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रविवार, 30 जनवरी 2022

चुनावी मौसम और भागते घोड़े

सर्द मौसम में अचानक गरमाहट का प्रकोप आ गया है।मुए वायरस के नित-नए बदलते रूपों से भी घातक कई वैरिएंट्स इस वक़्त सियासत में दाख़िल हो गए हैं।चुनावी आचार-संहिता लगी नहीं कि घोड़े-गधे इधर से उधर होने लगे।क्या ही अच्छा होता कि आचार-संहिता की लगाम से इन्हें बिदकने से रोका जा सकता।जो समय दर्शकों को रिझाने में लगना चाहिए,वह अस्तबल की पहरेदारी में खपने लगे तो यह घोर अन्याय ही है।इस भगदड़ में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सामने दो ही तंबू नज़र आ रहे हैं।छोटी-मोटी गुमटियाँ तो इस चुनावी-तूफ़ान में ख़ुद को रोकने की कोशिश भी नहीं कर रही हैं।यहाँ यह बताना ज़रूरी है कि हम गधों की नहीं,केवल विशुद्ध घोड़ों की बात कर रहे हैं,जिनका बाज़ार-मूल्य सबसे ज़्यादा होता है।गधे बेचारे तो ‘फ़िलर’ होते हैं,अक्सर घोड़ों के साथ मुफ़्त मिल जाते हैं।और एक बात,अच्छी क़द-काठी के घोड़े अब काबुल में ही नहीं,लखनऊ और दिल्ली में भी बहुतायत से पाए जाते हैं।सो इन दिनों शेयर-बाज़ार की तरह सियासी-सेंसेक्स रोज़ घट-बढ़ रहा है।जो ‘स्टॉक’ कभी फ़ायदा पहुँचा रहा था,अचानक ‘लॉस’ दिखाने लगा।गड़बड़ बस इत्ती हुई कि समय रहते इसे ‘एवरेज’ नहीं किया गया।अब एहतियातन अस्तबल के ‘स्कोर’ पर हर घंटे निग़ाह रखी जा रही है।


जैसा पहले बता चुका हूँ कि फ़िलहाल दो ही टेंट मुक़ाबले में हैं।एक से बढ़कर एक।पहला ‘धोबी-पछाड़’ है तो दूसरा ‘टोंटी-उखाड़’।जब पहले वाले तंबू में थोक में घोड़े घुसते हैं तो यह कृत्य ‘धोबी-पछाड़’ की श्रेणी में आता है, ‘मास्टर-स्ट्रोक’ की गति को प्राप्त होता है पर इसी नस्ल के घोड़े दूसरे तबेले में घुसते हैं तो ‘अपराधी’ बन जाते हैं।इसके बावजूद अभी ज़्यादा चहल-पहल ‘टोंटी-उखाड़’ टेंट में ही दिख रही है।वहाँ उम्दा क़िस्म के अलावा पिछड़ी और अति-पिछड़ी नस्ल के तुरंगों की ज़बरदस्त माँग है।‘धोबी-पछाड़’ टेंट वाले भी पीछे नहीं हैं।वे काबुली-घोड़ों के बजाय अवधी-खच्चरों को भी गले लगाने को आतुर हैं।इसके लिए उनके पास भरपूर ‘चारा’ भी उपलब्ध है।


अभी तक हमने भूखे भेड़ियों के ही क़िस्से सुने थे।अब भूखे घोड़े चर्चा का विषय बने हुए हैं।हर कोई इनकी प्यास बुझाना चाहता है।इसके लिए हर टेंट में रोज़ शाम को टोंटियों की गिनती हो रही है।कुछ टोंटियाँ लगने से पहले ही लीक हो गई हैं।इस बहाने टूटी टोंटी का भी मुँह-माँगा दाम मिल रहा है।घोड़ों का मिलान टोंटियों से किया जा रहा है।जितनी ज़्यादा टोंटियाँ सलामत,उतने घोड़े पक्के।पिछड़ी पंक्ति में खड़े घोड़ों पर सबकी नज़र है।उनकी शिकायत मौजूदा अस्तबल के मालिक से है कि उन्हें उनके परिवार सहित भरपेट भोजन नहीं दिया गया।इसीलिए पाँच साल नाँद में मुँह डालने के बाद भी वे औरों से ‘पिछड़े’ हैं।पिछड़े होने में हमेशा आगे बढ़ने की संभावना बनी रहती है।यह बात उन्हें बखूबी पता है।ऐसे में जो घोड़े आलरेडी आगे खड़े हैं,वे हिनहिना भी नहीं पा रहे।पिछड़े होने का ‘हल्ला’ तब तक होता रहेगा, जब तक कि दूसरे जानवर ‘बोल’ न उठें !


इसी भगदड़ के दौरान ‘टोंटी-उखाड़’ तंबू की तरफ़ तेज़ी से भागता हुआ क्रांतिकारी नस्ल का एक ‘तुरंग’ मुझसे टकरा गया।उसके एक हाथ में इस्तीफ़ा,दूसरे में ‘वारंट’ था।मैंने उसे टोक दिया, ‘अपने प्रिय स्वामी को छोड़कर कहाँ चल दिए ?अभी तो कई दिनों का चारा बाक़ी था ! उसे क्यों छोड़ दिया ? ’


मेरा सवाल सुनकर वह एकदम से बिदक गया।ज़ोर-ज़ोर से हिनहिनाने लगा, ‘मेरा कोई स्वामी नहीं।मैं ख़ुद अपना स्वामी हूँ।रही बात इधर से उधर होने की,मैं तो आदिकाल से छुट्टा घूम रहा हूँ।एक जगह बँधकर चरना मेरे लिए संभव नहीं।मुझे पूरा चरागाह चाहिए।मैं घूम-घूमकर चरना चाहता हूँ।पिछले टेंट वाले केवल अगड़े घोड़ों को खली डालते थे।हमें तो सूखी घास ही मिली।यह हाल तो मेरे जैसे का हुआ, जो हमेशा अपने हक़ के प्रति सचेत रहा।बाक़ी बेचारे जानवरों का बुरा हाल है।उनका ख़ूब शोषण हुआ है।यह मुझे अभी अभी पता चला है।इसलिए अपनी नाँद ख़ाली करके मैंने वह टेंट भी ख़ाली कर दिया।’ 


मैंने उसे पुचकारते हुए अच्छी ‘कवरेज’ का चारा डाला और यह सवाल भी; ‘हे बाजिश्रेष्ठ ! तुम्हारे ‘टोंटी-उखाड़’ टेंट में जाने की कोई ख़ास वजह ? सुना है वहाँ परिवार से बाहर के घोड़ों के लिए ज़्यादा गुंजाइश नहीं है।फिर क्या करोगे ?’


यह सुनकर वह तुरंग थोड़ा मुस्कुराया, फिर भगदड़ की ओर देखते हुए बोला, ‘ इस रेस के हम असली घोड़े हैं।यह उड़ती हुई धूल आपको दिख रही है ? यह हमारे ही खुरों का पराक्रम है।पूरा संग्राम हमारे ही इर्द-गिर्द लड़ा जा रहा है।रही बात हमारे परिवार की,उसकी चिंता अब नहीं है।हम जिस अस्तबल में जा रहे हैं,वहाँ ‘परिवार’ को ही तरजीह दी जाती है।इससे हमारे समाज का भी भला होगा।कलजुग में इसी को समाजवाद कहते हैं।’


उसने आख़िरी बात बहुत धीरे से कही पर पता नहीं कैसे यह बात पास से गुजर रहे बाक़ी पशुओं के कान में पड़ गई।वे तभी से सोच रहे हैं कि इस बार उनके शोषण की तीव्रता पहले से अधिक होगी या कम !


संतोष त्रिवेदी