पृष्ठ

रविवार, 12 सितंबर 2021

‘शूरा’ सो पहचानिए,जो लड़े ‘दीन’ के हेत !

बीते दिनों हमारे पड़ोसी देश में अचानक लोकतंत्र का क़ब्ज़ा हो गया।लोग कुछ समझ पाते,इससे पहले हीदुनिया का चौधरीइसका इंतज़ाम करके निकल लिया।असल लोकतंत्र से टकराने की उसकी भी हिम्मत नहीं हुई।जो लोग कुर्सियों पर बैठे थे,उन्होंने सत्ता का तनिक भी मोह नहीं किया।बचा-खुचा माल-असबाब लेकर वे भी खिसक लिए।वहाँ के लोग अब पूरी तरह बम और बंदूक़ के हवाले हैं।जानकार बताते हैं कि बाज़ार में लोकतंत्र का यह नया संस्करण आया है।इस तंत्र की खूबी यह है कि जो करना होता है,उसके लिए क़ानून,संयुक्त राष्ट्र और मानवाधिकार जैसी बेजान संस्थाओं का मुँह नहीं ताकना पड़ता।


पड़ोसी देश में जो कुछ भीघटरहा है,उसमें अभी तक आम राय नहीं बन पाई है।एक तरफ़ नापाक-पड़ोसी के लिएग़ुलामी की ज़ंजीरेंटूटी हैं तो दूसरी तरफ़सबसे बड़े लोकतंत्रकी चुप्पी नहीं टूट रही है।शायद उसने भी वहाँ आए हुएलोकतंत्रको दूरबीन से देख लिया है।दुनिया भर में वायरस फैलाने वाला सबसे अधिक सक्रिय है।सुनते हैं,उसके फैलने के लिए वहाँ माकूल माहौल है।आतंकवाद और साम्राज्यवाद अब दोनों हिल-मिलकर रहेंगे।


सबसे भले तो वे है जिनकी इस बारे में अब तक कोई राय ही नहीं बनी है।वे महिलाओं,बच्चों और बूढ़ों पर हो रहे जुल्म की कहानियों को अभी भी तौल रहे हैं।सही परख होते ही उनके भी उच्च-विचार सामने आएँगे। हाँ,बुद्धिजीवियों ने हमेशा की तरह निराश नहीं किया है।उसके दोनों धड़ों ने अपनी बहुमूल्य राय पेश कर दी है।जहाँ ग़ैर-बुद्धिजीवी पड़ोसी देश मेंलोकतंत्र की दस्तकको  आतंकी कह रहे हैं,वहीं विशुद्ध-बुद्धिजीवियों के लिए वेलड़ाकाहैं।इनके तईं वे लोकतंत्र कोसरियादेने वाले आधुनिक क्रांतिकारी हैं।कुछ ने तो अपनी बंद आँखों में कश्मीर के भी सपने पाल लिए हैं।वे इसे साँप पालने जैसा मामूली काम समझ रहे हैं।नापाक-पड़ोसी बहुत दिनों बाद उम्मीद से है।इंशाल्लाह इस बार पूरी दुनिया मज़हबी हुकूमत का दीदार कर पाएगी।


इस कशमकश के बीच असल बात को पकड़ने के इरादे से हमने इस उदारवादी और लोकतंत्र समर्थक तालिबान भाईजान से संपर्क किया।मुलाक़ात के लिए किसी बंकर में मिलने की बात की तो उधर से हमें तसल्ली मिली और यह ख़बर भी कि अब चूँकि वेलोकतंतरले आए हैं,इसलिए बेकार पड़े बंकरों में मिलने की ज़रूरत नहीं है।अब जो भी होगा,सरे-आम होगा।आख़िर तय समय पर एक बख़्तरबंद गाड़ी में बैठकर हम उसके ठिकाने पर पहुँचे।चारों तरफ़ संगीनें तनी हुई थीं।जब इसका कारण पूछा तो पता चला कि जब बातचीत संगीन हो तो यह इंतज़ाम करना पड़ता है।वह इतना उदार था कि इंटरव्यू देते वक्त उसने बंदूक़ के ट्रिगर को बड़ी सावधानी से संभाल रखा था क्योंकि गोली चल जाने पर खामखां एक इंटरव्यू हलाक हो जाता।


सबसे पहले मेरी आँखों पर पट्टी बाँध दी गई।इस तरह का तजुर्बा होने से हमें ख़ास तकलीफ़ नहीं हुई।लोकतंत्र को इज़्ज़त बख्शने के इरादे से मेरा मुँह खुला छोड़ दिया गया।इसका फ़ौरी फ़ायदा यह हुआ कि तालिबान भाईजान से मेरी गुफ़्तगू शुरू हो सकी।


इस माहौल में आपको कैसा लग रहा है ? आपको ख़ुदा का ख़ौफ़ भी नहीं रहा अब ?’ मैंने ऊपर वाले का नाम लेकर अपनी ज़ुबान चला दी।यह निहायत बेहूदा सवाल है।हम जो भी कर रहे हैं,उसी के नाम पर तो कर रहे हैं।उसी की दिखाई राह पर चल भी रहे हैं।अल्लाहताला ने चाहा तो हम इस दुनिया से काफ़िरों का नामोनिशां मिटा देंगे।हम अपनी क़ौम के हक़ के लिए लड़ रहे हैं।भाईजान ने बेख़ौफ़ होते हुए जवाब दिया।


जिन औरतों,बच्चों और बूढ़ों को आप मार रहे हैं,ये तो आपकी क़ौम के ही लोग हैं।किनके हक़ के लिए आप बारूद बो रहे हैं ?क्या अल्लाह ने ये सब करने के लिए कहा है ?’ मैंने जल्दबाज़ी में अटपटा-सा सवाल पूछ लिया।इतना सुनते ही भाईजान के हाथ में लहराती बंदूक़ का बदन मेरी खोपड़ी से सटने को आतुर हो उठा।मेरी रूह तक सनसना गई।लगा कि जन्नत का रास्ता ज़्यादा दूर नहीं है।पर तभी भाईजान ने दिलासा दी,‘डरिए मत।हम पवित्र किताब पढ़कर ही गोली मारते हैं।इससे मरने वाले को जन्नत जाने में सहूलियत होती है।गोली मारना हो या सरकार बनाना हो,हम नमाज़ अदा करके ही हर काम अंजाम देते हैं।इससे अल्लाह की ग़वाही भी हो जाती है।रही बात,अपने क़ौम के लोगों को मारने की,ऐसे लोग जो हमारी राह में नहीं चलते,वे काफिर हैं।और काफिर को मारना गुनाह नहीं,नेक काम है।हम मज़हबी लोग हैं,कुछ ग़लत नहीं करते।



पर इससे आपका मज़हब बदनाम नहीं होता ? आपको अल्लाह के नुमाइंदे किसने बना दिया ?’ मैंने कलेजा थामकर उसी बंदूक़ की ओर सवाल उछाला।


लगता है आप भी काफिरों की जमात में शामिल हो गए हैं।आपकी तालीम अधूरी है।हमारी लड़ाईदीनके लिए है।हमने पढ़ रखा हैशूरासो पहचानिए,जो लड़ेदीनके हेत।हमशूराहैं और सिर्फ़दीनके लिए लड़ते हैं।यह कहकर भाईजान ने इस मुलाक़ात के ख़त्म होने का ऐलान कर दिया।


मेरी जान सिर्फ़ इसलिए बख्श दी गई ताकि हम उनकेदीनको दुनिया के सामने ला सकें वरना एक काफ़िर की ज़िंदगी किस काम की ?



रविवार, 8 अगस्त 2021

गुरू-चेला दोऊ बड़े !

सच्चे गुरू की खोज में सब रहते हैं,पर सच्चे चेले के लिए कभी गंभीरता से खोज हुई हो,नहीं मालूम।साहित्य के विद्वानों से यह भारी चूक हुई है।जहाँ कठिन साधना से एक अच्छा-ख़ासा गुरू साधा जा सकता है,वहीं उभरता हुआ चेला शायद ही किसी से सधा हो ! सच तो यह है कि पहुँचा हुआ गुरू भी सामान्य क्वॉलिटी का ही चेला चाहता है।उन्नत क़िस्म का चेला कब शातिर हो जाए,कोई नहीं कह सकता।साहित्य में हमने गुरू-महिमा ख़ूब पढ़ी और सुनी है।गुरुओं पर पुराणों के पन्ने रंग डाले गए हैं पर मजाल है कि चेलों पर कोई चुटका भी लिखा गया हो ! साहित्य शुरू से ही गुरुओं के पक्ष में झुका रहा है।चेले हमेशाअंडररेटकिए गए।उन्हेंगुरु बिन लहै ज्ञानकहकर भरमाया गया।जबकि सच तो यह है कि ज्ञान प्राप्त करने के लिए कोई चेला अपना वक्त बर्बाद नहीं करता।आजकल के गुरू इसीलिएज्ञानके बजायसम्मानबाँट रहे हैं।


लायक चेले जहाँ आज भी गुरू-गान परंपरा का बखूबी निर्वाह कर रहे हैं,वहीं उनके लिएदो शब्दकहने में गुरुजी के पसीने छूटने लगते हैं।सिद्ध गुरुओं का मानना है कि ऐसीआशीर्वादी-समीक्षाओंसे कभी कोई लेखक नहीं बना।वे इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।ऐसे गुरू इतने महान और साहसी होते हैं कि वे चेले के मुँह पर ही उसकी प्रशंसा करके हाथ झाड़ लेते है,पीठ पीछे नहीं।चेले फिर भी अपना धर्म निभाते हैं।कालांतर में गुरूजी को तबियत भर गुरूदक्षिणा देते हैं।तभी उनका उद्धार होता है।


हालाँकि गुरू-चेले का संबंध बड़ा संवेदनशील और बेहद आपसी मसला है पर चेलों के बारे में जानना ज़रूरी है।इनके ऊपर अभी तक कोई विस्तृत शोध नहीं हुआ है।इस वजह से उनकी तमाम विशेषताओं से अधिकतर गुरु अनजान रहते हैं और गच्चा खा जाते हैं।साहित्य में सफल गुरू बनने के लिए ज़रूरी है कि चेलहाई के सारे दाँव-पेंच आने चाहिए।यह तभी संभव है,जब वह ख़ुद विशुद्ध चेला रहा हो।जितना घुटा और ख़ालिस चेला होता है,आगे चलकर वह उतना ही शातिर गुरू बनता है।असल चेला तो वही है जो गुरू को उसके ही अखाड़े में पछाड़ दे।इनमें ज़बर्दस्त प्रतिबद्धता होती है।हमारे एक प्रसिद्ध गुरू का कहना था, ‘ पहले एक छोटे अखाड़े में प्रवेश करिए।अपने गुरु की सेवा कर दो-चार पैंतरे सीखिए और फिर दाँव पाते ही सबसे पहले गुरु को ही चित्त कर दीजिये।इस सबक़ के बाद ही गुरुजीभूतपूर्वहो गए।ज्ञानी जन इसे गुरूद्रोह नहीं कहते।इससे गुरू को वास्तविक मुक्ति मिलती है;साहित्य से भी और इस भौतिक संसार से भी।जो वाक़ई मेंगुरूहोते हैं,वे ऐसे चेलों के इरादे पहले ही भाँप लेते हैं।उन्हें इस तरह केमुक्ति-अभियानोंपर क़तई भरोसा नहीं होता।अपने चेले से वे हमेशा सतर्क रहते हैं।उनमें गुरूदक्षिणा ग्रहण करने की लालसा भी नहीं बचती।यह भी एक समर्पित चेले की सफलता है।


चेलहाई का काम सबसे कठिन होता है।अपने मनोरथ दबाकर गुरू जी पर फ़ोकस करना पड़ता है।चेला गुरुजी कासाहित्यिक-स्टॉलचलाता है,मजूरी में उसे साहित्य का हरसम्मानमिलता है।चेला जब तक ठीक-ठाक नहीं लिखता-पढ़ता,गुरुजी का आशीष बना रहता है।जैसे ही चेले का साक्षात्कार अच्छे लेखन से होता है,उसके बुरे दिन शुरू हो जाते हैं।गुरू से द्रोह करना सबसे बड़ा अपराध है।गुरू के होते और किसी की प्रशंसा करना महापाप है।इससे गुरू तो कुपित होते ही हैं,साहित्य के सारे पुण्यों,सम्मानों से वह वंचित हो जाता है।ऐसे चेले अधम कोटि में आते हैं।


इसी तरह चेलों की और भी कोटियाँ हैं।चोटी का चेला किसी-किसी को ही नसीब होता है।ऐसा चेला गुरू के जीते जी अपने सारे सपने पूरे कर लेता है।गुरू द्वारा अर्जित की गई हर तरह की संपत्ति पर उसकावैधअधिकार होता है।इसके लिए उसे गुरू की आज्ञा भी नहीं लेनी पड़ती।गुरुजी के लिए यह साफ़ संदेश होता है कि अब गुरूदक्षिणा मिलने का समय क़रीब गया है।इस तरह दोनों को मुक्ति मिलती है।


चेलों की एकलंपट कोटिभी है,जो आजकल तेज़ी से बढ़ रही है।इनकेइन्बॉक्सहमेशा ओवरफ्लो रहते हैं जबकि बेचारे गुरूजी सोशल मीडिया में एक-एक कमेंट को तरसते हैं।ऐसे तत्व गुरुजी को चौपालों और गोष्ठियों के बजाय सोशल मीडिया में घेरते हैं।उनकीअमृत-वाणीपर सवाल उठाते हैं।गुरू जी की नई किताब बेचने से इंकार कर देते हैं।नामुराद गुरू की कविता में छंद-दोष निकालते हैं।व्यंग्य मेंसरकारऔरसरोकारढूँढ़ते-फिरते हैं।गुरु फिर भीगुरूठहरे।ऐसे लंपट चेलों का इलाज अपने पास रखते हैं।बचा हुआ मंत्र फूँक देते हैं।कभी हर किताब की पन्नी काटने वाले कन्नी काटने लगते हैं।असभ्य चेलों के नाम सभीसम्मान-सूचियोंसे आदर के साथ यह कहकर कटवा देते हैं कि ये इतने छोटे सम्मान के योग्य नहीं।इसका असर यह होता है कि फिर किसी को गुरुजी केप्रियचेले को सम्मानित करने की हिम्मत नहीं होती।


गुरुओं को इस हालत में लाने वाले ऐसे चेलों का कभी भी कल्याण नहीं हो सकता।



संतोष त्रिवेदी