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रविवार, 2 जुलाई 2023

टमाटर ख़रीदने के साइड-इफ़ेक्ट

पिछले कई दिनों से मैं गाँव में था।गर्मी की छुट्टियों में आम और जामुन के खूब मज़े ले रहा था।इस दौरान देस-दुनिया से बेख़बर-सा रहा।दो दिन पहले राजधानी लौटा तो ऐसा लगा कि धूप और घाम से झुलसी चमड़ी नक़ली रोशनी और एसी की ठंडी हवा पाकर खिल उठी हो।ऐसे स्वर्गिक-अनुभव में चार-चाँद लगाने के लिए मैं इंटरनेट-मीडिया में घुसने वाला ही था कि श्रीमती जी ने हाथ में थैला थमा दिया।जाओ पहले बाज़ार से सब्ज़ी ले आओ।किचन में कुछ बचा नहीं है।मैंने बचने की असफल कोशिश की, ‘लेकिन सब्ज़ी तो घर बैठे ऑनलाइन भी मँगाई जा सकती है।’ ‘ हाँ, पर सब्ज़ी देखकर लानी है।इस मौसम में सड़ी-गली सब्ज़ी ज़्यादा आती है।तुम्हारे गाँव से लौटने का मैं इंतज़ार ही कर रही थी।’ श्रीमती जी के कठिन संकल्प के आगे मैंने समर्पण कर दिया।घर के बाहर मेरा कितना भी ख़ास रुतबा हो, पर घर में शुद्ध रूप से आम आदमी ही हूँ।इसलिए चुपचाप झोला उठाकर चल दिया।

ख़रीदारी करने का अपना एक उसूल है।मैं ज़्यादा ‘लोड’ नहीं लेता।रुपयों के बजाय किलो में ख़रीदता हूँ।हाँ,जब श्रीमती जी के साथ होता हूँ,अपने उसूल ताक पर रख देता हूँ।दुकानदार से भाव-ताव वही कर लेती हैं।फिर घर आकर जोड़ती हैं कि उन्होंने आज कितने रुपए की बचत की।मोल-तोल करने की मेरी आदत कभी रही नहीं।जिसे मैं अपनी उदारता समझता हूँ,श्रीमती जी उसे बेवक़ूफ़ी कहती हैं।ये सब्ज़ी वाले बड़े शातिर होते हैं।एक का दो बताते हैं और ख़राब सब्ज़ी भी टिका देते हैं।उनके ये सूत्र वाक्य मेरे कानों में गूँजते तो हैं पर बाज़ार जाते ही हवा हो जाते हैं।बहरहाल,मैं तपती गर्मी में सब्ज़ी-मंडी तक सुरक्षित पहुँच गया।मेरे उसूल भी नहीं मुरझाए।मैंने ख़रीदारी में दस मिनट लगाए होंगे।दो किलो आलू,आधा किलो भिंडी,पाव भर अदरक और दो किलो लाल टमाटर झोले में डलवा लिए।मोलभाव किए बिना सब्ज़ीवाले से पैसे पूछकर भुगतान कर दिया।उसने भी हमारी उदारता का उधार नहीं रखा।थोड़ी-सी धनिया और हरी मिर्च मेरे झोले में छिड़क दी।मैंने उसे शुक्रिया कहा और झोला लेकर घर की ओर चल पड़ा।


अभी कुछ ही दूर चला होऊँगा कि मुझे लगा कि कुछ लोग मेरा पीछा कर रहे थे।वे कुल तीन थे।मुझे गले में पड़ी अपनी चेन की चिंता होने लगी।कुछ दिन पहले ही विभाग से मुझे एरियर मिला था,उसी से पीली धातु की भारी चेन बनवाई थी।अब उसी पर भारी संकट था।मैंने अपनी चाल बढ़ाई पर पीछा करने वाले मुझसे तेज निकले।पल भर में तीनों बिलकुल मेरे सामने थे।मैंने एक हाथ से अपना गला पकड़ा और दूसरे से झोला।वे मुझे छोड़कर झोले की ओर बढ़े।एक ने मेरे मासूम झोले को हाथ लगा दिया।मैंने बचने का प्रयास किया।इस क्रम में झोला एक तरफ़ गिरा और मैं दूसरी तरफ़।वे लुटेरे थे पर ज़ालिम नहीं।उन्होंने मुझ पर रहम किया और झोले की ख़बर लेने लगे।अब मुझे सीबीआई और इनकम टैक्स वालों की याद सताने लगी।इसके बाद मैं अचेत हो गया।


जब मुझे होश आया,सबसे पहले मेरा हाथ चेन पर गया।सुरक्षित पाकर राहत की साँस ली।तभी पास खड़े पड़ोसी पांडेय जी दिखे।बड़े चिंतित लग रहे थे।मैंने उन्हें इशारे से बताया कि सब ठीक है।वह बोल पड़े, ‘आपको अंदाज़ा भी नहीं है कि आप बुरी तरह लुट चुके हैं।आपके झोले से टमाटर ग़ायब हैं।यह तो अच्छा हुआ कि मैं आ गया।मैंने अचरज से उन्हें देखा।ये कैसी बहकी-बहकी बातें कर रहे हैं ? टमाटरों के लुटने से मैं बर्बाद कैसे हो गया! यह सोच ही रहा था कि पुलिस पहुँच गई।उसकी गिरफ़्त में दो आदमी थे।तीसरा टमाटरों के साथ फ़रार था।


पुलिस ने एक आक्रमणकारी से पूछा, ‘तूने ऐसा दुस्साहस क्यों किया ?’ उसने बेख़ौफ़ उत्तर दिया, ‘साहब,दुस्साहस हमने नहीं इन्होंने किया है।बाज़ार से दो किलो टमाटर ख़रीदते हम लोगों ने इन्हें देख लिया था।जिस वक़्त टमाटर की ओर निहारना तक हराम है,यह आदमी उन्हें रसोई में ले जाने की हिमाक़त कर रहा था।ज़रूर यह सरकारी आदमी है।आप हमें नहीं इन्हें गिरफ़्तार करें।’ अभी भी मैं पूरा माज़रा समझ नहीं पाया था।मैंने पांडेय जी की ओर सवालिया निगाहों से देखा तो वह फट पड़े, ‘अव्वल तो आपको गाँव से आने की क्या जल्दी थी ? आ ही गए थे तो बाज़ार क्यों गए थे ? और अगर गए भी थे तो टमाटर क्यों लाए ? तुम्हें पता भी है इसका भाव ?’ मैंने गर्दन हिलाकर मना किया।कहने को तो मैं मुँह से भी बोल सकता था पर तब सोने की चेन की क्या उपयोगिता रहती ! पांडेय जी ने मेरे गले पर दृष्टिपात किया फिर विनम्र होते हुए बोले, ‘भई टमाटर इस समय सेंचुरी मार चुका है और अभी भी नॉट-आउट है।आप जैसों की फ़ील्डिंग ऐसी ही रही तो कई रिकॉर्ड टूटेंगे।सरकार तक ख़तरे में पड़ सकती है।’ ‘वह कैसे भला ?’ मैंने मासूमियत का चोला ओढ़ लिया। ‘टमाटर खाते हो, पर इसके साइड इफ़ेक्ट नहीं पता।कुछ समय पहले प्याज़ ने सरकार बदल दी थी।ये तो टमाटर हैं।इनका दुष्प्रभाव और अधिक हो सकता है।ये चाहें तो पल भर में जमे-जमाए कवि को मंच में ही बिखेर दें।नेताओं की सफ़ेदी लाल कर दें।’ पांडेय जी एक साँस में बोल गए।


अब मुझे अपनी भूल का एहसास हुआ।मेरे एक ग़लत फ़ैसले से मेरी जान पर बन आई थी।सरकार तक गिर सकती थी।तभी श्रीमती जी का फ़ोन आ गया, ‘अजी कहाँ रह गए ? बच्चे बड़ी देर से चटनी खाने का इंतज़ार कर रहे हैं !’ मैं फिर से बेहोश हो गया।


संतोष त्रिवेदी 

गुरुवार, 19 नवंबर 2015

मँहगाई का ‘महागठबंधन’ !

सुनते हैं टमाटर फिर से लाल हो गया है।कुछ लोग इसी पर लाल-पीले हो रहे हैं ।टमाटर का गुणधर्म ही लाल होना है।वह तो केवल अपना धर्म निभा रहा है।वैसे भी देश में ‘महागठबंधन’ की सफलता की खबर उस तक पहुँच गई है।वह भी सरकार के खिलाफ प्याज,दाल और तेल के साथ ‘महागठबंधन’ में शामिल होना चाहता है।विकास का दौर है तो कोई क्यों पीछे रहे ?टमाटर विकास-यात्रा का नया राही है।
मँहगाई ऐसी-ऐसी जगहों से निकलकर आ रही है कि इसके खिलाफ मोर्चा भी नहीं बन पा रहा है।सरकार को भी इसके लिए कुछ करने की ज़रूरत नहीं पड़ रही।कोई न कोई चीज़ उसे राहत देने के लिए मैदान में आ जाती है।विकास की गाड़ी सरपट दौड़ रही है।बुलेट ट्रेन आने से पहले रेल-किरायों का लेवल भी वहाँ तक आना जरूरी है ।इसीलिए हर दूसरे-तीसरे दिन किराया अपने आप बढ़ लेता है।यात्री को किराए के तौर पर अहसास होना चाहिए कि वह ए सी क्लास में चल रहा है,भले ही कोच स्लीपर का हो।विकास धीरे-धीरे ही पटरी पर आएगा।इसमें समय लगेगा ।साठ साल की पुरानी  मालगाड़ी एकदम से ‘राजधानी’ की रफ़्तार नहीं पकड़ सकती।
खाने-पीने की चीज़ें मँहगी हो रही हैं,यह कहना गलत है।हमारी क्रय-शक्ति कितनी बढ़ गई है,इससे यह पता चलता है।विकास फटे-पुराने चीथड़े पहनकर नहीं आता।वह सूटेड-बूटेड होगा,तभी उड़ता हुआ दिखेगा।इसलिए अब विकास की दौड ‘उड़ान’ में बदल गई है।हवा में उड़ने के लिए भी तो ईंधन चाहिए।बस,सरकार उसी का जुगाड़ कर रही है।
टमाटर के दाम बढ़ गए हैं तो नूडल्स की तरह देसी ‘सूप’ का पाउच लाया जा सकता है।इससे प्याज,दाल और टमाटर के ‘महागठबंधन’ की चुनौती से निपटा जा सकता है।आखिर सब कुछ सरकार ही तो नहीं करेगी।जनता को कुछ तो छोड़ना होगा।
प्याज,दाल,तेल और टमाटर ‘सब मिले हुए हैं’।यह गठबंधन घोर अवसरवादी है।ऐसे समय में जब सरकार विकास को विदेशों से घसीटकर लाने को कृत-संकल्प है,उसकी हौसला-अफजाई करनी चाहिए।इसलिए टमाटर पर लाल होने से पहले यह सोचें कि यह किसकी साजिश है।तेज भागती हुई  सरकार दाल-रोटी पर चिंतन करने लगेगी तो विकास-यात्रा क्या खाक़ होगी?



                

बुधवार, 14 अगस्त 2013

प्याज से परहेज करिये !

जनवाणी में १४/०८/२०१३ को !
१४/०८/२०१३ को जनसंदेश में.

 
टमाटर आज खस्ताहाल है। प्याज बल्लियों उछल रहा है। थोड़े दिन पहले जब लाल टमाटर अपनी कीमतों से लोगों को फटेहाल कर रहा था तब भी प्याज दुखी नहीं था। उसे अपनी कीमत और प्रतिभा पर पूरा भरोसा था। वह जानता था कि टमाटर का उछलना केवल मौसमी होता है। बाकी समय तो उसे नाकारा नेताओं और फूहड़ शायरों पर ही फेंका जाता है। प्याज इस मामले में भाग्यशाली है। जब भी उसकी कीमत घटने लगती है या वह सड़ने लगता है,साँप के केंचुल की तरह अपना छिलका उतारकर नए भेष में आ जाता है। लोगों को लगता है। टमाटर ऐसा नहीं कर सकता। वह सड़ने पर सड़क पर ही जाता है। प्याज हमेशा ताज़ा और टिकाऊ होता है । इस तरह वह अपने मनमाने दाम वसूलता है जबकि टमाटर निर्दलीय की तरह एक कोने में पड़ा सही मौके की तलाश में लगा रहता है।

प्याज का भाव बढ़ाने में सरकार विशेष ध्यान रखती है। खासकर चुनावों के समय उसे पता होता है कि जनता पिछले पाँच साल से रो रही है और उसके पास और कुछ हो न हो,आँसुओं का असीमित भंडारण होता है। यही जनता अगर चुनावों के समय रोती रहेगी तो फिर सरकार को रोना आ जायेगा। सरकार के अनुसार जनता की आँखों में आँसू लाने का जिम्मेदार यह प्याज है,इसलिए ऐसे मौके पर इसकी कीमत इतनी बढ़ जाती है कि कोई रो भी न सके। प्याज के अलावा सरकार की इस योजना का किसी को नहीं पता रहता है।

आखिर प्याज पर ही मँहगाई क्यों मेहरबान रहती है,इसका भी सीधा-सादा हिसाब है। दूसरी सब्जियाँ भले ही सरकार को बिना माँगे अपना समर्थन देती हों,पर जब बारिश जैसी आपदा आती है,उस वक्त केवल प्याज ही अपना छिलका उतारकर सुरक्षित रखता है और मँहगाई से रोती जनता को अपना कंधा देता है। प्याज ने कई बार अपनी उपयोगिता सिद्ध की है। इसकी उछल-कूद से सरकार तक बदल जाती है। इसलिए टमाटर का रोना सरकार के लिए सिरदर्द नहीं है। जनता द्वारा नेताओं,मंत्रियों पर वार करने के लिए इससे नरम हथियार अभी तक मिल नहीं पाया है। सोचिये,अगर चुनावी-मौसम में प्याज सस्ता हो जाए तो कितनों के सर फूटेंगे ?

प्याज से टमाटर का कोई जोड़ नहीं है। प्याज के मँहगे होने पर सीधी-सादी जनता इसे खाने से ही परहेज शुरू कर देती है। नवरात्र के दिनों में वैसे भी प्याज नहीं खाया जाता,सो बाकी दिनों को भी देवी के नाम पर कुर्बान करने में क्या हर्ज है ?प्याज न खाने के फायदे और भी हैं। इससे मुँह की दुर्गन्ध से मुक्ति मिलती है और जेब के हल्के होने की आशंका भी नहीं रहती। इसलिए प्याज अगर मँहगा होता है तो सरकार को जनता के आँसुओं से राहत मिलती है और जनता की कमाई सलामत रहती है। इसलिए प्याज के कीमती होने पर जनता के लिए जश्न का मौका है। सरकार भी इस बहाने अपने ठेलों से प्याज बेचती नज़र आएगी ताकि सबको यह लगे कि सरकार हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठी है,वह काम भी करती है।

बुधवार, 10 जुलाई 2013

बाज़ार में समाजवाद के पहरुए !


 

10/07/2013 को 'जनसंदेश टाइम्स' में !
12/07/2013 को हरिभूमि में
 
 

बाज़ार पहुँचा तो कोहराम-सा मचा था।खरीदारों में ऐसा जोश दिख रहा था,जैसे वे देश की ओर से लड़ने सीमा पर गए हों।वे सब टमाटर लेने के लिए किसी से पीछे नहीं दिखना चाहते थे।बाज़ार की बाकी सब्जियाँ आतंकित दिखाई दीं।मुझे देखते ही उनकी बेचारगी बोलने लगी।सबसे पहले धनिया की हरियाली  में रौनक आई।उसने मेरे कान में फुसफुसाते हुए कहा,’ये जो भी हो रहा है,बहुत गलत है।अगर आप पक्के समाजवादी हैं तो एक टमाटर को इतना भाव देना ठीक नहीं है।उसकी औकात ही क्या है ?’मैंने धनिया के कंधे पर हाथ रखकर उसे सहलाते हुए बताया,’ टमाटर के योगदान को मत भूलो।तुम तो केवल पूरक का काम करती हो,जबकि टमाटर अपने आप में पूर्ण होता है।वह सबके साथ फिट हो सकता है।उसका स्वतंत्र अस्तित्व भी है।’

पास में बेसुध पड़ी मटर अचानक बोल पड़ी,’उसमें ऐसी क्या खासियत है जो हम सबमें नहीं है ? वह आज अपने भाव दिखा रहा है,मैं तो हमेशा सातवें आसमान में रही हूँ।ज़्यादा दिन नहीं हुए जब उसे सड़कों पर फेंका गया था।तब उसके ये चाहने वाले कहाँ चले गए थे ?’मटर की नाराज़गी पर पानी डालते हुए मैंने उसे समझाया,’तुम तो पब्लिक का सामना करती नहीं हो।तुम्हारा काम केवल रसोई तक सीमित है जबकि टमाटर को रसोई से लेकर सड़क तक,कवि-सम्मेलनों से लेकर हमारी सभाओं तक प्रहार झेलने होते हैं।वह हमारे अन्तः और वाह्य दोनों प्रकार के स्वाद का कारण बनता है।इसलिए उसकी निष्ठा असंदिग्ध है।घर-बाहर उससे हमारी कहीं भी मुठभेड़ हो सकती है,मेरी तरह वह भी पक्का समाजवादी है।’

तभी भिंडी ने प्याज को उकसाते हुए कहा,’क्या तुम्हें कोई तकलीफ नहीं है ? टमाटर की इतनी हैसियत बढ़ना हम सबके अस्तित्व के लिए खतरा है।तुम इसके विरोध में अपना भाव क्यों नहीं बढ़ाते ?’मेरे कुछ कहने से पहले ही प्याज ने छिलके उतारते हुए जवाब दिया,’ऐसा है बहन ! मैं अपने भाव बढ़ाकर किसी को एकाध बार ही सत्ता से बाहर कर सकता हूँ,बार-बार नहीं।इस काम में भी मेरे छिलके उतर जाते हैं।रही बात टमाटर की ,सो नेता जी ठीक कहते हैं।इनकी सभाओं में जब टमाटर फेंके जाते हैं,सीधे नेताजी की देह का स्पर्श करते हैं।अब इनकी देह पारसमणि से कम थोड़ी है।इसिलए टमाटर भी इनका संसर्ग पाकर आज आम पब्लिक से दूर है।इसके भाव बढ़ने से चुनावी-माहौल में नेताजी को बड़ी राहत मिलेगी।यह जानबूझकर टमाटर से बचना चाहते हैं।’

प्याज से ऐसी हरकत की मुझे आशंका थी,इसलिए मैंने विषय बदलते हुए बैंगन का उदाहरण दिया।उसकी जन-सेवा की भावना को टमाटर से ज़्यादा बताते हुए कहा,’बिना किसी भेद-भाव के बैंगन इधर-उधर लुढ़कता रहता है।यह पूर्णतः शर्मनिरपेक्ष और समाजवादी है।इसीलिए इसका महत्व हर काल में रहा है।रही बात इसके भाव की,ज़रूरतमंद स्वयं खुशी-खुशी इसको बख्शीश दे देते हैं।इसलिए सबकी थाली में यह सुलभ रहता है।’मेरी बातें सुनकर बैंगन कुछ बोला नहीं,बस मंद-मंद मुस्कुराता रहा।

अचानक हरी मिर्च ने सूचना दी कि टमाटर के खरीदार मुझे ही खोज रहे हैं।मुझे इसमें अपने किसी विरोधी की साजिश समझ में आई।मैंने सोचा,अभी अगर यहाँ रुका तो सारे टमाटर मुझे ही समर्पित कर दिए जायेंगे और बाज़ार में इनका अकाल पड़ जायेगा।मैं बाहर निकलने की जुगत में लगा ही था कि तब तक टमाटर की आवाज़ आई,’मेरा प्रणाम तो स्वीकार कर लो।मैं पब्लिक के झोले के बजाय आपके गोल-मटोल बदन से लिपटना चाहता हूँ।’ किसी अप्राकृतिक कृत्य की आशंका से अपने को बचाने के लिए मैं वहाँ से तुरंत अदृश्य हो गया।

रुतबे में चार-टमाटर लगना !


18/07/2013 को नेशनल दुनिया में

10/07/2013 को 'जनवाणी' में !
१२/०७/२०१३ को कल्पतरु एक्सप्रेस में !


‘ये लो झोला और बाज़ार चले जाओ।घर में पिछले पन्द्रह दिन से टमाटर नहीं हैं पर मैं चुप्पी साधे बैठी हूँ।पड़ोस वाले पांडेजी तब से अब तक तीन बार मुझे टमाटर दिखा चुके हैं।अब इज्ज़त पर आन पड़ी है इसलिए तुम भी कुछ करो।’पत्नी ने घुड़कते हुए फरमान सुनाया।

‘भागवान,मुझ पर जुलुम क्यों ढाती हो ? तुम तो घर के सामने रेहड़ी वाले से ही सब्जी लेती हो, आज भी ले लो।रही बात पांडेजी की,उनको मैं जानता हूँ।मँहगे टमाटर एक बार ही लाए होंगे।उन्हें ही फ्रिज से बार-बार निकालकर तुम्हें दिखा रहे हैं।तुम इस जाल में मत फँसो’,मैंने जान छुड़ाने की नीयत से पाँसा फेंका।

‘अजी,एक तो तुम्हें खुद अकल नहीं है और मैं बता रही हूँ तो उसमें भी मीन-मेख निकाल रहे हो।टमाटर लेने जा रहे हो,यह छोटी-मोटी बात नहीं है।बाज़ार से खरीदते और लाते हुए देखकर दस लोगों की छाती पर साँप लोटेगा।इससे तुम्हारा ही रुतबा बढ़ेगा,मेरा क्या ,मैं तो घर में ही रहती हूँ।’श्रीमती जी पूरे फॉर्म में थीं।

मरता क्या न करता,झोला उठाकर बाज़ार की ओर चल दिया।घर से निकलते ही पहली मुठभेड़ पांडेजी से हुई।मन ही मन खुश हो रहा था कि वो मुझसे ज़रूर पूँछ-पछोर करेंगे ,पर मुझे मायूसी  हाथ लगी।वो अपने गमलों में पानी डाल रहे थे।मैंने झोले को आगे करते हुए खुद ही बता दिया कि बाज़ार से टमाटर लेने जा रहा हूँ।तभी पांडेजी के मुँह से बकुर निकला ,’हाँ,ज़रूर लाओ ! अब तक माल छँट चुका होगा और सस्ता भी।’मैं कुढ़ता हुआ बिना जवाब दिए सीधे बाज़ार पहुँच गया।

सबसे पहले आम के बड़े ढेर पर मेरी नज़र गई और मैंने बिना भाव-ताव किए पाँच किलो आम झोले के हवाले कर लिए। महज सौ रुपये में झोला भरने के कगार पर था।अब टमाटरों के लिए आरक्षित जगह को भरने के लिए मैं आतुर हो उठा।झोले के आम कोई देख ले,इसके पहले ही मैं उसे टमाटरों से परिपूर्ण कर देना चाहता था।थोड़ी ही दूर पर टमाटरों की छोटी-सी ढेरी दिखाई दी।उसके इर्द-गिर्द तीन-चार ग्राहक झुके हुए थे।टमाटर-विक्रेता से मैंने सवाल किया ,’क्या इत्ते ही टमाटर बचे हैं ?’ मेरी आवाज़ सुनकर सभी ग्राहक मेरी ओर ताकने लगे।वो मुझे ऐसे देख रहे थे,मानो वो आपदा-पीड़ित हों और मैं मुआवजा बाँटने वाला।अब बारी विक्रेता की थी,बोला ‘आप चिंता न करें।आप तो हमेशा पाव भर ले जाते हैं,उतने तो मैं निकाल ही दूँगा।’

इतना सुनते ही ऐसा लगा ,जैसे नेता जी मंत्री बनने के लिए पद और गोपनीयता की शपथ लेने जा रहे हों और हाईकमान ने अचानक पार्टी की सेवा करने का निर्देश दे दिया हो।मैंने भी चेहरे पर नेताई-शरमाहट को लाते हुए बात संभाली,’नहीं,दरअसल आज तो झोला लाए ही टमाटर लेने के इरादे से थे पर शुरुआत में ही आमों की महक से मैं बौरा गया और न चाहते हुए भी इत्ते ले लिए।अब इसमें जो जगह बची है,उसी में टमाटर आ सकते हैं।’

टमाटर विक्रेता भी तब तक मेरा धर्म-संकट समझ गया था और उसने गिनकर चार टमाटर मेरे झोले को समर्पित कर दिए।मैंने अपनी जेब खाली करते हुए उसकी जेब रुपयों से पाट दी ।ऐसा दृश्य देखकर आस-पास के ग्राहकों ने हरी मिर्च की खरीदारी शुरू कर दी।चारों टमाटर पूरी निष्ठा के साथ झोले से झाँकने लगे थे।रास्ते भर मैं खुद को इस बात के लिए कोसता रहा कि पाव भर टमाटर लेने के लिए पाँच किलो आम लेने पड़े पर रुतबा बढ़ने की खुशी इससे कहीं ज़्यादा थी।उसमें अब चार-चाँद नहीं चार-टमाटर लग चुके थे।

संघर्ष का नया तरीका

आंदोलन ख़त्म हो चुका था।आँसू गैस के गोले और लाठी - डंडे तनिक विश्राम के लिए सुस्ताने लगे थे।सड़क का शोर बैरिकेड तोड़कर ...