रविवार, 16 जून 2024

न तुम जीते,न हम हारे😉

चुनाव परिणाम आने के बाद से कइयों की गर्मी निकल चुकी है ,पर देश के कई हिस्से अभी भी उबल रहे हैं।इस गर्मी के चलते दूध और दाल के दामों में भी उबाल आया है।विशेषज्ञों ने इसका कारण उत्तर दिशा से रही प्रतिकूल हवा को बताया है।सरकार भी गर्म हवा की चपेट में गई।उसने बस-भाड़ों में बढ़ोत्तरी कर दी ताकि उसकी प्रिय जनता लू-लपट से बची रहे।ऐसी ही सरकारें कलियुग में लोकप्रिय होती हैं,जो पूरे दिल से जनता की भावनाओं की कद्र करती हैं।कई क्षेत्रों में चुनाव निपटते ही बिजली-पानी का अकाल पड़ गया है।इससे ज़ाहिर होता है कि चुनावी-दिनों में ऐसी कटौती कर पाने के लिए सरकार को कितने धैर्य और त्याग की ज़रूरत पड़ती है ! इसके लिए जनता को उसके प्रति सदैव कृतज्ञ होना चाहिए।पर जनता तो जनता है।वह हमेशा  भावनाओं में नहीं बहती।कभी-कभी दिमाग़ ठीक भी करती है।


चुनाव जा चुके हैं और सारी गारंटियाँ भी।सरकार बनाने वाले ठीक से जीते और विपक्ष में बैठने वाले ठीक से हारे।इस तरह जनता के हाथ एक भी गारंटी नहीं लगी।इससे दोनों पक्षों को राहत मिली।लगता है,जनता पर गर्मी का असर कुछ ज़्यादा ही चढ़ गया था सो उसने किसी भी गारंटी पर एकतरफ़ा यक़ीन नहीं किया।उसने कान दोनों के खींचे हैं पर महसूस केवल एक को ही हुआ।


इस चुनाव की सबसे मज़ेदार बात यह रही कि सरकार बनाने वाले नाखुश लग रहे,जबकि विपक्ष में बैठने वाले गदगद।उनकी यह अप्रत्याशित ख़ुशी सत्ता पाने वालों को हज़म नहीं हुई।उन्हें इस बात पर शक होने लगा है कि वह वाक़ई में जीते भी हैं या नहीं ! उन्हें इस पर सख़्त आपत्ति है कि जो यक़ीनन हारे हैं,वे खुश कैसे हो सकते हैं ? जश्न मनाने का अधिकार सिर्फ़ जीतने वालों का है।पर होनी को कौन टाल सकता था ! जिन्हें हार का चिंतन करना चाहिए,वे जीत के भजन गा रहे हैं।इधर सरकार बनाकर भी कार्यकर्ता थके-हारे लग रहे थे।ऐसा लग रहा था,जैसे दूसरे पक्ष वालों ने इनकी भैंस खोल ली हो,जबकि उनके हाथ केवल पगही लगी है।फिर भी वे उछल रहे थे।इससे जीतने वाले कन्फ़्यूज़ हो गए।वे बार-बार अपनी जीत को आलाकमान से कन्फर्म कर रहे थे।आलाकमान आलरेडी असमंजस में था।उसने बयान जारी कर कह दिया कि हमने अकेले जितनी जीत हासिल की है, वे सब मिलकर भी हमसे पीछे रहे।दरअसल हारे वे हैं,हम नहीं।हारने पर भी उनकी गर्मी कम नहीं हुई,जबकि हम जीतकर भी ठंडे पड़ गए हैं।


इस बयान के आते ही दूसरे पक्ष से बड़ी गर्म प्रतिक्रिया आई।जवाब था, ‘हम हारे कहाँ हैं ! पहले से हम डबल हुए हैं जबकि उनका नाराबबलकी तरह फूटा है।हमारी खिली हुई सूरतें देखकर कोई भी अंदाज़ा लगा सकता है कि अगर कोई जीता है तो वह हम हैं।हार में छिपी हुई जीत भी हम देख लेते हैं।वो हमेंघमंडियाकहते रहे,जबकि असली घमंड तो उन्हीं के पास था।हमने उसे तोड़ा है।इसकी ख़ुशी हमें है।सरकार हमारे खाते तो पहले ही सील कर चुकी थीं,अब ख़ुशी भी सील करना चाहती है।चाहे जो हो जाए,हम हर हाल में खुश रहेंगे।बल्कि सरकार बनाकर हम ज़्यादा खुश हैं।सोचिए,अगर सरकार बनाने की ज़िम्मेदारी हमारे पल्ले पड़ जाती तो कितनी मुसीबत होती।न सहयोगियों की डिमांड पूरी कर पाते, ही जनता के लिएखटाखट-गारंटी।हम सामने वालों को चित्त भले कर पाए हों,पर बिना ग्लव्स पहने एक ज़ोरदार च्यूँटी हमने ज़रूर काट ली है।एक और ज़रूरी बात।इस बार जनता के साथ-साथ मशीनों ने भी हमारा साथ दिया है।उनके साथ जनता रही, मशीनें।हमारे लिए यही जीत है।


इसके बाद गर्म मौसम और धधकने लगा।सरकार बनाने वालों पर अपने भी टूट पड़े।जो उपदेश चुनाव से पहले देने चाहिए,वे रिज़ल्ट के बाद आने लगे।जिस प्रकार भीषण गर्मी के बाद बादल बरसते हैं,ऐसे ही चुनाव में झुलसने के बाद कुछ नेता बरसने लगे।इससे कार्यकर्ता फिर कंफ्यूज हुए कि सरकार उन्हीं की चल रही है कि विपक्ष की ? आख़िरकार इसकी आँच सहयोगियों को भी तपाने लगी।गर्मी में बड़े-बड़े हिमखंड पिघल जाते हैं,ये तो फिर भी छोटे-मोटे गठबंधन हैं।इनके जुड़ने और बिखरने की खबरें हवा में तैरने लगीं।खबरों से ज़्यादा दिन-रात अफ़वाहें दौड़ने लगीं।गर्मी है ही इतनी कि छोटी-मोटी अफ़वाह उड़ते ही गर्म हो उठती है।कोई नेता विरोधी गठबंधन के नेता की कुशल-क्षेम भी पूछ ले तो बनी-बनाई सरकार के गिरने की भविष्यवाणी हो जाती है।कइयों ने अपने निजी चैनलों पर नियमित रूप से ज्योतिषी और तोते बिठा लिए हैं।वे दिन में तीन बार यह बता रहे हैं कि फलाँ सरकार अब गिरी या तब।खबरें गर्म हैं कि फलाँ गठबंधन बस टूटने ही वाला है।इस तरह के क़यास में ही उनकी आस है।पहली बार सरकार बना पाने पर वे खुश हैं और सरकार में रहकर ये उदास !


कोई बताए यह माज़रा क्या है !


संतोष त्रिवेदी 



शुक्रवार, 31 मई 2024

योगिराज का ध्यान !

बहुत गंभीर था।यह गंभीरता उसकी हालत के बारे में नहीं थी।उसने एक नया प्रण लिया था,उसी को लेकर वह गंभीर था।पिछले दिनों उसने नीलकंठ की साधना की थी पर अधर्मियों के कारण उसमें तनिक व्यतिक्रम आ गया।विष पीने के बजाय वह विष उगलने लगा।यह उस पर परमात्मा का प्रताप ही था कि सारा विष जिह्वा के माध्यम से बहने लगा था।विष भले ही शरीर से निकल गया था,पर आत्मा में अब भी धँसा था।वरिष्ठ चिकित्सक ने परामर्श दिया, “योगिराज ! इस बार ग्रह-दशा अनुकूल नहीं है।आप पीले वस्त्र धारण कर दक्षिण-दिशा की ओर प्रस्थान करें।अनुकूल परिणाम आएँगे।”


योगिराज ने दक्षिण दिशा की ओर प्रस्थान किया।उसने देवताले की कविता का मनन नहीं किया था।इसलिए वह न कवि को जानता था,न कविता को।वह बिना डरे एक कंदरा में प्रविष्ट हुआ।जाने से पहले कैमरे को उसने आवश्यक निर्देश दिए;


चूँकि वह ध्यान में रहेगा,इसलिए उसका ध्यान सिर्फ़ उसकी ओर होना चाहिए।

चूँकि वह मौन रहेगा इसलिए चित्र बोलता हुआ हो !

चूँकि वह सत्य की जगह असत्य के प्रयोग करेगा इसलिए उसके दृष्टिकोण को हर कोण से दिखाना होगा।

चूँकि वह प्रतिक्षण आसन बदलेगा इसलिए कैमरे की दृष्टि उसकी ओर होगी।

इनमें से यदि कुछ भी भंग हुआ,उसका ध्यान-भंग होगा।


यदि किसी भी तरह उसका ध्यान-भंग हुआ,फिर उसकी दृष्टि से न कैमरा बचेगा न सृष्टि।


इतना कहकर योगी कंदरा में प्रवेश कर गया।


अभी तक योगी कंदरा में है

और मठ वसुंधरा में सुलग रहा है !


रविवार, 26 मई 2024

साहित्य को उठाने हेतु ज़रूरी सुझाव

कल सुबह मेल खोली तो ख़ुशी के मारे उछलने ही वाला था,पर घुटनों ने साथ नहीं दिया।किसी इनामी संस्था के सचिव का पत्र था।उन्होंने इस वर्ष के सम्मान देने के लिए मुझसे सुझाव माँगे थे।उत्सुकतावश संस्था का परिचय पढ़ने लगा।उसमें साफ़ लिखा था कि संस्था बहुत पुरानी है।विगत चालीस वर्षों से साहित्य-सेवा में अहर्निश जुटी हुई है।इस दौरान वह अनगिनत लेखकों और कवियों की झोली में सम्मान उड़ेल चुकी है।जो अपने लेखन से साहित्य-जगत में हलचल मचाने में असमर्थ होते हैं,संस्था तन और मन से उनकी सहायता करती है।जिस दिन उन्हें सम्मान की पुड़िया दी जाती है,उस दिन इंटरनेट मीडिया क्रैश हो जाता है।संस्था का दावा था कि उसके द्वारा सम्मानित साहित्यकार हर गली-मुहल्ले में मिल जाएँगे।इस वर्ष उनकी संस्था इक्कीस साहित्यकारों की भूख शांत करने के लिए प्रतिबद्ध है।इस पवित्र कार्य में आपसे सुझाव आमंत्रित हैं।आप अपनी संस्तुति भी दे सकते हैं।हम उस पर उदारतापूर्वक विचारेंगे।


पत्र पढ़कर घुटनों को भीफीलगुडहुआ।इतनी ऐतिहासिक संस्था मुझसे सुझाव माँग रही है।मुझे भी सम्मानित करने का हौसला रखती है।यह मुझ पर ऊपर वाले की कृपा है।शहर के साहित्यकारों ने कभी मेरी सुध नहीं ली।ज़रूर इस साहित्य-सरगना को मुझमें ऐसा कुछ दिखा होगा,जो कभी मुझे नहीं दिखा।मैं उनकी उम्मीद नहीं तोड़ूँगा।मैंने साहित्य-सेवा करने का संकल्प उठा लिया।संस्था-सचिव को कई सुझाव लिख डालेखटाखट-खटाखट।व्यापक साहित्य-हित में उसी को यहाँ जारी कर रहा हूँ।


आपकी संस्था बड़ा नेक काम कर रही है।साहित्य की सबसे ज्वलंत समस्या का समाधान करने के लिए आप बधाई के पात्र हैं।बिलकुल सही जगह आपने संपर्क साधा है।वरना आजकल पता नहीं लोग किस-किस को साध रहे हैं ! रही मेरी बात,कई सम्मानार्थियों से मेरे वैध संबंध हैं।वे मुझे उठाते हैं,मैं उन्हें।आप नाहक परेशान हो रहे हैं।एक खोजेंगे,इक्कीस मिलेंगे।यह मेरी गारंटी है।अव्वल तो अब आपको बीस ही खोजने हैं।मैं आपके प्यार भरे अनुग्रह को इंकार नहीं कर सकता।इन दिनों लेखक और कवि कण-कण में सम्मान खोज रहे हैं।इससे साहित्य खूब फल-फूल रहा है पर साहित्यकारों में सम्मान की भीषण कमी है।उनकी इस क्षतिपूर्ति के लिए आपकी संस्था का प्रयास स्तुत्य है।इसके लिए सर्वप्रथम संस्था सम्मान की पात्र है।इसकी संस्तुति मैं कर रहा हूँ।प्रशस्ति-पत्र भी मैं ही लिखूँगा।एक सच्चा लेखक अहसानफ़रामोश नहीं होता।


बहरहाल,मेरे पास कुछ अनुभव हैं,जिन्हें आपसे साझा कर रहा हूँ।सम्मान-रहित जीवन कैसा होता है,यह मुझसे बेहतर कौन जानता है!आपके पास जो भी संस्तुति आए,ध्यान से देखना कि उसे पहले कोई सम्मान मिला है कि नहीं।अगर नहीं मिला तो फिर रिस्क लें।हो सकता है,उसे इसीलिए मिला हो कि सम्मान देने वालों का वह लिहाज़ करता हो।साहित्यिक-गैंगस्टर को साहित्यकार मानता हो।ऐसे लोगों को सम्मान बाँटना कुल्हाड़ी पर पैर मारना है।वह संस्था का असली उद्देश्य उजागर कर सकता है।ऐसे को सम्मानित करने का कोई औचित्य नहीं,जो सम्मान तक ठीक से हज़म नहीं कर सकता।इससे बेहतर है,अपने गैंग का विस्तार करें।सम्मानार्थी को व्हॉट्स-अप ग्रुप का सक्रिय सदस्य होना अनिवार्य हो।परिवारदार आदमी हो तो सोने पर सुहागा।समारोह में श्रोताओं की संख्या की चिंता भी नहीं करनी पड़ेगी।


अब दूसरे पहलू पर ज़्यादा गौर करिए।जिसके परिचय में जितने ज़्यादा सम्मान हों,उन्हें वरीयता दें।इनके मुँह में सम्मान लगा होता है।नहीं मिलने पर और ख़ूँख़ार हो उठते हैं।पक्षपात का आरोप और लगायेंगे।ऐसेसीरियल-रिसीवरसरोकार से ज़्यादा सम्मान के प्यासे होते हैं।बारात में फूफा के बाद सम्मान का कोई भूखा होता है तो यही हैं।ये भले कठिन काव्य के प्रेत हों,पर इनकी सूरत एकदम सपाट और सरल होती है।गोष्ठियों में ये अपने लेखन को छोड़कर लिफ़ाफ़े और शॉल पर गर्व करते हैं।इनकी झोली कितनी भी भर जाए,पुष्पक-विमान में एक सीट की तरह एक लिफ़ाफ़े की गुंजाइश हमेशा रहती है।ये अनुभवी लोग होते हैं।दरअसल, सम्मान लेने की एक तमीज़ होती है।ये इसमें निपुण होते हैं।अख़बार के लिए स्वयं रपट भी ख़ुद लिख देते हैं।अगर भूखे-नंगों को सम्मान दोगे तो बड़ी थू-थू होगी।मेरी बात और है।मैं ऑलरेडी सम्मान-हीन हूँ।साहित्य के लिये पूरा जीवन होम कर चुका हूँ।बस,सम्मान पाने भर के लिए प्राण अटके हैं।मैंने भी बीड़ा उठाया है कि बिना अपने हिस्से का सम्मान लिए संसार नहीं छोड़ूँगा,साहित्य क्या चीज़ है ! हाँ,बाक़ियों के बारे में थोड़ा सतर्कता बरतना।सब मेरे जैसे संकल्पशील नहीं हैं।सम्मान पाने पर गैंग और ग्रुप से भी भाग सकते हैं।संस्था चलानी है तो सहेजना और समेटना सीखिए।ईमानदारी से सरकार तक नहीं बचती,संस्था कैसे बचेगी

एक आख़िरी सुझाव।सभी सम्मानयाफ़्ता लोगों की सूची बना लें।सम्मान की टोपी इन्हीं के इर्द-गिर्द घूमनी चाहिए।इनसे सहयोग वसूला जाए ताकि संस्था के साथ इनकापरमानेंट बॉण्डस्थापित हो सके।ध्यान रहे,समय-समय परबॉण्डकैश भी कराते रहें !


संतोष त्रिवेदी 


न तुम जीते,न हम हारे😉

चुनाव परिणाम आने के बाद से कइयों की गर्मी निकल चुकी है , पर देश के कई हिस्से अभी भी उबल रहे हैं।इस गर्मी के चलते दू...