल तभी तक है जब तक हम सबमें नेह है और वह मैं हूँ।
तेल की बात सुनकर दीया और बाती सन्न रह गए पर रोशनी से न रहा गया।वह बोली--तुम सब को ग़लतफ़हमी है।दरअसल,हम सबके पीछे अँधेरे का हाथ है।सोचिए,अँधेरा न आता तो हम सभी की ज़रूरत ही क्या थी ? शुक्र मनाओ कि वह अभी तक क़ायम है।वह आता भी तभी है जब हम सब अलग-थलग पड़ जाते हैं।
इतना सुनते ही बाती दीये से नेह के साथ लिपट गई और अँधेरा दूर किसी कोने में पसर गया।
अमावस और पूनम !
अमावस ने पूनम से चुहल करते हुए कहा-तुम पूरा चाँद लेकर भी फीकी और उजाड़-सी दिखती हो।मुझे देखो,मेरा कितना श्रृंगार किया गया है।आतिशबाजियों से लोग जश्न मना रहे हैं।क्या ऐसा तुम्हें कभी नसीब होता है ?
पूनम ने लजाते,सकुचाते हुए जवाब दिया-मैं हमेशा यकसा रहती हूँ।मेरा उजाला अमीर-गरीब में भेद नहीं करता।कृत्रिमता से मेरा रंचमात्र लगाव नहीं है।मुझे पाकर प्रेमी चहक उठते हैं,शीतलता बरस-बरस उठती है,जबकि चोर-उचक्के तुम्हारा इंतज़ार करते हैं,अतरे-कोने ढूँढ़ते हैं।
अमावस ने फिर भी हार नहीं मानी।कहने लगी--लेकिन अँधेरा मेरा भाई है।उसका विस्तार बहुत व्यापक है।तुम तो केवल बाहर के अँधेरे को दूर करती हो पर अंदर के अँधेरे...?
पूनम ने उसकी जिज्ञासा शांत करते हुए कहा-अँधेरा हमेशा डरा-डरा रहता है।वह काले कारनामों को मौका देता है।अँधेरा कभी भी दिल खोलकर सबके सामने नहीं आता,जबकि उजाले को किसी से छुपने की ज़रूरत नहीं रहती।यहाँ तक कि तुम भी उजाले के आने पर अँधेरे को बचा नहीं पाती।
अमावस निरुत्तर हो गई।वह आतिशबाजी के शोर में डूबती इसके पहले ही पूनम आगे बढ़ गई थी।

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