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गुरुवार, 24 अप्रैल 2014

सरकार की रिकॉर्ड विकास-दर !


जो लोग वर्तमान सरकार के परफोर्मेंस से निराश हैं और उसकी लानत-मलामत कर रहे हैं,उन्हें मुँह की खानी पड़ी है।सरकार के मुखिया पर असरदार न होने के गंभीर आरोप बराबर लगाये जाते रहे हैं पर मौन रहना उनकी कमी नहीं बल्कि यूएसपी रही है।इस बीच उनके योग्य मीडिया सलाहकार ने खुलासा करके साबित किया है कि जो भी बातें मीडिया में चल रही हैं,भ्रामक और बेसिर-पैर की हैं।उन्होंने यह कहकर सबकी बोलती बंद कर दी कि मानव-जाति के इतिहास में सबसे अधिक विकास यदि हुआ है,इसी काल में हुआ है।इस कथन के बाद हँसी के कई ठहाके कहीं दूर जाकर अपने लिए पनाह माँगने लगे।इस तरह प्रधानमंत्री कार्यालय ने अपने आलोचकों का मुँहतोड़ जवाब दिया है ।
सरकार के उक्त कथन का कागजी दस्तावेज भी इस समय निर्गत हुआ है,जिससे जानकारी मिली है कि आर्थिक विकास की रफ़्तार वास्तव में मानव-जाति में इससे पहले कभी नहीं हुई।इस बात को साबित करने के लिए छोटा-सा उदाहरण सामने है।एक छोटा किसान ,पाँच साल पहले महज एक लाख रूपये अपनी गाढ़ी कमाई से निकालता है और सरकार-समर्थक नीतियों से उसको तीन सौ पचीस करोड़ के पार ले जाता है।इसी से सरकार के विकास गति का अंदाज़ा लग जाता है ।
ऐसा तभी होता है जब स्वयं सरकार की आर्थिक गति तीव्र हो।उन लोगों का विरोध बिला वजह है जो देश की आर्थिक गति को अपनी नपनी से माप रहे हैं।सरकार देश को चलाती है इसलिए उसकी गति और उसका विकास ही देश का विकास होता है ।यह छोटी-सी बात आर्थिक विशेषज्ञों की समझ में नहीं आ रही है।इस उदाहरण से एक बात और साफ़ हो गई कि देश में भ्रष्टाचार की केवल हवा है।लाख को अरब में बदलने का हुनर भ्रष्टाचार की उपस्थिति में नहीं हो सकता।एक आम आदमी केवल केले की फ़सल उगाकर ‘बनाना कंट्री’ में ही इस तरह की उपलब्धि हासिल कर सकता है।वर्तमान सरकार के मूल्यांकन के लिए क्या इतना ग्रोथ कम है ?
कुछ लोग अभी भी सरकार की उपलब्धियों को मानने को तैयार नहीं हैं।उनकी मुख्य शिकायत है कि प्रधानमंत्री कुछ बोलते नहीं।इस बारे में सरकार ने दोनों हाथों से दस का दम दिखाया है।उसके कदम से कदम मिलाने के लिए तेज दिमाग और दूरदृष्टि ज़रूरी है।इसलिए कामकाज ही नहीं व्यक्तिगत संबंध बनाते समय भी व्यक्ति को पूरी तरह सज्ज होना चाहिए।सरकार से उसका करीबी रिश्ता हो,यदि सीधा जुड़ा हो तो सोने पे सुहागा।दूरदृष्टि होने से पास की ही नहीं दूर-दूर तक की ज़मीन पर उसकी पकड़ बनी रहती है।ऐसे में कोई ज़मीन यदि उसके हाथों में हो तो वह सीधा सोना पैदा करती है।कौडियों की जमीन को करोड़ों में बदलने का पेटेंट इस सरकार के पास है। इस पेटेंट को हासिल करने की अर्हता यदि किसी में नहीं है तो यह सरकार की नहीं उसकी नाकामी है।
हमें सरकार और उसके सलाहकारों पर पूरा भरोसा है।मानव-जाति के इतिहास में उसके बहुमूल्य योगदान के लिए सभी को कतारबद्ध होकर कृतज्ञ होना चाहिए।सरकार ने तो अपना दम दिखा दिया है अब हमें भी हर हाथ आई तरक्की को लपक कर कृतज्ञता का बटन दबा देना चाहिए।  

जनसन्देश में 24/04/2014 ,25/04/2014 को हरिभूमि में

गुरुवार, 16 जनवरी 2014

हम जिम्मेदारी को तैयार हैं !

जनसंदेश और हरिभूमि में 16/01/2014 को।
बचपन से ही मैं जिम्मेदारी उठाने को लेकर तत्पर रहा हूँ,पर कभी इस लायक किसी ने समझा ही नहीं।घर में कोई भी काम मेरी जिम्मेदारी पर नहीं छोड़ा गया।पता नहीं घरवालों को इस बात का इल्हाम  कैसे हुआ कि कोई भी गम्भीर काम मेरे भरोसे नहीं हो सकता।मेरे बारे में उनका यह भरोसा अभी तक बना हुआ है।इस बीच देश की सबसे पुरानी और बड़ी पार्टी के युवा नेता ने बड़ी जोर से उचारा है कि पार्टी उनको जो भी जिम्मेदारी देगी ,वे निभाने को तैयार हैं,बशर्ते वह जिम्मेदारी देश से सम्बन्धित हो।मेरी बात को मेरे परिजनों ने कभी सुनने की कोशिश नहीं की,पर युवराज की बात उनकी पार्टी के लिए सूत्र-वाक्य है,पहला एजेंडा है।इसलिए पार्टी में इस बात का उत्सव है कि उनके युवराज अब दूध-पीते बच्चे नहीं रहे,जिम्मेदार हो गए हैं।यह और ख़ुशी की बात है कि जिम्मेदारी का यह भाव ठीक चुनावों से पहले आया है।

काम सभी होते हैं,ज़रूरी और गैर ज़रूरी ;पर जब देश सेवा की बात हो,तो यह बड़ी जिम्मेदारी का काम हो जाता है।देश सेवा आज़ादी से पहले भी लोग किया करते थे।तब कोई किसी को जिम्मेदारी नहीं देता था।लोग चुपचाप अपना काम करते थे और ज़रूरत पड़ने पर जिम्मेदारी भी लेते थे।यानी,जिम्मेदारी का भाव तब भी था लेकिन उसे ओढ़ने की औपचारिकता नहीं थी।तब देश सेवा का काम औपचारिकता का नहीं था,इसलिए जिम्मेदारी भी औपचारिक नहीं थी।तब के नेता अपने हर काम को किसी से बताते नहीं थे।इस नाते, आज के नेता अधिक लोकतान्त्रिक हैं।यह उनकी जिम्मेदारी है कि वे देश सेवा के लिए अपने को प्रस्तुत करें।

देश की जिम्मेदारी लेने के मामले में हमारे यहाँ बहुत बड़ी प्रतियोगिता है।कोई किसी से पीछे नहीं रहना चाहता है।यहाँ तक कि एक पार्टी में जो आज सबसे बड़े जिम्मेदार बनकर उभरे हैं,उन्होंने अपने ही बुजुर्ग को देश-सेवा की जिम्मेदारी से ज़बरन मुक्त कर दिया है।यह अलग बात है कि वे राजधर्म की अपनी जिम्मेदारी से हमेशा बचते रहे हैं।पर देश-सेवा इस सबसे ऊपर है।उसकी जिम्मेदारी लेने के लिए यदि किसी नचनिये के साथ पतंग भी उड़ाना पड़े तो कोई उज्र नहीं।जिम्मेदारी का ज़ज्बा होता ही ऐसा है कि राष्ट्रभक्त व्यक्ति देश-सेवा करने के लिए कुलबुला उठता है।यह कुलबुलाहट इतनी तीव्र होती है कि इसके लिए तीसरा,चौथा मोर्चा भी बनाना पड़े तो लोग तैयार बैठे हैं।

कुछ लोगों को ठंडी में भी गर्मी का अहसास होता है।इसकी जिम्मेदारी वे अपने ऊपर नहीं लेते क्योंकि उन्हें लगता है कि यह जिम्मेदारी जनता की है।जब जनता ने उन्हें एक बार जिम्मेदारी सौंप दी है तो फिर वे कहाँ से जिम्मेदार हुए ? भारी ठण्ड में भी महोत्सव और सैर-सपाटे के लिए समय निकाल लेना कम जिमेदारी का काम है ? जो लोग यह बात नहीं जानते,वे गैर-जिम्मेदार हैं।हमें तो खुश होना चाहिए कि देश-सेवा जैसे नीरस काम की जिम्मेदारी उठाने के लिए लोग चौतरफा तैयार हैं।अब इस काम में ख़ास ही नहीं आम आदमी भी जुट गया है,इसलिए हमें अपने लोकतंत्र के प्रति पूर्ण आश्वस्ति है।भले ही हम कभी कोई जिम्मेदारी न निभा पाए हों,पर अब इन आँखों से जिम्मेदारी को निभते हुए तो देख ही सकते हैं ।

©संतोष त्रिवेदी

शुक्रवार, 3 जनवरी 2014

ठण्ड से कोई नहीं मरता !


हरिभूमि और जनसन्देश में 03/01/2014 को
हमारा देश किसी मामले में आत्मनिर्भर हुआ हो या नहीं पर बयानों के मामले में कम से कम पूर्णतः आत्मनिर्भर हो चुका है।देश में पहले यह काम नेताओं के ही जिम्मे रहा करता था,पर अब उनसे प्रेरणा पाकर अफसरों ने यह ज़िम्मेदारी उठाने की सराहनीय पहल की है।इससे कम होती जा रही नेताई नस्ल और उनकी घास चरती अक्ल से जनता को चिंता करने की ज़रूरत नहीं है।नेता जी के बयानों का भरपूर लाभ आम आदमी तक पहुँचाने के लिए ह्रदय में संवेदना और आँखों में शर्म का समुद्र भरने की कुछ अफसरों ने प्रतिज्ञा कर ली है।नेता जी को अपने से कहीं ज्यादा चिंता उस आदमी की है,जिसने अपनी उँगली से वोटिंग मशीन को एक बार दबाकर अपनी सारी जिंदगी उनके नाम लिख दी है।अब यह नेता जी का फ़र्ज़ बन जाता है कि ऐसी परजा का वे ध्यान रखें।

नेताजी हालिया हुए दंगों से बहुत आहत हैं।ये दंगे हुए भी थे या किसी विरोधी की साजिश,अभी इस बात की भी जाँच होनी है पर शुरूआती तौर पर उन्होंने सरकारी आंकड़े को मानने की महानता दिखाई है।नेता जी आम आदमी के प्रति बड़े रहमदिल हैं और वो यह कतई नहीं मान सकते कि उनके राज में लोग तम्बुओं और टेन्टों में जीवन गुजारें।इसीलिए जब युवराज उन तम्बुओं को एक पर्यटन-स्थल समझ कर भ्रमण करते हैं तो उनकी जनसेवा का ज्वार हिलोरे मारने लगता है।नेता जी का साफ़ मानना है भीषण ठण्ड में तम्बुओं में रहने वाले पीड़ित नहीं हैं।उनके एक अफसर ने खुलासा किया कि वे सारे लोग भू-माफियाओं की तरह भूखंड कब्जाने के लिए वहां डटे हैं।उनके नवाबी मंत्री ने तो उन सबको युवराज के लिए कूड़ेदान में पड़े वोट भर कह दिया।इससे साफ़ ज़ाहिर हो गया कि वहां मरने-खपने वाली जनता और ठण्ड से मरने वाले बच्चे केवल ज़मीन हथियाने के चक्कर में मारे गए।

नेता जी के एक अफसर ने तो ठण्ड में बच्चों के मरने पर ऐतिहासिक और भौगोलिक शोध का परिचय दिया है।उसने अपनी आँखों में गज़ब की धूर्तता ओढ़ी और सरकार को बेपर्द होने से बचा लिया।उस अफसर ने सबके सामने खुलासा किया कि ठण्ड से कोई नहीं मरता ।अगर ठण्ड से कोई मरता होता तो साइबेरिया में कोई न बचता।उसका ऐसा तर्क सुनकर कई लोग वहीँ ज़मीन पर लोट गए।सुनते हैं कि अफसर के इस रह्स्योद्घाटन के बाद सरकार साइबेरिया जाने के लिए आम आदमी को अनुदान देने पर विचार भी कर रही है।इस बयान के बाद कई अफसरों ने वातानुकूलित गाड़ियों में बैठकर ठण्ड से काँपती राजधानी का रात में निरीक्षण भी किया और यह पाया कि पुलों के नीचे और सड़कों के किनारे लोग बड़े ही आराम से सोये पड़े हैं।यहाँ तक कि उनकी नींद तब भी नहीं टूटी जब किसी साहबजादे की गाड़ी उनमें से कुछ को रौंदकर चली गई।इससे स्पष्ट होता है कि ठण्ड से मरने वाली बात निहायत बेतुकी है।

नेता जी खुश हैं कि उनकी सरकार चल रही है।अफसर खुश हैं कि सरकार उनकी सुन रही है और जनता खुश है कि सरकार उन्हे मरने पर भी अनुदान दे रही है।कम से कम इसी बहाने वह साइबेरिया तो देख लेगी।


 

 

शनिवार, 30 नवंबर 2013

कुर्सी वाले साहब !


30/11/2013 को हरिभूमि में
 

कुर्सी पर बैठने वाले साहब ही होते हैं,यह तब और पक्का हो गया जब खबर आई कि वे जिस पर बैठे थे ,वह नीलामी की हक़दार हो गई ।इससे साहब के रुतबे को चार चाँद लग गए और वे बड़ी कुर्सी की ओर दो इंच और सरक गए।इस कुर्सी की कीमत तय करेगी कि साहब की मार्केट-वैल्यू क्या है ? उनके बन्दों ने फ़िलहाल उस सौभाग्यशाली कुर्सी के ऊपर पाँच लाख का दाँव लगा रखा है।यह कीमत साहब के ‘टाइम’ के ऑनलाइन सर्वे में नॉमिनेट होने से पहले की है,इस लिहाज़ से अब इसमें और बढ़ोत्तरी हो सकती है।नीलामीकर्ता अब उस कुर्सी पर ‘टाइम-इफेक्ट’ का टैग लगाकर मनचाही कीमत वसूल सकते हैं।फ़िलहाल,जिन लोगों की निष्ठा महज़ कुर्सी तक होती है,वे साहब के ‘कुर्सी-त्याग’ की कीमत से अपनी हैसियत का अंदाज़ा लगा सकते हैं।

कीमत कुर्सी की नहीं उस पर बैठने वाले की होती है।यूँ तो कुर्सी पर मास्टर जी भी विराजते हैं पर उनकी कुर्सी की कीमत टका भर की नहीं है।न मास्टर जी के बच्चे और न ही सरकार उनकी कुर्सी के अवमूल्यन पर चिंतित है।इसकी सीधी वज़ह यही है कि मास्टर जी साहब नहीं हैं।उन्हें हर कोई घुड़क देता है।जो व्यक्ति अपनी इज्ज़त नहीं सुरक्षित रख सकता ,वो बेचारा कुर्सी को क्या खाक संभाल पायेगा ? कुर्सी-कुर्सी में भी तो फर्क होता है।मास्टर जी की कुर्सी का दायरा एक कक्षा तक सीमित है जबकि साहब की कुर्सी अपने लिए इच्छित स्पेस बना सकती है,उसके आगे खुला आसमान है।जहाँ मास्टर जी का सौभाग्य है कि वे कुर्सी पर बैठ पाते हैं,वहीँ कुर्सी का सौभाग्य है कि उसमें साहब विराजें और उसे सिंहासन में तब्दील कर बाज़ार के लायक बना दें।यह मामला दो कौड़ी बनाम लखटकिया ग्लैमर का है,जिसे समझना आम आदमी के बस का नहीं है

साहब कोई आम साहब नहीं हैं।पढ़-लिख के साहब बनने वालों को अब कोई पूछता भी  नहीं,इसलिए उनकी कुर्सी भी अपनी किस्मत पर रोती रहती है।साहब का संसर्ग पाने वाली कुर्सी धन्य है।पहली बार कोई ब्रांड और यूएसपी वाले साहब ने उसको कृतार्थ किया है।साहब की यूएसपी है कि उनको सुनने के लिए टिकट लगती है,स्पीच बिकती है।वे चलते-चलते रास्ते में अपना लालकिला बना लेते हैं,रोज नया इतिहास गढ़ते हैं।ऐसे जादूगर साहब अपने बन्दों की तालियाँ पाकर सातवें आसमान में हैं।इतने बड़े पैकेज के साथ वे जिस कुर्सी पर बैठेंगे,वह क्योंकर न इतराएगी ? उसी कुर्सी को नीलामी में हासिल कर साहब के बंदे भी अगली पीढ़ी का निर्माण आसानी से कर सकेंगे।

कुर्सी मिलना बहुत बड़े पुण्यों का फल होता है।कई लोग अपना पूरा जीवन लगा देते हैं पर उस तक पहुँच नहीं पाते।कुछ निकट आते हैं तो दूसरे उसे सरका देते हैं।पुण्याई से कुर्सी पाने वालों की संख्या बहुत कम है।अधिकतर मामलों में बढ़िया मैनेजमेंट और शतरंजी चालों से ही कुर्सी हथियाई जाती है।इसमें ‘गन्दी-गन्दी-गन्दी बात’ जैसा कुछ भी नहीं होता।बड़ी और मार्के की बात यही है कि कुर्सी पर उसी का हक बनता है जो इस पर बैठकर इसकी कीमत बढ़ाये;और आज किसकी कीमत अधिक है,यह बाज़ार के हाथ में है।इसलिए जिस कुर्सी पर सबसे ज्यादा सट्टा या दाँव लगे,वही कीमती है।सभी लोग जहाँ पाने वाली कुर्सी की कीमत लगाते हैं,वहीँ साहब जिस कुर्सी पर विराजमान हो जाते हैं,उसी का बाज़ार-मूल्य बढ़ जाता है।इससे यह साबित होता है कि कीमत कुर्सी की नहीं,साहब की है।सोचिये,जिस कुर्सी पर बैठने के लिए देश की कई पुण्यात्माऐं व्यग्र हैं,उस पर साहब बैठ गए तो वह कितनी कीमती हो जाएगी ! ऐसी पायेदार बड़ी कुर्सी साहब की पकड़ के बिना कब तक दो कौड़ी की बनी रहती है,यही देखने वाली बात है !

एब्सोल्यूट इंडिया में १/१२/२०१३ को
 

बुधवार, 23 अक्टूबर 2013

काश ,मुझे कोई सपना आए!

जनसंदेश में 23/10/2013 को।
सपने फ़िर से चर्चा में हैं। एक साधु ने हाल ही में सपना देखा कि फलां जगह सोने का खजाना गड़ा है । खजाना अभी हाथ नहीं लगा है पर उसको लेकर कई लोग सपने देखने लगे हैं। खजाना मिलने पर देश का बहुत सारा क़र्ज़ निपटने का सपना मीडिया भी दिखा रहा है। कुछ दिन पहले कुछ नेताओं के सपने भी चर्चा में छाये हुए थे। कोई सपनों में प्रधानमंत्री बन रहा था तो कोई अपने को इस स्थिति में बता रहा था कि वह सपने नहीं देखता,उन पर डायरेक्ट अमल करता है। कुछ बाबा लोग भी सपने देखते,दिखाते हुए धरे गए थे।

सपनों को लेकर की जा रही चर्चाओं ने मेरी बेचैनी फ़िर से बढ़ा दी। आखिर सपने मुझे क्यों नहीं आते ? क्या मुझे कोई बीमारी है यह सोचकर नुक्कड़ वाले डॉ. झोलाराम के यहाँ अपनी परेशानी लेकर पहुँच गया । वे आँखें मूँदे कुर्सी पर अधलेटी मुद्रा में पड़े हुए थे। हमारी आहट पाकर डॉक्टर साहब उठ बैठे और अपने आले को टटोलने लगे। मुझे प्रत्यक्ष पाकर कहने लगे,’मुझे अपने सपने पर पूरा भरोसा था और तुमने उसे सच कर दिखाया’। इतना सुनते ही मेरी धड़कन और बढ़ गई। अब यहाँ भी सपने की बात ? साधु,नेता,डॉक्टर सभी को सपने आ रहे हैं फ़िर मुझे क्यों नहीं ?

डॉक्टर झोलाराम ने मेरी चिंतन-प्रक्रिया को भंग करते हुए पूछा,’क्या परेशानी है आपको ?’ ‘डॉ. साहब,बहुत दिन हुए ,मुझे कोई सपना नहीं दिखा। क्या यह कोई गंभीर बीमारी है ? मैंने डरते-डरते ही पूछा। डॉ. साहब ने मुझको ऐसे घूरा जैसे मुझे कोई बड़ी संक्रामक बीमारी हो। उन्होंने मेरी आँखों की पुतलियों को कई बार उलट-पुलटकर देखा। अंत में गंभीर होते हुए बोले,’आप को नींद बहुत आती है। आपकी आँखों से लगता है कि आप हमेशा घोड़े बेचकर सोते हैं,इसलिए ऐसी नींद में किसी सपने के लिए गुंजाइश नहीं है। इतना सोना स्वास्थ्य के लिए भले ही हितकर हो,पर सपनों के लिए ठीक नहीं। ’ 'मगर डॉ.साहब, क्या करें ? खुले आसमान में मच्छरों का संगीत सुनते हुए गहरी नींद आ जाती है। बस,यह ससुरा सपना ही नहीं आता। ’

डॉ. झोलाराम ने अब मेरे पेट पर हाथ फिराया। कहने लगे,’सपने न आना तुम्हारी वंशानुगत बीमारी है। मुझे  तो लगता है कि तुम्हारी कई पीढ़ियों ने कोई सपना ही नहीं देखा है। इसकी दवा मेरे पास नहीं है। आप चाहें तो सरपंच जी से मिलकर ‘मनरेगा’ का जॉब-कार्ड बनवा लें। सपने की गारंटी नहीं है, पर देह में पेट का एहसास जरूर हो जायेगा। ’यह सुनकर मैं निराश हो गया। लौटते-लौटते डॉ. साहब से पूछ ही लिया कि आखिर सपने देखने का कोई उपाय तो होगा ? डॉ. झोलाराम ने ज़ोर देकर कहा कहा,’उपाय तो है,पर यह गाँव में रहकर नहीं हो सकता। सपने देखने के लिए पहले जमीन तैयार करनी पड़ती है । बड़े शहर में जाओ। वहाँ सोने से पहले बड़े मॉल के चक्कर लगाओ। वहाँ की हर दुकान पर भरपूर नज़र डालो। बस,कीमत मत पूछना,नहीं तो सपना भी नहीं आएगा। किसी नेता के फार्म-हाउस या बाबा के आश्रम का फेरा भी नियमित रूप से लगाओ,तभी कुछ हो सकता है। ’

डॉ. साहब का यह नुस्खा लेकर घर लौट आया हूँ। तब से शहर जाने के इंतजाम में लगा हूँ। सोच रहा हूँ  कि अपने जीते-जी शहर जाने का सपना पूरा कर लूँ,ताकि नींद में सोने के खजाने जैसा कोई सपना मुझे भी इस जनम में नसीब हो जाय।
 
 
हरिभूमि में १२/११/२०१३ को

गुरुवार, 3 अक्टूबर 2013

चारे ने बेचारा किया !

जनसंदेश में 3/10/2013 को।

ऐसा जुलुम पहली बार हुआ है। जो काम आम आदमी के वश का नहीं था,उसे नामुराद चारे ने कर दिया। राजनीति को ओढ़ने-बिछाने और उस पर सवारी करने वाले को चारे ने दुलत्ती मार दी है। यह बिलकुल हजम होने वाली बात नहीं लगती कि चारा हजम करने वाले को उसी चारे ने हजम कर लिया। हालाँकि उन्हें कारागार पहुँचने पर परेशान होने की कतई ज़रूरत नहीं है क्योंकि उनके आराध्य की जन्मस्थली भी वही है।

लोग बुढ़बक हैं जो समझते हैं कि उन्होंने अपराध-टाइप का कुछ किया है। राजनीति केवल अवसरों का खेल है,जिसके सामने जो आएगा,उसी से तो वह काम चलाएगा। तब पुराना जमाना था,ज़्यादा समझदार और पढ़े-लिखे लोग थे नहीं। टूजी,पनडुब्बी,कोयला,हेलीकाप्टर इनका नाम नहीं सुने थे। सामने चारा दिखा,चर लिया। अब ये थोड़ी ना पता था कि भ्रष्टाचार की वैतरणी में यह पार भी न लगा पायेगा। लोग तो डूबते में तिनके का सहारा ढूँढते हैं,उनके पास तो चारा था। उन्हें क्या पता था कि बुढ़ौती में यही बेसहारा कर देगा ! अब वे कारागार में चारा-चालीसा का पाठ करेंगे।

कहते हैं कि योद्धा कभी हार नहीं मानता। उसके पास कोई न कोई दाँव मौजूद रहता है। फ़िर वे तो राजनैतिक योद्धा ठहरे। उनके पास कई गुप्त दाँव होते हैं। वे कारागार भी गए हैं तो जनसेवा के लिए ही। यह सेवा उनसे कोई नहीं छीन सकता है। जो लोग ऐसा सोचकर उछल रहे हैं,वे नादान हैं। अब उनके पास चारा न सही,रबड़ी तो है ,उसी से काम चलाएंगे। इसलिए उनके प्रशंसकों को दुखी होने की ज़रूरत नहीं है। जब माँ-बेटे मिलकर देश चला सकते हैं तो वह अपनी राजनीति क्यों नहीं ? फ़िर अभी तो वह जिंदा भी हैं !

राजनीति भी कैसे-कैसे मजाक कर लेती है ? जिस व्यक्ति ने राजनीति के कुटिल-खेलों को हँस-हँसकर खेला,मंहगाई और भ्रष्टाचार से दुखी जनता का भरपूर मनोरंजन किया,आज उसी राजनीति ने उसके साथ उल्टा मजाक किया है। कभी किंग-मेकर की भूमिका में रह चुके व्यक्ति को एक जेलर के रहमोकरम पर छोड़ दिया गया है। यह बात चारे के हाजमे से भी कठिन लगती है। यह अकेले भैंस और गायों की साज़िश मात्र नहीं है। इसमें हाथी और शेर जैसे बड़े खिलाड़ी शामिल हैं। उन्हें खुद तो पूरा जंगल साफ़ करना आता है लेकिन अगर कोई घास-फूस जैसा चारा खा ले तो उन्हें  तकलीफ होती है। जनता यह सब समझ रही है,जानवर भी समझ जायेंगे।

चारे ने उनको कितना ही बेचारा कर दिया हो,राजनीति कोई न कोई चारा ढूँढ लेगी। यह संकट एक अकेले उनका नहीं है। जनसेवा करने में ऐसे हाजमा वालों की बहुत ज़रूरत है। चारा हजम करने के बाद आज भले ही गोबर दिख रहा हो,मगर यहीं गोबर आगे चलकर प्रचंड ईंधन का काम करेगा। एक सबक इस मामले से और मिलता है कि राजनीति में मजबूत हाजमे वालों की ही पूछ रहेगी। गाय की पूँछ पकड़कर वैतरणी पार करने वाले कभी भी चूक सकते हैं।

फ़िलहाल, जानवर अपने चारे को गोबर बनता देख रहे हैं और आम आदमी उस गोबर से बनते अपने भविष्य को, जो बहुत दिनों से कारागार में कैद है।

हरिभूमि में 4/10/2013 को प्रकाशित।

मंगलवार, 17 सितंबर 2013

सपनों का पूरा होना !

हरिभूमि में १७/०९/२०१३ को
Welcome To National Duniya: Daily Hindi News Paper
१७/०९/२०१३ को 'नेशनल दुनिया' में !

 

 
आखिरकार उन्होंने लाल किले से चढ़कर भाषण दे ही दिया। ऐसा करके उन्होंने साबित कर दिया कि सपने देखना नहीं चाहिए,जितनी जल्दी हो ,उन पर अमल कर अपनी मुराद पूरी कर लेनी चाहिए । समय भी बड़ा कठिन है,पता नहीं, कब कौन किसको गच्चा दे जाए ? थोड़े दिनों पहले ही उनको यह आभास हो गया था कि सपने देखने से आदमी बर्बाद हो जाता है। उनका यह कहना अकारण भी नहीं था। यह उन्होंने लम्बे अनुभव से सीखा है। वे अपने अग्रज के सपने देखने और उनका हश्र बखूबी समझ चुके हैं,इसलिए कोई जोखिम  नहीं उठाना चाहते थे। यह सपने देखने का नहीं पूरा करने का समय था,इसलिए उनके अनुयायी जी-जान से इस काम में जुट गए हैं।

सपनों में ताजमहल बनाने की कोशिशें कई लोगों ने की हैं और कुछ लोगों ने उसे मूर्त रूप भी दिया है। लाल किले पर चढ़कर झंडा फहराने का सपना भी आज़ादी के बाद से लगातार देखा जा रहा है,पर उसे मूर्त रूप देने की कोशिश किसी ने नहीं की। चूँकि वे सबसे अलग दिखने वाली पार्टी के नेता हैं और फेंकने के काम में महारत हासिल कर चुके हैं ,इसलिए यह उनके ही बूते की बात थी कि लाल किले पर चढ़कर बोलने की कल्पना को साकार कर दिया जाए। खबर है कि देश का कारपोरेट उनके साथ है,इसीलिए उनके इस काम में कोई मुश्किल भी नहीं आई ।

वैसे तो उनका रथ समय से काफ़ी पहले दिल्ली की ओर कूच कर चुका है पर उनकी पार्टी के ही कुछ लोगों की मंशा ठीक नहीं है। बार-बार लग रही अड़ंगेबाजी से तंग आकर असली लाल किला पहुँचने से पहले ही बीच रास्ते में उनके भक्तों ने एकठो लाल किला बनवा दिया । वे उस पर चढ़कर अपने अंदरूनी और बाहरी विरोधियों को संकेत देना चाहते थे कि वे केवल फेंकते ही नहीं, ’फेकलाल किले पर चढ़ भी सकते हैं। उनके इस कदम की भनक उनके अग्रज को भी नहीं लगी । अब वे बैठे माथा पीट रहे हैं कि मुआ,यह आइडिया उनके दिमाग में क्यों नहीं आया ? उनके तो नाम में भी लाल लगा है ।

बहरहाल,वे भी अब लाल किले से बोलने वाले नेता बन गए हैं। कुछ लोगों को लगता है कि वह तो नकली था,सो उससे क्या ?जो असली लाल किले से बोलते हैं,उन्होंने कौन-सी क्रांति ला दी ? लाल किले पर चढ़कर बोलने से किसी की आत्मा पर किसी प्रकार का दबाव नहीं बनता और न ही बोले हुए को पूरा करने का दायित्व होता है। जब बोलने का हश्र दोनों जगह एक जैसा ही होना है तो क्या फर्क पड़ता है असली और नकली लाल किले में ?इसलिए वे तो बोलकर ही खुश हैं।

उनके कुछ सलाहकारों ने सलाह दी है कि जब तक दिल्ली दूर है,गाँधीनगर को ही दिल्ली का नाम दे दिया जाय। इसके साथ ही वे सामने वाली गली का नाम 'रेसकोर्स रोड' रख कर तथा अपने आवास पर प्रधानमंत्रीकी नामपट्टिका लगाकर सपनों के पूरे होने का अहसास कर सकते हैं।

 

 

सोमवार, 2 सितंबर 2013

वह सुबह कभी तो आएगी !


२/९/२०१३ को हरिभूमि में
 
रुपये के रोज़ रसातल में जाने की और सोने के सातवें आसमान में पहुँचने की खबरों से हमारी बेचैनी बढ़ रही है। हमें लगता है कि इसका कारण हमारे दिल का कमज़ोर होना ही है। अभी तक इस बात की कोई खबर नहीं मिली कि इन खबरों से सरकार की तबियत खराब है। इस रोजाना की उठापटक से दूर सरकार के सभी सलाहकार बंकरों में सुरक्षित बैठे हुए हैं। वे सरकार की आर्थिक नीतियों को लेकर अभी भी निश्चिन्त हैं। जनता भी सरकार की मुस्तैदी की कायल हो चुकी है। उसे लगता है कि उसकी सरकार सब संभाल लेगी। सँभालने वाले समझ रहे हैं कि रुपया,सेंसेक्स और सोने के भाव अपने आप ठिकाने पर आ जायेंगे ,ये केवल ‘दिनन का फेर’ है। सारी गलती अख़बारों की है जो विकास की खबरों के बजाय गिरते हुए रूपये के पीछे पड़े हैं। डॉलर की गुगली से रुपया बार-बार बीट हो रहा है पर उसके उद्धारक पवेलियन में बैठे इस बात का इंतज़ार कर रहे हैं कि वह कम से कम शतक लगा ले तो फील्ड पर आयें। इसलिए हम जैसे कमज़ोर दिल वाले दर्शकों का भले ही रोज़ कलेजा बैठ रहा हो,देश के कप्तान को लगता है कि वे बिना कुछ कहे और किए ही बाजी जीत लेंगे।

देश में रूपये की हालात पर बेजा चिंता जताई जा रही है। ऐसे रूपये का गिरना तो स्वाभाविक ही है जिस पर गाँधी बाबा की पुरानी फोटो लगी हुई है। वे देश के जननेताओं के मानस से कब के उतर चुके हैं,अब अगर नोटों से भी जितनी जल्दी उतर जांय,ठीक रहेगा। आज़ादी के बाद उनके बताये अनुसार देश चलता तो ठीक से खड़ा भी नहीं हो पाता । इस सचाई को हमारे कर्णधारों ने जल्द पहचान लिया और उनके विचारों को खूँटी पर टाँगकर उनकी फोटो को अपना लिया। इसीलिए हर सरकारी दफ्तर में गाँधी जी निगहबानी करते मिलते हैं। अब उन्हीं की आँखों के सामने उनके अनुयायी नए भारत का निर्माण करने में जुटे हैं। जाहिर है यह एक कठिन प्रक्रिया है,पर वे गिरकर भी इसका निर्वाह करने में तत्पर हैं।

अगर रुपया गिर रहा है तो सोना छलाँग लगा रहा है। इन दोनों बातों से आम आदमी खुश और बेफिक्र है। रुपया तो उसके हाथ में पहले से ही नहीं रहा,तो उसके गिरने और बने रहने से उसे कोई अंतर नहीं पड़ता और रही बात सोने की तो वह इसकी भरपाई ख़ूब नींद लेकर कर लेता है। सोना हाथ में होने पर उसको खटका बना रहता है ,इसलिए अच्छा है कि सोना सातवें आसमान में ही रहे। इस रहस्य को हमारी सरकार भी जान गई  है। हो सकता है,इसी वज़ह से उसने ‘खाद्य-सुरक्षा’ की चादर ओढ़ ली हो और सोने की खोज में सातवें आसमान में हो। अब वह रूपये को तभी तो संभाल पायेगी,जब सोने से फुरसत पायेगी ।

देश को यकीन हो न हो,पर सरकार निश्चिन्त है कि किसी सुबह अख़बारों में वह खुशहाली की खबर पढ़ लेगी। सबकुछ अपने आप ठीक हो जायेगा। चिंतित लोग केवल उस सुबह का इंतज़ार करें !

गुरुवार, 1 अगस्त 2013

देश-सेवा के लिए टेंडर !

2/8/2013 को हरिभूमि में !
कल्पतरु एक्सप्रेस में 01/08/2013  को

जनवाणी की रविवाणी  में ०४/०८/२०१३ को Photo: जनवाणी में आज की रविवाणी .....सूचना दी निर्मल गुप्त जी ने।


देश-सेवा को ठेके पर देने का आयोजन चल रहा था। हाईकमान जी इस नाते बहुत व्यस्त थे फ़िर भी  वे चौकन्ने और सक्रिय दिख रहे थे। अपने मातहतों से वे पल-पल का अपडेट ले रहे थे। ऐसा आयोजन पाँच या छः साल में एक बार आता है इसलिए गहमागहमी ज़्यादा थी। यह आयोजन कई लोगों की मुरादें पूरी करने वाला होता है। हाईकमान ने किसी भी अव्यवस्था से बचने के लिए काफ़ी-कुछ पहले से ही तय कर रखा था पर ठेके का अंतिम सूचीपत्र यहीं तैयार होना था। सबको अपना-अपना वज़न साबित करने का बराबर मौका मिल सके,इसके लिए विशेष व्यवस्था की गई थी। इसका फौरी फायदा यह था कि हर बन्दा अपना वजन बेझिझक दिखा सके। सारा आयोजन हाईकमान जी के विशेष कक्ष में नियत समय पर शुरू हुआ।

विशेष कक्ष के बाहर एक बड़ा-सा तम्बू लगा था,जिसके नीचे सारे संभावित जनसेवक इकठ्ठा थे। हाईकमान के भरोसेमंद लोग उनसे दसबंद-जैसा कुछ लेकर कक्ष में जाने की पात्रता प्रदान कर रहे थे। अंदर हाईकमान जी के अलावा दो सहयोगी भी थे,जो इस चयन-प्रक्रिया को सुचारू रूप से चलाने में सहयोग दे रहे थे। साक्षात्कार की शुरुआत एक मोटे जनसेवक से हुई। उनकी आँखों से देश-सेवा की ललक टपककर बाहर आने को आतुर थी। हाईकमान जी ने सहयोगी से उनकी समर्पण-भावना का मूल्यांकन जानना चाहा। सहयोगी ने निवेदन किया,’ये हमारे बड़े पुराने कार्यकर्त्ता हैं। पिछली बार के चुनाव में इन्होंने पार्टी के सेवकों पर पचास करोड़ खर्च कर दिए थे। अब जब इनके ही हाथों देश-सेवा करने की बात है,सौ करोड़ तो आराम से निछावर कर देंगे। ’हाईकमान जी ने उनको ऊपर से नीचे तक निहारा। जब उनको लगा कि वाकई उनकी देह देश-सेवा का बोझ उठा लेगी तो सवाल किया कि वे कितना गिर सकते हैं ?संभावित जनसेवक ने पूरी सहजता से उत्तर दिया,’जितना आप कयास लगा सकते हैं उससे भी दो इंच ज़्यादा । ’ ‘पर आप यह सब कैसे करेंगे ? हाईकमान जी ने शंकित नजरों से उनकी ओर देखते हुए पूछा।

अब संभावित जनसेवक खुलकर बोलने लगे। उन्हें हर हाल में देश-सेवा करनी थी । यह मौका गंवाने का जोखिम वे नहीं उठा सकते थे। उन्होंने अपनी बात को साफ़ किया,’ मैं गिरने –गिराने के खेल का माहिर खिलाड़ी हूँ। बचपन में कबड्डी खेलते हुए मैंने कई बार साथियों को टंगड़ी मारकर गिराया था । थोड़ा समझदार होने पर सड़कों की ठेकेदारी पाने के लिए विरोधियों को गिराया। कोतवाल से मिलकर कई दुश्मनों को एनकाउंटर में गिराया। दरअसल ,मैं पैदाइशी गिरा हुआ हूँ। जब से सुना है कि रुपया बहुत गिर गया है तो उसे उठाने को बेचैन हूँ। इस काम के के लिए मुझ गिरे हुए से ज़्यादा उपयुक्त कौन होगा ?’ हाईकमान जी होने वाले जनसेवक को पहचान चुके थे। उन्होंने सुझाया ,’ आप अभी से सरकार में शामिल होकर देश-सेवा शुरू कर सकते हैं। हमें इस समय रूपये को उठाने वाले की बड़ी दरकार है। इसके लिए आप दो सौ करोड़ के अनुदान का और शाम को होने वाले शपथ-ग्रहण के लिए नए सूट का इंतजाम कर लें। ’

चयनित जनसेवक ने हाईकमान जी को साष्टांग प्रणाम कर अपने गिरने का ताज़ा सबूत दिया और वे देश-सेवा का अवसर पा खुशी-खुशी कक्ष से बाहर आ गए।

इस बीच सहयोगी ने अगले जनसेवक को कक्ष में बुला लिया और बाकी अपनी बारी का इंतज़ार करने लगे।

शुक्रवार, 19 जुलाई 2013

ये दाग वाकई अच्छे हैं !


१९/०७/२०१३ को हरिभूमि में !
 

नेता जी कई दिनों के बाद शहर से गाँव आए थे।उनसे मेरी मुलाकात हुए अरसा बीत चुका था। पिछली बार वे आम चुनावों के समय आए थे और क्षेत्र के लिए काफ़ी फ़िक्र भी जताई थी। चुनाव जीतने के बाद वे सबकी फ़िक्र के वास्ते राजधानी में ही स्थाई रूप से बस गए थे।चुनाव फ़िर से सिर पर आ गए तो मुझे अंदेशा हुआ कि कहीं वे फ़िर से फिक्रमंद तो नहीं हो गए ? उनसे मिलने की उत्कट इच्छा लेकर जब मैं उनके प्रासाद पहुँचा तो संतरी ने बताया कि साहब अभी चिंता में ग्रस्त हैं,वे किसी से नहीं मिल रहे हैं।मैंने उसे यह बताया कि उनकी चिंता को ही दूर करने के लिए आया हूँ,तो उसने मुझे झट से अंदर प्रवेश करा दिया।

नेता जी ड्राइंग रूम में ही दिख गए ।वे शीर्षासन कर रहे थे।मुझे लगा कि वे अपनी चिंता को योगाभ्यास के द्वारा निर्गत करने में तल्लीन हैं,पर यह मेरा भ्रम साबित हुआ।नेताजी पूरी श्रद्धा के साथ हाईकमान के चित्र के सामने दोहरे हुए जा रहे थे।वातावरण में अगरबत्ती और लोबान की गंध व्याप्त थी। वे कुछ बुदबुदाए जा रहे है थे।आहट पाकर नेताजी सहज अवस्था में लौट आए और मुझे सोफ़े पर बैठने का इशारा किया।उनका शरीर पसीने से तर-बतर था।वे ज़मीन पर ही पसर गए।नेताजी से अपनापा दिखाते हुए मैंने उनके चेहरे पर आए पसीने का असली कारण पूछा ।

’क्या बताऊँ पत्रकार जी  ? अब तो लगता है सारी पुण्याई ही अकारथ जायेगी।हमने जनता की सेवा करने का सनातन काल से जो टेंडर लिया हुआ है,उसमें अचानक व्यवधान पैदा हो गया है।अब हमें जनता के लिए संघर्ष करने से भी रोका जा रहा है।यहाँ तक आने के लिए हमने लाठी-गोली खाई और खिलाई है।दसियों बार जेल गए हैं,सजा काटी है।हमारी सत्ता कारागार से ही निकलती है ।जेल तो हमारा दूसरा घर है पर इसको अब दाग कहा जा रहा है।भला बताओ,यह सब करके ही हम सेवा करने के लायक हुए हैं ,फ़िर हम दागी कैसे हुए ?’नेता जी ने बड़ा गंभीर प्रश्न उछाला था।

मैंने उन्हें आश्वस्त करते हुए बताया,’बस ,इत्ती-सी बात ! आप तनिक भी परेशान न हों।आपके दल के प्रवक्ता से मेरी आज ही बात हुई है।उसने बताया है कि सभी दल देश पर आए इस संकट के समय एक साथ हैं।सबमें आम सहमति है कि अगर यह फार्मूला लागू कर दिया गया तो देश बिलकुल अनाथ हो जायेगा,यहाँ की उर्वरा जमीन बंजर हो जायेगी।अपराध का क्षेत्र राजनीति की नर्सरी है,ऐसे में हम नेता कहाँ से लायेंगे ? अभी इस क्षेत्र में एफडीआई भी नहीं लागू की गई है।इसलिए आप बेख़ौफ़ जनता की सेवा करते रहें।’पर यह होगा कैसे ? बड़े ‘कोरट’ ने तो कह दिया है ?’नेता जी अभी भी आशंकित लग रहे थे।मैंने आखिरी समाधान प्रस्तुत करते हुए बताया कि कानून बनाने  वालों को खुद से ज़्यादा जनता की चिंता है,इसके लिए वे ज़रूरी कदम उठा लेंगे।उन्होंने जो पिछले कई सालों से जनता में निवेश किया है ,उसको यूँ ही जाया नहीं होने देंगे।इसलिए आपके जो भी दाग हैं,अच्छे हैं।इन पर शर्म नहीं, गर्व करने का समय है।

मेरी बात सुनकर नेताजी धरती पर ही लोटने लगे।अगरबत्ती और लोबान की महक अचानक तेज हो गई थी और सामने रखा हाईकमान का चित्र धीरे-धीरे मुस्कराने लगा था।

'कल्पतरु एक्सप्रेस' में  23/07/2013 को !

दैनिक ट्रिब्यून में ०२/०८/२०१३ को !

बुधवार, 17 जुलाई 2013

कव्वाली के ज़रिये भारत-निर्माण !


१७/०७/२०१३ को जनसंदेश में !
 


दिन-भर का थका-हारा कल शाम जब घर पहुँचा तो देश के ताज़ा हालात जानने के लिए मैंने टीवी खोल लिया।जब भी उदासीन होता हूँ,न्यूज़-चैनल लगा लेता हूँ।हर चैनल पर चुनावी-कव्वाली का सीधा प्रसारण देखकर सारी थकान फुर्र हो गई।यहाँ पेश हैं उसके चुनिन्दा अंश :

‘आपकी धर्मनिरपेक्षता छुपी हुई है।वह हमेशा बुरके की ओट में रहती है पर वोट के मौसम में बाहर झाँक लेती है।’

‘अजी, आप वैसे तो खाकी निक्कर पहनकर पार्कों में घूमते हो पर सत्ता की आहट आने पर बेपर्द होकर सांप्रदायिक-नाच दिखाते हो।इससे तो हमें घूँघट ओढ़ना पसंद है ताकि आपके बोरिंग डांडिया-नृत्य से बच सकें।’

‘आपने देश को कबड्डी में छोड़कर बाकी खेलों में फिसड्डी कर दिया।राष्ट्रमंडल खेलों में खेल से ज़्यादा पैसे बनाने का खेल हुआ था। देश पदक तालिका के बजाय भ्रष्टाचार की रेटिंग में ऊपर रहा।ओलम्पिक में सबसे बुरा हाल है।’

‘और आप तो खेल ही नहीं पाए।देश की छोड़िये, अपने प्रदेश को खेल में कोई उपलब्धि नहीं दिला सके।आप तो एक ही खेल जानते हैं,जिसका जवाब जनता चुनावों के समय देगी।उसकी याददाश्त को हम ताज़ा करेंगे।ओलम्पिक में जो भी खिलाड़ी गए वो सब हमारे थे,आपने तो यह भी नहीं किया ’’

‘पिछले ग्यारह सालों से हमारा प्रदेश ज़बरदस्त विकास कर रहा है।इस बारे में मीडिया ने हमें कई बार प्रमाण-पत्र भी दिया है।जबसे आपने शासन संभाला है ,देश का नाम केवल स्विस बैंक की वजह से आगे रहा है।देश को एक्ट नहीं एक्शन चाहिए।वो सिर्फ़ हमारे पास है।’

‘हम पिछले दस सालों से लगातार भारत-निर्माण में व्यस्त हैं।हम इसको पूरा करके ही दम लेंगे।रही बात आपके विकास की,हमने सारी रिपोर्टें हमने मंगवा ली हैं।’मिड डे मील’ बंटवाने में आपका राज्य औरों से दो प्रतिशत पीछे है,जबकि हम तो अब खाने की पूरी गारंटी दे रहे हैं।हम खुद में और जनता में कोई भेद न करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।इसके ज़रिये हम सबको खाने का मौका मुहैया कराएँगे और फ़िर से आएँगे।यह हमारा एक्शन--प्लान है।’

‘चीन हो या पाकिस्तान,बंगलादेश हो या मालदीव,सबके आगे आप घुग्घू बने रहते हो,अपना मौन व्रत नहीं तोड़ते।इस देश को चुप्पा या ठप्पा-प्रधानमंत्री नहीं चाहिए।’

‘हमारी विदेश-नीति पर उँगली उठाना ठीक नहीं है।हमने कई क्षेत्रों में एफडीआई लाकर अपनी प्रतिबद्धता जता दी है।हम किसी के आगे झुकते हैं तो वह शिष्टाचार-वश ।इसे हमारी कमजोरी न समझी जाय।’

‘आपने शिक्षा में क्या किया। ?दुनिया की पांच सौ टॉप यूनिवर्सिटी में हमारी सिर्फ़ एक है।’

‘हमने शिक्षा के लिए बराबर प्रयास किए हैं।टीवी तक में ‘जागो ग्राहक जागो’ से सबको जगाया है।आपके यहाँ तो शिक्षकों का ही टोटा है।’

‘हम राष्ट्रवादी हिन्दू हैं और पैदाइशी भी।हमें अपनी पहचान तक याद है,आपकी क्या है ?’

‘हम बिना किसी वाद या विवाद के राष्ट्रीय हैं।हम सबमें मिले हुए हैं या यूँ कहिये कि हम बहुरूपिये हैं।’

कव्वाली बड़े रोचक मोड़ पर पहुँच चुकी थी।तभी श्रीमती जी ने व्यवधान डालते हुए टीवी ऑफ कर दिया।तब से मैं सोच रहा हूँ कि ‘भारत-निर्माण’ का काम चरम पर था और यदि श्रीमती जी थोड़ा-सा और सब्र कर लेतीं तो उसी दिन सारा काम पूरा हो जाता।क्या कोई बताएगा कि काम की प्रगति कैसी है ?

 'हरिभूमि' में २५/०७/२०१३ को

बुधवार, 10 जुलाई 2013

बाज़ार में समाजवाद के पहरुए !


 

10/07/2013 को 'जनसंदेश टाइम्स' में !
12/07/2013 को हरिभूमि में
 
 

बाज़ार पहुँचा तो कोहराम-सा मचा था।खरीदारों में ऐसा जोश दिख रहा था,जैसे वे देश की ओर से लड़ने सीमा पर गए हों।वे सब टमाटर लेने के लिए किसी से पीछे नहीं दिखना चाहते थे।बाज़ार की बाकी सब्जियाँ आतंकित दिखाई दीं।मुझे देखते ही उनकी बेचारगी बोलने लगी।सबसे पहले धनिया की हरियाली  में रौनक आई।उसने मेरे कान में फुसफुसाते हुए कहा,’ये जो भी हो रहा है,बहुत गलत है।अगर आप पक्के समाजवादी हैं तो एक टमाटर को इतना भाव देना ठीक नहीं है।उसकी औकात ही क्या है ?’मैंने धनिया के कंधे पर हाथ रखकर उसे सहलाते हुए बताया,’ टमाटर के योगदान को मत भूलो।तुम तो केवल पूरक का काम करती हो,जबकि टमाटर अपने आप में पूर्ण होता है।वह सबके साथ फिट हो सकता है।उसका स्वतंत्र अस्तित्व भी है।’

पास में बेसुध पड़ी मटर अचानक बोल पड़ी,’उसमें ऐसी क्या खासियत है जो हम सबमें नहीं है ? वह आज अपने भाव दिखा रहा है,मैं तो हमेशा सातवें आसमान में रही हूँ।ज़्यादा दिन नहीं हुए जब उसे सड़कों पर फेंका गया था।तब उसके ये चाहने वाले कहाँ चले गए थे ?’मटर की नाराज़गी पर पानी डालते हुए मैंने उसे समझाया,’तुम तो पब्लिक का सामना करती नहीं हो।तुम्हारा काम केवल रसोई तक सीमित है जबकि टमाटर को रसोई से लेकर सड़क तक,कवि-सम्मेलनों से लेकर हमारी सभाओं तक प्रहार झेलने होते हैं।वह हमारे अन्तः और वाह्य दोनों प्रकार के स्वाद का कारण बनता है।इसलिए उसकी निष्ठा असंदिग्ध है।घर-बाहर उससे हमारी कहीं भी मुठभेड़ हो सकती है,मेरी तरह वह भी पक्का समाजवादी है।’

तभी भिंडी ने प्याज को उकसाते हुए कहा,’क्या तुम्हें कोई तकलीफ नहीं है ? टमाटर की इतनी हैसियत बढ़ना हम सबके अस्तित्व के लिए खतरा है।तुम इसके विरोध में अपना भाव क्यों नहीं बढ़ाते ?’मेरे कुछ कहने से पहले ही प्याज ने छिलके उतारते हुए जवाब दिया,’ऐसा है बहन ! मैं अपने भाव बढ़ाकर किसी को एकाध बार ही सत्ता से बाहर कर सकता हूँ,बार-बार नहीं।इस काम में भी मेरे छिलके उतर जाते हैं।रही बात टमाटर की ,सो नेता जी ठीक कहते हैं।इनकी सभाओं में जब टमाटर फेंके जाते हैं,सीधे नेताजी की देह का स्पर्श करते हैं।अब इनकी देह पारसमणि से कम थोड़ी है।इसिलए टमाटर भी इनका संसर्ग पाकर आज आम पब्लिक से दूर है।इसके भाव बढ़ने से चुनावी-माहौल में नेताजी को बड़ी राहत मिलेगी।यह जानबूझकर टमाटर से बचना चाहते हैं।’

प्याज से ऐसी हरकत की मुझे आशंका थी,इसलिए मैंने विषय बदलते हुए बैंगन का उदाहरण दिया।उसकी जन-सेवा की भावना को टमाटर से ज़्यादा बताते हुए कहा,’बिना किसी भेद-भाव के बैंगन इधर-उधर लुढ़कता रहता है।यह पूर्णतः शर्मनिरपेक्ष और समाजवादी है।इसीलिए इसका महत्व हर काल में रहा है।रही बात इसके भाव की,ज़रूरतमंद स्वयं खुशी-खुशी इसको बख्शीश दे देते हैं।इसलिए सबकी थाली में यह सुलभ रहता है।’मेरी बातें सुनकर बैंगन कुछ बोला नहीं,बस मंद-मंद मुस्कुराता रहा।

अचानक हरी मिर्च ने सूचना दी कि टमाटर के खरीदार मुझे ही खोज रहे हैं।मुझे इसमें अपने किसी विरोधी की साजिश समझ में आई।मैंने सोचा,अभी अगर यहाँ रुका तो सारे टमाटर मुझे ही समर्पित कर दिए जायेंगे और बाज़ार में इनका अकाल पड़ जायेगा।मैं बाहर निकलने की जुगत में लगा ही था कि तब तक टमाटर की आवाज़ आई,’मेरा प्रणाम तो स्वीकार कर लो।मैं पब्लिक के झोले के बजाय आपके गोल-मटोल बदन से लिपटना चाहता हूँ।’ किसी अप्राकृतिक कृत्य की आशंका से अपने को बचाने के लिए मैं वहाँ से तुरंत अदृश्य हो गया।

शुक्रवार, 5 जुलाई 2013

रूपये की आत्म-कथा !


 
05/07/2013 को हरिभूमि में मेरा व्यंग्य....बस नाम बदल गया !
 

मैं आज़ाद भारत का ऐसा प्रतिनिधि हूँ,जिसकी हालत इन दिनों सबसे ज़्यादा खस्ता है।आज हमारे गिरे होने को लेकर बड़ा हल्ला मच रहा है,पर इसमें मेरा रत्ती भर भी कुसूर नहीं है।आज़ादी के साथ ही कई और चीज़ें व प्रजातियाँ अस्तित्व में आईं थीं,जिन्हें मुझसे जीवनदान मिला और वो आज सबसे ऊपर हैं।इसका मुख्य कारण यही है कि इन सबने मुझ पर ही अपने पाँव रखकर चढ़ाई की ।मेरे गिरने की  एकमात्र जिम्मेदार वह खास प्रजाति है,जिसने दिखाने के लिए तो मुझ पर गाँधी बाबा को बिठा दिया पर असल में वही अपने घर-परिवार के साथ मुझ पर सवार हो गई । मुझमें फ़िर भी थोड़ी शर्म बची हुई है जिससे मैं ज़मीन में गड़ा जा रहा हूँ पर उनके बारे में मैं कुछ नहीं कहूँगा जो मेरे बहाने अपनी गिरावट को छुपाये हुए हैं।

मुझे याद है जब शुरू में मैं ‘आना’ था,तब मेरी शुद्धता और सत्यनिष्ठा को लेकर लोग कई तरह की बातें किया करते थे।किसी बात को बल देने के लिए अकसर वे ‘सोलहों आना सच ’की मिसाल देते थे।उस समय किसी के पास ‘आना’ होना,खुशियों का आना होता था।लोग मेला-हाट जाते थे और बच्चों को ‘आना-दो आना’ देकर निश्चिन्त हो लेते थे।’चार आने की पाव जलेबी बैठ सड़क पर खाऊँगी’ या ‘सैंया दिल माँगे चवन्नी उछाल के’ गाने उस समय सबकी जुबान पर रहते थे।इससे साबित होता है कि उस समय ‘आना’ की हैसियत क्या थी।एक और बात ,तब ’आना’ हथेली पर होता था और सामान झोले में जबकि अब हम झोले में होते हैं और सामान हथेली में।

मेरी मुद्रा में तब अप्रत्याशित रूप से बदलाव आया,जब सारी दुनिया में आर्थिक उदारीकरण की हवा चली।इस प्रक्रिया में क्रान्तिकारी परिवर्तन आया और मुझे पाने की चाह में आदमी ने अपने को सामान बना लिया।वह बकायदा बड़े तराजुओं में तुलने लगा।मेरे लिए उसने अपनी बोली तक लगा ली। मुझे लपकने के लिए वह लगातार गिरता गया ।मेरी निकटता में वह अपने नैसर्गिक सम्बन्धों,रिश्तों को भूल गया।हद तो तब हुई जब वह विदेसिया ’डालर’ के तराजू में मुझे तौलने लगा।’डालर’ के ऊपर जहाँ ज्यादा दबाव नहीं है,मेरे ऊपर वह अपने खानदान सहित चढ़ बैठा।अब इसके नीचे दबे-दबे मेरा दम फूल रहा है पर वह हटने को तैयार नहीं है।

अब जब मैं ज़मीन पर आ चुका हूँ,मुझ पर बैठे लोगों ने राहत की साँस ली है। अभी तक उनकी जग-हंसाई हो रही थी,क्योंकि वे इसके लिए किसी भी सीमा तक नीचे गिर सकते हैं ।अब उन्होंने खुद मुझे इतना नीचे गिरा दिया है कि लोग गिरने के मामले में उनके बजाय मेरा उदाहरण दें।अभी तक वो मुझ से पेट भरते थे,अब पीठ पर चढ़कर बैठ गए हैं।देश को आज़ादी मिले कई बरस हो गए और अभी होंगे ,पर मुझे  हिलने-डुलने तक की आज़ादी नहीं है और न होगी।इस मुद्रा में पड़े-पड़े मैं केवल असहाय होकर अपने रहनुमा को देख रहा हूँ,जो छुड़ाने के बजाय मुझे विदेसिया ‘डालर’ के साथ तौलने और स्विस बैंक के हवाले करने में लगा है।मुझे अपने मरने की चिंता नहीं है क्योंकि मुझ पर सवार लोग ही मुझे बचा लेंगे ।ऐसा न होने पर फ़िर वो किस पर अपनी सवारी गाँठेंगे ? इसीलिए मैं अजर-अमर हूँ ।

बुधवार, 19 जून 2013

सेकुलर होने का मौसम !

'कल्पतरु एक्सप्रेस' में १९/०६/२०१३ को
'जनवाणी' में १९/०६/२०१३ को


 


सेकुलर जी बड़ी जल्दी में थे। मिलते ही कहने लगे कि अभी उनके पास समय का घोर अभाव है। हमने उनसे अपनी दोस्ती का वास्ता दिया कि बड़े दिनों बाद आप काम-काज से खाली मिले हो,थोड़ा बतिया लेते हैं। हमारी बात सुनकर वे एकदम से गंभीर हो गए और अपने माथे पर चिंता की कई लकीरें खींचते हुए बोले,’आप हमें खाली समझ रहे हैं,जबकि इस समय हमें खुद से ज़्यादा देश और समाज की चिंता है। अगर हम अभी नहीं चेते तो बड़ा अनर्थ हो जायेगा। इसलिए फ़िलहाल हमें देशसेवा करने से फुरसत नहीं है। ’

उनकी ऐसी दशा को देखकर अपन पशोपेश में पड़ गए। अगर और कोई बात होती तो उसे टाल सकते थे,पर बात मुलुक और समाज को बचाने की थी,सो अपन भी द्रवित हो गए। सेकुलर जी के सुर में सुर मिलाते हुए हमने उवाचा,’आपके रहते यह गज़ब कैसे होने जा रहा है ?हम बातें तो बाद में भी कर लेंगे,पर इस देश पर कौन-सी और कैसे आफत आ गई है ?अब भाईचारे के नाते तो यह खुलासा ज़रूरी है क्योंकि आपकी तरह अपन भी देश की चिंता में हर पल दुबले रहते हैं। ’

हमारे सांत्वना और सहानुभूति के शब्द सुनकर सेकुलर जी बुक्का-फाड़ कर रोने लगे। उन्होंने सिसकते  हुए अपना बयान दर्ज़ कराया,’देश के सेकुलर ढाँचे को ध्वस्त करने के लिए अचानक गिरोहबंदी तेज हो गई है। सबसे दुःख की बात यह है कि इस काम में हमारे सहयोगी सबसे आगे हैं। वे ऊपर से तो दुआ करते हैं कि सेकुलर जी जिंदा रहें पर दवा ऐसी देते हैं कि हम समूल नष्ट हो जांय। ’ ‘पर बहुत समय से तो आप उनके साथ हैं फ़िर भी उन्हें पहचान नहीं पाए ?’अपन ने विस्फारित नेत्रों से सवाल किया। सेकुलर जी ने इसका रहस्योद्घाटन करते हुए बताया कि तब वह नादान थे और अपनी जिम्मेदारी को ठीक से समझ नहीं पाए थे। आज वे इस योग्य हो गए हैं कि देश को उनकी सेवाओं की कभी भी दरकार पड़ सकती है। यह तो अच्छा हुआ कि चुनाव जल्द आ गए नहीं तो अभी तक वे दुश्मनों की ही गोदी में बैठे रहते।

अभी भी हम मामले को पूरी तरह समझ नहीं पाए थे। हमने अंदाज़ लगाते हुए ही पूछ लिया,’क्या कोई सांप्रदायिक ताकत आपको परेशान कर रही है ?’ उन्होंने बिलकुल सहज होते हुए उत्तर दिया,’हमारा होना तभी सार्थक है,जब सांप्रदायिक ताकतें बची रहें । वे जितना मज़बूत होंगी,उससे अधिक गति से हमें मजबूती मिलेगी। हम तो स्वयं चाहते हैं कि वे बराबर बनी रहें ताकि उनसे लड़ने का अवसर हमें मिलता रहे । इस बहाने हम देश-सेवा में अपना योगदान कर सकते हैं । देश के लिए जब ज़रूरी हुआ ,हमने टीका लगाया अब टोपी लगाने का समय है तो हम कैसे रुक सकते हैं? देश को हमारी सख्त ज़रूरत है। ’

सारी बात अब हमारी समझ में आ गई थी और सेकुलर जी की आँखों में चमक भी। उनके चेहरे पर परम-शांति के लक्षण देखकर हमें भरोसा हो गया कि अब चाहे जो हो जाए,देश सही-सलामत रहेगा। हमने देखा,तब तक सेकुलर जी उस झुण्ड की ओर बढ़ गए थे,जिधर से आवाजें आ रही थीं,’देश का नेता कैसा हो,बस बिलकुल सेकुलर जैसा हो !’


'हरिभूमि ' में २१/०६/२०१३ को



 

गुरुवार, 6 जून 2013

कल्लो,क्या कल्लोगे ???

जनसंदेश और हरिभूमि में ०६/०६/२०१३ को

Photo: आज 'नेशनल दुनिया' में।
०७/०६/२०१३ को नेशनल दुनिया में !
 

 

‘अजी सुनते हो ? अब टीवी के सामने से उठोगे भी या कहो तो यहीं पर बिस्तर लगवा दूँ ?मैं देख रही हूँ कि पिछले आठ दिनों से तुम एक इस्तीफ़े के इंतज़ार में टकटकी लगाये बैठे हो।आखिर देख लिया ना ! खेल अपनी रफ़्तार से चल रहा है और देश भी।एक तुम्हीं सेंटिया गए थे।नतीजा क्या निकला ? तुम्हारे इस्तीफ़े के चक्कर में ‘नाच इंडिया नाच’ ,‘मास्टर-शेफ’ और ‘सास,बहू,ननद’ सभी छूट गए।अब मैं समझी कि ‘ससुर-दामाद’ का कार्यक्रम इन सब पर कैसे भारी पड़ा।इसलिए तुम भी समझ जाओ और टीवी के आगे से हट जाओ।‘

‘भागवान ! तुम भी ना...! पहले एक कप चाय पिला दो,सर बिलकुल भारी हो रहा है।रही बात टीवी के आगे से हटने की,तो अभी भी मुझे न्यूज़ चैनल वालों और उस पर बहसियाने वालों पर पूरा भरोसा है।कभी भी ब्रेकिंग-न्यूज़ आ सकती है।आखिर इतने दिनों से इस्तीफ़े का दबाव जो है कभी तो वह काम करेगा।‘

‘लीजिए,अपनी चाय पीजिए और पहले अपना दबाव दूर करिये।खेल आप देखते हो पर समझती मैं हूँ।ये जो दबाव वगैरह हैं ना,कमजोर इच्छाशक्ति वाले को डिगाते हैं। वे खेल के असली खिलाड़ी हैं।अपनी आत्मा की मजबूती को वो पहचान चुके हैं।वह सीमेंट से भी ज़्यादा सख्तजान है।इसलिए अब वे कोई नौसिखिए भर नहीं रह गए हैं,घाघ बन गए हैं घाघ।अब घाघत्व प्राप्त व्यक्ति की आत्मा गीता के अनुसार अविचलित,अजर और अमर हो जाती है।जिस तरह वह कभी नष्ट नहीं होती,केवल कपड़े बदलती है,इसी तरह इसने भी कुर्सी बदल ली है।‘

‘क्या बात है ? आज तो बड़ी दार्शनिक बातें कर रही हो।खेल के बारे में इत्ता कुछ तुम्हें पता है,हम तो जानते ही नहीं थे।अच्छा और क्या जानती हो,जरा तफसील से बताओ ना ?’

‘अजी,हमें तो और भी बहुत कुछ पता है।तभी मैं कहती थी कि आप बैठक के नतीजे का इंतज़ार मत करो,वह मुझे पहले से ही मालूम था।खेल की तरह यह बैठक भी फिक्स थी।खेल के घाघ ने राजनीति के घाघों से मिलकर इसकी फिक्सिंग कर ली थी।इस पर भी सटोरियों ने जमकर माल काटा और तुम खेल में लग रहे सट्टे से हलकान हो रहे हो ।‘

‘अब यह क्या कह रही हो ? बैठक पर सट्टा ? वह कैसे ?’

‘अजी ! समाचार तुम सुनते हो पर अंदर की खबर नहीं निकाल पाते क्योंकि तुम्हारे ऊपर तो इस्तीफ़े की ही धुन सवार है ।बैठक से पहले हर चैनल यही खबर दे रहा था कि उसके सूत्रों ने बताया है कि आज इस्तीफ़ा हो जाएगा।देखने-सुनने वालों ने भी यही समझा।हकीकत तो यह थी कि वे सूत्र नहीं सटोरिये थे,जो इस तरह की खबर देकर इस पर भी सट्टा लगवा रहे थे।उन्हीं को पता था कि इस्तीफ़ा नहीं होने वाला।अब जिन्होंने इस्तीफ़ा होने पर दाँव लगाया था,वे चित्त हो गए।इसे कहते हैं असली घाघ ! तुम खेल में फिक्सिंग को लेकर रो रहे हो,उन्होंने बैठक और नतीजे को ही फिक्स कर डाला। कल्लो, क्या कल्लोगे ?’

‘फिलहाल,एक कप चाय और ले आओ।मेरा सिर फटा जा रहा है !’

 
I-next में ११/०६/२०१३ को ! 

बुधवार, 22 मई 2013

जेंटलमेन का तौलिया !

कल्पतरु में ३०/०५/२०१३ को !

 

२२/०५/२०१३ को जनवाणी में !हरिभूमि में २३/०५/२०१३ को !
 

 
 

आईपीएल को खेल मानने वालों का भरोसा उस समय हिट-विकेट की तरह उखड़ गया जब पता चला कि कुछ खिलाड़ी गेंद और बल्ले की जगह तौलिया उछालते हैं ।यह तौलिया कोई साधारण किस्म का अंग-वस्त्र भर नहीं है ।उछलने के बाद यह जब दुहरकर जमीन पकड़ता है तो इसकी मुद्रा भरी हुई झोली की माफिक होती है ।इस बात को सामान्य व्यक्ति समझ भी नहीं सकता है ।इस तरह यह तौलिया देह के पसीने को पोंछने के बजाय अनायास ही ज़िन्दगी का ‘दलिद्दर’ दूर कर देता है।इस गोपन-कर्म पर पता नहीं किसकी नज़र लग गई और जो खिलाड़ी लाखों में खेल रहे थे,वे सलाखों के पीछे हो गए।

कई लोग जो आईपीएल को गहरे से जानते हैं,उनको इस तरह की घटनाओं पर नहीं, उसके सार्वजनीकरण पर चिंता है।जो इस खेल की प्रवृत्ति को जानते हैं,उन्हें इसके खिलाड़ियों की दशा का भी बोध  है।आईपीएल-भक्तों को मैदान में भले ही बाईस खिलाड़ी और दो अम्पायर दिखते हों पर असली खिलाड़ी और अम्पायर तो मैदान के बाहर ही होते हैं।मैदान के भीतर जब कोई विकेट गिरता है या चौका-छक्का पड़ता है,तब खिलाड़ियों की उछल-कूद और चीयर-लीडर का नृत्य बनावटी होता है।असली नाच और अंतिम खुशी तो मैदान के बाहर के खिलाड़ी ही उठाते हैं।

हमारे देश के लोगों में क्रिकेट उसी तरह रच-बस गया है,जैसे राजनीति।लोगों की रूचियाँ इन दोनों में समान रूप से हैं।क्रिकेट के खेल में खिलाड़ी जीत या हारकर पैसा बना लेते हैं पर उनके प्रशंसक मार-पीट सहन करते हैं और हार का सट्टा भी।ठीक यही अनुभव वे राजनीति से भी ग्रहण करते हैं।यानी खेल के दोनों प्रारूपों में आम नागरिक का बलिदान होना तय है ।रही बात क्रिकेट में फिक्सिंग की ,तो वह भी राजनीति के क्षेत्र से आयातित है।राजनीति में जहाँ सांसद बनने या सरकार बनाने को लेकर बड़ी फिक्सिंग होती है,वहीँ क्रिकेट में टुटपुंजिया-टाइप की।इसीलिए अकसर बड़े टाइप की फिक्सिंग क्रिकेट जैसी छोटी-मोटी फिक्सिंग का उत्सर्ग करके अपने को बचा लेती है।

हालिया फिक्सिंग प्रकरण में जिनकी संतई उजागर हुई है,उनका लुक बड़ा मासूम रहा है।कुछ समय पहले जब एक खिलाड़ी ने उन्हें मैदान में थप्पड़ मारा था,उनके आंसुओं से पूरी पिच पानी-पानी हो गई थी।वो उनका ओरिजिनल-लुक था ।अब वही लुक पुलिसिया-पूछताछ में काम आ रहा है।उनसे बस थोड़ी-सी चूक हुई कि जो तौलिया अब तक उनकी निर्दोष छवि की रक्षा कर रहा था,अचानक उन्हें नंगा कर गया।हालाँकि उनकी संतई को बचाने के लिए उनके वकील ने कमर कस ली है और जल्द ही वे अपनी मासूम-लुक की प्राप्ति कर सकेंगे।

आइपीएल की फिक्सिंग की खबर से क्रिकेट बोर्ड बिलकुल अविचलित है।उसने साफ़ कर दिया है कि बोर्ड की साख बहुत मजबूत है,ऐसी घटनाओं से उस पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला।उनके कहने का सीधा मतलब यही है कि जिस खाद-पानी से आईपीएल का वृक्ष तैयार किया गया है,उसकी कोई भी शाख ऐसे छोटे-मोटे बवंडरों से टूटने वाली नहीं है।इसकी बुनियाद ही नीलामी प्रक्रिया के दौरान ठोंक-बजाकर मजबूत कर ली जाती है।इसलिए देश की जनता खेल देखती रहे,वे खेलते और नाचते रहेंगे ।हमारा भी यही कहना है कि खिलाड़ियों को नैतिक तराजू पर न तौलिए,बल्कि उन्हें तौलिए के साथ खेलने दीजिए।क्रिकेट को यूँ ही नहीं जेंटलमेन गेम कहा गया है।इस खेल की पवित्रता को तौलिए से ढंका रहने दीजिए,इसे उघाड़ने की कतई ज़रूरत नहीं है।

बुधवार, 17 अप्रैल 2013

हम बिलकुल बेकसूर हैं,साब !



 
23/04/2013 को कल्पतरु में
'जनसंदेश टाइम्स' में १७/०४/२०१३ को प्रकाशित

वो तो एकदम बेकसूर निकले। यह बात तब पता चली जब उन सभी ने यह ऐलान कर दिया । दरअसल हम सब अभी तक यही समझते रहे कि राजधानी में हुए गैंगरेप में उन्हीं का हाथ है। यह बात हमें भुक्तभोगियों के बयान ,टीवी चैनलों,अख़बारों की रिपोर्टिंग और पुलिस की सतर्क कार्रवाई के ज़रिये पता चली थी। इतने दिनों की थुक्का-फजीहत के बाद उन बेचारों का बयान अब सबके सामने आया है। यह नौबत आज भी न आती ,अगर उन्हें एक परोपकारी वकील साहब न मिलते। सुनते हैं कि उन्हीं की ज़बरदस्त हौसला-अफज़ाई के बाद वो बयान देने लायक हुए हैं,नहीं तो उन बेकसूरों में से एक ने तो कारागार में ही अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली थी। वकील साहब के बार-बार उसे निर्दोष बताने के बाद भी उसे उनकी वक़ालत पर शक था । अगर आज वह जिंदा होता तो,वह भी बेकसूरों की सूची में शामिल होता।

इन बेचारों के बारे में यह महत्वपूर्ण जानकारी हमें तब मिली,जब पेशी के वक़्त जाते समय थोड़ी देर के लिए अचानक उनसे मुलाक़ात हो गई । जिन लोगों पर इस कांड में शामिल होने का आरोप लगा था  ,उसमें एक तो बिलकुल नाबालिग है। उतनी उम्र वाले तक को तो बलात्कार का मतलब ही नहीं पता होता ! यही सोचकर कुछ लोगों ने उसे अपराधी मानने से साफ़ इंकार कर दिया । दूसरे ने फांसी लगाकर यह साबित करने की कोशिश की कि उसे गलत फंसाया जा रहा था। बाकी बचे हुए चार लोगों ने अपने बचाव में बिलकुल नई सच्चाई बताई । उनमें से एक ने कहा है कि वह उस बस में ही नहीं था,जिसमें यह घटना हुई थी। यहाँ तक कि उसने बस में कभी सफ़र ही नहीं किया है ,यह बात उसे अपने वकील साहब के माध्यम से मालूम हुई है।

दूसरे आरोपी ने खुलासा किया ,’साब ! हम तो उस दिन दिल्ली में ही नहीं थे। हमारे गाँव में मनकापुर की नौटंकी का प्रोग्राम था और ऐसे में हम और कहीं क्यूँ जाते ? नौटंकी देखते हुए ही पुलिस हमें धर लाई थी । उस वक्त हमारे दिमाग में ससुरी नौटंकी चढ़ी हुई थी,सो हम कुछ समझ न पाए। अब जाकर वकील साहब ने यह रहस्योद्घाटन किया है कि हमारे खिलाफ यह साजिश है। ’तीसरे आरोपी ने मुँह बनाते हुए जवाब दिया,’साहब ! हमें तो नशे की लत ने मार दिया। उस दिन रोज़ की तरह चौपाल में हम गाँजे की पिनक में लुढके पड़े थे। हमारे कई साथी वहाँ मस्त और बेसुध थे। पता नहीं,कब पुलिसवाले आए और हमको उठा लिया। वह तो भला हो वकील बाबू का,जो उस रात वहीँ से गुजर रहे थे जब हम चिलम फूँक रहे थे। अब उनकी ही गवाही से हम बेकसूर साबित होंगे। ’

बचे हुए चौथे बेक़सूर ने साफ़-साफ़ बताया,’साब ! हम तो पिकनिक मनाने के लिए अंडमान-निकोबार के टूर पर थे। अगले दिन होटल के कमरे में लगे टीवी में हमें पकड़े जाने की खबर मिली। इस बात से हम बेहद डर गए थे और अपने आप वहीँ की जेल में बंद होने जा रहे थे,पर हमारे वकील साहब ने फ़ोन करके हमें बुला लिया कि जेल में हम सेफ रहेंगे। अचानक एक साथी के जेल में ही निपट जाने के बाद हम सहम गए थे,पर वकील साहब ने अपनी पिछली कई उपलब्धियाँ गिनाई,जिससे हमें इस देश के कानून पर भरोसा हो गया है। ’

इस तरह का वाकया बताता है कि हम बहुत ही भावुक लोग हैं जो किसी भी आन्दोलन या खबर से बहुत जल्द प्रभावित हो जाते हैं। ऐसे में हमेशा बेकसूर ही मारे जाते हैं।


'हरिभूमि' में १२/०६/२०१३ को प्रकाशित
 
 

 

संघर्ष का नया तरीका

आंदोलन ख़त्म हो चुका था।आँसू गैस के गोले और लाठी - डंडे तनिक विश्राम के लिए सुस्ताने लगे थे।सड़क का शोर बैरिकेड तोड़कर ...