मोदी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
मोदी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 31 मई 2024

योगिराज का ध्यान !

बहुत गंभीर था।यह गंभीरता उसकी हालत के बारे में नहीं थी।उसने एक नया प्रण लिया था,उसी को लेकर वह गंभीर था।पिछले दिनों उसने नीलकंठ की साधना की थी पर अधर्मियों के कारण उसमें तनिक व्यतिक्रम आ गया।विष पीने के बजाय वह विष उगलने लगा।यह उस पर परमात्मा का प्रताप ही था कि सारा विष जिह्वा के माध्यम से बहने लगा था।विष भले ही शरीर से निकल गया था,पर आत्मा में अब भी धँसा था।वरिष्ठ चिकित्सक ने परामर्श दिया, “योगिराज ! इस बार ग्रह-दशा अनुकूल नहीं है।आप पीले वस्त्र धारण कर दक्षिण-दिशा की ओर प्रस्थान करें।अनुकूल परिणाम आएँगे।”


योगिराज ने दक्षिण दिशा की ओर प्रस्थान किया।उसने देवताले की कविता का मनन नहीं किया था।इसलिए वह न कवि को जानता था,न कविता को।वह बिना डरे एक कंदरा में प्रविष्ट हुआ।जाने से पहले कैमरे को उसने आवश्यक निर्देश दिए;


चूँकि वह ध्यान में रहेगा,इसलिए उसका ध्यान सिर्फ़ उसकी ओर होना चाहिए।

चूँकि वह मौन रहेगा इसलिए चित्र बोलता हुआ हो !

चूँकि वह सत्य की जगह असत्य के प्रयोग करेगा इसलिए उसके दृष्टिकोण को हर कोण से दिखाना होगा।

चूँकि वह प्रतिक्षण आसन बदलेगा इसलिए कैमरे की दृष्टि उसकी ओर होगी।

इनमें से यदि कुछ भी भंग हुआ,उसका ध्यान-भंग होगा।


यदि किसी भी तरह उसका ध्यान-भंग हुआ,फिर उसकी दृष्टि से न कैमरा बचेगा न सृष्टि।


इतना कहकर योगी कंदरा में प्रवेश कर गया।


अभी तक योगी कंदरा में है

और मठ वसुंधरा में सुलग रहा है !


मंगलवार, 30 जून 2015

वोट भी डाउनलोड होगी !

मार्केट में तो वे पहले से ही थे,अब उनके नाम का ऐप भी आ गया है।वे अच्छे बाज़ीगर तो साबित हो ही चुके हैं,सुपरहिट सौदागर भी सिद्ध हो रहे हैं।अच्छे व्यापार के लिए ज़रूरी है कि बाज़ार में नियमित रूप से नए-नए प्रॉडक्ट आते रहें और साथ ही बिजनेस का प्रमोशन भी होता रहे ।इसके लिए वे झाड़ू लगाने से लेकर शीर्षासन तक आजमा रहे हैं।कम समय में कई विश्व-रिकॉर्ड बनाने हैं सो वे दिन-रात लगे हुए हैं।देश में ऑनलाइन शॉपिंग के बढ़ते चलन और ‘अच्छे दिनों’ की गारंटीड डिलीवरी को ध्यान में रखकर जनता के लिए अहर्निश सेवा उपलब्ध होने जा रही है।आज हर हाथ में स्मार्ट फोन है इसलिए सबके फोन में अब वे मोबाइल ऐप के रूप में विद्यमान रहेंगे।भक्तों के याद करते ही जिस तरह भगवान हाज़िर हो जाते हैं,ठीक वैसे ही अब ऐप के ज़रिये ‘हर हाथ मोबाइल,हर हाथ नेता’ होंगे।लोग उनके दर्शन-प्रवचन से न कभी वंचित होंगे,न बच सकेंगे।’मिसकॉल’ से मेंबर बनी जनता अब अपने नेता को डाउनलोड करके सीधे अपनी जेब में धर लेगी।वे जनता के सुख-दुःख में ही नहीं ,खेत-खलिहानों और उसकी झोपड़पट्टी में भी हर समय मिलेंगे।

यह ऐप हर तरह के ज़वाब देगा,हाँ यदि काला-धन,भ्रष्टाचार या मंहगाई जैसा विकास-विरोधी सवाल होगा तो वह ‘एरर’ दिखा सकता है।इसके अलावा यदि किसी को कुछ पूछना है तो वह ज़रूर बताएगा।यहाँ तक कि ’मन की बात’ के लिए अब रेडियो का इंतज़ार भी नहीं करना पड़ेगा।जब मन चाहा,बात डाउनलोड की और सुन ली।इससे सुनने वाले को तो आत्मीय सुख मिलेगा ही,साथ ही सुनाने वाले को भी रेडियो स्टेशन तक नहीं आना पड़ेगा।वे दिन हवा हुए जब प्रधानमंत्री को कोई ख़त लिखता था तो शायद ही कभी उस तक जवाब पहुँचता था।अब काम से खाली बैठे लोग अपने पीएम को चिट्ठी लिखा करेंगे और उन्हें तुरंत उधर से जवाब मिल जायेगा।यह बात और है कि सबके सवाल अलग होंगे पर जवाब एक ही होगा।

कुछ लोग इस ऐप को लेकर बड़े रोमांचित हैं।उन्हें लगता है कि सुझाव की जगह इससे सीधा समाधान ही निकल के बाहर आ जायेगा।’मनरेगा’ की मजदूरी इस ऐप में बटन दबाते ही जन-धन खाते में पहुँच जायेगी।इसलिए अब वे खेतों के बजाय मोबाइल पर ही श्रमदान करेंगे और मजदूरी ले लेंगे।कुछ इस उम्मीद में इस ऐप को अपने मोबाइल में रखने की सोच रहे हैं कि कभी ज़रूरत पड़ी तो इससे रोटी भी डाउनलोड कर लेंगे।न आटा खरीदने का झंझट और न ही चूल्हे में रोटी सेंकने की कवायद।यानी कुल मिलाकर ‘हर्रा लगे न फिटकरी पर रंग चोखा’ वाला मामला हो जायेगा।पर यह तभी संभव होगा जब अगले चुनाव से पहले इसका अपडेटेड वर्जन जारी होगा।इस ऐप की मदद से जनता की मेमोरी को रीसेट करके डिलीट भी किया जा सकेगा ताकि न मोबाइल हैंग हो और न ही कोई किसान।

इस ऐप की एक और खासियत है।इसने नेताओं के लिए आगे का बढ़िया रास्ता खोल दिया है।उनके लिए जनता से सीधे मिलने के बजाय मोबाइल-मिलन ही बेहतर होगा,साथ ही जोखिम रहित भी।यह ऐसा आधुनिक ‘जनता-दरबार’ होगा,जिसमें नेता एक साथ ही सबको दर्शन देंगे।यानी इस तकनीक से वास्तविक ‘राम-राज्य’ स्थापित हो सकेगा।जिस तरह चौदह बरस के वनवास के बाद अयोध्या लौटकर भगवान राम अपनी प्रजा से एक साथ मिले थे,ठीक वैसा ही अनुभव अब हो सकेगा।इस विषय में तुलसी बाबा ने साफ़-साफ़ बताया है;’अमित रूप प्रकटे तेहि काला,जथाजोग मिले सबहिं कृपाला’।इस तरह लोगों से मिलने के लिए त्रेतायुग में तो भगवान को कई रूप धरने पड़े थे,जबकि मोदी-युग में एक ऐप ही यह कमाल कर देगा।

वह समय भी अब जल्द आने वाला है जब किसी नेता को वोट माँगने के लिए जनता के पास जाने की ज़रुरत नहीं होगी।वह सीधे ऐप से ही सबकी वोट डाउनलोड कर लेगा।इससे उसका और जनता, दोनों का श्रम बचेगा,वोट भी खराब नहीं होगी।हाँ,मजदूरी सीधा उसके खाते में पहुँच जाएगी।वह दिन सबसे ऐतिहासिक होगा।




शुक्रवार, 30 जनवरी 2015

मैनूँ शॉपिंग करा दे....!

अंकल सैम आए और हमें लहालोट करके चले गए। बताया जा रहा है कि इस दौरे में कई रिकॉर्ड टूटे हैं। टूटे तो विपक्षी दलों के दिल भी हैं,पर वे किसी तरह किरिच-किरिच हो चुके टुकड़ों को संभालने में जुट गए हैं। पड़ोसी देशों ने तो बकायदा अपने-अपने दिल टूटने के साक्ष्य प्रस्तुत किये हैं। पाकिस्तान ने चीन का काउंटर-दौरा करके बताया कि उसकी सेहत बिगाड़ने की कोई भी कोशिश नाकाम कर दी जाएगी,वहीँ चीन को दिल का दौरा पड़ा है। उसके दिमाग ने सुझाया है कि भारत और अमेरिका की दोस्ती बनावटी है बिलकुल चीन-पाकिस्तान की तरह। बहरहाल,हमारे प्रधानमंत्री ने अमेरिकी राष्ट्रपति को उनके नाम से बुलाकर जाहिर कर दिया कि ये दोस्ती नौ इंच की दीवार पर उकड़ू बैठ कर घरबार की बातें बतियाने के स्तर तक जाती है।

ओबामा के भारत आने के कई असर बताए जा रहे हैं। एक तो यह कि मीडिया का ध्यान केजरीवाल से हटा इससे भाजपा का डर घटा। दूसरे यह कि अमेरिका भी चाहता है कि दिल्ली में भाजपा की सरकार बने। इस यात्रा ने यह भी साफ़ किया कि किसी सरकारी कार्यक्रम में निमन्त्रण अधिकारी नहीं भगवान देते हैं या भाजपा। गणतन्त्र दिवस के समारोह में इसीलिए किरन बेदी मौजूद रहीं। भाजपा और भाग्य दोनों उनके साथ हैं।अोबामा ने हिन्दुस्तान के साथ -साथ उन्हें भी उड़ा दिया है। देखना यही है कि रिज़ल्ट के बाद दिल्ली ही न उड़ जाय! वहीं केजरीवाल चुनावी-मौसम में आम से ख़ास बनने को आतुर हैं पर दावत के बजाय उन्हें अदावत ही मिल रही है।

रिकॉर्ड पर लगातार नज़र रखने वाले जोड़-घटाकर बता रहे हैं कि अमेरिकी राष्ट्रपति केवल पैंतालिस मिनट तक खुले आसमान के तले रह सकते हैं पर वे यहाँ पूरे एक सौ बीस मिनट तक रहे। यह गिनीस बुक में नया रिकॉर्ड हो सकता है। अगर उनकी तरफ से यह रिकॉर्ड बनाया गया है तो हमारी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ी गई। दिल्ली गणतंत्र में पहली बार छाते के नीचे आई।हमारे प्रधानमंत्री ने अंकल सैम को खुलेआम अपने हाथों से चाय बनाकर पिलाई। इस आधार पर सत्ताधारी पार्टी भविष्य में अमेरिकन राष्ट्रपति को पानी पिलाने का दावा भी ठोंक सकती है।ओबामा भी कई सौदों को निपटाने के चक्कर में मोदी के साथ टहलते रहे। अंततः किसने किसको टहलाया,यह तो समय ही बताएगा ?

कहते हैं कि जहाँ ओबामा ठहरे थे,वहाँ आसपास ’मैंनू शॉपिंग करा दे....’ का रिकॉर्ड लगातार बज रहा था। आखिर मिशेल के कहने पर उन्होंने हमारे कटोरे में चार अरब डॉलर डाले और अपनी जान बचाई !

गुरुवार, 21 अगस्त 2014

लालकिले से पकड़े गए कबूतर !


 अंततः वे लालकिले में चढ़ाई करने में सफल हो गए।पिछली बार वाला लालकिला नकली था पर लोगों को दहाड़ असली सुनाई दी थी।उसी उम्मीद में इस बार कई लोग यह देखने बैठे थे कि नकली लालकिले से जो सीना छप्पन इंच फूल सकता है,असली लालकिला पाकर कहीं वह वह फूल कर कुप्पा न हो जाय ;पर हुआ इसके उलट।लालकिले से क्रांति की ज्वाला धधकने के बजाय आध्यात्मिक प्रवचन की गंगा बह निकली।अब बारी थी आलोचकों की,कुछ ने एकदम से पलटी मारी।उनने एक सुर से कहा,ऐसा पहली बार हुआ है।यानी उन्होंने फिर से इतिहास रच दिया है ।
लालकिले में पहुँचकर उनके अचानक इस तरह शान्तिप्रेमी बन जाने से विरोधी सदमे में पहुँच गए ।वो लालकिले से उनकी ललकार सुनने की प्रतीक्षा में थे,पर निराश हुए।ख़ुशी की बात यह रही कि देश के कुछ मान्यताप्राप्त बुद्धिजीवियों और धर्मनिरपेक्ष खेमे को भी यह भाषण बहुत सुहाया है।अब इस बात पर उनकी आलोचनाएँ शुरू हो गई हैं कि उन्होंने मौके की नज़ाक़त देखते हुए अपने खेमे और खूँटे बदल लिए हैं।पर इस बात पर किसी का ध्यान नहीं कि आखिर यह सब हुआ कैसे,जबकि मंहगाई और भ्रष्टाचार की रेटिंग पहले की ही तरह मेनटेन है ! ऐसे में उन्हें प्रशंसा-पत्र बाँटने के क्या  कारण हो सकते हैं ?
सच पूछिए तो भाषण वाकई में कमाल का था,जिससे बेचारे बुद्धिजीवी भी उसकी लपेट में आ गए।उन्हें बहुत दिनों बाद लालकिले से दम्भपूर्ण और रोबोटनुमा भाषण सुनने से राहत मिली।वस्तुतः काम के दो ही स्तर होते हैं,कहना और करना।अब पिछले कई सालों से काम करने को लेकर इतनी ज्यादा चिल्लाहट हो चुकी है कि उस ओर कोई सोचना भी नहीं चाहता।यहाँ तक कि मंहगाई और भ्रष्टाचार पर जनता ने समझौता कर लिया है,फिर वे उस पर क्यों और क्या बोलें ? हाँ,बड़े दिनों बाद जनता को कुछ मीठे बोल जरूर सुनाई दिए हैं।बुद्धिजीवियों को भी वह मिठास भा गई तो उसमें उनकी क्या गलती ? इस जादूगर ने कबूतर छोड़े नहीं बल्कि पकड़े हैं ! शांति कहाँ तक अपने को बचा पायेगी !
वे लोग बड़ी ग़लतफ़हमी में हैं जिन्हें लगता है कि भाषण से राशन नहीं मिलता।आम आदमी की बात छोडिये,अबकी बार तो कवि,लेखक और प्रमाणित चिन्तक भी तृप्त हो गए हैं।यदि आपको इस भाषण की कला पर तुलसीदास की पंक्तियाँ ‘इंद्रजालि कहुं कहिय न बीरा।निज कर काटइ सकल सरीरा’ की याद आ रही है तो आप गलत हैं।जादूगर ही जानता है कि वह जो दिखा रहा है,असली नहीं है,पर देखने वाले को तो असली लगता है और यही सबसे ज़रूरी है।


गुरुवार, 12 जून 2014

एजेंडा पूरा होने के दुःख !


नई सरकार बड़ी तेजी से काम कर रही है।पहले ही दिन उसने अपने सभी मंत्रियों को सौ दिन का एजेंडा थमा दिया था पर उसके मंत्री और भी तेज निकले।दिए गए काम को पन्द्रह दिन में ही पूरा कर डाला।यह बात अलग है कि इस तथ्य पर किसी ने गौर ही नहीं किया कि मंत्रियों ने जनता से किए अधिकतर वादे कम समय में ही पूरे कर डाले।
नई सरकार की प्राथमिकता में धारा 370 को हटाना था,मंत्री जी ने शपथ लेते ही उस पर अमल कर दिया।धारा के विरुद्ध बयान देते ही इतना हंगामा कटा कि अब आने वाले पांच सालों में भी कोई इसका नाम नहीं लेगा।मंत्री जी के वश में एजेंडा पूरा करना था,सो कर लिया।अब सर्वत्र शान्ति पसरी है.
नई सरकार ने आते ही पाकिस्तान को सबक सिखा दिया है।जो देश अभी तक हमारे यहाँ लगातार आतंकवादी भेज रहा था,उसे साड़ी भेजने पर मजबूर कर दिया है।इसके बाद से ही सरकार के समर्थक ‘साड़ी से शाल को कभी मैच किया रे...’गीत गुनगुना रहे हैं।अब एक सिर के बदले दस सिरों की ज़रूरत नहीं रह गई है।
सबसे ज्यादा सुधार हमारी अमेरिकी-नीति में देखने को मिले हैं।जो अमेरिका वीसा देने में हज़ार नखरे  कर रहा था,उसने आगे बढ़कर अंकल सैम से मिलने का प्रोग्राम भी फिक्स कर दिया है।सुनने में तो यह भी आ रहा है कि अमेरिका हमारे प्रधानमंत्री के पहनावे से बहुत प्रभावित है।हो सकता है कि वह भविष्य में ‘नमो-कुरता’ और ‘नमो-सदरी’ का आयात भी करने लगे।पिछली सरकारों की इतनी नाकामी रही कि वे मुई एक सुई तक अमेरिका को न बेच पाए।
ऐसा नहीं है कि सरकार ने आर्थिक क्षेत्र में कुछ नहीं किया है।शेयर बाज़ार तीस हज़ारी पहुँचने पर आमादा है और सोना धूल फाँक रहा है।ऐसे मुनाफे के दौर में गैस के दामों में कुछ बढ़ोत्तरी और बिजली में कटौती हो जाए तो आसमान नहीं टूट पड़ेगा।विपक्ष तो उजड़कर मौन-मुद्रा में है,बहुत बोलने वाले भी सत्ता पाकर चुप्पी साधे हैं ।
इधर जनता सौ दिनों का एजेंडा पढ़ने में व्यस्त है,उधर मंत्रियों के हाथ खाली हैं .यहाँ तक कि उनके पैर छूने तक की मनाही कर दी गई है। मंत्रियों को बोलने के लिए भी मना कर दिया गया है.ऐसे में मीडिया में बिना बयान आये,कैसे पता चलेगा कि सरकार काम कर रही है ? मीडिया भी टकटकी लगाये किसी स्कूप की तलाश में लगा है पर यहाँ भी संकट है.नए लोगों को स्टिंग से बचने का ख़ास निर्देश है.ऐसे में खबर निकले तो कैसे ? भ्रष्टाचार से निपटने का काम भी पूरा हो चुका है.मंत्रियों ने अपने कार्यालयों के आगे सूचना छाप दी है कि मोबाइल और कलम के साथ भी कोई अन्दर न घुस पाए.इस तरह पांच साल तक ईमानदारी की रक्षा आसानी से हो सकेगी.
चुनाव से पहले बहुचर्चित काले धन पर भी सरकार बनते ही प्रहार हो चुका है.उसे लाने की जिम्मेदारी विशेष बल को सौंप दी गई है.अब उसका बल ही जवाबदेह होगा.

एजेंडे का जल्दी पूरा होना कितना नुकसानदेह है,यह कोई नए मंत्रियों से पूछे.

'प्रजातंत्र लाइव' में 12/06/2014 व जनसंदेश टाइम्स में 13/06/2014 को प्रकाशित 

मंगलवार, 20 मई 2014

सरकार छोड़िए,विचार के लाले पड़ गए !

बीते कई महीनों से देश पर चढ़ा चुनावी-ज्वार शांत हो गया है।इसके साथ ही नेताओं का खुमार और आम आदमी का बुखार भी उतर गया।वे जिसे लहर समझने से कतरा रहे थे,वह कहर बनकर आई ।पूरे के पूरे मठ और खम्भे ढह गए।बहुतों पर ऐसी मार पड़ी कि हार से ज्यादा भविष्य के रोजगार पर ग्रहण लग गया ।कहीं कोई नामलेवा नहीं बचा तो कहीं सांत्वना के लिए एक कंधा भी नहीं मिल रहा ।भगवान ऐसे दिन किसी को न दिखाए,तिस पर लोग रट लगाये हैं कि अच्छे दिन आ गए।क्या ऐसे ही होते हैं अच्छे दिन ?

चुनावों ने किसी के मन का नहीं किया।जो सरकार चलाने भर के लिए अपनी झोली फैलाये हुए थे,उनके दामन में इतना प्रसाद आ गया कि छलकने लगा। माना यह गया कि मछलियों और बगुलों ने तालाब को ख़ूब मथा जिससे कीचड़ ज़्यादा निकला।इसी वजह से तालाब कमल के फूलों से लद गया।यह महत्वपूर्ण रूपक जब तक समझ में आता,बाकी लोग तालाब से बाहर हो चुके थे।जनता को कमलगट्टे खाने के लिए कुछ समय का इंतज़ार तो करना होगा पर तालाब से निकल चुकी कई मछलियाँ बिना जल के कब तक जीवित रह पाएंगी ?

चुनाव परिणामों ने कई जगह एकाकी-चिंतन का माहौल बना दिया है।कुछ सूझ नहीं रहा। सरकार बनाने के लिए नहीं,चिंतन-विमर्श के लिए तो कुछ आदमी होने चाहिए।जो लोग परिवार के सहारे सरकार चला रहे थे,चिंतन के लिए जनता ने उन्हें परिवार तक ही सीमित कर दिया है । ऐसी सुनामी आई कि सब कुछ तहस-नहस हो गया है।प्रतीकों के रूप में देखें तो हाथी सुन्न पड़ गया,तो हाथ अनाथ हो गया है ।कहीं रोने वाले नहीं बचे तो कहीं आँसू पोंछने वाले।हैंडपम्प उखड़ के हाथ में आ गया है । कल तक जिस झाड़ू पर बहार आई हुई थी,आज उसने खुद को ही बुहार दिया है।जिस लालटेन को लोग ताक रहे थे कि आखिरी क्षणों में भकभका कर रोशन हो उठेगी,उसका शीशा ही चटक गया ।सारे तीर तरकश में ही धरे रह गए।सूरज समय से पहले डूब गया और साइकिल गड्ढे में फिर गई.

अब फटे कुर्तों की जेबों से इस्तीफ़े लहरा रहे हैं।यह हार नहीं अंदरूनी मार है।वे कई हारों को पचा चुके हैं, फूलों का हार बनाकर गले लगा चुके हैं पर इस कमल का कमाल उनकी समझ से परे है।फ़िलहाल,पार्टी या संगठन की हार के बजाय सब अपनी ही हार के विचार में लगे हैं, पर वह भी तो अकेले नहीं होता।


शनिवार, 15 मार्च 2014

सुराज आ रहा है,कुछ तो गड़बड़ है !



देश भर में इस समय लोकतंत्र की बयार चल रही है।चुनाव को लोकतंत्र का पर्व माना जाता है पर मीडिया इसे रणक्षेत्र,रणभेरी,कुरुक्षेत्र और महाभारत बता रहा है।जनता इस बीच भारी कन्फ्यूज़न में है,कुछ तो गड़बड़ है।नेताओं के मुँह से प्यार के सोते और झरने तथा दिल में टिकट के लड्डू फूट रहे हैं।इमरजेंसी के बहुत दिनों बाद कोई नेता ‘मीसा’ का शिकार हुआ और वह जेल के बजाय कमल की शोभा बढ़ा रहा है,कुछ तो गड़बड़ है।साहब की लहर चल रही है पर नाव भँवर में डगमगा रही है।नाविक मझधार में सहयात्री का लाइफ-बेल्ट छुड़ाकर खुद को बचा रहा है,कुछ तो गड़बड़ है।

चुनावी-चौपाल में चर्चाओं का जोर है।रामराज की प्रतीति हो रही है।लोग प्याज़,टमाटर और पेट्रोल भूलकर चाय पर चर्चा कर रहे हैं।बिजली,पानी सब हवा हो गया है,कुछ तो गड़बड़ है।अपने राज्य के मुखिया का पद छोड़कर दूसरे राज्य की और सारे देश की खबर ली जा रही है।किसी को भेंट में गुलदस्ते के बजाय पत्थर तो किसी को दूसरे दल के सताए और भगाए हुए नेता मिल रहे हैं।अपनी किताब बंद करके दूसरे से हिसाब माँगा जा रहा है,कुछ तो गड़बड़ है।समय कम है और जनता की मुश्किलें ज्यादा,सो चार्टर्ड प्लेन की सवारी करके जनता का भला किया जा रहा है।जनहित में किया गया खर्च सेवा के दायरे में आता है। अनुभवी सेवक इस बात पर कान ही नहीं देते,इसका मतलब उनके कान में ही खराबी है,कुछ तो गड़बड़ है।

चुनावी मौसम में मीडिया से मिलना-जुलना खतरनाक हो रहा है।सामने से जूता उछालने का नुस्खा पुराना पड़ चुका है।अब पीठ पीछे से उजले चेहरे स्याह किये जा रहे हैं।ऐसा करने वालों  को हर तरफ कालिख-पुती शक्लें ही नज़र आती हैं,सो वो भी क्या करें या इसी बहाने कुछ लोग कालिख में भी समाजवाद लाना चाह रहे हैं।सब एक जैसे दिखेंगे,तभी उनका मिशन पूरा होगा,कुछ तो गड़बड़ है।

चुनावी टिकटें जितनी बंट रही हैं,उससे ज्यादा तो कट रही हैं।टिकट कटने से आत्माएं आहत हो  रही हैं।नैतिकता और निष्ठा को थोड़े दिनों के लिए कोने में धर दिया गया है।शरीर की रक्षा पहले ज़रूरी है।जब वही नहीं रहेगा,तो आत्मा कहाँ भटकेगी ? धृतराष्ट्र के सौ पुत्र थे तो उनके लिए महाभारत करनी पड़ी थी और जब किसी का एक ही चिराग हो तो वो क्या कर गुजरेगा,सोचिये ! कुछ तो गड़बड़ है।

अब सुराज की आहट हो चुकी है।सेंसेक्स होली में दीवाली मना रहा है।मंहगाई और भ्रष्टाचार एक्सपायरी डेट में चल रहे हैं।धर्म और जाति के झंडे ऊँचे और ऊँचे हो रहे हैं,कुछ तो गड़बड़ है !


15/03/2014 को 'जनसंदेश टाइम्स' में




 

शनिवार, 8 मार्च 2014

शुक्र है,वे इतिहास पढ़े हैं !

जनसन्देश टाइम्स में 07/03/2014 को 

वो पूरी रफ़्तार से आगे बढ़ रहे हैं।उनके गुजरने के बाद पीछे जो धूल का गुबार उठता है,बचे हुए लोग उसी में लट्ठमलट्ठ करने में मशगूल हो जाते हैं।जब तक वे लोग ऐसा करते हैं,उनका काफ़िला नया इतिहास रचकर आगे बढ़ लेता है।उनमें गजब का आत्मविश्वास है और उससे ज्यादा अपने समर्थकों पर भरोसा।वे पढ़कर तो आये हैं राजनीति, पर बदल रहे हैं इतिहास।राजनीति में बात करने का किसी दूसरे को वो मौका ही नहीं देते।वे नित्य एक नया एजेंडा बनाते हैं और उनके विरोधी थाली बजाते ही रह जाते हैं ।वैसे भी इस मुई राजनीति में अब बचा ही क्या है ? भ्रष्टाचार,मँहगाई और कदाचार को वे बिलकुल पसंद नहीं करते,इसलिए इन विषयों पर समय गँवाकर वे जनता को हलकान नहीं करना चाहते।वे एक-एक कर इतिहास के पन्ने पलटते जा रहे हैं।उनका व्यक्तित्व इतना प्रभावी है कि इतिहास उनके मुँह से बोलने लगता है।वे जो कहते हैं ,वही इतिहास बन जाता है।उनको पता है कि लोग राजनीति की गंदगी से ऊबे हुए हैं,सो जल्द ही इतिहास पर चर्चा शुरू कर देते हैं।लोग भी चाय की चुस्कियों के साथ उनके इतिहास-ज्ञान से अभिभूत हो उठते हैं।

फिर भी,कुछ लोग इतने अहमक हैं कि इतिहास के तथ्यों से खुद को बड़े गहरे से जोड़ लेते हैं,संवेदनशील हो उठते हैं।इतिहास अतीत का आख्यान है और अगर कोई अपना भविष्य बनाने के लिए इतिहास को बदलता है तो इसमें हर्ज़ क्या है ? आखिर जब भी कोई बदलाव होता है तो इसकी कीमत इतिहास ही तो चुकाता है।इसलिए अगर राजनीति आगे बढ़ने के लिए इतिहास के कंधे का सहारा लेती है तो ज़ाहिर है कि उसकी कुछ हड्डियाँ तो चरमराएंगी ही।महत्वपूर्ण तथ्य तो यही है कि अब तक राजनीति ने ही इतिहास को गढ़ा है और वे भी यही काम कर रहे हैं।जनतंत्र में जनमत सबसे मुख्य माना गया है और वह अधिकतर उनके साथ है,यह वे साबित कर रहे हैं । उनकी मशाल के साए में लोग अपने-अपने चिराग लेकर उदित हो रहे हैं । इसलिए उनके समर्थकों को इतिहास की नहीं राजनीति की चिंता है।इतिहास की गड़बड़ तो वे बाद में ठोंक-पीट कर ठीक कर लेंगे।

उन्होंने देश के विकास के लिए अपना प्लान तैयार कर लिया है।उनकी इस योजना में ‘सबका’ नाश तय है।यह पिछले जमाने की बात हो गई ,जब ‘विश्व में सद्भाव हो,सबका कल्याण हो’ का उद्घोष किया जाता था।अब बदले ज़माने में नारा भी बदल दिया है उन्होंने।अब उनके समर्थक ‘सबका विनाश हो’ की हुँकार भर रहे हैं।उन बेचारों को यह भी नहीं पता चल रहा है कि इस ‘सबका’ में वो भी तो शामिल हैं।वे आगे बढ़ने में कहीं पिछड़ न जाएँ ,इसलिए स्वयं को पिछड़ा बता रहे हैं।उनका दल बिलकुल पारदर्शी तरीके से काम करे,सो इसके लिए बॉलीवुड से पारदर्शिता में विशेषज्ञता हासिल कर चुकी हस्तियों को बुला रहे हैं।वे इस चुनाव में जीत-हार से परे होकर नए इतिहास की संरचना में व्यस्त हैं।इतिहास भी अपनी इस उपलब्धि पर खुद को बड़ा रोमांचित-सा महसूस कर रहा है ।

यह तो गनीमत है कि उन्होंने इतिहास पढ़ा है। अगर कहीं विज्ञान पढ़े होते तो सोचिये क्या-क्या होता ? तब बल्ब का आविष्कार न्यूटन और रेडियो का शेख चिल्ली साहब किये होते ! किसी को भला इस बात से क्या फर्क पड़ता है कि कौन कहाँ पैदा हुआ या कौन सा शहर किस देश में है या फलां कौन सी जेल में रहा ? महत्वपूर्ण तो यह है कि यदि वे इतिहास पर अपने प्रयोग करने के बजाय विज्ञान पर करते तो वैज्ञानिक हाइड्रोजन और कार्बन डाई ऑक्साइड के मेल से जल कैसे बनाते या सीएनजी से वायुयान कैसे उड़ाते ? इसलिए इतिहास के इस बलिदान को विज्ञान हमेशा याद रखेगा और इसके लिए वैज्ञानिक उनके आभारी हैं ।


शनिवार, 30 नवंबर 2013

कुर्सी वाले साहब !


30/11/2013 को हरिभूमि में
 

कुर्सी पर बैठने वाले साहब ही होते हैं,यह तब और पक्का हो गया जब खबर आई कि वे जिस पर बैठे थे ,वह नीलामी की हक़दार हो गई ।इससे साहब के रुतबे को चार चाँद लग गए और वे बड़ी कुर्सी की ओर दो इंच और सरक गए।इस कुर्सी की कीमत तय करेगी कि साहब की मार्केट-वैल्यू क्या है ? उनके बन्दों ने फ़िलहाल उस सौभाग्यशाली कुर्सी के ऊपर पाँच लाख का दाँव लगा रखा है।यह कीमत साहब के ‘टाइम’ के ऑनलाइन सर्वे में नॉमिनेट होने से पहले की है,इस लिहाज़ से अब इसमें और बढ़ोत्तरी हो सकती है।नीलामीकर्ता अब उस कुर्सी पर ‘टाइम-इफेक्ट’ का टैग लगाकर मनचाही कीमत वसूल सकते हैं।फ़िलहाल,जिन लोगों की निष्ठा महज़ कुर्सी तक होती है,वे साहब के ‘कुर्सी-त्याग’ की कीमत से अपनी हैसियत का अंदाज़ा लगा सकते हैं।

कीमत कुर्सी की नहीं उस पर बैठने वाले की होती है।यूँ तो कुर्सी पर मास्टर जी भी विराजते हैं पर उनकी कुर्सी की कीमत टका भर की नहीं है।न मास्टर जी के बच्चे और न ही सरकार उनकी कुर्सी के अवमूल्यन पर चिंतित है।इसकी सीधी वज़ह यही है कि मास्टर जी साहब नहीं हैं।उन्हें हर कोई घुड़क देता है।जो व्यक्ति अपनी इज्ज़त नहीं सुरक्षित रख सकता ,वो बेचारा कुर्सी को क्या खाक संभाल पायेगा ? कुर्सी-कुर्सी में भी तो फर्क होता है।मास्टर जी की कुर्सी का दायरा एक कक्षा तक सीमित है जबकि साहब की कुर्सी अपने लिए इच्छित स्पेस बना सकती है,उसके आगे खुला आसमान है।जहाँ मास्टर जी का सौभाग्य है कि वे कुर्सी पर बैठ पाते हैं,वहीँ कुर्सी का सौभाग्य है कि उसमें साहब विराजें और उसे सिंहासन में तब्दील कर बाज़ार के लायक बना दें।यह मामला दो कौड़ी बनाम लखटकिया ग्लैमर का है,जिसे समझना आम आदमी के बस का नहीं है।

साहब कोई आम साहब नहीं हैं।पढ़-लिख के साहब बनने वालों को अब कोई पूछता भी  नहीं,इसलिए उनकी कुर्सी भी अपनी किस्मत पर रोती रहती है।साहब का संसर्ग पाने वाली कुर्सी धन्य है।पहली बार कोई ब्रांड और यूएसपी वाले साहब ने उसको कृतार्थ किया है।साहब की यूएसपी है कि उनको सुनने के लिए टिकट लगती है,स्पीच बिकती है।वे चलते-चलते रास्ते में अपना लालकिला बना लेते हैं,रोज नया इतिहास गढ़ते हैं।ऐसे जादूगर साहब अपने बन्दों की तालियाँ पाकर सातवें आसमान में हैं।इतने बड़े पैकेज के साथ वे जिस कुर्सी पर बैठेंगे,वह क्योंकर न इतराएगी ? उसी कुर्सी को नीलामी में हासिल कर साहब के बंदे भी अगली पीढ़ी का निर्माण आसानी से कर सकेंगे।

कुर्सी मिलना बहुत बड़े पुण्यों का फल होता है।कई लोग अपना पूरा जीवन लगा देते हैं पर उस तक पहुँच नहीं पाते।कुछ निकट आते हैं तो दूसरे उसे सरका देते हैं।पुण्याई से कुर्सी पाने वालों की संख्या बहुत कम है।अधिकतर मामलों में बढ़िया मैनेजमेंट और शतरंजी चालों से ही कुर्सी हथियाई जाती है।इसमें ‘गन्दी-गन्दी-गन्दी बात’ जैसा कुछ भी नहीं होता।बड़ी और मार्के की बात यही है कि कुर्सी पर उसी का हक बनता है जो इस पर बैठकर इसकी कीमत बढ़ाये;और आज किसकी कीमत अधिक है,यह बाज़ार के हाथ में है।इसलिए जिस कुर्सी पर सबसे ज्यादा सट्टा या दाँव लगे,वही कीमती है।सभी लोग जहाँ पाने वाली कुर्सी की कीमत लगाते हैं,वहीँ साहब जिस कुर्सी पर विराजमान हो जाते हैं,उसी का बाज़ार-मूल्य बढ़ जाता है।इससे यह साबित होता है कि कीमत कुर्सी की नहीं,साहब की है।सोचिये,जिस कुर्सी पर बैठने के लिए देश की कई पुण्यात्माऐं व्यग्र हैं,उस पर साहब बैठ गए तो वह कितनी कीमती हो जाएगी ! ऐसी पायेदार बड़ी कुर्सी साहब की पकड़ के बिना कब तक दो कौड़ी की बनी रहती है,यही देखने वाली बात है !

एब्सोल्यूट इंडिया में १/१२/२०१३ को
 

गुरुवार, 21 नवंबर 2013

चाय वाले साहब ही ठीक हैं !


Welcome To Jansandesh  Times: Daily Hindi News Paper
जनसंदेश में २१/११/२०१३ को

आखिर इस देश के लोगों को क्या हो गया है ? अगर एक चाय वाला साहब बनकर लाल किले पर चढ़ना चाहता है,तो क्यों कुछ लोग आसमान-पाताल एक किये हैं ? बड़े-बूढ़ों को धकेलकर यदि वह मंचासीन होना चाहता है तो इसमें गलत क्या है ? हमारे देश में ऐसे लोग बड़ी संख्या में हैं,जिन्हें किसी गरीब का सुख देखा नहीं जाता।ऐसे ही लोगों को ‘परसंतापी’ कहा जाता है।हमारे लिए तो बड़े फख्र की बात होगी,जिस दिन चाय वाला देश का साहब बन जायेगा ।इससे खाली बैठे कारिंदों और पुलिस वालों को भी ढंग का काम मिल जायेगा और वे आम आदमी की सुरक्षा के लिए दिन-रात उसके पीछे लगे रहेंगे ।ऐसे में साहब और उसके बंदे की नीयत पर शक करना कतई मुनासिब नहीं है ।सीधी बात है कि एक चाय वाले का साहब बनना कइयों को नागवार गुजर रहा है।

लोग बहुत नादान हैं।उन्हें सोना खोदने और सपने बेचने वालों पर तो भरोसा है लेकिन एक  चाय बेचने वाले की क्षमताओं पर संदेह हैं।‘मयूर-तख़्त’ पर उसका दावा सामने आते ही स्वयंभू शहजादे का भविष्य डगमगाने लगा है ।दिक्कततलब  बात तो यह है कि ’परसंतापी’ लोग अब उस तख़्त में नुकीले बयानों की कील चुभो रहे हैं।भले ही देश की बागडोर थामने के लिए इतिहासकार होना ज़रूरी न हो पर चाय के इतिहास का अध्ययन करने पर तो रोक नहीं है।कहते हैं कि नामालूम-सा यह कड़क उत्पाद इंग्लैंड से अंग्रेज़ अपने साथ लाए थे।इस तरह चाय का कारोबार अंतरराष्ट्रीय ब्रांड से जुड़ा हुआ है।आज बाज़ार में उसी चाय की डिमांड है,जिसका ब्रांड दमदार और ग्लोबल हो ।यह आप पर निर्भर है कि आप टाटा की ‘जागो रे’ पसंद करते हैं या बाघ-बकरी जैसी एक घाट पर लाने वाली समाजवादी चाय ?यदि कोई ‘ग्रीन-टी’ पीने की कसम ही खा चुका है तो अलग बात है,पर ऐसों की संख्या कितनी है ?फ़िलहाल,तुलसी,अदरक,वंजारा और साहिब जैसे नए-नए फ्लेवर की चाय परोसी जा रही है ।मीडिया और कार्पोरेट ने भी सबको आश्वस्त किया है कि यही चाय मुर्दनी वाले चेहरों पर ताजगी ला सकती है।

भूले-बिसरे नायकों पर टॉर्च मारी जा रही है।महापुरुष चुनाव के समय उधारी पर चल रहे हैं।लौहपुरुष को उबारने के लिए लोहा लिया जा रहा है तो बापू को मोहन लाल के रूप में गढ़ा जा रहा है।देश के इतिहास में यह पहली बार होगा कि सत्ता के लिए नया  इतिहास लिखने की होड़ मची है ।इस इतिहास का अवलोकन किसी विश्वविद्यालय या स्कूल के पाठ्यक्रम में नहीं,बल्कि विशेष शाखाओं में किया जा सकता है । सभाओं और रैलियों में लोगों को चाय की ताजगी और भविष्य की बानगी दिख रही है।चाय बेचने वाले का दावा देश पर तब और पुख्ता हो जाता है,जब यह तथ्य सामने आता है कि उसने तो चाय ही बेच रखी है,जबकि दूसरे लोग देश बेचने में लगे हैं।जब बिना किसी अनुभव के कोयला,स्पेक्ट्रम,तोप,सब कुछ बेचा जा सकता है तो चाय बेचकर और बड़ी उपलब्धि हासिल की जा सकती है। इससे साहब और उनके बन्दों को तगड़ी स्फूर्ति मिलेगी,इसलिए हमारी नज़र में देश-सेवा के लिए चाय और बन्दे वाले साहब की प्रोफाइल ज्यादा दमदार है।

बुधवार, 18 सितंबर 2013

जंगल में आया शेर !


 

देश में जंगल-राज की खबरें बहुत पहले से आ रही थीं,पर इसके कोई पुख्ता सबूत नहीं थे।इधर कुछ लोगों के यह ऐलान करने के बाद कि जंगल में शेर आ गया है,जंगल-राज वाली बात पर मुहर लग गई है।इसके लिए सियार और लोमड़ी ने प्रचार-मंत्री का जिम्मा बखूबी संभाल लिया है।अब जब जंगल है तो शेर तो रहेगा ही और वही राज भी करेगा।इसमें सबसे बड़ी बात यह है कि इस जंगल में शेर पैदा नहीं होते बल्कि बनाये जाते हैं।शेर के अलावा जंगल के सारे प्राणी निरीह होते हैं।उसकी धमक ही ऐसी होती है कि दूसरे पशु अपने जीवन-निर्वाह के बजाय अपनी जीवन-रक्षा में ही लगे रहते हैं।इस तरह जंगल में गजब की शांति रहती है।हाथी,तेंदुआ और बाघ उसे चुनौती देने की हिम्मत नहीं रखते,फ़िर हिरन,खरगोश और बन्दर किस खेत की मूली हैं ?जंगल की सत्ता इसीलिए शेर के अनुकूल रहती है।

हमारे देश में बाघों की गिनती में सब लगे रहते हैं पर शेरों की गिनती कोई नहीं करता।इसका सीधा मतलब यही है कि एक समय में एक ही शेर होता है,उसकी गिनती करने से वो नहीं बढ़ेगा।वह अपने आप नहीं पैदा होता,उसे गाजे-बाजे के साथ जंगल में उतरना होता है।ऐसा नहीं है कि शेर अभी ही  आया है।इसके पहले वाला तो बब्बर शेर था,पर अब ज़्यादा बुजुर्ग हो गया है।उससे अब शिकार भी नहीं किया जाता।उसने अपने पंजों को उतरती खाल के साथ छुपा लिया है,इसलिए ऐसा शेर किस काम का ?यह वाला तो अच्छी नस्ल का है और गिर के वन से लाया गया है।यह ज़ोर से गरजता भी है और अपनी गुफ़ा में हड्डियाँ भी टाँगे रहता है जिससे कोई बाघ या तेंदुआ शेर बनने की कोशिश न करे।जंगल के बाकी पशु तो शेर की एक गर्जना पर ही लोटने लगते हैं,उन्हें किसी किस्म की घास डालने की ज़रूरत भी नहीं पड़ती।

जब से नए शेर ने जंगल का काम-काज संभाला है,रोज़ नई दहाड़ सुनाई देती है।इससे कमजोर पशुओं को लगता है कि वह उन्हें भालुओं और पड़ोसी जंगल के हिंसक पशुओं से बचा लेगा।उन्हें यह शेर बहुत वैरायटी वाला लगता है।पुराने वाले शेर को कोई घास भी डालने को तैयार नहीं क्योंकि उन्हें पता है कि घास खाने वाला शेर नहीं हो सकता।उधर भेड़िये और शिकारी कुत्ते शेर की आमद से थोड़ा हलकान हो गए हैं,आसमान में गिद्ध भी बेचैन हैं।ये सभी अब तक जंगल के पशुओं को नोचकर खा रहे थे और अपने भविष्य के प्रति निश्चिन्त थे। दूसरी ओर निरीह पशु सोच रहे हैं कि उनको तो हर हाल में नुचना ही है तो शेर का शिकार बनने में क्या हर्ज़ है ?
 
'जनवाणी' में १८/०९/२०१३ को

 

 

तीन तरह के सपने और आम आदमी !

18/09/2013 को जनसंदेश में



कोई कुछ भी कहता हो,देश में अभी सपने मरे नहीं हैं। परेशानियों की बातें करने वाले तो हमेशा रोते ही रहते हैं पर अभी भी बहुत कुछ बचा हुआ है,जिससे लगता है कि देश में समस्याओं की बातें करने वाले नादान हैं। इस समय कम से कम तीन लोग ऐसे हैं जो सपनों की बातें कर रहे हैं । इन स्वप्नदृष्टाओं के अलावा बचे हुए लोग इनकी चर्चा में लगे हुए हैं। सपनों के बारे में सोचने की आम आदमी की न तो हैसियत है और न हिम्मत। यह अलग बात है कि इनके सपनों के बारे में सारी खबरें सबसे पहले उसी के पास आती हैं। इन तीनों टाइप के सपनों में ही आम आदमी इत्ता व्यस्त है कि उसे अपने सपने की सुध ही नहीं । यही कमाल है,तीन तरह के सपनों की फिलासफी का।

प्रधानमंत्री-पद के उम्मीदवार नकली लालकिले पर चढ़कर भाषण देते हैं कि सपने नहीं देखना चाहिए क्योंकि इससे आदमी बर्बाद हो जाता है। देश का आम आदमी तो इस थ्योरी पर बहुत पहले से यकीन किए बैठा है,इसलिए उसके पास कोई सपना पेंडिंग है भी नहीं। वह तो बस दूसरों के सपनों को पूरा करने में भिड़ा हुआ है । नेता जी ने इस थ्योरी से ही सीख लेकर सपने देखने के बजाय उस पर अमल करना शुरू कर दिया है ,पर जनता के लिए सन्देश है कि वह सपने देखना बंद करे नहीं तो बर्बाद हो जायेगी। यह बात अगर जिसे समझ न आए,वही कुसूरवार है।

सपनों के बारे में दूसरी बात उस युवराज ने कही है,जिसको लेकर कई लोग सपने पाले बैठे हैं। उन्होंने तो यह कह दिया है कि वे अपने सपनों को कुर्बान करने के लिए तैयार हैं । वे यह सब आम आदमी के हित में ही करेंगे। इससे यह तो स्पष्ट हो गया कि उनके पास सपने हैं और उन्हें कुर्बान करने की हैसियत भी वे रखते हैं। आम आदमी सपनों को खाक कुर्बान करेगा। वह तो देखने तक की हैसियत में नहीं रह गया है। अब यह उसे सोचना है कि यह क़ुरबानी उसे कित्ती सस्ती पड़ती है ?

तीसरे टाइप का सपना सबसे दिलचस्प है। यह सदाबहार है। यह लगातार इतनी बार देखा गया है कि अब हवा में ही घुल गया है। पर इसे देखने वाली बुजुर्ग आँखें उसे जमीन पर लाने को आतुर हैं। उनके आत्मीय जनों ने बहुतेरा समझाया कि अब हवा का रुख दूसरी ओर है,पर वे बाल-हठ की तर्ज पर ‘लाल-हठ’ पकड़े हुए हैं। जहाँ दो लोग सपनों से दूर भागने की बात कर रहे हैं,वे देखने पर आमादा हैं। उन्हें लगता है कि जब उन दोनों का कोई सपना ही नहीं है,तो फ़िर वे ही बचते हैं। इन तीनों के बीच आम आदमी यह सोच रहा है कि इनके सपनों में वह कहाँ पर है ? 

मंगलवार, 17 सितंबर 2013

सपनों का पूरा होना !

हरिभूमि में १७/०९/२०१३ को
Welcome To National Duniya: Daily Hindi News Paper
१७/०९/२०१३ को 'नेशनल दुनिया' में !

 

 
आखिरकार उन्होंने लाल किले से चढ़कर भाषण दे ही दिया। ऐसा करके उन्होंने साबित कर दिया कि सपने देखना नहीं चाहिए,जितनी जल्दी हो ,उन पर अमल कर अपनी मुराद पूरी कर लेनी चाहिए । समय भी बड़ा कठिन है,पता नहीं, कब कौन किसको गच्चा दे जाए ? थोड़े दिनों पहले ही उनको यह आभास हो गया था कि सपने देखने से आदमी बर्बाद हो जाता है। उनका यह कहना अकारण भी नहीं था। यह उन्होंने लम्बे अनुभव से सीखा है। वे अपने अग्रज के सपने देखने और उनका हश्र बखूबी समझ चुके हैं,इसलिए कोई जोखिम  नहीं उठाना चाहते थे। यह सपने देखने का नहीं पूरा करने का समय था,इसलिए उनके अनुयायी जी-जान से इस काम में जुट गए हैं।

सपनों में ताजमहल बनाने की कोशिशें कई लोगों ने की हैं और कुछ लोगों ने उसे मूर्त रूप भी दिया है। लाल किले पर चढ़कर झंडा फहराने का सपना भी आज़ादी के बाद से लगातार देखा जा रहा है,पर उसे मूर्त रूप देने की कोशिश किसी ने नहीं की। चूँकि वे सबसे अलग दिखने वाली पार्टी के नेता हैं और फेंकने के काम में महारत हासिल कर चुके हैं ,इसलिए यह उनके ही बूते की बात थी कि लाल किले पर चढ़कर बोलने की कल्पना को साकार कर दिया जाए। खबर है कि देश का कारपोरेट उनके साथ है,इसीलिए उनके इस काम में कोई मुश्किल भी नहीं आई ।

वैसे तो उनका रथ समय से काफ़ी पहले दिल्ली की ओर कूच कर चुका है पर उनकी पार्टी के ही कुछ लोगों की मंशा ठीक नहीं है। बार-बार लग रही अड़ंगेबाजी से तंग आकर असली लाल किला पहुँचने से पहले ही बीच रास्ते में उनके भक्तों ने एकठो लाल किला बनवा दिया । वे उस पर चढ़कर अपने अंदरूनी और बाहरी विरोधियों को संकेत देना चाहते थे कि वे केवल फेंकते ही नहीं, ’फेक’ लाल किले पर चढ़ भी सकते हैं। उनके इस कदम की भनक उनके अग्रज को भी नहीं लगी । अब वे बैठे माथा पीट रहे हैं कि मुआ,यह आइडिया उनके दिमाग में क्यों नहीं आया ? उनके तो नाम में भी लाल लगा है ।

बहरहाल,वे भी अब लाल किले से बोलने वाले नेता बन गए हैं। कुछ लोगों को लगता है कि वह तो नकली था,सो उससे क्या ?जो असली लाल किले से बोलते हैं,उन्होंने कौन-सी क्रांति ला दी ? लाल किले पर चढ़कर बोलने से किसी की आत्मा पर किसी प्रकार का दबाव नहीं बनता और न ही बोले हुए को पूरा करने का दायित्व होता है। जब बोलने का हश्र दोनों जगह एक जैसा ही होना है तो क्या फर्क पड़ता है असली और नकली लाल किले में ?इसलिए वे तो बोलकर ही खुश हैं।

उनके कुछ सलाहकारों ने सलाह दी है कि जब तक दिल्ली दूर है,गाँधीनगर को ही दिल्ली का नाम दे दिया जाय। इसके साथ ही वे सामने वाली गली का नाम 'रेसकोर्स रोड' रख कर तथा अपने आवास पर ‘प्रधानमंत्री’ की नामपट्टिका लगाकर सपनों के पूरे होने का अहसास कर सकते हैं।

 

 

बुधवार, 21 अगस्त 2013

मंत्रजाप करें, टारगेट पूरा होगा !




                                                           21/08/2013 को जनसंदेश में !
 

वे बड़ी जल्दी में हैं.उन्होंने समय का इंतजार करने से बेहतर यह समझा कि लोग उनका ही इंतजार करने लगें.इसके लिए भले ही उनको लाल किला न मिला हो पर उन्होंने अपना भाषण लालन कॉलेज से देकर देश चलाने की अपनी प्रतिभा का परिचय दे दिया है.उन्होंने बोलने से पहले ही कह दिया था कि लोग दिल्ली और गुजरात की तुलना करेंगे.उन्होंने लोगों को समझा दिया है कि गुजरात का शेष भारत से सिर्फ तुलनात्मक महत्त्व है, गोया वह इस देश का हिस्सा न हो !

उनके भाषण पर खूब तालियाँ मिलीं .उनके ही बुजुर्ग नसीहत की छींक उनके लालकिला-अभियान को रोक पाने में असफल दिख रही है.इसीलिए जल्दी में ही एक सम्मिलित बैठक भी आयोजित कर ली गई ताकि टोकाटाकी करने वाले सावधान हो जांय .देश को बदहाली और मंहगाई से मुक्ति दिलाने के नाम पर जो लोग इकठ्ठा हुए थे वे जब बैठक से बाहर निकले तो सबके पास एक टारगेट था.उन्होंने अपने टारगेट को तो आज़ादी के दिन ही सबके सामने प्रकट कर दिया था पर बाकियों के लिए 272 का मन्त्र-जाप था.इसे हर सदस्य और कार्यकर्त्ता को चुनावों तक जपना है ताकि वे गिरते हुए देश को अपनी गोदी में उठा सकें .

कहते हैं कि किसी बात को यदि बार-बार कहा जाय तो वह सच हो जाती है,भले ही वह झूठ क्यों न हो.यही मान्यता मन्त्रों को लेकर चली आ रही है.भारतीय संस्कृति और धर्म के मानने वाले सबसे बड़े समर्थक उनके ही लोग हैं .ऐसे में नए मन्त्र ईजाद करना,पुरानों को झाड-पोंछकर जपने लायक बनाना इन सबकी कुशलता है.वे अपने दल के नए नायक हैं सो मन्त्र भी नए बनेंगे.मंदिर का मन्त्र अब निष्प्रभावी हो चुका है इसलिए राष्ट्रवाद का शंख सुनाई दे रहा है.आम चर्चा यही है कि वो आएंगे और जादू की छड़ी घुमाते ही पाकिस्तान और डॉन ,मंहगाई और भ्रष्टाचार सब उनके चरणों में लोटने लगेंगे.इस बात को उनके ही वरिष्ठ साथी नहीं मानते पर जनता यदि यह मंत्रजाप शुरू कर दे तो वे यह सब पलक झपकते ही कर डालेंगे.

अब इस देश और उसके रहने वालों को सोचना है कि उन्हें क्या चाहिए ?उन्होंने देश के सामने अपना एजेंडा तय कर दिया है.देश में विकास करने का वादा उन्होंने इसीलिए नहीं लिया है क्योंकि ऐसा तो कई लोग कर चुके हैं और उनका हो भी गया है.जनता यदि देश बचाना चाहती है तो उसे 272 की गिनती याद रखनी चाहिए.मंहगाई या भ्रष्टाचार दूर करना उनके टारगेट में नहीं है.वे तो बस चाहते हैं कि जनता उनके खीसे में 272 का नजराना डाल दे और वे देश-सेवा शुरू कर दें.उनकी इस सेवाभक्ति की आतुरता से जनता पूरी तरह ओत-प्रोत हो चुकी है और इस इंतजार में है कि कब चुनाव आयें और वह अपना काम कर सके.

अब वे करोड़ों की जनता का टारगेट बन चुके हैं और उनका टारगेट महज़ 272 है.यह बात अगर किसी को समझ नहीं आ रही है तो उनका मन्त्र-जाप करके देखे ,तुरंत काम करता है.


 

गुरुवार, 15 अगस्त 2013

हम कर सकते हैं !


 
15/08/2013 को कल्पतरु में !
विपक्ष के संभावित प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नेता ने हाल ही में एक बड़ी रैली में आह्वान किया है कि ‘यस वी कैन’ यानी ‘हम कर सकते हैं’। इस नारे पर पूरा देश झूम गया है। ऐसा नहीं है कि यह नारा उन नेता ने इजाद किया हो,पर आज वो जो भी कहते हैं,खबर बन जाती है। इसी तरह का आह्वान करके ओबामा ने अमेरिकी चुनाव जीत लिया। उन्होंने चुनाव जीतने के बाद पाकिस्तान के अंदर घुसकर ओसामा को मारकर वाकई करके दिखा दिया । अमेरिकियों को अभी भी उन पर भरोसा है कि उसको मारने के बाद वे उनकी बेरोज़गारी और आर्थिक बदहाली की भी सुध लेंगे। उनका इंतज़ार अभी ज्यादा लंबा नहीं हुआ है पर अब वह नारा अमेरिका के लिए अप्रासंगिक हो गया है।

हमारे देश के लिए यह नारा तो नया है पर इस पर अमल बहुत पहले से हो रहा है। आज़ादी के बाद से ही सत्तारूढ़ दल और उसके नेता जी-जान से देश के लिए करने में जुटे हुए हैं। न जाने कितनी पनडुब्बियाँ,हेलीकॉप्टर,तोपें इस काम में लगाई गईं पर विरोधियों ने इसे घोटाले और स्कैम का नाम दे दिया। सत्ता चलाना आसान काम नहीं है। बेचारों ने खेल,कोयला,पत्थर,ज़मीन यानी जल,थल और नभ हर जगह किया। इसमें किसी प्रकार का भेदभाव नहीं बरता गया,बालू और कफन को भी बराबर सम्मान मिला। यह काम इतनी व्यापकता से हुआ कि दफ्तर का हर बाबू,अफसर,चपरासी तक इसमें निपुण हो गया। ऐसे सनातन-काल से चले आ रहे फार्मूले को आज नारा बनाना हास्यास्पद नहीं तो क्या है ?

विपक्ष के लोग तो केवल कहने भर के हैं,उनकी सुनता कोई नहीं है। कुछ समय पहले विपक्ष के ही नेता द्वारा नारा दिया गया था,’सबको देखा बार-बार,हमको परखो एक बार’ और जनता ने उनके नारे को सही मान लिया। वे एक बार के लिए ही आ पाए क्योंकि जनता ने उनकी ही बात पर अमल किया। अब वे उस नारे को फिर कभी दुहरा नहीं पा रहे हैं। यहाँ तक कि अब नारे के साथ उनकी उम्मीदवारी भी हवा हो गई है। यानी आज के नारे के हिसाब से ‘वो नहीं कर सकते’।

यह भी हो सकता है कि ‘हम कर सकते हैं’ का नारा जनता को यह विश्वास दिलाने के लिया दिया गया हो कि जो दूसरे कर सकते हैं,वो भी कर सकते हैं। यह बात इसलिए भी तर्कसंगत लगती है क्योंकि जनता कई सालों से ऐसी ‘करनी’ पसंद करती आ रही है। अपनी रैली में टिकट लगाकर उस नेता ने कार्यकर्ताओं  को यह सन्देश दे दिया है कि उनका भविष्य सुरक्षित है,वे अपने कैरियर को लेकर चिंतित न हों।

‘हम कर सकते हैं’ एक नारे के बजाय सूत्रवाक्य अधिक है। इस देश में सब अपना-अपना काम चुपचाप कर रहे हैं। जनता ने भी जिस दिन इसे नारे की तरह न लेकर अपना सूत्रवाक्य बना लिया,समझिए वह भी कर सकती है। हमारे यहाँ सबसे समझदार नेता ही हैं। अपने काम की हर बात वो बखूबी समझते हैं। इस समझ के मुताबिक ज़रूरी हुआ तो संसद चलती है और ज़रूरी हुआ तो ठप्प हो जाती है। जो भी कानून उनकी राह में रोड़ा बनता है उसे बदल सकते हैं। इस सबके पीछे ‘हम कर सकते हैं’ का ही सूत्रवाक्य काम करता है। अब एक नेता को जज बदलने की बहुत दरकार थी,पर अभी इसमें सफलता नहीं मिली है। वह दिन दूर नहीं जब नेता कानून ही नहीं,जज भी बदल सकेंगे। वही दिन वास्तव में ‘हम कर सकते हैं’ को चरितार्थ करेगा।

संघर्ष का नया तरीका

आंदोलन ख़त्म हो चुका था।आँसू गैस के गोले और लाठी - डंडे तनिक विश्राम के लिए सुस्ताने लगे थे।सड़क का शोर बैरिकेड तोड़कर ...