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रविवार, 1 नवंबर 2015

पुताई का सूत्र !

दीवाली सिर पर हैं पर घर की दीवारें वैसी ही गंदी नज़र आ रही हैं।कई ठेकेदारों से सम्पर्क किया लेकिन बजट ऐसा कि बूते के बाहर।अभी पाँच दिनों की ऑनलाइन शॉपिंग से उबरा नहीं था कि श्रीमती जी ने तीखा बयान जारी कर दिया-अबकी दीवाली में साफ़-सफ़ाई बहुत ज़रूरी है।पिछले तीन सालों से टालते आ रहे हैं।अब तो सामने वाले गुप्ता जी ने भी रंग-रोगन करा लिया है।और कितनी भद्द पिटवाओगे ?’

इस बात को हमने दिल पर ले लिया।बात केवल सफ़ाई तक होती तो ढांपी जा सकती थी,पर एकदम सीधे इमोशन पर आ लगी।गुप्ता जी के रंग-रोगन ने घर में क्रान्ति के बीज बो दिए थे।इससे निपटना बेहद ज़रूरी था।पर जेब खाली थी और आगे दीवाली थी।दफ्तर से एडवांस लेकर ‘बिग बिलियन सेल’ और ‘दिल की डील’ में पहले ही शहीद हो चुका था।श्रीमतीजी की बात भी ठीक थी।सफ़ाई से अधिक जरूरी था कि हमारा खोया हुआ आत्म-विश्वास लौटे।इसलिए पड़ोसी गुप्ता जी के नाम की उलटी माला जपते हुए पार्क की ओर बढ़ गया।

पार्क में चार-पाँच लोग मिलकर एक निहत्थे पर लिपटे हुए थे।पास जाकर देखा तो उसके चेहरे को स्याही से पोत दिया था।हमने पूछा-भाई यह क्या कर रहे हो? एक ने उत्तर दिया-यह पिछले दो दिनों से राजेश जोशी की कविता बांँच रहा था।हम इसे कसकर पोतेंगे।‘पुताई से याद आया कि हमारे घर में भी सबसे ज़रूरी काम इस समय यही है।हमें ये लड़के बडे़ संस्कारी और परोपकारी किस्म के लगे।लगा कि हमारी समस्या का समाधान अब होकर रहेगा।

पुताई-अभियान का नेतृत्व करने वाले युवा से हमने अपनी परेशानी बताई।हम चाहते थे कि वे सभी उसी निस्पृह भाव से हमारी दीवारों को अच्छे रंगों से पोत दें।लड़के के चेहरे से देश का भविष्य टपक रहा था।उसने हमें अजीब नज़रों से देखा।अपने मिशन को तनिक विराम देते हुए वह हमारे बिलकुल पास आ गया।बोला-भाई साहब,आपको गलतफहमी हुई है।हम पुताई वाले बंदे नहीं हैं।यह तो देश-व्यापी साफ़-सफ़ाई अभियान में लगे हुए हैं।हमारा उद्देश्य जरा व्यापक है।‘

उसका जवाब सुनकर हम पर जैसे कालिख गिरी हो ! किस मुँह से गुप्ता जी के घर को फेस करूँगा।उससे फ़िर विनती की,’देखिए,आप लोग रंग पोतने में एक्सपर्ट मालूम पड़ते हैं।हमारे बदरंग घर को भी रोशन कर दें ,प्लीज़।’ लड़का समझदार था,हँसकर बोला-अरे भाई,हम सामान्य रंगरेज नहीं हैं।एक ही रंग का प्रयोग करते हैं और उससे दीवारें बोलती नहीं कराह उठती हैं।हमारे पास केवल कालिख है।हम इसका निःशुल्क वितरण करते हैं।जब कभी चेहरे पर कालिख पुतवानी हो,बता देना।लड़के भेज देंगे।'

हमारी आखिरी आशा भी धूल-धूसरित हो चुकी थी।पार्क से आगे बढ़े तो पड़ोसी गुप्ता जी टकरा गए।हम कुछ बोलते कि वे शुरू हो गए-और बताइए क्या चल रहा है लेखक जी ?’ हमने भी सँभलते हुए कहा कि बस पुताई के लिए...’बात बीच में ही काटकर वे पूछ बैठे,’आप भी कुछ लौटाने जा रहे हैं क्या? ज़रा ध्यान से।कहीं दीवाली में ही होली वाली कालिख न लगवा बैठना !’ मन ही मन हम सोचने लगे कि अपने ऐसे नसीब कहाँ,पर आत्म-विश्वास को बटोरकर बोले-नहीं गुप्ता जी,हम तो कबीर के अनुयायी हैं,बिलकुल फक्कड़।पुताई तो घर की करवानी थी,पर इस समय कोई खाली ही नहीं।’

गुप्ता जी हमारे और नज़दीक आए और फुसफुसाते हुए बोले,’मजदूर तो मिल रहे थे पर उनके रेट सुनकर हमने तो मना कर दिया।किसी और को न बताओ तो आपको भी इसकी जुगत बता दें?’ मरता क्या न करता।हमने उसी अंदाज में हामी भर दी।गुप्ता जी ने रहस्य खोला कि उनकी श्रीमती जी ने सुझाव दिया कि पिछले साल हमने कैमरों के सामने ख़ूब साफ़-सफ़ाई की थी तो इस बार अपने घर में क्यों नहीं करते ! बस हमने यह काम अँधेरे में कर लिया ताकि मुँह में कालिख न लग सके।चाहो तो आप भी यही फार्मूला अपना लें,पर किसी और को मत बताना।‘

हमने गुप्ता जी को गले लगा लिया।अब उसी सूत्र से सफ़ाई अभियान में जुट गए हैं।

शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2015

कालिख तेरे हाथ की!

जितना उजला और झक सफ़ेद हो,उस पर उतनी ही कालिमा फबती है।काले कारनामे में एक-दो बार कालिख और पुत गई तो क्या फर्क पड़ता है ! कालिमा इसीलिए सहज होती है और मौलिक भी।उजले और धुले वस्त्र अंततः कालिख की गति को प्राप्त होते हैं।कालिमा कभी भी धवल और उज्ज्वल नहीं हो सकती।काला रंग पक्का होता है और काले कारनामे भी।’काली कामरी’ सभी रंगों को आत्मसात कर लेती है,इसीलिए इसकी महत्ता है।सब इसीलिये इसे ओढ़ना चाहते हैं।

चेहरे पर कालिख पोतना अब केवल मुहावरा भर नहीं रहा।शिक्षित और विकसित होने का सबसे बड़ा प्रमाण-पत्र आज यही है।जो जितनी ज़्यादा कालिख पोत सकता है,वह उतना ही बड़ा क्रान्तिकारी और विचारक माना जाता है।केवल पढ़े-लिखे होने से कुछ नहीं होता जब तक कि आप व्यावहारिक रूप से वैसे कारनामे न करने लगें।परिवर्तनकारी होने के लिए अब बड़े-बड़े ग्रन्थ पढ़ने और दिन-रात सिर खपाने की आवश्यकता नहीं है।बाज़ार से एक अदद स्याही की टिक्की और अपनी आँखों में बचे दुर्लभ पानी से ही यह मनोरथ पूर्ण हो सकता है।किताबों में तर्क खोजने और कानून का निबाह करने की जहमत उठाने की भी ज़रूरत नहीं है।बस,अपने निठल्ले हाथों से कैमरों के चमकते फ्लैश के सामने इसे झोंकना भर है।यह काम पढ़ाई में भाड़ झोंकने से भी ज़्यादा आसान है।

किताबों पर स्याही खर्चने वालों से स्मार्ट वे लोग हैं जो इसे उजले चेहरों पर पोत रहे हैं।जहाँ किताबी-कालिख जीवन-नैया को पार लगाने में हिचकोले खाने लगती है,वहीँ ये कालिख सत्ता की वैतरणी को एक झटके में पार करा सकती है।यहाँ तक कि जूता उछालकर भी कालिख-कर्म सम्पन्न किया जा सकता है।ऐसे लोग संविधान और संस्कार अपने हाथ में लेकर चलते हैं।ये ‘बाय-डिफॉल्ट’ संस्कारी-जीव हैं।संस्कृति के प्रति पूर्णतः समर्पित भी ।अपने मन और धन को तो पहले ही वे अपने प्रिय रंग में रंग चुके हैं,कालिख चुपड़कर तन को भी वैसा बनाना चाहते हैं तो इसमें हर्ज़ क्या है ! वे अब तन-मन-धन से देश-सेवा कर रहे हैं।

अँधेरा काला होता है इसीलिए सारी विशिष्ट कलाएं उसी की शरण में फलती-फूलती हैं।सबसे बड़ा समाजवाद तो अँधेरे का होता है।छोटे-बडे का कोई भेद नहीं रहता।न किसी का सूट-बूट दिखता है न यह कि कौन लंगोटी में है ! अँधेरा गरीब का पक्षधर है।उसके खाली पेट को ढाँपता है।अमीर को और समृद्ध होने की राह दिखाता है।काला इसीलिए सबका अभीष्ट है,फ़िर चाहे वह धन हो या मन।कालिख लगना  कलियुग का प्रताप है।जिसे लग गई वह देश का भविष्य बन जाता है।इसलिए कालिख से नहीं उजाले से डरो।उजाला विकास का शत्रु है,भेदिया है।और भेदिये देशद्रोही होते हैं।

अगली बार जब आप उजले-धुले बने रहने की जद्दोजहद करें तो कालिख पोतने वालों का भी खयाल रखें।आपके उजले होने तक ही उनकी कालिमा का असर रहेगा।इसलिए उनकी मजबूरियों को नज़र-अंदाज़ न करें।जिनके पास सम्मान है,वे उसे वापस दे रहे हैं,उनके पास कालिख है,वे उसे लौटा रहे हैं।

संघर्ष का नया तरीका

आंदोलन ख़त्म हो चुका था।आँसू गैस के गोले और लाठी - डंडे तनिक विश्राम के लिए सुस्ताने लगे थे।सड़क का शोर बैरिकेड तोड़कर ...