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रविवार, 4 सितंबर 2022

एक फ़िल्म जो रिलीज़ नहीं हुई !

बात उन दिनों की है जब देश क्रांति की चपेट में था।सड़कों पर बेरोक-टोक क्रांति बह रही थी।गड्ढे भी क्रांति से पट गए थे।वे सड़कों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर मुक्त हो जाने को तैयार थे।भ्रष्टाचार था कि कुंडली मारकर ऊँचे आसन पर बैठा हुआ था।'आम' परेशान था कि 'ख़ास' की सारी सप्लाई-लाइन कैसे रोकी जाय ! ऐसे कठिन समय मेंक्रांतिकुमारअवतरित हुए।'आम' और 'अवाम' एक हो गए।जल्द ही अँधेरा फट गया।कुर्सी दिखने लगी।उनकी सहयात्री ईमानदारी भ्रष्टाचार से मिलने को आतुर हो उठी,जिससे वह उसका गला दबा सके।पर इसमें एक मुश्किल थी।वह हवाई चप्पल से बँधी हुई थी।कुर्सी उसकी पकड़ से बहुत दूर थी।वहाँ तक पहुँचने के लिए उसे एक मज़बूत जूते की दरकार थी।उसने इधर-उधर से कई आरोप इकट्ठे किए।उन्हीं को जूता बनाकर नियमित रूप से मीडिया की ओर उछालना शुरू कर दिया।दिन में दस बार लोकपाल जी का मंत्रजाप भी शुरू हो गया।राजपथ जनपथ में बदल गया।देखते-ही-देखते बदलाव की आग लग गई।


कुर्सी का फ़र्नीचर पुराना था,सुलग उठा।क्रांति की ताप से भ्रष्टाचार भाग खड़ा हुआ।अभी आरोप हवा में ही तैर रहे थे,पर कुर्सी उनकी जद में गई।ईमानदारी के साथ वे कुर्सी पर बैठ गए।वे चारों तरफ़ पसरना चाहते थे,पर कुर्सी में लगे दो हत्थे उनकी इस राह का रोड़ा बन गए।उन्होंने एक झटके में लात मारकर दोनों हत्थे उखाड़ फेंके।यह काम इतनी कुशलता से किया गया कि लोकतंत्र को तनिक भी चोट नहीं पहुँची।पूरी पारदर्शिता के साथ उन्होंने अपना मुक्ति-पथ साफ़ किया।इसके बाद वे सुकून से फैल गए।


इस बीच उन्होंने लोकपाल जी की सुरक्षा को लेकर महत्वपूर्ण क़दम उठाया।उन्हें एक गठरी में बाँधकर रख दिया  ताकि वे प्रदूषित हवा-पानी के संसर्ग से बचे रहें।देश के आम और ख़ास लोकपाल जी का नाम तक भूल गए।शोध से मालूम हुआ कि दरअसल देश को अब लोकपाल जी की ज़रूरत ही नहीं थी।केवल कुर्सियाँ बदल जाने भर से ही भ्रष्टाचार भय से काँपने लगा था।इसमें उनका कोई दोष नहीं था।उन्होंने शुरू में ही चेतावनी दे दी थी कि सब मिले हुए हैं।किसी ने उन्हें गंभीरता से नहीं लिया पर वे गंभीर थे।


भ्रष्टाचार के यूँ एकदम से ग़ायब हो जाने के बाद बेचारी ईमानदारी अकेली रह गई।सरकार का संसर्ग पाकर वह अब  कट्टर हो चुकी थी।कट्टरता को लेकर क्रांतिकुमार इतने ईमानदार निकले कि देशभक्त भी हुए तो एकदम कट्टर।यह बात असली देशभक्तों को बुरी लगी।इससे उनकी रेटिंग पर ख़तरा उत्पन्न हो गया।अब देश में दो तरह के ही देशभक्त पाए जा रहे थे।एक असली,दूसरे कट्टर।इनके अलावा जो भी बचे थे,वे देशद्रोही हो सकते थे या संदिग्ध नागरिक।


देश को तब तकअच्छे दिनोंकी लत लग चुकी थी।तभी घटनाक्रम में ज़बर्दस्त मोड़ गया।आपातकाल से आजिज़ आए लोगों ने पहले तो भक्तिकाल की घोषणा की,फिर एक-एक कर सबकी निशानदेही शुरू हो गई।राज्य से इतर राय रखने वालेअराजकसबक़ सीखने लगे।मँहगाई और बेरोज़गारी जैसी बातें भक्ति में बाधा डालने लगीं।इस समस्या से निपटने के लिए लोगों ने शंख और घड़ियाल बजाने शुरू कर दिए।इससे दोतरफ़ा फ़ायदा हुआ।मँहगाई ने आत्महत्या कर ली और बेरोज़गारी से लड़ने के लिएअग्निवीर गए।इस बीच क्रांतिकुमार को लगा कि उनकी तपस्या में कहीं कमी रह गई थी।अचानक उनका ताप कम होने लगा था।वे देशभक्ति कोसिलेबसमें ले आए।अब देशभक्ति एक जज़्बा नहीं सबक़ था।इसे याद करना ज़रूरी बना दिया गया।फिर एक दिनदिल्ली-मॉडलकी चर्चा ध्वस्त हुएट्विन-टॉवरवाले सुदूर देश तक जा पहुँची।इस बीच कहानी में एक औरट्विस्ट गया।राष्ट्रवादियों के सामने नव-राष्ट्रवादी उनसे ज़्यादा उछल-कूद करने लगे।यह बात खरे राष्ट्रवादियों को अखर गई।


आख़िरकार वे उबल पड़े।उनके तरकश में अभी भी कईमास्टर-स्ट्रोकबचे थे।आपातकाल से उबर चुके देश मेंअमृतकाललागू हो गया।सहसा सब कुछ अमृतमय हो उठा।उन्होंने विरोधियों पर तोते और कबूतर छोड़ दिए।वे जगह-जगह सुरक्षा और शांति का संदेश वितरित करने लगे।इससे प्रभावित हो लाभार्थियों ने तुरत-फ़ुरत राष्ट्रवाद की शपथ ले ली।जो बचे,वे पिंजरे में बंद हो गए।उधर कट्टर ईमानदार सुरापान में व्यस्त थे और इधरपाँच टिलियनके कटोरे मेंसुधा-पानहोने लगा।एक तरफ़ गालीबाज़ों का गौरवगान था तो दूसरी तरफ़ बलात्कारियों और हत्यारों को सरकारी-सहायता से अमृत चखाया जाने लगा।निर्भयाकी मुक्ति के बाद जैसेअभयअभियान प्रारंभ हो गया हो


मेरी आँखों के सामने इत्ती अच्छी फ़िल्म चल रही थी कि तभी पर्दा फाड़करअच्छे दिनों की सरकारऔरक्रांतिकुमारदोनों एक साथ प्रकट हो गए।एक के हाथ तिरंगा था तो दूसरे का मुँह पुता हुआ।देश कोने में खड़ा मेरी ओर देख रहा था।मैं उधर लपकने ही जा रहा था कि श्रीमती जी मुझे झिंझोड़ने लगीं-कितनी बार कहा है कि दिन मेंसनीमामत देखा करो।बड़ी देर से पता नहीं क्या अंट-शंट बक रहे हो ! अपना घर देखो।कितने दिन से टपक रहा है।इसे जोड़ लो फिर देश जोड़ लेना !


संतोष त्रिवेदी 










रविवार, 31 जुलाई 2022

गिरावट के दौर में हम !

मेरे एक परम मित्र हैं जो पहुँचे हुए आलोचक हैं।साहित्य और राजनीति में उनका एक समान दख़ल है।जब भी उन्हें लगता है कि कुछ ग़लत हो रहा है,‘फ़ायरिंग’ करने वे मेरे पास आ जाते हैं।पर कल तो ग़ज़ब हो गया।वे नहीं आए,उनका फ़ोन आ गया।‘हलो’ कहते ही शुरू हो गए,‘भाई,बात ही कुछ ऐसी है कि मिलने का इंतज़ार नहीं कर सकता।जब तक तुम्हें बताने आऊँगा,तब तक सारी ‘गर्मी’ निकल जाएगी।इसलिए सोचा फ़ोन पर ही निपट लेते हैं।’


निपटने का नाम सुनकर मेरे कान खड़े हो जाने थे पर नहीं हुए।फ़ोन को इतना सटा रखा था कि इसके लिए ‘स्पेस’ ही नहीं मिला।इसी  चक्कर में मैंने गंभीरता ओढ़ ली।इन दिनों वैसे भी साहित्य और राजनीति दोनों ने मिज़ाज हल्का कर रखा है।जब भी गंभीर होने की कोशिश करता हूँ,मुँह की खाता हूँ।इन दोनों जगहों से आजकल ऐसी खबरें आ रही हैं कि उनके आगे चुटकुले पानी भरते हैं।इसलिए जब मित्र फ़ोन पर ‘सीरियस’ हो गए तो पशोपेश में पड़ गया।अपने लहज़े में थोड़ा भारीपन लाते हुए मैंने पूछ लिया, ‘क्या बात है दोस्त ? उधर पानी नहीं गिर रहा क्या ?’


मित्र के लहज़े में अचानक तल्ख़ी आ गई।मेरे ऊपर बरसने लगे, ‘पानी गिर रहा हो या न गिर रहा हो,रूपया रोज़ गिर रहा है।बाज़ार गिर रहा है।मीडिया गिर रही है।प्रार्थना और इबादत गिर रही है।हम भी कब तक बचेंगे ?’ ऐसा कहकर वे लंबी-लंबी साँसें लेने लगे।‘तुम भी जल्द गिरने वाले हो मित्र ! सुना है,इस साल का ‘सूरमा भोपाली’ सम्मान तुम पर ही गिरने जा रहा है।बिलकुल अंदर की और सौ टका पक्की ख़बर है।’ मैंने यूँ ही हवा में तीर चलाया।वे कराह उठे-‘कभी तो ‘सीरियस’ रहा करो दोस्त ! रूपया मेरी तरह अस्सी पार कर गया है।जल्द ही ‘सौ टके’ का भी हो जाएगा।होटलों में सरकार गिर रही है और और सड़क पर संगठन।सारे देश में गिरावट का दौर है और तुम्हें मसखरी सूझ रही है।बड़ी गंभीर स्थिति है।देश को बचाने के लिए हमें एक होना होगा।’ उन्होंने अपना फ़रमान सुना दिया।


यह सुनकर मेरा सिर चकरा गया।सनद रहे,यह वही सिर है,जिसके ऊपर ‘ऑलरेडी’ जमाने भर का भार लदा है।उसी पर आलोचक-मित्र ने ‘गिरावट’ बचाने का भार भी लाद दिया।मैंने उन्हें दुरुस्त करते हुए बताया, ‘इससे भी बड़ी और ताज़ी ख़बर हमारे पास है।साहित्य का ‘भुखर-सम्मान’ घोषित हुआ है।इस बार यह सम्मान दूसरे गुट के ‘प्रखर लखनवी’ ले उड़े हैं, जिनकी पिछली किताब की तुमने धज्जियाँ उड़ाई थीं।अब वही तुम्हें गिरा हुआ आलोचक साबित करने पर तुले हैं।वर्तमान में आलोचना क्या इतना गिर चुकी है ?’


यह सुनकर मित्र हिल गए।पास होते तो शायद मुझ पर ही गिर पड़ते।कहने लगे, ‘पहले मुझे संदेह था अब भरोसा हो गया है।तुम भी पूरी तरह गिर चुके हो।मुझ पर भरोसा नहीं रहा ? मैं तो अपनी ‘मानहानि’ की कहीं न कहीं भरपाई कर ही लूँगा।फ़िलहाल,मुझे अपनी नहीं देश और समाज की चिंता है।लोकतंत्र में साहित्य की गरिमा गिरी है।अब से लोकतंत्र के मंदिर में किसी को कोई चोर-उचक्का नहीं कह सकता।यहाँ तक कि पाखंडी,बेशर्म,भ्रष्ट और मूर्ख कहना वर्जित है।ये सारे शब्द अब बेहद शरीफ़ हो गए हैं।सड़क पर किसी को ‘गुंडा’ कह दो तो उसे ‘टिकट’ मिल जाता है।यही टिकट लेकर वह ‘माननीय’ हो जाता है।सड़क पर इन शब्दों से कोई बुरा तक नहीं मानता।ऐसे ‘पवित्र’ शब्दों को सदन में गिरने से रोका जा रहा है।कहते हैं इससे संसदीय गरिमा गिरती है।ऐसे शब्दों के जीते-जागते प्रतिमान वहाँ सशरीर बैठ तो सकते हैं पर ये निर्जीव ‘शब्द’ सदन में नहीं घुस सकते।यह साहित्य के विरुद्ध सियासत की साज़िश नहीं तो और क्या है ? इसके विरुद्ध हमें मिलकर लड़ना होगा।तभी हम अपने हिस्से का सम्मान खींच पाएँगे।’ उनकी आवाज़ कमजोर होती हुई महसूस हुई।


अब तक मुझे आभास हो चुका था कि मैं पता नहीं किस दुनिया में रहता हूँ ! मूल्यों की गिरावट इतनी हो गई और मुझे टमाटर तक के दाम गिरने की ख़बर नहीं मिली।मन ही मन ख़ुद को कोसने लगा।उधर मित्र ने फ़ोन ‘होल्ड’ पर धर दिया।मैं भी ‘वाट्सऐप’ पर अपना ‘स्टेटस’ चेक करने लगा।ख़ुद को गिरा हुआ फ़ील करता तभी उधर से उनकी चहकती हुई आवाज़ सुनाई दी, ‘दोस्त,तुम्हारा लेखन भले ‘टू जी’ स्तर का हो,नेटवर्क बिलकुल ‘फ़ाइव जी’ स्टैंडर्ड का है।तुम्हारी ख़बर पक्की निकली।अभी भोपाल से ही फ़ोन आया था।वे बस मुझे सम्मानित करने की सहमति चाहते थे।अब इतना भी ग़िरा हुआ नहीं हूँ कि सामने से आ रहे सम्मान-प्रस्ताव को ठुकरा दूँ ! यह शिष्टाचार और नैतिकता के विरुद्ध होता।इसलिए मैंने बड़ी विनम्रता से उनको‘हाँ’ कर दी।अब बस बैंक जा रहा हूँ।’


मैंने उन्हें बीच में टोका, ‘मगर इस समय बैंक जाने की क्या जल्दी है ?’ मित्र तुरंत बोल उठे, ‘भई,’आधुनिक सम्मान’ हैं।इनके ‘प्रॉसेस’ होने में ‘तन-मन-धन’ से लगना पड़ता है।यह बस सामान्य प्रक्रिया है।तुम नहीं समझोगे।कभी सम्मानित हुए हो तो जानो !’ इतना कहकर वे निकल लिए और मैं तभी से साहित्य में अपनी गिरावट पर चिंतन कर रहा हूँ।उनकी बात सोलह आना सच निकली।वाक़ई गिरावट की कमी नहीं है देश में !


संतोष त्रिवेदी


रविवार, 26 जून 2022

बाढ़ और साहब का हवाई-दौरा

 देश के अधिकतर हिस्से गर्मी से तप रहे थे पर बड़े साहब का तप इससे भी तेज निकला।उनके हिस्से में बाढ़ आई हुई थी।वे बरामदे में बैठे अख़बार पढ़ रहे थे।बाढ़ इतनी थी कि साहब के मुँह में पानी आ गया।सूखा भी तो बहुत दिनों से था।वे बेचैन हो उठे।जब भी उन्हें बेचैनी महसूस होती है,दौरे शुरू हो जाते हैं।इस बार भी यही हुआ।उन्होंने अपने क्षेत्र का दौरा फ़ाइनल कर दिया।साहब की तरह उनका व्यक्तिगत सचिव भी संवेदनशील था।दोनों से जनता के दुःख देखे नहीं जाते थे पर मन में जनसेवा का ऐसा ज्वार उठता था कि बिना देखे चैन नहीं आता था।सचिव जी तुरंत सक्रिय हो उठे।एक विशेष विमान से अपने और साहब के ‘दुःख-निवारण’ की व्यवस्था की।विमान अत्याधुनिक क़िस्म का था।उसकी खिड़कियाँ ‘दृश्य-फ़्रेंडली’ थीं।देखने वाले को वही दिखता था,जो वह देखना चाहे।कोई भी अवांछित-टाइप का दृश्य सामने नहीं पड़ता था।दौरे के समय इससे बाढ़ का पानी तो साफ़ दिखेगा,पर पानी में क्या-क्या समा गया है,यह नहीं।इसके लिए बाढ़-कमेटी है ना ! वही देख लेगी।उसको भी तो रोज़गार मुहैया कराना है।यह उनकी दूसरी बड़ी चिंता थी।


फ़िलहाल सचिव जी को साहब की चिंता थी और साहब को बाढ़ की।देखते ही देखते विमान हाज़िर हो गया।उसकी खिड़कियाँ ‘दृश्य-फ़्रेंडली’ के साथ-साथ ‘गंध-प्रूफ़’ भी थीं।दुर्गंध का एक भी झोंका साहब को विचलित कर सकता था।इससे बाढ़ से उपजे उनके दुःख में ख़लल पड़ने की आशंका थी।इसलिए ऐसा पुख़्ता इंतज़ाम किया गया था।इसी बात से उनकी संवेदनशीलता का अंदाज़ा लगाया जा सकता है।कहीं वे वाक़ई दुःखी हो गए तो फिर जनता का दुःख कौन बाँटेगा ? और हाँ,राहत भी तो बाँटनी है।यही सोचकर वे सचिव सहित विमान में समा गए।‘मेन-स्ट्रीम मीडिया’ से तीन छँटे हुए पत्रकार वहाँ पहले से जमे हुए थे।पहले भी वे सूखे और सरकार को बख़ूबी ‘कवर’ कर चुके थे।अब बाढ़ ‘कवर’ करने की ज़िम्मेदारी भी उनकी थी।साहब अपने सचिव की इसी तरह की दूरंदेशी के क़ायल थे।आज फिर हुए।


विमान उड़ने लगा।वे दोनों भी भरे मन से उड़े।साहब को रह-रहकर घर की याद आ रही थी,पर जनसेवा के आगे बेबस थे।मन ही मन सोचने लगे कि जब तक वे बाढ़ से हुए नुक़सान का जायज़ा नहीं ले लेते,राहत-परियोजना पर काम नहीं शुरू हो पाएगा।साहब को चिंतित देखकर सचिव जी साथ में बैठे पत्रकारों की ओर ताकने लगे।इनमें एक युवा पत्रकार ज़्यादा उत्साहित लग रहा था।उसे न्यूज़ ‘ब्रेक’ करने की जल्दी थी।विमान अभी बाढ़-क्षेत्र में आया भी नहीं था पर उसका सवाल आ गया।मुस्कुराते हुए उसने साहब से पहला सवाल किया, ‘इस बार की बाढ़ कितनी गंभीर है ? इससे निपटने के लिए आपके पास किस तरह की योजनाएँ हैं ?’


सवाल सुनते ही साहब खुद गंभीर हो गए। बोले-‘देखिए,यह वाली बाढ़ पहले से ज़्यादा तीव्र लग रही है।हमें और अधिक योजनाओं की ज़रूरत होगी।एक बात साफ़ है।सरकार इस काम में कोई कोताही नहीं बरतेगी।दौरा शुरू करने से पहले ही हमने बीस-सदस्यीय ‘बाढ़-राहत कमेटी’ गठित कर दी है।इस बार उसका बजट भी बढ़ा दिया है।कमेटी पूरी तरह संतुष्ट है।बाक़ी देखते हैं कि जान-माल का कितना नुक़सान हुआ है ?’ यह कहकर साहब ने राहत की साँस ली।


इस बीच सचिव जी ने ऐलान किया।हम बाढ़-ग्रस्त क्षेत्र के ऊपर से गुजर रहे हैं।बाक़ी सवाल इलाक़े के अवलोकन के बाद लिए जाएँगे।सबने आसमान से नीचे की ओर झाँका।हर तरफ़ जल ही जल दिख रहा था।खेत और ऊसर में कोई फ़र्क़ नहीं था।फ़सलें रोज़गार की तरह ग़ायब थीं।बीच में कहीं-कहीं लंबे पेड़ विपक्षी दलों की तरह अपनी सत्ता बचाए दिख रहे थे।जन और जानवर का कोई भी निशान नहीं दिखा।सचिव जी ने निष्कर्ष निकालते हुए घोषणा की, ‘लोगों में सहन-शक्ति की अत्यंत कमी है।हो न हो,जन और जानवर आपदा के समय मैदान छोड़कर भाग गए हों ! इससे हमें नुक़सान का हिसाब लगाने में और समय लग सकता है।’ साहब ने सहमति में सिर हिलाते हुए आश्वस्त किया कि जनकार्यों के निष्पादन के लिए समय की कोई कमी नहीं है।कमेटी को इसका भी अधिकार दे दिया गया है कि वह अगली बाढ़ से पहले इसका सही-सही आकलन कर ले।

लगभग आधे घंटे के सघन दौरे के बाद विमान विशेष हवाई पट्टी पर उतर गया।यहाँ गेस्ट-हाउस में भोजन और विश्राम का कार्यक्रम था।वरिष्ठ पत्रकार ,जो एक बड़े चैनल से थे, बड़ी देर से कसमसा रहे थे।भोजन के बीच में एक महत्वपूर्ण सवाल पूछ बैठे, ‘इतने व्यस्त कार्यक्रम के बीच आप कभी थकते नहीं ? हमारे श्रोता जानना चाहेंगे कि आपकी इस सक्रियता का राज क्या है ?’


साहब ने डकार लेते हुए उत्तर दिया, ‘सच बताऊँ,हमें राहत बाँटने से ही राहत मिलती है।यदि आपदाएँ आना बंद हो जाएँ,लोगों का भला करने को हम तरस जाएँ।ईश्वर उनकी भी सुनता है और हमारी भी।जब भी कोई आपदा आती है,पूरी मशीनरी सक्रिय हो उठती है।इसलिए हर आपदा हमें अवसर देती है।आप स्वयं इसके गवाह हैं।तीसरा पत्रकार जो अपनी बारी का इंतज़ार कर रहा था,यह सुनकर उसने पानी का गिलास उठा लिया।


अचानक मौसम की बातें होने लगीं।सबने राहत की साँस ली।


संतोष त्रिवेदी