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बुधवार, 19 नवंबर 2014

संतई सुरक्षा चाहती है !

संत हमारे समाज के नायक होते हैं,ठीक वैसे ही जैसे नेता।जाहिर है कि इनके गुणधर्मों में भी समानता होगी।पहले संत प्रवचनकर्ता थे,अब नेता उनसे प्रवचन में इक्कीस सिद्ध हो रहे हैं।विकसित हो रहे आधुनिक युग में संत किसी तरह प्रतियोगिता में नेताओं से पिछड़ न जाएँ ,सो इन्होंने उनका हावभाव-स्वभाव पूर्ण रूप से आत्मसात कर लिया है।नेताओं की अपनी भीड़ होती है और उनके भक्त भी।उनके बीच वो निर्भय होते हैं और दिखते भी हैं ताकि उनके भक्त बाकी दुनिया से निर्भय रहें।संत भी इसी परिपाटी को आगे बढ़ा रहे हैं।उनको लगता है कि वे भक्तों की रक्षा तभी कर सकते हैं जब बाहरी दुनिया से भक्त उनकी रक्षा कर सकें।इसलिए संत विश्रामगृह में अमन-चैन से हैं और बाहर कानून पानी माँग रहा है।

दरअसल,नेता और संत को आम समझने की भूल ही समाज में सबसे बड़े दुःख का कारण है।दुनिया के तारणहार कहे जाने वाले किसी भी संविधान से ऊपर होते हैं।वे स्वयं नियंता हैं,नीति-निर्धारक हैं इसलिए उन पर कोई नियम लागू नहीं होता।वे अपने प्रवचनों में शांति,अहिंसा,संयम की घुट्टी तो भक्तों को पिलाने के लिए तैयार करते हैं,खुद थोड़ी पीते हैं ! ऐसे परमार्थ में रत संत को राज्य भी दंडवत करता है और समाज भी।इनसे प्रवचन-प्रसाद पाकर भक्त भी संत-गति को प्राप्त हो जाते हैं।इसलिए वे निराहार रह सकते हैं,घर-बार छोड़ सकते हैं पर अपनी सीख पर कालिख नहीं पुतने दे सकते।वे इसके लिए लट्ठ भी उठा सकते हैं और अपना कानून भी बना सकते हैं।यही परमसंत की उनको सीख है और वे उन्हें बस गुरुदक्षिणा के रूप में वापस कर रहे हैं।

चाहे संत हो या नेता;मूल रूप से ये दोनों उपदेशक होते हैं।इनकी अपनी जनता और अपना संविधान होता है।बाहरी दुनिया के लोग इनके लिए एलियन-टाइप होते हैं।एक आम आदमी को खेत से ककड़ी चुराने के जुर्म में जहाँ जेल की सलाखें मिलती हैं,वहीँ संत को करबद्ध अपीलें नसीब होती हैं।कानून के आगे उसकी हाजिरी लगाने के लिए हजारों जवानों को कई दिनों तक रणनीतियाँ बनानी पड़ती हैं ।राज्य उसके घुटने में होता है और कानून ठेंगे पर।

सबसे बड़ी कमी हमारे ही अंदर है।हम उपदेशकों से वैसी ही अपेक्षा करने लगते हैं,जैसा वो बोलते हैं।उपदेशक या प्रवचन देने वाले को उन बातों पर अमल करने की ज़रूरत ही नहीं है।वे उपदेश देकर अपना काम कर रहे हैं और हमें आँख मूँदकर उस पर अमल कर लेना चाहिए।इसलिए नेता या संत से जवाब माँगने वाले या उन्हें कानून की किताब दिखाने वाले निरा अल्पज्ञानी हैं।ऐसे पहुँचे हुए संत स्वयं में जवाब हैं।खबरदार,यदि किसी ने उन पर उँगली उठाने की हिमाक़त की !

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