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गुरुवार, 9 अक्तूबर 2014

अब कक्षाओं से ही ‘किरपा’ बरसेगी !


यह कक्षाओं में पहुँचने का मौसम है।शिक्षक-दिवस पर देश के सभी बच्चों की कक्षा ली गई ,गाँधी-जयंती पर सफ़ाई की क्लास लगी.इसके बाद दूरदर्शन की कक्षा से भागवत-कथा सुनाई गई।खेत में काम करता हुआ किसान तो उस समय बिलकुल बौरा ही गया जब उससे प्रधानमंत्री जी ने रेडियो से अपने ‘मन की बात’ कही ।अब तो हर दूसरे-तीसरे दिन इतनी कक्षाएं लग रही हैं कि आम आदमी और कर्मचारी अगली कक्षा की तैयारी में ही लगे हुए हैं । उन्हें इस सबके बीच मंहगाई और भ्रष्टाचार कहीं नज़र नहीं आ रहे,गोया ‘स्वच्छ भारत’ अभियान से घबराकर वे भी कहीं लुक गए हों !

कक्षाओं की इस श्रृंखला में सबसे उल्लेखनीय ‘मन की बात’ वाली कक्षा है।जो लोग यह सोचकर दुखी हो रहे थे कि ये कक्षाएं बस थोड़े दिनों के लिए हैं,उसके बाद उनका वक्त कैसे गुजरेगा,उनके लिए खुशखबरी है।प्रधानमंत्री जी ने स्पष्ट कर दिया है कि ‘मन की बात’ को वह नियमित रूप से कहते-बताते रहेंगे।इससे बहुत सारे फायदे हैं।अगर वो ‘प्रेस से मिलिए’ के ज़रिये अपनी बात रखें तो उन्हें अपनी बात के लिए कम मौका मिलेगा।कुछ सिरफिरे पत्रकार बात को कहीं और मोड़ सकते हैं,इससे विषयान्तर होने का अंदेशा बना रहेगा।दूसरी बात, वे जनता से होने वाले वाद-संवाद को विवाद का विषय नहीं बनाना चाहते।सबसे बड़ा कारण तो यह कि यदि जनता के पास प्रवचनों से ही नियमित रूप से ‘किरपा’ आने लग रही है,तो क्यों उन्हें उनके भौतिक दु:खों को याद करने दिया जाए।शायद इसीलिए जनता की सुविधा का ख्याल रखते हुए टीवी और रेडियो का भरपूर उपयोग किया जा रहा है।

खबर तो यह भी है कि गाँव के किसान रेडियो के इर्द-गिर्द ही बैठे रहते हैं।पता नहीं कब प्रधानमंत्री जी उनसे अपने ‘मन की बात’ करने लगें।वे भले अपने गाँव के सरपंच या इलाके के विधायक और सांसद के दर्शन-लाभ से वंचित हों,पर प्रधानमंत्री जी लगातार इसकी कमी पूरा कर रहे हैं.यह उनके लिए बहुत बड़ी बात है।किसानों को यह भी उम्मीद है कि आज नहीं तो कल प्रधानमंत्री जी उनके भी मन की बात सुनेंगे।फ़िलहाल,इत्ते कम समय में इतना कुछ हो पा रहा है,इसी से सब मुदित हैं।

इन कक्षाओं पर शोर मचाने वाले भी कुछ लोग हैं।उन्हें यह नहीं दिख रहा है कि जब नैतिक,आध्यात्मिक सत्संग से ही सारी समस्याएँ हल हो रही हैं,टीवी चैनल और रेडियो ज़मीनी काम करने में जुटे हैं,तो सरकार क्योंकर और कुछ करे ?चुपचाप काम करते रहने में वह ग्लैमर–युक्त आनंद कहाँ ! आखिर,करने से ज़्यादा काम करते हुए और मौन रहने से ज़्यादा बोलते हुए दिखना ही तो सर्वोत्तम अभीष्ट है।

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