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रविवार, 10 अक्तूबर 2021

वो इधर का लगता रहे और उधर का हो जाए !

बड़े दिनों बाद कल शाम को लल्लन चचा मिल गए।बौराए घूम रहे थे।हम पहचान ही नहीं पाए।हमको आशंका हुई कि कहीं इन पर तीसरी लहर का असर तो नहीं आ गया,पर जल्द ही अपनी भूल का अहसास हुआ।उनके माथे पर ‘फुल-वैक्सिनेटेड’ का लेबल चस्पा था।चेहरे पर किसी तरह का ख़ौफ़ भी नहीं था।हमें देखते ही ‘आँय-बाँय’ बकने लगे।उनके ऐन साथ चल रही उनकी आत्मा ने रहस्य उजागर किया कि उनके अंदर सियासत का साया प्रवेश कर गया है।इसलिए वे भी ‘सही जगह’ में घुसना चाहते हैं।यह जानकर मुझे लल्लन चचा को नज़दीक से जानने की ललक हुई।वे बड़बड़ा रहे थे,‘देश इस समय भीषण बदलाव के दौर में है।पलक झपकते सब बदल रहा है।जो देख रहे हो,वो सच नहीं है।धाराएँ बदल रही हैं।दल बदल रहे हैं।लोग गंडक में डुबकी लगाकर गंगा का पुण्य लूट रहे हैं।और तो और ,निष्ठा और नैतिकता व्यक्तित्व की सबसे बड़ी बुराइयाँ हैं।जबकि झूठ और पाखंड अच्छे ‘कैरियर’ साबित हो रहे हैं।हम कुछ दिनों से अपनी आत्मा को कुरेद रहे थे।इसी ने बाहर आकर समझाया कि प्रगतिशील होने के लिए विचारधारा कोई ‘बैरियर’ नहीं है।उसे तोड़कर ही मुक्ति का द्वार खुलता है।इसलिए वाम हो कि दक्षिण, ‘मध्य’ में आना ही सबकी नियति है।’


यह कहकर उन्होंने नया झंडा उठा लिया।वाममार्ग से होते हुए वे मध्य की ओर बढ़ चले।आगे का रास्ता बेहद चौड़ा था।जगह भी ख़ूब ख़ाली पड़ी थी।इसलिए उस पर चलने और आगे बढ़ने का उतना ही ‘स्कोप’ दिख रहा था।हमें भी कुछ सवाल दिखाई दिए।उन्हीं से शुरू कर दिया, ‘कल तो झंडे का रंग गाढ़ा था।आज बिलकुल हल्का है।रंग बदलते समय कुछ ‘विचार-उचार’ नहीं किये चचा ?’


वे चेहरे से ‘मास्क’ हटाते हुए बोले, ‘क्यों नहीं ! ख़ूब किए।अभी तक यही तो किए हैं।अफ़सोस है कि बुढ़ापे में यह बात समझ आई कि मनुष्य को ‘विचार’ में नहीं ‘धारा’ में बहना चाहिए।बाएँ,दाएँ रहेंगे तो किनारे हो जाएँगे।इसलिए विचार को उचार कर मध्य में आ गए हैं।सत्ता की नाव यहीं बहती है।अब बहने में भी सुभीता होगी।जब मन किया,बाएँ या दाएँ करवट ले ली।पलटने में तनिक संकोच किया तो ज़िंदगी भर पछताएँगे।वैसे भी आदमी समझदार तभी माना जाता है,जब उसके लिए कोई अपना-पराया नहीं होता।मक़बूल शायर ने कहा भी है, ‘उसी को जीने का हक़ है जो इस ज़माने में,इधर का दिखता रहे और उधर का हो जाए।’ राजनैतिक-वनवास में रहकर हमने इस पर ख़ूब चिंतन किया है।तुमको भी ‘फ़्री’ में बाँट रहा हूँ।वर्तमान में वाम दक्षिण की ओर खिसक गए हैं तो दक्षिण मध्य बनने को मचल रहा है।बचा मध्य तो उसके लिए कोई निषेध नहीं रहा।वह वास्तव में बचा ही नहीं।उसकी हर जगह पैठ है।सभी ‘धाराएँ’ एकाकार हो गई हैं।इससे पहले कभी ऐसा राजनैतिक-संगम देखने को नहीं मिला।’


वे बोले जा रहे थे,आत्मा हँस रही थी।कहने लगी, ‘सब तुम्हें ही नहीं पता।कुछ मेरे भी अनुभव हैं पर ये बातें ‘ऑफ़-रिकार्ड’ रहनी चाहिए।आजकल आत्माएँ बोलती नहीं बयान देती हैं।फ़िलवक्त मैं बयानबाज़ी की होड़ में नहीं पड़ना चाहती।मैंने दलों में इत्ती पारदर्शिता कभी नहीं देखी।सब बेपर्द हो चुके हैं।कल जो लोकतंत्र के माथे का कलंक था,आज वही ‘टीका’ है।पार्टी-दफ़्तर अब शुद्धिकरण-केंद्र बन गए हैं।‘बहना’ अब प्रगतिशीलता की निशानी बन गया है।शुचिता और लंपटता गले मिल रही हैं।यह नया समय है।पाखंड छोड़कर लोग यथार्थवादी बन चुके हैं।सिद्धांतों और निष्ठा की गठरी कब तक सिर पर लादे रहते।इसलिए आदरणीय चचा जी सब फेंक कर हल्के हो गए हैं।इन्हें हल्के होने की क़तई चिंता नहीं हैं।सामने कुर्सी दिखती है तो ‘विज़न’ और ‘वज़न’ दोनों ‘चेंज’ हो जाता है।इनका भी हो गया है।और हाँ,सवाल केवल चचा पर ही क्यों ? बदलने के दौर में केवल नेता ही नहीं बदल रहे हैं।जनता भी रोज़ बदल रही है।अब किसी के पास ‘जनता’ ही नहीं बची।वह दलित,पिछड़ी,अल्पसंख्यक और सवर्ण के खाँचे में बदल चुकी है।नए युग के नेता जनता के नहीं इन्हीं के प्रतिनिधि हैं।जिसके पास ‘एक’ जनता है,सत्ता उससे कोसों दूर रहती है।इसलिए फ़ोकस इस बात पर ज़्यादा है कि किसके पास ‘कितनी मात्रा’ में जनता है।लोकतंत्र की जान अब ‘जाति-सम्मेलनों’ में है।यही बात चचा जी को मालूम पड़ गई है।’


आत्मा के इस विस्फोट से हल्ला मच गया।आस-पास भारी भीड़ जमा हो गई।लोग आत्मा की जाति पूछने लगे।चचा अचानक ‘मध्य’ से छलाँग मारकर दक्षिण-दिशा की ओर भागे।शायद उन्होंने वह कविता नहीं पढ़ी थी कि ‘दक्षिण की दिशा मौत की दिशा होती है !’

कोई हमारी जाति पूछता,इससे पहले हम भी वहाँ से सरक लिए।आत्मा का क्या हुआ,अब तक कोई ख़बर नहीं।


संतोष त्रिवेदी 



रविवार, 12 सितंबर 2021

‘शूरा’ सो पहचानिए,जो लड़े ‘दीन’ के हेत !

बीते दिनों हमारे पड़ोसी देश में अचानक लोकतंत्र का क़ब्ज़ा हो गया।लोग कुछ समझ पाते,इससे पहले हीदुनिया का चौधरीइसका इंतज़ाम करके निकल लिया।असल लोकतंत्र से टकराने की उसकी भी हिम्मत नहीं हुई।जो लोग कुर्सियों पर बैठे थे,उन्होंने सत्ता का तनिक भी मोह नहीं किया।बचा-खुचा माल-असबाब लेकर वे भी खिसक लिए।वहाँ के लोग अब पूरी तरह बम और बंदूक़ के हवाले हैं।जानकार बताते हैं कि बाज़ार में लोकतंत्र का यह नया संस्करण आया है।इस तंत्र की खूबी यह है कि जो करना होता है,उसके लिए क़ानून,संयुक्त राष्ट्र और मानवाधिकार जैसी बेजान संस्थाओं का मुँह नहीं ताकना पड़ता।


पड़ोसी देश में जो कुछ भीघटरहा है,उसमें अभी तक आम राय नहीं बन पाई है।एक तरफ़ नापाक-पड़ोसी के लिएग़ुलामी की ज़ंजीरेंटूटी हैं तो दूसरी तरफ़सबसे बड़े लोकतंत्रकी चुप्पी नहीं टूट रही है।शायद उसने भी वहाँ आए हुएलोकतंत्रको दूरबीन से देख लिया है।दुनिया भर में वायरस फैलाने वाला सबसे अधिक सक्रिय है।सुनते हैं,उसके फैलने के लिए वहाँ माकूल माहौल है।आतंकवाद और साम्राज्यवाद अब दोनों हिल-मिलकर रहेंगे।


सबसे भले तो वे है जिनकी इस बारे में अब तक कोई राय ही नहीं बनी है।वे महिलाओं,बच्चों और बूढ़ों पर हो रहे जुल्म की कहानियों को अभी भी तौल रहे हैं।सही परख होते ही उनके भी उच्च-विचार सामने आएँगे। हाँ,बुद्धिजीवियों ने हमेशा की तरह निराश नहीं किया है।उसके दोनों धड़ों ने अपनी बहुमूल्य राय पेश कर दी है।जहाँ ग़ैर-बुद्धिजीवी पड़ोसी देश मेंलोकतंत्र की दस्तकको  आतंकी कह रहे हैं,वहीं विशुद्ध-बुद्धिजीवियों के लिए वेलड़ाकाहैं।इनके तईं वे लोकतंत्र कोसरियादेने वाले आधुनिक क्रांतिकारी हैं।कुछ ने तो अपनी बंद आँखों में कश्मीर के भी सपने पाल लिए हैं।वे इसे साँप पालने जैसा मामूली काम समझ रहे हैं।नापाक-पड़ोसी बहुत दिनों बाद उम्मीद से है।इंशाल्लाह इस बार पूरी दुनिया मज़हबी हुकूमत का दीदार कर पाएगी।


इस कशमकश के बीच असल बात को पकड़ने के इरादे से हमने इस उदारवादी और लोकतंत्र समर्थक तालिबान भाईजान से संपर्क किया।मुलाक़ात के लिए किसी बंकर में मिलने की बात की तो उधर से हमें तसल्ली मिली और यह ख़बर भी कि अब चूँकि वेलोकतंतरले आए हैं,इसलिए बेकार पड़े बंकरों में मिलने की ज़रूरत नहीं है।अब जो भी होगा,सरे-आम होगा।आख़िर तय समय पर एक बख़्तरबंद गाड़ी में बैठकर हम उसके ठिकाने पर पहुँचे।चारों तरफ़ संगीनें तनी हुई थीं।जब इसका कारण पूछा तो पता चला कि जब बातचीत संगीन हो तो यह इंतज़ाम करना पड़ता है।वह इतना उदार था कि इंटरव्यू देते वक्त उसने बंदूक़ के ट्रिगर को बड़ी सावधानी से संभाल रखा था क्योंकि गोली चल जाने पर खामखां एक इंटरव्यू हलाक हो जाता।


सबसे पहले मेरी आँखों पर पट्टी बाँध दी गई।इस तरह का तजुर्बा होने से हमें ख़ास तकलीफ़ नहीं हुई।लोकतंत्र को इज़्ज़त बख्शने के इरादे से मेरा मुँह खुला छोड़ दिया गया।इसका फ़ौरी फ़ायदा यह हुआ कि तालिबान भाईजान से मेरी गुफ़्तगू शुरू हो सकी।


इस माहौल में आपको कैसा लग रहा है ? आपको ख़ुदा का ख़ौफ़ भी नहीं रहा अब ?’ मैंने ऊपर वाले का नाम लेकर अपनी ज़ुबान चला दी।यह निहायत बेहूदा सवाल है।हम जो भी कर रहे हैं,उसी के नाम पर तो कर रहे हैं।उसी की दिखाई राह पर चल भी रहे हैं।अल्लाहताला ने चाहा तो हम इस दुनिया से काफ़िरों का नामोनिशां मिटा देंगे।हम अपनी क़ौम के हक़ के लिए लड़ रहे हैं।भाईजान ने बेख़ौफ़ होते हुए जवाब दिया।


जिन औरतों,बच्चों और बूढ़ों को आप मार रहे हैं,ये तो आपकी क़ौम के ही लोग हैं।किनके हक़ के लिए आप बारूद बो रहे हैं ?क्या अल्लाह ने ये सब करने के लिए कहा है ?’ मैंने जल्दबाज़ी में अटपटा-सा सवाल पूछ लिया।इतना सुनते ही भाईजान के हाथ में लहराती बंदूक़ का बदन मेरी खोपड़ी से सटने को आतुर हो उठा।मेरी रूह तक सनसना गई।लगा कि जन्नत का रास्ता ज़्यादा दूर नहीं है।पर तभी भाईजान ने दिलासा दी,‘डरिए मत।हम पवित्र किताब पढ़कर ही गोली मारते हैं।इससे मरने वाले को जन्नत जाने में सहूलियत होती है।गोली मारना हो या सरकार बनाना हो,हम नमाज़ अदा करके ही हर काम अंजाम देते हैं।इससे अल्लाह की ग़वाही भी हो जाती है।रही बात,अपने क़ौम के लोगों को मारने की,ऐसे लोग जो हमारी राह में नहीं चलते,वे काफिर हैं।और काफिर को मारना गुनाह नहीं,नेक काम है।हम मज़हबी लोग हैं,कुछ ग़लत नहीं करते।



पर इससे आपका मज़हब बदनाम नहीं होता ? आपको अल्लाह के नुमाइंदे किसने बना दिया ?’ मैंने कलेजा थामकर उसी बंदूक़ की ओर सवाल उछाला।


लगता है आप भी काफिरों की जमात में शामिल हो गए हैं।आपकी तालीम अधूरी है।हमारी लड़ाईदीनके लिए है।हमने पढ़ रखा हैशूरासो पहचानिए,जो लड़ेदीनके हेत।हमशूराहैं और सिर्फ़दीनके लिए लड़ते हैं।यह कहकर भाईजान ने इस मुलाक़ात के ख़त्म होने का ऐलान कर दिया।


मेरी जान सिर्फ़ इसलिए बख्श दी गई ताकि हम उनकेदीनको दुनिया के सामने ला सकें वरना एक काफ़िर की ज़िंदगी किस काम की ?