आंदोलन ख़त्म हो चुका था।आँसू गैस के गोले और लाठी-डंडे तनिक विश्राम के लिए सुस्ताने लगे थे।सड़क का शोर बैरिकेड तोड़कर संसद में ‘शिफ्ट’ हो गया।मोर्चे पर डटीं सूरतें बदल चुकीं हैं पर देश की सूरत बदलने के आसार नहीं दिखाई दे रहे हैं।अब संवाद संसद से निकलकर इंटरनेट-मीडिया पर तैरने लगा है।आंदोलन से क्या हासिल हुआ इसका ठीक-ठाक अनुमान न तो करने वालों को अभी तक हो पाया है और न ही उसे दबाने वालों को।हाँ, संघर्ष का नया तरीका ज़रूर ईज़ाद हो चुका है।धरना,प्रदर्शन या आमरण अनशन से भी अधिक प्रभावी नुस्ख़ा अब सामने है।पहले पत्रकार ख़ुलासे करते थे और सरकारें एकदम से ढह जाती थीं।जब से पत्रकार दूसरे कामों में व्यस्त हो गए हैं तो यह काम इंटरनेट मीडिया पर वायरल होती हुई ‘रील’ मजे-मजे में कर सकती है।इससे सरकार तो नहीं बदलती,बल्कि ‘मन की बात’ रेडियो के बजाय रील से होने लगती है।यह काम भी रात के धुप्प अँधेरे में होता है ताकि उस पर कोई अंधेरगर्दी का आरोप न लगा सके।
जनसंघर्ष को राष्ट्रीय मनोरंजन में बदल दिए जाने से सरकार के सिपहसालार भी भौंचक हो गए हैं।उन्हें विपक्ष के पारंपरिक हथियारों से लड़ने का अनुभव खूब रहा है लेकिन ये हँसते-हँसाते क़हर ढाने वाली पीढ़ी इनकी समझ के बाहर लग रही है।यह ‘जेन-जी’ जी का जंजाल है या देश का भविष्य है, सरकार के कर्ता-धर्ता इस पर अभी शोध कर रहे हैं।
किसी भी सरकार की पहली सफलता यह होती है कि जो मुद्दा उस पर भारी पड़ने वाला हो,उस पर एक राय न हो।जनमत बँट जाने पर उसकी जवाबदेही भी समाप्तप्राय हो जाती है।आंदोलन में लाठी चल जाने के बाद जनता आपस में लाठी भाँजने लगी।यही वजह रही कि परीक्षा-सिस्टम में हुई गड़बड़ी का आंदोलन लाठी-गोली और गालियों के विमर्श में तब्दील हो गया।यह देखकर आख़िरकार सियासत को दख़ल देना पड़ा और सरकार भी ‘वायरल रील’ बनाने लगी।
विमर्शकार मानो इसी ताक में बैठे थे।वे रील की टाइमिंग,उसकी गुणवत्ता और कैमरे के एंगल पर विमर्श करने लगते हैं।‘वायरल-पीड़ित’ पीढ़ी उसी पर मीम और रील बनाने में जुट जाती है।अचानक इंटरनेट मीडिया में आई बाढ़ ने देश के कई इलाक़ों में हुई बाढ़ को ढक लिया।परीक्षा और उसका सिस्टम कहीं दूर पड़ा अंतिम साँसें गिन रहा है।सड़क और सदन में सरकार बहादुर को राहत हुई।किसी समस्या का समाधान अधिक बार तभी होता है जब उसके बरक्स नई समस्या खड़ी हो जाए।इस घटना से एक बात साबित हुई कि जो काम पुलिस की गोली और लाठी नहीं कर सकती,वह दो मिनट की एक ‘रील’ कर सकती है।
यह सरकार वैसे भी ‘फ्लोर-मैनेजमेंट’ करने में उस्ताद है।सदन हो,सड़क हो, मुख्य धारा की मीडिया हो या अब इंटरनेट मीडिया,उसके पास सब कुछ ‘मैनेज’ करने का हुनर हासिल है।
कह सकते हैं कि सरकार ने रोजगार के नए फ्रंट खोल दिए हैं और जनता के विरोध का तरीका भी बदल दिया है।सरकार का हर ‘स्ट्रोक’ अंततः ‘मास्टर-स्ट्रोक’ की गति को प्राप्त होता है।
अब हर मुद्दे के दो पक्ष निकल आते हैं।एक वह जो ड्रॉइंग रूम में बैठकर टीवी मीडिया फैलाता है और दूसरा वह जो हर मोबाइल पर रील बनकर वायरल होता है।जानकार इन दोनों के पीछे का एक ही कारण बताते हैं -गोदी।पहले वाले को जब गोदी -मीडिया के नाम से ख्याति मिल गई तो उससे निपटने के लिए दूसरे पक्ष वाले भी गोदी के शरणागत हो गए।हर आदमी की गोदी में मोबाइल-स्क्रीन चमकने लगा है और पल भर में एक उँगली दुनिया भर की ख़बरों को स्क्रॉल करके उदरस्थ कर लेती है।हर कोई विश्लेषक और अव्वल दर्जे का पत्रकार बन चुका है।सुनने में लगता है कि यही तो लोकतंत्र की ख़ूबी है पर समझ में आता है कि इसी में सरकारों की ‘लाइफ-लाइन’ भी छिपी हुई है।अब सरकार का पक्ष रखने के लिए प्रवक्ता या न्यूज़-एंकर की ज़रूरत ही नहीं बची।बाक़ी चीज़ों की तरह सरकार ने समाचारों की ज़रूरत को भी इसी तरह ख़त्म कर दिया है।आम आदमी के अंदर ही उसके खास आदमी निर्मित हो चुके हैं हैं जो किसी भी विमर्श को पल भर में ध्वस्त कर सकते हैं और किसी के चरित्र को तार-तार कर सकते हैं।अब समाचार सुने नहीं बुने जाते हैं।इसके लिए बुद्धि की भी ज़रूरत नहीं लगती है।नक़ली बुद्धि की माँग तेज़ी से बढ़ी है।
और हाँ, आप आंदोलन के तरीक़े बदल सकते हैं,मुद्दे बदल सकते हैं,सरकार भी बदल सकते हैं पर सिस्टम नहीं बदल सकते।अच्छी बात यह है कि इस एक मुद्दे पर सरकार, विपक्ष और जनता में आम सहमति है।