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शनिवार, 11 अगस्त 2012

बस,प्रधानमंत्री सेकुलर होना चाहिए !

नेशनल दुनिया,२६ /०६/२०१२
जनसंदेश टाइम्‍स 27 जून 2012


हमारे देश को यूँ ही नहीं महान कहा जाता है.यहाँ के नेता तो इससे भी अधिक महान हैं.देश की इन्हें इतनी चिंता होने लगती है कि जितना कभी इन्होंने अपने घर-परिवार के बारे में नहीं सोचा होगा.अभी देखो,राष्ट्रपति के लिए होने वाले चुनाव में ये नेता जी-जान से लगे हुए हैं.सत्तापक्ष ने तो जैसे-तैसे अपनी पिटारी खोल दी थी,पर विपक्ष को पिटारी खोलने में ही डर लग रहा था.उसे आशंका थी कि कहीं पिटारी अंदर से खाली हुई तो और भद्द पिटेगी.इस चक्कर में बैठकों के कई दौर हो लिए तब तक दो-तीन समूह सत्तापक्ष की ही पिटारी पर अपना दाँव लगा बैठे.जब विपक्ष के बड़े भागीदार को कोई नहीं मिला तो बड़ी देर से बाहर से दौड़ते हुए को ही अपनी पिटारी से निकला दिखा दिया ! वह तो अच्छा हुआ कि उनको दौड़ लगाते हुए ही पकड़ लिया गया,नहीं तो वह लन्दन ओलम्पिक में होने वाली स्पर्धा के लिए क्वालीफाई कर जाते !
हमने महानता से बात शुरू की थी सो उसी पर अब आते हैं.जिस समय कुछ लोग राष्ट्रपति पद के लिए एकठो आदमी को ढूँढने में लगे हुए थे,उसी समय इन्होंने अगले प्रधानमंत्री को लेकर गंभीरता से सोचना शुरू कर दिया.एक तरफ बैठकों का लगातार दौर चल रहा था कि राष्ट्रपति के लिए किसको बलि का बकरा बनाया जाए,दूसरी तरफ एक महान और ज़मीं से जुड़े नेता ने सेकुलर प्रधानमंत्री की ज़रूरत पर ‘गोल्डन वर्ड्स’ पेश कर दिए.बस,हो-हल्ला मचना शुरू हो गया.मीडिया और राजनीति सामने खड़े राष्ट्रपति के चुनाव को भूलकर ‘सेकुलर-सेकुलर’ खेलने लगी.पता चला कि यह ‘सेकुलर-बम’ जानबूझकर अपनी ही पिटारी के एक विकास-पुरुष की ओर फेंका गया है.
इस ‘सेकुलर-बम’ की तीव्र भर्त्सना भी शुरू हो गई है.अजी,यह कौन निर्धारित करेगा कि फलाने सेकुलर हैं या नहीं ? यह तो अजीब मुसीबत हुई.अभी दलित,अल्पसंख्यक,आदिवासी आदि के नाम पर चयन हो जाता था,यह नई कैटेगरी कहाँ से आ गई ? आप किसी परिवार,वंश या वारिस के रूप में तो नेता चुन सकते हो पर इस नए पैमाने से निपटना मुश्किल है.इसे निर्धारित कौन करेगा ? इसी बीच इस ‘सेकुलर’ की आवाज़ के ज़वाब में एक प्रस्ताव यह भी आया,अजी सेकुलर ही क्यों,हिंदूवादी क्यों नहीं? इसका मतलब तो यही निकला जो पहला है वह दूसरा नहीं हो सकता या जो दूसरा है वह पहला नहीं !

अब तो मीडिया और हमारे महान नेताओं के बीच किसी के इंसान होने या न होने की कोई जिरह नहीं हो रही.बस,यह कि अगला सेकुलर है या हिंदूवादी,दलित है या सामान्य,अल्पसंख्यक है या बहुजन ! अब यह भी नहीं देखने की किसी को फुरसत नहीं है कि वो गूंगा है या बहरा,बस उसे खालिस सेकुलर होना चाहिए क्योंकि देश की सवारी करने के लिए इसी तरह के खाल के प्राणी की ज़रूरत है.प्रधानमंत्री बन जायेगा तो बाकी सभी योग्यताएं अपने आप आ जाएँगी या अयोग्यताएं ढँक जाएँगी.
हमारे देश के नेता महान इसलिए भी हैं कि जो काम सर पर है वह तो कर ही लेते हैं,लगे हाथों दो साल बाद का अजेंडा भी निपटा देते हैं.अब यह और बात है कि इस प्रक्रिया में कोई और निपट जाता है या हमारे गले लग जाता है? फ़िलहाल तो देश के नेता इसी बात में दुबले हुए जा रहे हैं कि अगला प्रधानमंत्री सेकुलर हो,भले ही इससे जनता के ऊपर मंहगाई का बोझ कम न पड़े या शासन-व्यवस्था अपरिवर्तित रहे . हमारे नेताओं के लिए अगली पंचवर्षीय योजना का इंतजाम अभी से हो जाय तो क्या दिक्कत है ?

2 टिप्‍पणियां:

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

अच्‍छा है (वर्ड वेरीफ़ि‍केशन हटाने से रह गया)

संतोष त्रिवेदी ने कहा…

हटा दिया है
बतलाने के लिए
आभार।