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रविवार, 12 अगस्त 2012

रीढ़ विहीनता का दौर !

नेशनल दुनिया में १४/०७/२०१२ को प्रकाशित


देश में अचानक रीढ़ वाले नेताओं की मांग बढ़ गई है.जब से राजनीति में अपनी गोटी गड़बड़ाई है,एक प्रदेश की मुख्यमंत्री ने सरे-आम यह पर्दाफ़ाश किया है कि हमारे यहाँ रीढ़विहीन नेताओं की संख्या अप्रत्याशित रूप से बढ़ी है.गोया ऐसे नेता रातोंरात पैदा हो गए हों ! यह तो इन नेताओं के ऊपर सरासर अन्याय है और यह पहचान उनको कैसे हुई यह भी गंभीर सोच का विषय है. रीढ़ नापने का कोई नया यंत्र तो हाल-फ़िलहाल इजाद भी नहीं हुआ है फिर कैसे उन महोदया ने ऐसी मेडिकल-रिपोर्ट जारी कर दी ?

याद आता है कि जब यही महोदया विपक्ष में थी तो लोकतंत्र और नागरिकों के मूल-अधिकार की बात पर रोज़ हो-हल्ला मचता था,बड़े-बड़े जनांदोलन खड़े किये जाते थे.ज़ाहिर है कि यह सब बिना रीढ़ की हड्डी के संभव नहीं था.सत्ता में आते ही अपने विरोधियों को सबक सिखाना,प्रेस के सवालों के जवाब न देना,अपनी सरकार की आलोचना करने वाले दो प्रोफेसरों को कारण बताओ नोटिस थमाना,व्यक्तिगत खुंदक के लिए माटी-मानुष का लिहाज़ न करना,रेल-मंत्रालय को निजी जागीर बना लेना आदि ऐसे काम इतनी सरलता से किये गए जिनमें किसी रीढ़ की हड्डी का काम ही नहीं पड़ा.इस हड्डी के होने से जहाँ काम करने में असुविधा होती है वहीँ इसके अभाव में व्यक्ति कैसे भी,किधर भी आराम से झुक या लपक सकता है.

बिना रीढ़ के होने का एक फायदा यह भी है कि संसद-भवन के अंदर आसानी से घुसा जा सकता है.उसके दरवाजे पर लगा सुरक्षा-यंत्र उस शख्स को बेरोक-टोक अंदर जाने देगा,जिसके रीढ़ की हड्डी नहीं है.ऐसी हड्डी होने पर वह यंत्र बीप-बीप कर सकता है.इसलिए यह अच्छा है कि संसद के अंदर ऐसे लोगों की संख्या बढ़े.दूसरे,ऐसा होने पर किसी भी सरकार को कोई अड़चन भी नहीं आ सकती.किसी खास मुद्दे पर सरकार के मनेजर जब चाहें तब ऐसे लोगों की सेवाएं ले सकते हैं.

आखिर ,फिर रीढ़-विहीन लोगों की बढती तादाद को लेकर इतना हल्ला क्यों मचाया जा रहा है,गहरी निराशा क्यों जताई जा रही है.हाँ,एक बात हो सकती है ,यदि ऐसे लोग प्रचुर मात्रा में सुलभ हो जायेंगे तो नखरे सहने की रेटिंग घट जायेगी,बाज़ार-भाव घटेगा सो अलग ! यही एक बात परेशान करनेवाली है कि जमे-जमाये रीढ़-विहीन लोगों के रहते अगर नई आमद पर रोक न लगाई गई तो क्या होगा ? इस सन्दर्भ में आने वाले दिनों में समर्थन की कीमत पर यह प्रस्ताव भी लाया जा सकता है कि आगे से पूरी सावधानी बरती जाय कि रीढ़-विहीन लोग बिना कोटे के न आवें.यदि ऐसे लोगों का आना ज़रूरी ही है तो  इनकी ही संतानों को,इनकी ही प्रजाति के लोगों को प्राथमिकता दी जाय !

रही बात रीढ़ वाले लोगों की, सो उनकी यहाँ ज़रूरत नहीं है.वे खेतों में,कार्यालयों में,विद्यालयों में मुस्तैदी से काम करें.अगर उनकी रीढ़ की हड्डी मज़बूत रहेगी तो ठीक से हल चलेगा,कुर्सी और कम्यूटर पर बैठकर काम हो सकेगा और जब किसी नेता को आन्दोलन करने की ज़रूरत पड़ेगी तो पुलिसिया-लाठीचार्ज में उनकी हड्डियां टूटने के काम आ सकेंगी ! इसलिए हमें भी लगता है कि रीढ़ की हड्डी केवल आम आदमी के लिए ही ज़रूरी है !

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