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सोमवार, 6 फ़रवरी 2017

गाँधी और नया मुक्ति-काल !

गाँधी जी ऊपर बैठे पछता रहे हैं।पूरी ज़िंदगी लँगोटी पहनने की ज़िद की,सूत काता,फिर भी वो नहीं कमा पाए जो उनके नए अवतार ने केवल झाड़ू और चरख़ा पकड़कर पलक झपकते ही पा लिया।देश को जानने,समझने के लिए उन्होंने बरसों गाँव-गाँव,सड़क-सड़क घूमकर अपनी ऊर्जा नष्ट की फिर भी कोई चमत्कार नहीं पैदा हुआ।इधर नव-गाँधी केवल कलेंडर और डायरी में ही घुसकर पूरे देश में छा गए।इससे साबित होता है कि गाँधी एक असफल नेता थे।इसलिए आज़ादी के समय और उसके बाद किसी भी असफलता के सबसे सहज कारण गाँधी ही माने जाते हैं।आज देश की जो दुर्गति है,इसमें गाँधी और उनकी  प्रेरणा का योगदान सबसे अधिक है।हमारे नए गाँधी ग़ुलामी के वक़्त होते तो फिरंगियों के ख़िलाफ़ आमरण अनशन नहीं करते,बल्कि उन्हें भाषण पिला-पिला कर ही मार डालते।

ख़ैर,अब तक जो हुआ सो हुआ,अब नहीं होगा।सत्तर सालों का हिसाब मिलना शुरू हो गया है।गाँधी का आम आदमी क़तार में खड़ा आख़िरी आदमी था पर अब क़तार में खड़े हर आदमी का हाल आख़िरी आदमी जैसा हो गया है।समाज में यह बराबरी गाँधी की मुद्रा बदलने से आई है।इससे साफ़ हुआ कि वो गाँधी अब निरर्थक हो गए हैं।मुद्रा बदलने से अगर बाज़ार मूल्य बढ़ता है तो बदल। लेने में समझदारी है।बाज़ार के बरक्स आदमी और मुद्रा का अवमूल्यन तुच्छ है।हम बाज़ार में रहेंगे,बिकेंगे,तभी बचेंगे।आज हमारे लिए होना नहीं बचना ज़रूरी है।गाँधी भी इसी बाज़ार में खड़े हैं।उनकी हर चीज़ अब नुमाइश की चीज़ है।जो दिखता है,वो बिकता है,इसी सिद्धांत पर उनकी नई पीढ़ी अमल कर रही है।और देखिए,इतने भर से खादी हॉट हो गई है ! बाज़ार का हिट होना ज़रूरी है,इससे गाँधी 'हिट' होते हैं तो हों।

चरख़ा अचानक चमत्कारी हो गया है।पहले सूत कातता था,अब वोट कातने लगा है।गाँधी जी इस परिवर्तन से सबसे ज़्यादा ख़ुश हैं।देश को आज़ादी मिले इतने बरस हो चुके हैं पर अब जाकर उन्हें मुक्ति मिली है।यह सफ़र इतना आसान भी नहीं रहा।ऐसी सम्मानपूर्ण विदाई उन्हें किश्तों में मिली है।पहले उनका शरीर मुक्त हुआ,फिर विचार।प्रचार में वो फिर भी लगातार बने रहे।पुरानी दीवारों के कलेंडर में टंगे रहे।फिर अचानक एक दिन देश बदलने लगा।सफ़ाई-अभियान चला और गाँधी सब जगह से ग़ायब होने लगे।दिल  के बाद नोट से भी उतर गए।यह उचित भी हुआ।दुबले-पतले और अधनंगे फ़क़ीर की तस्वीर किसी म्यूज़ियम में तो स्थापित की जा सकती है पर बाज़ार के रैम्प पर कैटवाक करने के लिए डिज़ाइनर और सूटेड-बूटेड फ़क़ीर ही उपयुक्त होता है।हिट होने के लिए मौनव्रत के आंदोलन की नहीं हंगामाखेज इवेंट की ज़रूरत होती है।गाँधी इसीलिए फ़ेल हो गए।

चरखा नए गाँधी के हत्थे चढ़ चुका है।खादी को उसकी खाद मिल गई है।सियासी फ़सल लहलहाने लगी है।चरखे से सूत नहीं सीधे सत्ता निकल रही है।यह देखकर गाँधी जी की बकरी डरने लगी है।मुक्तिकाल की मूकदर्शक रही है वह।आम आदमी को उसने मुक्ति पाने के लिए क़तारबद्ध होते देखा है।वह चिंतित है कि नए गाँधी कहीं उसे भी न झपट लें ! पर वह नादान है।उसे नहीं पता कि भेड़-बकरियों के पास बचने का कोई विकल्प नहीं होता।पूरी तरह दुह कर उन्हें मुक्त कर दिया जाता है।मुक्ति पर उनका स्थायी हक़ है।बदलते हुए देश में अब सब कुछ मुक्त हो रहा है,बिलकुल शर्म-मुक्त शेख़ी के साथ।


शुक्रवार, 9 दिसंबर 2016

कालेधन की बाढ़ और चंद आँसू !

काला धन बड़ा ही कमजोर निकला ! एक ही डंडे से डरकर बाहर आ गया।लम्बे समय से बोरियों में भरे-भरे वैसे भी उसका दम घुट रहा था।मौक़ा मिलते ही वह गंगा में तैरने लगा,सड़क पर नाचने लगा।नोटों की नदियाँ बहने लगीं।ऐसी बाढ़ में कुछ गरीबों ने भी फ़ायदा उठा लिया।आँखों में बची हुई दो-चार बूँदें बहाने का उन्हें भी बहाना मिल गया।कालेधन के इस तरह एकदम से सामने आ जाने से रामराज्य आने की आशंका पैदा हो गई है।जो लोग हरे और लाल रंग के नोटों के पीछे अब तक भाग रहे थे,वे अब पीछा छुटाने में लग गए हैं।पता चला है कि जिन नोटों का रंग छूट रहा है,वे ही अब लम्बी रेस के घोड़े हैं ।सफ़ेद मुद्रा तो पहले से ही रंगहीन थी,अब प्राणहीन होकर कतार में गिर रही है।कालिख-पुती मुद्रा सफ़ेद होने पर उतारू है।सुना है कि रंग छोड़ने और बदलने वाली मुद्रा ही असली है।गिरगिट इसीलिए नए जमाने का देवता है।लोग हैं कि कतारों में लगकर भी बदरंग होना चाहते हैं।
काला-धन हमेशा से सेलेब्रिटी रहा है।रैंप से उतरकर अब वह सड़क पर चलना चाहता है।सफ़ेद है कि मुँह छुपाए घूम रहा है।कल तक जिस काले धन के पीछे वह पड़ा हुआ था,आज कतार में उसी के पीछे खड़ा है।कातर को कतार में आने के लिए अतिरिक्त मेहनत की ज़रूरत नहीं पड़ती।एक कदम चलकर ही वह इस गति को और सौभाग्य हुआ तो अंतिम गति को प्राप्त हो सकता है।कतार में होना ही अनुशासन में होना है।अनुशासित व्यक्ति देशप्रेमी होता है।वह कोई सवाल नहीं करता।कतार भीड़ बन जाए तो अराजक और देशद्रोही हो जाती है।ऐसे में व्यवस्था को आगे आना पड़ता है।वह चाहती है कि कतारें कभी खत्म न हों।हर कतार बताती है कि देश में सरकार है।अस्पताल और बैंक से होते हुए यही कतार अंततः मतदान-स्थल तक चली जाती है।इसलिए कतार का नियंत्रित होना ज़रूरी है।कतार होगी तभी 'गाँधी का आखिरी आदमी' पहचानने में सरकार को सहूलियत होगी।वर्ना वह उसके आँसू कैसे पोंछ पाएगी ?

लाइन में लगे लोगों को काले रंग का टीका लगाने का फ़ैसला बेहद समझदारी है।इसे माथे के बजाय उँगली पर इसलिए लगाया गया कि वोट देते समय वाली फीलिंग नोट लेते समय भी रखें।कतार में वोट देना ही केवल देशभक्ति नहीं है,नोट लेते समय भी इसे महसूसें।वोट देते और नोट लेते समय कालिख़-पुती रियाया सरकार के समकक्ष होती है।कतार में खड़े सभी लोग स्याह होंगे तो सरकार पर भेदभाव का आरोप भी नहीं लग सकता।

कुछ लोग लाइन में खड़े-खड़े गिर गए।कुछ उठे भी नहीं।इससे उनमें जज्बे की कमी झलकती है।ये लोग भूख-प्यास से नहीं 'देशभक्ति' में दिनोंदिन हो रहे ह्रास के शिकार हुए हैं।सौ-पचास रूपये निकालने के लिए दुश्मन-सीमा पर तैनात सिपाही जैसा जज्बा होना चाहिए।जब वह अपनी 'देशभक्ति' पूरी निष्ठा से साबित करता है तो अपने पैसों के लिए लाइन में लगकर मर-खप जाना कतई बुरा नहीं है!हाँ,कुछ सावधानियाँ ज़रूर बरतनी चाहिए।लाइन में जोश बना रहे,इसके लिए बीच-बीच में 'भारत माता की जय' बोलते रहें और भूख-प्यास की अधिकता होने पर योगी बाबा का चमत्कारी शहद चाँटते रहें।इससे नोट मिलने की संभावना तो बढ़ेगी ही,'देश-विरोधी' बट्टे से भी बचेंगे।साथ ही गीता में अर्जुन को दिया भगवान कृष्ण का कहा भी चरितार्थ होगा;जिसमें उन्होंने कहा था कि यदि जीते तो राज्य मिलेगा और मृत्यु हुई तो यश।लाइन में खड़े हर व्यक्ति को यह सूत्र याद रखना चाहिए।वह कतार से नोट या देशभक्ति में से कुछ तो कतर कर लाएगा ही।

नोटबंदी से किसी को परेशानी नहीं है।सभी राजनैतिक पार्टियाँ सफेदी से पुती हुई हैं।इसलिए उनका कुछ  हमें दिख नहीं रहा।लोग खामखाँ अपनी स्याह उँगली उनकी तरफ उठा रहे हैं।वैसे भी चुनाव नोट से नहीं चोट से जीते जाते हैं।कालेधन और आतंक पर चोट हो गई है।जल्द ही राम और गाय को मलहम की ज़रूरत पड़ेगी।ये चोटें गहरी हैं।इनके भरने से ही सत्ता की कुर्सियाँ उगेंगी।
फ़िलहाल आम जनता परेशान बिलकुल नहीं है बल्कि वह अपनी ख़ुशी का इज़हार कर रही है।यह सब काली-पट्टी बांधे न्याय की देवी को नहीं दिखाई दे रहा है।काले धन वाले सो नहीं पा रहे हैं और आम आदमी कतार में जाग रहा है।देश मजे में है,इस बात की मुनादी राजा ने ताली पीटकर कर भी दी है।

शुक्रवार, 9 सितंबर 2016

डूबते-उतराते लोग और टंगे हुए भूपाल !

पूरा राज्य जलमग्न था।जनता घोर कष्ट में थी।उसके दुःख देखने के लिए वे बेचैन हो रहे थे।दुःख तभी समझ में सही आता है,जब दिखाई दे,आर्तनाद करे।राज्य के मुखिया के नाते वे आधिकारिक रूप से इसे देखने के हकदार थे।इसके साक्षी बनने के लिए वे निकल पड़े।जनता के दुःख ठीक प्रकार से दिखाई दें,इसके लिए पहले वे हवा में उड़े।ऊपर से जल और जमीन एक-सी लग रही थी।मैदान उजले और झक सफ़ेद थे।चारों तरफ पूर्ण शान्ति पसरी हुई थी।वे दुःख देखने के लिए अवतरित हुए थे,पर यहाँ तो दूर-दूर तक उन्हें निर्जन दिखा।न कोई कोलाहल,न चिल्ल-पों।यह भी कोई ‘एडवेंचर’ हुआ ?

उन्होंने तत्काल साहसिक निर्णय लिया।ज़मीन पर उतर आए।न,न कहने का मतलब उन्होंने विमान त्याग दिया।अब सामने जल था,वे थे और उनका समर्पित दल।जनता कहाँ-कहाँ तक जल में समाई है,वे निकट से देखना चाहते थे।पर समस्या इससे भी विकट थी।वे अभी तक बेदाग़ और उजले थे।यहाँ तक कि उनके जूते भी उनकी सफेदी की गवाही दे रहे थे।आज उन्हीं पर संकट था।जल-स्तर तीस सेंटीमीटर के खतरनाक लेवल यानी घुटनों तक पहुँच चुका था।वे घुटनों पर कोई संकट नहीं चाहते थे।वे राजा थे,प्रजा नहीं,जो गले तक भी पानी भर आने पर खुद को सहज महसूस करती है।इस विकट परिस्थिति में भी उन्होंने हार नहीं मानी।आख़िरकार पानी से रार ठान दी।

हर मौके पर सुस्त रहने वाला राज्य-बल तुरंत सक्रिय हो गया।राज्य की व्यवस्था खतरे में थी।उसे अगल-बगल से टांग लिया गया।कुछ लोग तो उसे कंधे पर भी बिठाना चाहते थे पर तब जनता के दुःख से वह साठ सेंटीमीटर और दूर हो जाती।वे व्यवस्था की साक्षात् मूर्ति बन गए।जल के बीचोबीच वे जनता के दुःख देखने लगे।कुछ जासूसी आँखें भी उन्हें देख रही थीं।आखिरकार कड़ी मशक्कत के बाद दुःख को कैमरे में क़ैद कर लिया गया।राज्य के बाढ़-पीड़ित मुखिया को उसकी झक-सफेदी के साथ धरा पर सुरक्षित धरा गया।

दुःख का आकलन हो चुका था।जायजा भलीभांति हुआ था ताकि सबको उचित मुआवजा मिल सके।मुआवजे का बजट बढ़ा दिया गया।बाढ़ में फँसे लोग अभी इतना गिरे नहीं थे कि राज्य-कोष के बदले जयघोष न उच्चार सकें।हाहाकार के बीच जयकारा गूँज उठा।दुःख देखने का प्रयोजन सफल हुआ।

कुछ लोग इस ‘दुःख-दर्शन’ पर भी तिरछी नजर उठा रहे हैं।उनको ऐतराज है कि दुःख देखने के लिए दुःख समझना ज़रूरी है।उनका मानना है कि इसके लिए उनको पानी में उतरना चाहिए था।पर ये लोग यह भूल जाते हैं कि इससे उनका पजामा गीला हो जाता।तब बड़ा अनर्थ होता।वैसे भी दुःख-दर्द देखने के लिए थोड़ा फासला होना चाहिए।वे तो बस इसी आपदा से निपट रहे थे।

रविवार, 20 मार्च 2016

रंग लाएगी हमारी देनदारी एक दिन !

सयाने बहुत पहले कह गए हैं कि ‘यावद् जीवेत् सुखम् जीवेत,ऋणं कृत्वा घृतम् पीबेत’ अर्थात् जब तक जियो,सुख से जियो,क़र्ज़ लेकर घी पियो।इस जीवन-सूत्र को हमने बड़ी शिद्दत से अपनाया है।पैदा होते ही हम पर ऋण चढ़ने लगता है।इस बारे में हमें पढ़ाई के दौरान ही पता चलता है कि हम पर माता,पिता और गुरू के नाम पर एडवांस में बकाया हो गया है।साथ में यह भी हिदायत होती है कि ये ऋण पूरी तरह से चुकता होने वाले नहीं हैं,इसलिए समझदार लोग इसे चुकाने की कोशिश ही नहीं करते।इस तरह का ऋण भले ही आभासी होता है पर वह हमारे डीएनए में पैबस्त हो जाता है।जैसे ही हम असल ज़िन्दगी से मुक़ाबला शुरू करते हैं,वह हमारे लिए खाने में ‘लोन’ की तरह हो लेता है।इस तरह हम ‘लोन-फ्रेंडली’ हो जाते हैं।

लोन बाँटने वाले भी बड़े सहृदय होते हैं।वह बार-बार हमारी चिरकुटपना का स्मरण कराते रहते हैं।अगर हम इस ज़रूरी जीवन-कर्म से चूक गए हैं तो वे दोपहर के खाने के गैर-ज़रूरी वक्त भी फोन पर याद दिलाते हैं कि लो न ! आपको गाड़ी चलानी नहीं आती पर नई अर्थव्यवस्था को ढंग से चलाने के लिए उनके दस्तावेजों में बस एक बार आपका अगूंठा लग भर जाए,उसे जड़ से काट लेने की प्रक्रिया वे स्वयं पूरी कर लेते हैं।माल उधार लेने वाला ‘बिरला’ ही पचाने की हैसियत रखता है।लोन लेने की हैसियत से अधिक हाजमा दुरुस्त होना ज़रूरी होता है।इसके लिए किंग-साइज़ का पेट और विलायती-वीसा आवश्यक अर्हता है।जिनको दो जून की रोटी का जुगाड़ नहीं,वे क्या खाकर भाग पायेंगे ?

कर्ज़ लेने के लिए बूता और जूता दोनों मजबूत होना चाहिए।जो इस मामले में कमजोर पड़ते हैं,पेड़ों से लटक जाते हैं।ऐसे लोग समाज के लिए अभिशाप हैं।इनके जीते रहने से तो हमारी नाक कटती ही है,मरने पर जेब भी।मुआवजे से हमारी अर्थ-व्यवस्था चौपट होती है।दूसरी ओर भारी कर्ज़ लेकर अर्थ-व्यवस्था को गति देने वाला नायक होता है।उसकी प्रतिष्ठा उसकी देनदारी से बड़ी होती है।वह कर्ज़ लेकर पेड़ पर नहीं चढ़ता,बल्कि आसमान में उड़ जाता है।कर्ज़ लेने का एक सलीका और शऊर होता है।सूटेड-बूटेड बंदा कर्ज लेते हुए भी ऋणदाता पर एहसान करता है।हमारे बैंक सार्वजनिक संस्थान हैं।फटेहाल और दीन-दुखियों के लिए खोले गए परमार्थ आश्रम नहीं।
कर्जदार होना आदमी का मौलिक अधिकार है।पहली कार से लेकर पहला घर तक कर्ज से उसके प्रेम को दर्शाता है।कर्ज सबको लेना चाहिए ताकि बाज़ार ज़िन्दा रहे।ईएमआई इसीलिए आई है,जिससे गरीबी किश्तों में मरती रहे।उसका एकदम से खतम हो जाना बाज़ार की सेहत के लिए ठीक नहीं होगा।अब तो लोन लेकर पढ़ाई भी हो रही है ताकि शुरुआत से ही उधार लेने का कौशल डेवलप हो सके।

कुछ लोग कर्ज़ का नाम सुनते ही बड़े संवेदनशील हो उठते हैं।संवेदनशीलता प्रगति के लिए घातक है।हमें आगे की ओर देखना चाहिए।हमारे प्रिय शायर ग़ालिब कह भी गए हैं कि ‘कर्ज़ की पीते थे मय और समझते थे,रंग लाएगी हमारी फाका-मस्ती एक दिन’।उन्हें कर्ज लेकर ही क्रांति आने की उम्मीद थी।ऐसा तो तब था,जब शायर कर्ज लेकर शराब पीता था।आज कर्ज़ लेकर शराब बेची जा रही है।कर्ज़ परेशान नहीं खुशहाल और दार्शनिक बनाता है।कर्ज तो लिया जाता है गम गलत करने के लिए ताकि परेशानी गड्ढे में गिरे।जिस आदमी को कर्ज़ लेने के लिए कोसा जा रहा है,उसने तो पीने वालों का कतई भला किया है।उसकी बनाई दवाई से जान-जहान की परेशानियाँ दूर हो रही हैं।

जब एक शायर को उम्मीद थी कि उसकी तंगहाली एक दिन ज़रूर रंग लाएगी तो कर्ज लेकर ऐश करने वाले का आत्म-विश्वास ऊँचा क्यों न हो ! कर्जदार कोई छोटी मछली नहीं जो किसी भी काँटे में फँस सके।छोटे-मोटे लोन लेकर सरकारी अफसरों से डरकर भागने वाले निश्चिन्त होकर रहें।कर्ज़ लेकर शराब पिएँ और देनदारी भूल जाएँ।हाँ,कर्ज़ भूलने से पहले अपना पासपोर्ट बनवाना न भूलें।

संघर्ष का नया तरीका

आंदोलन ख़त्म हो चुका था।आँसू गैस के गोले और लाठी - डंडे तनिक विश्राम के लिए सुस्ताने लगे थे।सड़क का शोर बैरिकेड तोड़कर ...