पृष्ठ

गुरुवार, 30 अक्तूबर 2014

ज्यों ज्यों बूड़ै श्याम रंग !

आखिर काफ़ी मशक्कत के बाद काला धन बाहर निकल ही आया।ऐसा कारनामा करने वालों को उस समय ‘हम लाए हैं तूफ़ान से कश्ती निकाल के’ टाइप फीलिंग हो रही थी।जिस तरह पूरे देश को काले धन का इंतज़ार था,उसे देखने की ललक थी,उसी तरह सफ़ेद धन भी बड़ा आकुल हो रहा था।कोई कुछ भी कहे,सगा न सही,वह उसका सौतेला भाई जो ठहरा।काले धन ने भी सबसे पहले सफ़ेद धन से मिलने की इच्छा व्यक्त की।स्विस बैंक से भी बेहद गोपनीय जगह पर दोनों का संवाद हुआ,पर हमारे सेल्फी-पत्रकार ने उन दोनों की बातचीत रिकॉर्ड कर ली।जनहित में उसके मुख्य अंश यहाँ पेश हैं :

सफ़ेद धन: अपनी धरती पर तुम्हारा स्वागत है।यहाँ आकर कैसा लग रहा है ?

काला धन : मेरे लिए धरती का कोई हिस्सा पराया नहीं है।मैं जहाँ जाता हूँ,मेरा हो जाता है।तुम अपनी बताओ।दाल-रोटी का जुगाड़ चल रहा है कि नहीं ?

सफ़ेद धन : सरकार मेरा भी पुनर्वास करने को प्रतिबद्ध है।अभी ‘जन-धन’ के माध्यम से करोड़ों घरों में पहुँच गया हूँ।तुम्हारी घुसपैठ तो उँगलियों में गिनने लायक है अभी।सर्वव्यापी तो मैं ही हूँ।

काला धन: सर्वव्यापी ? माय फुट।जिन करोड़ों खातों में तुम्हारा ठिकाना है,कभी झाँक कर देखना।ओढ़ने-बिछाने के लिए जीरो बैलेंस से अधिक कुछ नहीं मिलेगा।हम एलीट टाइप के रहवासी हैं।सबके मुँह नहीं लगते।हमारी तो गिनती ही करोड़ों से शुरू होती है।बात करते हो !

सफ़ेद धन : पर तुम्हारा नाम कित्ता खराब है,यह कभी सोचा है ?

काला धन : तुम्हें ख़ाक पता है।हाशिये की खबरों के अलावा कभी साहित्य के पन्ने भी पलट लिया करो।तुमने पढ़ा नहीं है ‘ज्यों ज्यों बूड़ै श्याम रंग,त्यों त्यों उज्ज्वल होय’।माफ़ करना,क्या अब इसका अर्थ भी बताना पड़ेगा ? जो जितना हममें डूबता है,वह उतना ही उजला और सफ़ेद यानी तुम-सा हो जाता है।इससे सिद्ध होता है कि सफ़ेद होने के लिए पहले काला होना ज़रूरी है।

सफ़ेद धन : बड़ी दूर की कौड़ी लाए हो फिर भी दो कौड़ी का उदाहरण है।असल साहित्य तो हमने ही पढ़ा है।तुमने वह भजन अवश्य सुना होगा,’पायो जी मैंने राम रतन धन पायो‘।इसमें जिस रतन धन की बात की गई है,वह मैं ही हूँ।खाते में अदृश्य होकर भी मैं उसमें उपस्थित रहता हूँ।कभी खर्च नहीं होता क्योंकि मैं शून्य होता हूँ।

काला धन : तुम्हारे अध्यात्म और साहित्य की पूछ वैसे भी नहीं है।इस समय सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में बस राजनीति का बोलबाला है और मैं उसकी पतवार हूँ।तुम तो किसी छोटी-मोटी लहर की तरह हो,क्षण भर में ही लुप्त हो जाते हो।मेरे आगे तुम्हारी क्या बिसात ?

सफ़ेद धन : तुम्हारा कितना भी नाम हो पर है तो बदनाम ही।अभी तुमने ही कहा है कि काला धन अंततः सफ़ेद हो जाता है,इसका मतलब साफ़ है कि धन का अंतिम रूप मुझमें ही निहित है।तुम्हें भी मजबूरन हमारा रूप धारण करना पड़ता है।रही बात लहर की,तो मत भूलो कि लहरें बड़ी बड़ी नौकाओं को पतवार सहित डुबो देती हैं।इसलिए बाहर निकल आये हो तो मुझ जैसा बनकर रहो !

काला धन : ऐसा कभी नहीं हो सकता।मेरा रूप ही मेरी पहचान है।बड़ी कुर्सी और बड़े पद का रास्ता मुझसे ही होकर जाता है।मेरी बैलेंस-शीट जितनी दिखती है,उससे भी कई गुना ज्यादा छिपी रहती है।पूरी दुनिया का कारोबार मेरे कन्धों पर है।तुम्हारी ‘जन-धन टाइप’ फीलिंग से देश को केवल अनुदान मिल सकता है,फ़ोर्ब्स की अमीर सूची में नाम नहीं।

सफ़ेद धन : इतना सब होते हुए भी समाज में तुम्हें भली निगाह से नहीं देखा जाता है।आज भी तुम बड़ी मुश्किल से बाहर निकले हो ।

काला धन : यह तुम्हारी ग़लतफ़हमी है।समाज के हर क्षेत्र में मेरा नाम है,तुम्हारी तो कोई पूछ ही नहीं है।काले कारनामे और काली करतूत से लेकर मुँह काला करने तक सर्वत्र हमारी ही प्रतिभा है।ले-देकर एक सफेदपोश नाम है,उसके अंदर भी मैं ही रहता हूँ।तुम हो कहाँ मित्र ?

इतना सुनते ही सफ़ेद धन का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।वह जल्द से जल्द अपने असल ठिकाने ‘जन-धन’ की तलाश में जुट गया।


©संतोष त्रिवेदी
नवभारत टाइम्स में प्रकाशित।

कोई टिप्पणी नहीं: