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रविवार, 31 मई 2015

कक्कू और उनका फेसबुक-स्टेटस !

शाम को बाज़ार से पैदल ही वापिस आ रहा था कि अचानक कराहने की आवाज़ सुनाई दी।मैं रुक कर इधर-उधर देखने लगा।शाम के धुंधलके में पहले तो कुछ समझ ही न आया कि आवाज कहाँ से आ रही है फ़िर ज़रा गौर से पड़ताल की तो पता चला कि बगल से बह रही नाली में कक्कू अपनी साइकिल समेत समर्पित भाव से गिरे हुए थे।मैंने झट से उनको पकड़ना चाहा तो वे बोल पड़े -बच्चा,पहले तुम साइकिल निकालो,यह हमरे ही ऊपर चढ़ी है।हम कहीं ना भाग रहे।’

मैंने पहले साइकिल निकाली फ़िर कक्कू बाहर आए।साइकिल को खास नुकसान नहीं हुआ था,बस मडगार्ड जरा-सा टेढ़ा हो गया था।कक्कू उसे ही ताके जा रहे थे,तभी मैंने पूछा-आप कैसे हैं कक्कू ? कहीं चोट तो नहीं आई ?’’कुछ नहीं बेटा,लगता है ई ससुरा हाथ अपनी जगह से हिल गवा है।बस पिलास्टर-पट्टी का खर्चा थोड़ा बढ़ गया है और कुछ नहीं’,कक्कू ने अपनी साइकिल से नज़रें हटाये बिना उत्तर दिया।
‘मगर ये अनर्थ हुआ कैसे ? आपको तो साइकल अच्छी तरह से चलानी भी आती है !’ मैंने अपने चेहरे पर गंभीरता लादकर चिन्ता प्रकट की।कक्कू ने हाथ की पीड़ा से उबरते हुए जवाब दिया,’बच्चा,हमें साइकल चलानी तो ख़ूब आती है।हम इसका हैंडल भी पकड़े रहे,पर ई ससुर फेसबुकवा हैंडल करै मा  सारी आफत आई है।’

अब मैंने अचरज-भरी निगाह से उनकी ओर देखा और सीआईडी के एसीपी प्रद्युम्न की तरह उनसे एक खोजी सवाल कर दिया-‘पर आपके नाली में गिरने से फेसबुक का क्या सम्बन्ध ? क्या कोई सेल्फी-उल्फी के चक्कर में यह सब हो गया या किसी ने ब्लॉक कर दिया आपको ?’
कक्कू अब कराह उठे,कहने लगे-नहीं बेटा ! सांझ में इस मोबाइल से सेल्फी की साफ़ तस्वीर भी नहीं आती और ना ही हमें किसी ने ब्लॉक किया है।हम तो सबके कमेन्ट भी लाइक करते हैं।सो ऐसी कउनो  दुश्मनी भी नाय है।हम बस अपनी  फोटू पर आए इकलौते कमेन्ट को लाइक भर कर रहे थे कि तभी साइकिल-रानी हमको लेकर गड्ढे मा समाय गईं।अब बताओ यहिमा हमरी कौन-सी गलती है ? अगर कमेंट को केवल हसरत-भरी निगाह से ही फेसबुकवा लाइक मान लेता तो ई अनर्थ ना होता।’

‘लेकिन खाली इसके लिए आपने अपनी जान जोखिम में डाल दी।कमेन्ट में लाइक थोड़ी देर बाद कर लेते’ मैंने पूछ लिया।मैं अभी भी इस दुर्घटना के असली कारण तक पहुँचना चाह रहा था।

कक्कू शायद मेरी मंशा समझ गए थे,कहने लगे-बच्चा,अगर हम लाइक करने में देरी करते तो कमेन्ट करने वाली कामिनी जी फेसबुक से नदारद हो जातीं।उनके फेसबुक में आने का यही टाइम है।इसके बाद वो रात में दो बजे आती हैं।तुम तो जानत ही हौ कि तुमरी काकी हमरा कितना खयाल रखती हैं।ऊ कहती हैं कि रात मा जागने वाला खाली उल्लू होत है।फ़िर अगर हम तुरतै लाइक न करते तो कामिनी जी नराज हो जातीं।हम नहीं चाहते थे कि उनको हमरे लाइक की खबर देर मा मिले।अब इस उमर मा हम ना काकी को नराज कर सकते हैं और न कामिनी जी को।तुमही बताओ हमने ठीक किया ना ?’

कक्कू हमें अब सोशल मीडिया के हीरो नज़र आने लगे थे।उन्होंने हम जैसे नई पीढ़ी के लोगों को उचित राह दिखाई थी।मन ही मन हम उन्हें अपना आदर्श मान बैठे।उन्होंने केवल एक लाइक के लिए अपना सगा हाथ कुर्बान कर दिया था।इधर हम हैं कि अपने खास दोस्त की पोस्ट पर सौ-सौ लाइक देखकर उसे गिनकर सौ गालियाँ देते हैं।मैंने फटाक से उनकी फोटू खींची और इस वीरोचित कार्य को अपना स्टेटस बनाकर सीधे फेसबुक को समर्पित कर दिया।देखते ही देखते उस पर धड़ाधड़ लाइक और कमेन्ट आने लगे।मैंने कक्कू को दिखाया तो बोले-बच्चा,पन्द्रह दिन बाद जब पिलास्टर उखड़ेगा,हम इस पर लाइक ज़रूर करेंगे।‘

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