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बुधवार, 1 मई 2013

गए थे नवाब बनकर !

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जनसंदेश में १/५/२०१३ को




नवाब जी बहुत सदमे में हैं।रंज की बात यह है कि इस सदमे का बायस कोई बाहर वाला नहीं बल्कि अपना ही है।अमूमन हर गलत काम में विदेशी साजिश होती है लेकिन इसमें अपनों का ही हाथ निकला  ।जिस हाथ को वो गाहे-बगाहे उठाये घूम रहे थे,उसी ने उनके साथ छल किया है।यह बात हम नहीं कह रहे हैं,सार्वजनिक रूप से नवाब जी ने ही खुलासा किया है।वे आला दर्जे और रसूखवाले नेता हैं।इससे भी ज़्यादा यह कि वो मंत्री है और उत्तम प्रदेश में महत्वपूर्ण तबके की नुमाइंदगी करते हैं।नवाबी ठाठ के चलते अकसर वो दूसरों की परेशानी का सबब बनते हैं पर इस बार संसार के प्रभु देश अमेरिका ने उनकी शान में गुस्ताखी की है।वहाँ वे गए तो थे लेक्चर झाड़ने,पर मेजबान शायद लखनवी तहजीब से वाकिफ नहीं थे।
अब यह भी कोई बात हुई कि जिसे बुलाया जाए,उसकी आवभगत की कौन कहे,जामा तलाशी ली जाय ?आखिर वो कोई छोटी-मोटी हस्ती नहीं हैं ।अगर मंत्री न बनते तो भी उनकी रगों में नवाबी खून तो ठांठे मारता ही है।इसका प्रदर्शन अभी कुछ दिनों पहले उन्होंने अपनी रेलयात्रा में दिखाया भी था,जब एक परिचर ने उनकी सेवा में कोताही की थी,उन्होंने वहीँ उसे ज़ोरदार थप्पड़ रसीदकर अपनी नवाबी सम्मान की रक्षा की थी।कुछ समय पहले कुम्भ मेले का शानदार इंतजाम उन्हीं की अगुवाई में हुआ था।इसी बात को समझाने वे अमेरिका गए थे।वहाँ जाते समय सोचा होगा कि सारे अफ़सर एक जैसे होते हैं।अपने देश के अफसरों की तरह वे भी चरणों में लोट जायेंगे,पर हुआ इसके उलट । वहाँ नवाब जी को ज़बरन रोका गया और असहज करने वाले सवाल पूछे गए।एयरपोर्ट में उन्हें वो मान न मिल सका,जिसके वो हक़दार थे।
इस बात से नवाब जी के सम्मान को बड़ी ठेस पहुंची।यह ठेस इतनी व्यापक थी कि उन्होंने अमेरिका में व्याख्यान देना भी निरस्त कर दिया।ऐसा करके उन्होंने अपने अपमान से थोड़ा राहत महसूस की।अभी यह आकलन आना बाकी है कि अमेरिका ने इनका वक्तव्य न सुनकर अपना कितना नुकसान किया है या राहत महसूस की है।यह उनका व्यक्तिगत अपमान होता तो वे झेल भी जाते,उत्तम प्रदेश और अपने तबके के इकलौते प्रतिनिधि होने के नाते यह उन सबका अपमान है।नवाब जी को लगता है जिस सरकार का हाथ वो थामे हुए हैं,उसी के एक मंत्री की साजिश से यह सब हुआ है।अब वे अपनी पार्टी में यह दबाव बना रहे हैं कि ऐसी सरकार से अपना हाथ खींच लिया जाय।
नवाब जी यदि नाराज़ हैं तो ज़रूर कुछ करना चाहिए।अब अमेरिका वाले इतने संवेदनहीन हैं कि उनको कहने से कुछ हासिल नहीं होने वाला।वे अतीत में हमारे कई नेताओं और मंत्रियों के कपड़े तक उतरवा चुके हैं,पर क्या किया जाए ? देश सेवा के लिए अमेरिका जाना ज़रूरी है,इसलिए मौका पाने वाला हर नेता वहाँ एक बार ज़रूर जाना चाहता है।इससे देश का कल्याण तो होता ही है,अपना जनम भी सुफल हो जाता है।केन्द्र सरकार यदि अपनी सरकार सुरक्षित रखना चाहती है तो अमेरिका के एयरपोर्ट में कुछ भारतीय अफ़सर नियुक्त करवा दे जो नेताओं की आवभगत करने में कुशल व अनुभवी हों।इससे ऐसी पुनरावृत्ति नहीं होगी कि कोई जाए नवाब बनकर और लौटे तो जल-भुनकर टुंडे का कबाब होकर।


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