रविवार, 17 दिसंबर 2023

हार और जीत के बीच फँसा चिंतन

उनसे मिलने के लिए समय नहीं मिल पा रहा था।न उन्हें, हमें।वे पिछले कई दिनों से मंथन में व्यस्त थे और हम अटकलबाज़ियों में।उनके मंथन सेअमृतभले निकल आया हो,पर हमारी अटकलबाज़ी से एक भी सरकार नहीं निकली।इस बार नेताओं ने जहाँ जनता को चुनाव के पहले जमकरपैकेजबाँटे,वहीं जीते हुए नेताओं को भीज़बरन आरामदिया गया।काम करके भी आराम कीगारंटीमिल सकती है,यह इन चुनावों की ख़ास उपलब्धि रही।इस बार जीतने से ज़्यादा हारने वाले खुश दिखे।पहले सारेपोलध्वस्त हुए,फिर जीते हुए सेनापति।कुछ सेवक सेवा करते हुए हारे और कुछ जीत कर भी नहीं जीत पाए।पहली बार ऐसे चुनाव-परिणाम आए,जिसमें जीतने वाले नाखुश दिखे और हारने वाले आश्वस्त।


बहरहाल,जब सब जगह विधिवत रूप से लोकतंत्र स्थापित हो गया तब जाकर हमें सुकून मिला।हम अपनी निष्पक्षता को लेकर सदैव सजग रहते हैं,इसलिए जीत की अगुआई करने और हार को गले लगाने वाली दोनों पुण्यात्माओं को बातचीत के लिए आमंत्रित किया।मेरी निष्पक्षता का यह पहला सबूत था।आगे और मिलेंगे।


मेरे बाईं ओर हारने वाली आत्मा विराजमान थी और ठीक दाईं ओर जीतने वाली।सबसे पहले हमनेहार-वीरको ही पहला अवसर दिया।अपनी ताज़ा उपलब्धि के बारे में कुछ बताएँ ? क्या कारण रहे इस बार ?’ उन्होंने पूरे आत्मविश्वास से उत्तर दिया, ‘कोई ख़ास नहीं।हम अकारण ही हारे।जैसे हारते आए हैं,वैसे ही हारे हैं।हमें इससे ज़्यादा की उम्मीद थी पर शायद कुछ कमी रह गई और हम कहीं-कहीं हारने से वंचित भी रहे।आगे हम इसका ध्यान रखेंगे।


किस बात का ?’ मेरे मुँह से फ़िज़ूल-सा सवाल निकल गया।उनकी अंतरात्मा जवाब के लिए जैसे तैयार बैठी थी।देखिए हमने अभी अभी मंथन किया है।हम लगातार यही कर रहे हैं।हम बड़े पसोपेशमें थे कि यदि कहीं जीत गए तो बड़ा संघर्ष होगा।हमारे बूढ़े और थके हुए लोगों को नामुराद कुर्सी छोड़ ही नहीं रही थी।वे तो कब से हारने का फ़ुल-प्रूफ प्लान बनाकर बैठे थे।कुर्सी को ही उनसे मोह हो गया था।जीतने पर यह मोह हम पर भारी पड़ता।विधायकों की बाड़ाबंदी करनी पड़ती सो अलग।सच बताऊँ ! काफ़ी खर्चा बच गया।अगले चुनाव में काम आएगा।कहीं जीत जाते तो संघर्ष और विरोध की आदत छूट जाती।बड़ा फ़ायदा यह हुआ कि एक झटके में गुटबाज़ी ख़त्म हो गई।अब पार्टी में वही बचे हैं जिन्हे जीतने से मोह नहीं है।हारने के हज़ार फ़ायदे हैं।हमारे कार्यकर्ता अब पूरे पाँच साल आराम कर सकेंगे।राज का क्या है,रिवाज है तो मिलेगा ही।


उस हुतात्मा की ऐसी बातें सुनकर मेरा ही नहीं जीतने वाली आत्मा का भी धीरज डोल गया।मैंने स्वयं को संयत करते हुए दाईं ओर ताका।आपकी जीत पर सवाल उठाना ही बेमानी है।फिर भी यदि कहना चाहें तो बताएँ कि इतना बड़ा जीतकर कैसा लग रहा है ? ’ मैंने थोड़ा सहमते हुए पूछा।


देखिए,हम सिर्फ़ जीत रहे हैं ,आगे भी जीतेंगे।सरकार जब हमें ही बनानी है तो जीत-हार से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता।हराकर तो सभी सरकार बनाते हैं।हम हारकर भी बना लेते हैं।यह हमारा कौशल है।इसीलिएएक देश-एक चुनावआज की ज़रूरत है।एक साथ चुनाव होने से संकल्प कम लेने होंगे।रेवड़ी-संस्कृति पर लगाम लगेगी और अमीरों पर धन-वर्षा होगी।इस योजना से ज़हरीले बयानों में कमी आएगी।देश में सद्भाव भी इफ़रात में बढ़ेगा।क्षेत्रीय दल और मँहगाई दोनों क़ाबू में रहेंगे।


किंतु जीतने के बाद भी आपके यहाँ असंतोष है ?’ मैंने लाख टके का सवाल किया।


यह सही है कि हमारे यहाँ असंतोष है।पर यही हमारी जीत का आधार है।हमारा कार्यकर्ता संतुष्ट होकर अकर्मण्य नहीं बनना चाहता।इसीलिए हमारी भूख बड़ी है।मीडिया चाहे तो इसे तिल का ताड़ बना सकती है।यू-ट्यूब का सर्वर डॉउन कर सकती है पर हम रुकने वाले नहीं हैं।


एक आख़िरी सवाल।आप जीते हैं तो ज़िम्मेदारी भी ज़्यादा है।रोज़गार के बारे में आप आगे क्या करेंगे ? मैंने आख़िर चुभता सवाल पूछ ही लिया।यह निष्पक्षता का दूसरा सबूत रहा।


आपने बिलकुल उचित सवाल पूछा है।हम जैसे-जैसे जीत रहे हैं, यू-ट्यूबर की कमाई बढ़ रही है।हमारे हारने पर रोज़गार का संकट उत्पन्न होता।इसलिए हमारा जीतना रोज़गार की गारंटी है।हमारे जीतते रहने का एक बड़ा फ़ायदा और भी है कि रोज़ाना आने वाले फ़तवे बंद हो गए हैं।इससे बहुतों को राहत मिली है।भ्रष्टाचारी भी देशभक्त हो लिए हैं।उनके इतना कहते ही हमने दूसरी ओर निहारा पर वहचिंतन-मोडमें जा चुके थे।मैंने उन्हें उनके नाम से बुलाया पर कोई उत्तर नहीं मिला।


मैंने हाथ पकड़कर झकझोरा।वह मौलिक अवस्था में लौट आए।मैंने उनसे भी आख़िरी सवाल पूछा,‘इस प्रचंड हार का श्रेय आप किसे देंगे ?’ वह इत्मीनान से बोले,‘इस सबका श्रेय लोकतंत्र को है।यह उसी की हार है।अगर हमारी जीत होती तो भी लोकतंत्र जीतता।हमारा जो भी है,लोकतंत्र को समर्पित है।इससे ज़्यादा लोकतांत्रिक होने का सबूत हम नहीं दे सकते।इस हार से हम और मज़बूत होकर उभरे हैं।हमें बहुत सारे सबक मिले हैं जो जीतने पर नहीं मिलते।


उनके इस सच्चे विश्लेषण ने मुझेचिंतन- मोडमें पहुँचा दिया।अभी भी वहीं हूँ।


संतोष त्रिवेदी

न तुम जीते,न हम हारे😉

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