लोग अचानक फ़कीर बनने पर उतारू हो गए हैं।क्या राजा,क्या प्रजा,सब मोह-माया त्याग रहे हैं।सब कुछ छोड़-छाड़कर लोग कतारों में खड़े हैं।खाली जेबें जीवन के प्रति वैराग्य पैदा कर रही हैं।कोहराती शाम में मूँगफली खाने तक की लालसा नहीं रह गई है।जी चाहता है कि धुनी रमाकर जंगल की ओर निकल चलें।खाली पेट और खाली थैले डिजिटल दुआओं से स्वतः लबालब हो जाएँगे।इससे उजाड़ और बियाबान होती बागों में भी बहार आएगी।
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