पृष्ठ

रविवार, 8 मई 2022

साहित्यिक चोरी का कलापक्ष

कल शाम लेखक-मित्र का फ़ोन आया।बड़े आहत थे।कहने लगे,उनके साथ बड़ी नाइंसाफ़ी हुई है।उनकी एक ‘हिट-रचना’ सोशल मीडिया से चोरी हो गई।दो दिन पहले ही उन्होंने उसे वहाँ लगाया था।ख़ूब वाहवाही भी बटोरी थी,पर कुछ लोगों ने उसे अपने नाम से कई जगह बाँट दिया।इस बात की खबर भी उन्हें दूसरों से मिली।उनके लिए यह बहुत बड़ा साहित्यिक-आघात है।उनके दुःख की मैं कल्पना भी नहीं कर सकता क्योंकि मेरी कभी कोई रचना चोरी नहीं हुई।सच तो यह कि लिखने के बाद मुझसे ही नहीं पढ़ी गई तो दूसरे क्या पढ़ते !


ख़ैर,अभी उनकी बात चल रही है तो उन्हीं पर फ़ोकस करते हैं।उनको इतना आहत जानकर मुझे थोड़ा अचरज हुआ।सोचने लगा,ऐसे समय में जब समाज से सद्भाव, देश से लगाव और बड़े गोदामों से निठल्ले नींबू चोरी हो रहे हैं, उन्हें अपनी रचना की पड़ी है, पर नहीं कहा।और भी आहत हो सकते थे।इसलिए मैंने फ़ौरी सांत्वना दी, ‘भई, चोरी होने के ख़तरे हैं तो फ़ायदे भी।फ़िलहाल आप केवल फ़ायदे गिनें।चोरी होकर ही आपकी रचना वायरल हो पाई,वर्ना इसका शायद ही कोई ज़िक्र करता।अब सब जगह इसका प्रसार हो रहा है।मतलब वायरल होने के लिए चोरी होना ज़रूरी है।इसलिए तुम इसका केवल उजला पक्ष देखो।अब तुम प्रेमचंद और परसाई की क़तार में शामिल हो गए हो।जगह-जगह छपकर और कई संस्करणों में बिककर जो उपलब्धि नहीं हासिल कर पाए,वह इस इकलौती रचना ने चोरी होकर दिला दी।यह बड़ी बात है।’ मेरी दो-टूक सुनकर वे और टूट गए।कहने लगे,‘यार, कभी तो सीरियस हुआ करो।मेरी तो नींद उड़ी हुई है।जिन लोगों ने रचना को अपने नाम से लगाया है,लोग उन्हें ही असली रचनाकार मान रहे हैं।मेरी दिक़्क़त अलग क़िस्म की है।एक तो मैं लिखता नहीं।लिखता हूँ तो कोई छापने को तैयार नहीं होता।कहते हैं,सब आपकी तरह बेरोज़गारी नहीं निभा सकते।ले-दे के सोशल मीडिया बचा था,यहाँ भी चोरों ने क़ब्ज़ा कर रखा है….’

  

उनको बीच में ही टोकते हुए मैंने कहा,‘देखिए ,जिन्हें तुम चोर कह रहे हो,तुम्हारी रचनाओं के सजग पाठक और असली प्रशंसक वही हैं।पूरे मनोयोग से पढ़ने के बाद ही वे उन्हें चुराने के क़ाबिल समझते हैं।अपनी ओर से कोई हेरफेर न करके पूरी रचना को मौलिक रूप में आगे बढ़ा देते हैं,बस।इसे तुम ‘चुराना’ कहकर उनकी प्रतिभा का अपमान कर रहे हो।कम से कम वे आज के आलोचकों की तरह नहीं हैं जो एक तरफ़ तो अपने मित्रों की रचनाओं को बिना पढ़े सिर पर चढ़ा लेते हैं, वहीं अमित्र लेखक की रचना को ललाट पर चश्मा चढ़ाकर उसका ‘क्लास’ देखते हैं और एकदम से ख़ारिज कर देते हैं।इससे तो ये ‘चोट्टे’ कहीं अधिक ईमानदार हैं।’


‘फिर भी इस चौर्यकर्म को मैं भुला नहीं सकता।मेरा नाम मिट्टी में मिल जाता तो भी मैं संतोष कर लेता,पर इस कृत्य से तो सोशल-मीडिया में मिल गया हूँ।आने वाले सभी सम्मान यही चोट्टे हथिया सकते हैं।यह अन्याय मेरे साथ नहीं पूरी साहित्यिक-बिरादरी के साथ हुआ है।इससे मोर्चा लेने की ज़रूरत है,न कि आँख मूँद लेने की।जब हम अपने धर्म को बचाने के लिए ‘शोभायात्रा’ और जुलूस तथा देशभक्ति साबित करने के लिए ‘तिरंगा-यात्रा’ निकाल रहे हैं, फिर मेरी रचना के लिए भी ‘मौलिक यात्रा’ क्यों नहीं ! इस पर साहित्य-जगत मौन क्यों है ? यह सभी रचनाकर्मियों का धर्म है।’ इतना कहकर उन्होंने ठंडी साँस भरी।


उनके मुँह से धर्म का नाम सुनते ही मेरे कान खड़े हो गए।वे साहित्य में धर्म घुसेड़ने पर आमादा थे।पहले ही राजनीति में घुसकर धर्म ने सबका कल्याण कर दिया है,अभी भी उनको उससे आस है।धर्म के प्रति उनके प्रेम को देखकर मेरे मन में ‘निम्न’ विचार आने लगे।‘लोगों के दिलों से भक्ति,इबादत कब चोरी हो गई पता ही नहीं चला।ईश्वर पूरी तरह नारे में बदल गया है।लोग इतने आस्थावान हो गए हैं कि दूसरों के घरों में घुसकर प्रार्थनाएँ बाँच रहे हैं।’मैंने उनसे यह सब नहीं कहा बल्कि उनके संघर्ष वाले जज़्बे की सराहना की।उन्होंने भी साहित्यिक-चोरों को देख लेने की बात कहकर फ़ोन काट दिया।


उनके इस दुःख से मुझे आत्मीय सुख मिला।मैं मन ही मन ख़ुश था,पर संवाद के दौरान प्रकट नहीं होने दिया।लिखते-पढ़ते इतनी कुशलता तो आ ही गई है।इस ‘साहित्यिक-चोरकटई’ को झाँकने के लिए मैंने सोशल मीडिया में प्रवेश किया।सभी चोर अपनी बात पर अड़े थे।एक युवा चोर ने ज्ञान दिया कि लिखने के बाद रचना लेखक की नहीं रह जाती।साहित्य और राजनीति में विज्ञान की तरह का कोई पेटेंट नहीं होता।हर कोई अपनी कलात्मकता दिखा सकता है।एक वरिष्ठ चोर ने अपना अनुभव साझा करते हुए बताया कि उनके कविता के तीन संग्रह इसी प्रतिभा की उपज हैं।अगर इस तरह इस कला पर प्रतिबंध लगाया गया तो साहित्य भी नीरस होकर रह जाएगा।हम जैसे लोग ही साहित्य का सही प्रचार-प्रसार कर रहे हैं।आज का पाठक भी विवादित साहित्य को पहले लपकता है।इसलिए इस कला को संरक्षण की ज़रूरत है।उनके इन तर्कों का सभी संभावित चोरों ने समर्थन किया।मैं बिना कुछ कहे ‘ट्विटर’ में कूद पड़ा।यहाँ लेखक-मित्र की रचना को एक अनुभवी चोर ने अपने नाम से पोस्ट कर रखा था।मैंने उस पर कमेंट किया,‘साहित्यिक चोरी अच्छी बात नहीं।’ उसने इसे भी तुरंत रिट्वीट कर दिया।


संतोष त्रिवेदी 

रविवार, 27 मार्च 2022

मूर्ख होने का मुग़ालता

बचपन में पढ़ा था कि आदमी पढ़-लिखकर बुद्धिमान बन जाता है जबकि बिना पढ़ा-लिखा आदमी निरा मूर्ख रहता है।पर अब जाकर पता चला कि यह सब किताबी बातें हैं।ख़ूब पढ़-लिखकर भी आदमी अच्छी क्वॉलिटी का मूर्ख बन सकता है।पढ़ने से मूर्खता और प्रतिभाशाली हो उठती है।जहाँ बुद्धिमान होना काग़ज़ी और ‘फ़ेक’ है वहीं मूर्ख होना सहज और ‘रियल’ है।मेरे कई मित्र पैदाइशी बुद्धिमान हैं।पढ़-लिखकर वे सब बुद्धिजीवी बन चुके हैं।अच्छी बात यह कि वे मुझे भी अपने जैसा ही समझते हैं।दरअसल,यह उनकी गलती नहीं है।मैंने खुद को ऐसा तैयार किया है कि बाहर से बुद्धिमान लगूँ।कई बार तो मुझे भी शंका होने लगती है कि मैं भी उन जैसा हूँ।फिर अगले पल मेरी उपलब्धियाँ बताती हैं कि मैं दिशाहीन होने से बच गया।बिना किसी मुलम्मे के मैं सोने-सा ख़रा मूर्ख हूँ।मुझे इस बात का बेहद संतोष है कि मूर्खता के दम पर मैंने अपनी अलग पहचान बनाई है।आज बुद्धिमान झख मार रहे हैं और हम जैसे मूर्ख इतिहास लिख रहे हैं।


बुद्धिमान होने के जहाँ ढेर सारे संकट हैं,मूर्ख होते ही वही सब अवसर में बदल जाते हैं।मुझे बुद्धिमान होना कभी सहज नहीं लगा।चेहरे से लेकर काम-काज तक में इसका असर दिखाई देता है।बुद्धिमान दिखने के लिए मनहूसियत की हद तक गंभीर होना होता है,जबकि मूर्ख हमेशा खिला-खिला और ‘ओपन’ होता है।वह जल्दी खुल जाता है जबकि बुद्धिमान नामक जीव कई मुलाक़ातों में भी नहीं खुलता।बेहद गोपन होता है।मूर्खता मौलिक हो तो आदमी बिलकुल सहज रहता है।उसमें कोई बनावट या मिलावट नहीं होती।विद्वान इसीलिए उसे ‘जड़’ कहते हैं।वह हर हाल में स्थिर होता है।झूठ-मूठ की विद्वता ओढ़ना,स्वाँग करना और दूसरों को भ्रमित करना बुद्धिमानों के साधारण कृत्य हैं।मूर्ख जो करते हैं,उल्लेखनीय करते हैं।इसीलिए मूर्खता मुझे हमेशा से आकर्षित करती रही है।इसका अपना आत्म-विश्वास होता है।मूर्ख बात-बात पर गर्व की अनुभूति करता है जबकि बुद्धिमान इतना दीन होता है कि वह किसी बात के लिए गर्व भी नहीं कर सकता।


मैं जितने बुद्धिमानों को जानता हूँ,सब परेशान रहते हैं।कभी स्वयं के लिए,कभी समाज के लिए,कभी देश के लिए।कभी-कभी तो वे किसी ‘फ़िल्म’ के लिए भी बेचैन हो उठते हैं।असल में किसी ने उन्हें बता दिया है कि बेचैन रहना ही बुद्धिमान बने रहना है।उनकी इस बेचैनी का खमियाजा कभी कविता भरती है,कभी कहानी।जब ज़्यादा बेचैन होते हैं तो उपन्यास पूरा होने से पहले नहीं रुकते।यह बेचैनी भी वे सोशल-मीडिया में बताकर ख़त्म करते हैं।इससे प्रकाशक बेचैन हो उठता है कि अब उसे उनकी इस ‘बेचैनी’ का सदुपयोग करना पड़ेगा।यह तो ऐसे बुद्धिमानों की व्यथा है जो साहित्य में घुसकर अपनी बेचैनी दूर कर लेते हैं।एक फ़िल्म के लिए जब यह बेचैनी मचती है तो करोड़ों का बिज़नेस कर डालती है।इसे करने के लिए अव्वल दर्जे की बुद्धिमत्ता की ज़रूरत होती है।कुछ दूसरे बुद्धिमान हैं,जो मँहगाई और अराजकता पर सरकार के ख़िलाफ़ ‘चैनल’ खोल देते हैं।देश-दुनिया में कोई मरे,ये हरदम ‘लाइव’ रहते हैं।ऐसे ‘मिलिनेयर यू-ट्यूबर’ थोड़ी-थोड़ी देर में बेचैन हो उठते हैं।सरकार भी उनकी इस बेचैनी को ख़ूब हवा देती है।पब्लिक की बेचैनी इससे काफ़ी कम हो जाती है।इस तरह साहित्य हो या राजनीति,सब जगह बेचैनी ‘कैश’ होती है।


मूर्ख होने पर ऐसा कुछ भी ‘फ़ील’ नहीं होता।वह दूसरों की चिंता में अपना सुख बर्बाद नहीं करता।दूसरे के दुःख में भी वह अपने हिस्से का सुख खींच लेता है।बुद्धिमान बनना मुझे शुरू से इसलिए भी पसंद नहीं रहा क्योंकि उसका समानार्थी शब्द ‘अक़्लमंद’ होता है।जिसकी अक़्ल ही मंद हो,वह किस गति को प्राप्त होगा,आप आसानी से समझ सकते हैं।इतने अक़्लमंद तो आप भी होंगे !


मूर्ख मूलतः तीन प्रकार के पाए जाते हैं।निम्न कोटि वाले ‘शठ’ कहाते हैं।ऐसे लोग ज़्यादा देर तक नहीं टिक पाते।‘सत्संगति’ पाकर एकदम से विचलित हो उठते हैं।इनकी मूर्खता पर अधिक भरोसा नहीं किया जा सकता।इसके बाद मध्य कोटि वाले ‘लंठ’ होते हैं।इनको विधाता तक नहीं सुधार सकते।सरकार भी सुधारने का प्रयास नहीं करती।इन दोनों के बारे में तुलसी बाबा थोड़ा संकेत दे गए हैं।इधर तेज़ी से नया ‘वेरियंट’ विकसित हुआ है।यह उच्च कोटि की प्रजाति है ,जिसे ‘बज्रमूर्ख’ कहते हैं।इसे अक़्सर सोशल मीडिया में पाया जाता है।यह किसी की नहीं सुनता।केवल अपनी सुनाता है।सत्य और तथ्य से इसे रत्ती भर मतलब नहीं होता।यहाँ तक कि इसके पास सत्य को भी असत्य सिद्ध कर देने की मौलिक मूर्खता होती है।आधुनिक काल की यह नई उपलब्धि है।इसे ईश्वर और सरकार दोनों की कृपा समान रूप से मिलती है।मेरा अंतिम लक्ष्य यही उत्तम कोटि की मूर्खता है।पूरे मनोयोग से मैं इस पर लगा हूँ।अब यही देखिए ! रात का अंतिम प्रहर है।घर के बाक़ी सदस्य बुद्धि बेचकर सो रहे हैं और मैं उसी बुद्धि से मूर्खता पर गंभीर शोध कर रहा हूँ।संपूर्ण जगत के लिए साहित्य रच रहा हूँ।अब आप खुद तय कीजिए कि मेरी तपस्या में क्या कमी है !



संतोष त्रिवेदी


रविवार, 27 फ़रवरी 2022

मेरी नई किताब और विश्व-युद्ध !

फागुन की अभी शुरुआत ही हुई थी कि मेरी तीसरी किताब पाठकों पर मिसाइल बनकर टूट पड़ी।लोग कोरोना की तीसरी लहर से ठीक से उबर भी नहीं पाए थे कि मेरे ‘पुतिननुमा’ कृत्य से पूरा साहित्य-जगत दहल गया।वायरस से मरने वालों का सही-सही आँकड़ा सरकार के पास भले न हो,मेरी इस किताबी-मिसाइल से कितने लेखक आहत हुए,इसकी सटीक जानकारी ज़रूर मेरे पास है।अपनी किताब के बहाने साहित्य को क़ब्ज़ाने की मेरी योजना हिट साबित हुई।ख़ास दोस्तों के द्वारा सोशल मीडिया को मैंने पहले ही साध लिया था।हर-एक को आगाह कर दिया था कि मेरी नई किताब के साथ ही अपनी सेल्फ़ी डालें अन्यथा आगामी गोष्ठियों में उठने-बैठने लायक नहीं रहेंगे।इसका असर तुरंत हुआ।जिधर देखो,मेरी किताब की चर्चा।इसका साइड-इफ़ेक्ट भी देखने को मिला।एक वरिष्ठ लेखक ख़ुद को मिले ‘सम्मान’ की बधाइयाँ ठीक तरह से बटोर नहीं पाए थे कि यह हादसा हो गया।जहाँ एक ओर मुझे अनगिन बधाइयाँ मिल रही थीं,वहीं साहित्यिक गलियारों में गिन-गिनकर लोग मेरे प्रकाशक को कोस रहे थे।वे इस बात से चिंतित थे कि यदि मेरे किताबों की ‘डिलिवरी’ इसी तरह जारी रही तो साहित्यिक-कचरे के निपटान में बड़ी समस्या आने वाली है।मेरी किताब की मारक-क्षमता का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि तमाम वरिष्ठों ने अपने फ़ोन ही बंद कर लिए।वे ‘जो बाइडेन’ की तरह सोशल-मीडिया में निंदक-मिसाइलें चलाने लगे।उनकी चिंता यह थी कि यदि यह लेखक इसी रफ़्तार से आगे बढ़ता रहा तो वे अधिक दिनों तक वरिष्ठ नहीं बने रह पाएँगे।उनसे यह ‘ताज’ भी छिन जाएगा।दूसरी ओर युवा-पीढ़ी को तो जैसे काठ मार गया हो।मेरे लेखन का यह आतंक मचा कि उनका छपना बंद हो गया।पलक झपकते ही मैं संभावनाशील लेखक से चर्चित लेखक की कोटि में आ गया।अंदरखाने चर्चा थी कि इस बार का अकादमी त्रिवेदी ही मारेगा।वही बचा है।मुझे ऐसी सूचनाएँ निजी सूत्रों से प्राप्त हो रही थीं।अपने सूत्रों पर मुझे अपने लेखन से अधिक भरोसा था,इसलिए मैंने भी स्वयं को इस योग्य मान लिया।


एक तो फागुन का ख़ुमार,दूसरे ‘वायरल-लेखक’ बनने का नशा;मैं अचानक साहित्य के केंद्र में आ गया।कई व्हाट्स-अप समूहों ने मुझे विशिष्ट अतिथि बना डाला।आख़िरकार ‘साहित्य-धारा’ समूह के न्योते को मैंने बड़ी विनम्रता से स्वीकार किया।समूह के एडमिन से अपनी पुरानी जान-पहचान थी,सो उनका मान रखना पड़ा।उन्होंने भी चर्चा में ‘सुरक्षा-परिषद’ की तरह मेरे ‘सम्मान-रक्षा’ की पूरी गारंटी दी।अंदर की बात यह भी थी कि मेरी नई किताब की भूमिका उन्होंने ही लिखी थी।मेरे लेखक बनने में इस नाते उनकी प्रत्यक्ष भूमिका थी।लेखक उन्होंने ज़रूर बनाया था पर चर्चित अपने कारनामों की वजह से ही हुआ।


बहरहाल,तय समय पर समूह की ‘ज़ूम-वार्ता’ शुरू हुई।विषय था, ‘समकालीन लेखन और विश्व-साहित्य’।विषय से ही आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि मेरी ख्याति अब ‘लोकल’ से ‘ग्लोबल’ स्तर की हो चुकी है।गोष्ठी प्रारंभ होते ही एडमिन ने चर्चा की दिशा तय कर दी।वह मेरा परिचय कराते हुए बोले-‘आज हमारे बीच अंतरराष्ट्रीय स्तर के लेखक मौजूद हैं।ये स्थानीय मुद्दों को बिलकुल नहीं छूते।इनका लेखन ‘एलीट-क्लॉस’ का है।हमें ख़ुशी है कि इतनी बड़ी प्रतिभा आज हमारे गैंग सॉरी ग्रुप में उपस्थित है।अब यह अपने अमूल्य अनुभवों को हमारे साथ साझा करेंगे।’


एक पल को लगा कि मैं फागुन में झूम रहा हूँ,पर तुरंत अहसास हुआ कि ‘ज़ूम-मीटिंग’ में हूँ।दाएँ हाथ की तर्जनी उँगली को उठाते हुए हमने बोलना शुरू किया, ‘इस समय संसार और साहित्य दोनों ख़तरे में हैं।हमें सड़कों और खेतों पर बौराते साँड़ दिख रहे हैं,जबकि विश्व-परिदृश्य में दो साँड़ अचानक भिड़ गए हैं।हमें यहाँ फ़ोकस करना चाहिए।यह महत्वपूर्ण नहीं है कि आप क्या लिखते हैं;किस पाले में हैं,यह ग़ौरतलब है।हमारा लेखक है कि स्थानीय मसलों पर ही उलझा रहता है।सच तो यह है कि लोकल-लड़ाई से विश्व-युद्ध की महत्ता कहीं अधिक है।उसकी रेटिंग हमेशा टॉप पर होती है।उसकी चपेट से बाज़ार,लोकतंत्र और साम्यवाद एक साथ ‘गिर’ जाते हैं।लोकल-लड़ाई में तो केवल सिर-फ़ुटौवल या बहुत हुआ तो जूता-लात की ही नौबत आती है।दो-चार लेखक ही ‘गिरते’ हैं बस।ऐसी छोटी-छोटी बातों को कोई नोटिस तक नहीं लेता अब।इसलिए आदर्शवादी नहीं यथार्थवादी बनो।अंतरराष्ट्रीय लेखक कलम घिसकर नहीं बना जा सकता है।अपने लेखन को ‘इंटरनैशनल-टच’ दीजिए।आप लोग जब तक ‘लोकल’ मुद्दे उठाते रहेंगे,कभी ‘ग्लोबल-राइटर’ नहीं बन पाएँगे।यदि ट्वीट भी करना है तो सीधे पुतिन या बाइडेन के ख़िलाफ़ करो।लंबा खेलो।चीन की तरह ताक में रहो।मौका पाते ही दूसरे के ‘प्लॉट’ में कविता बो दो।इधर-उधर से ‘कॉपी-पेस्ट’ करो पर अपना साहित्यिक-क्षेत्रफल बढ़ाओ।यह आपकी ज़मीन है।यदि अवसर गँवा दिया तो न साहित्य बचेगा न संसार।मेरी नई किताब ‘लाल टोपी का सपना’ इसी का परिणाम है।’

‘पर ‘लाल टोपी’ का उल्लेख करके तो आप ‘लोकल’ मुद्दे पर नहीं आ गए ?’ एक युवा लेखक ने मुझे पकड़ा।उसकी नासमझी पर मेरी हँसी छूट गई।मैं बोला-लगता है कभी पुराने गाने नहीं सुने,नहीं तो ‘लाल टोपी रूसी’ को कैसे भूल जाते !’


लगा चलती मीटिंग में जैसे फिर मिसाइल गिर पड़ी हो !


संतोष त्रिवेदी 


रविवार, 6 फ़रवरी 2022

सावधान,वे ग़रीबों के बारे में सोच रहे हैं !

देश के कई हिस्सों से बेमौसम बरसात की ख़बर है।जहाँ चुनाव होने वाले हैं,वहाँ दोहरी बरसात हो रही है।बादलों का रूप धरकर सब नेता अपने चुनावी-क्षेत्रों में बरस रहे हैं।आम आदमी बरसाती-ओलों से तो फिर भी बच सकता है पर वह चुनावी-गोलों की ज़द में आए बिना नहीं रह सकता।नेताजी महल में बैठकर मँहगाई से संतप्त जनता को कई बार सांत्वना दे चुके हैं पर मुई वोट की ख़ातिर उन्होंने ग़रीबों के बारे मेंसीरियसलीसोचना शुरू कर दिया है।इस बार नेताजी वाक़ईसीरियसहैं।वे पहले भी सोचते रहे हैं पर इस वक्त उसकी तीव्रता और फ़्रीक्वेंसी थोड़ा बढ़ गई है।थोड़े-थोड़े अंतराल के बाद इस सोच को वेरिन्यूकरते रहते हैं।


देश के ग़रीबों के लिए वह और उनकी सरकार हमेशा से समर्पित रही है।ग़रीब हैं तो योजनाएँ हैं।योजनाएँ हैं तो सोच है।सोच है तो वह भी हैं।इस बीच अगर चुनाव गए हैं तो क्या हुआ ? इस सोच को वह रोक तो नहीं सकते ! ऐसा नहीं है कि केवल वही ऐसा सोचते हैं।ग़रीबों पर हर नेता का अधिकार है।उसका वोट सबके लिए खुला है।जो चाहे,लूट ले।ग़रीबों के कल्याण की सोच सर्वव्यापी और सार्वकालिक है।यह किसी चुनाव-फुनाव के आने से नहीं रुक सकती।बक़ौल नेताजी,सरकार ने इस बार भी तय किया है कि वह ग़रीबों का कल्याण करके रहेगी।इससे ग़रीब सोच में पड़ गए हैं।उन्हें आशंका है ,कहीं ग़रीबी का उनका यह तमग़ा भी उनसे छिन जाए ! पर यह महज़ अफ़वाह है।सरकार ने भरोसा दिया है कि उनका राशन-कार्ड कभी बंद नहीं होगा।वे काग़ज़ों में भी गरीब बने रहेंगे।


इस बीच बजट चुका है।सरकार ने इसे दूरदर्शी और विपक्ष ने मंहगाई बढ़ाने वाला बताया है।मुझे जब ख़ुद इसे समझने में दिक़्क़त हुई,तो अख़बार और टीवी ने बताया कि यह दूरगामी बजट है।इसका असल फ़ायदा पचीस साल बाद दिखेगा।इस बार मैं सरकार से सहमत और विपक्ष से असहमत हूँ।सरकार की यह बात सोलह आने सच है कि यह दूरदर्शी बजट है।उसे निकट का दिखता भी नहीं।ऐसा होता तो कम से कम ये चुनाव ही उसे दिख जाते।रही विपक्ष के मँहगाई बढ़ाने की बात,वह बिलकुल बेबुनियाद है।जूते और चार्जर सस्ते हो गए हैं।चीजें तो और भी खूब सस्ती हुई हैं पर ये दोनों आम आदमी से ज़्यादा ताल्लुक़ रखती हैं।आदमी पैदल है तो जूते घिसेंगे ही।यही सोचकर जूते सस्ते किए गए हैं।चार्जर का सस्ता होना भी बड़ा कदम है।हर आदमी रोटी-रोज़गार छोड़कर दिन भर सोशल-मीडिया में बैठा रहता है।वह हर तरह से चार्ज रहे,सरकार की यही मंशा है।और हाँ,सरकार इन दिनोंकैश-लेसपर खूब ज़ोर दे रही है,ग़रीब आदमी को भी इसका भरपूर समर्थन प्राप्त है।इसलिए उसने अपनी क़मीज़ से जेब तक निकाल फेंकी है।उसको आस है कि डिजिटल-रुपया आते ही उसकी भूख भी डिजिटल हो जाएगी।उसका पेट ऑनलाइन ही भर दिया जाएगा।


फ़िलहाल सरकार की जेब बजट से फ़ुल है।ऐसे में कल्याण का ढोल बख़ूबी बज सकता है।सरकार यही करना चाहती है।वह कहती है कि विपक्ष ग़रीब-विरोधी है पर विपक्ष इसे सरासर ग़लत मानता है।वह ग़रीबों से एकजुटता दिखाने के लिए ख़ुद भी कितना ग़रीब है ! उसकी अंदरूनी चाहत है कि ग़रीब बने रहें।इन्हीं से उसका कल्याण हो सकता है।दरअसल  कल्याण की दरकार उसे ग़रीब से ज़्यादा है।सरकार है कि विपक्ष के मंसूबे पूरे नहीं होने देना चाहती।इसलिए वह लगातारग़रीब-कल्याण-योजनालाने को प्रतिबद्ध है।आख़िर उसे भी तो अपना कल्याण करवाना है।


इधर ग़रीब ख़ुश है।उसके दोनों हाथों में लड्डू है जो शून्य की तरह गोल है।उसके कल्याण के लिए पक्ष और विपक्ष में मारामारी मची है।अभी तो कल्याण का प्रथम चरण है।इस बारे में सोचा ही जा रहा है।जब कल्याण को ग़रीब के गले में आधिकारिक रूप से लटकाया जाएगा,तब उसे असल मुक्ति मिलेगी ! यह सोच-सोचकर ही वह रोमांचित है।सोचने पर केवल सरकार का ही अधिकार नहीं है।कभी-कभी ग़रीब भी सोच लेता है।इससे यह बात साफ़ होती है कि सरकार और ग़रीब की सोच में कितनी समानता है ! दोनों चुनाव के समय ही सोचते हैं।यह सौभाग्य की बात है कि सरकार ग़रीबों के लिए सोच ही रही थी कि चुनाव गए।उनका कल्याण होने से अब कोई नहीं रोक सकता।


ऐसे ही एककल्याण-कार्यक्रममें जाना हुआ।बड़ा दिव्य आयोजन था।कोने-कोने से ग़रीब आए हुए थे।नेताजी बेहद उत्साहित थे।बिना जाति पूछे ही घोषणा-पत्र और संकल्प-पत्र बाँट रहे थे।ग़रीबों का कितना कल्याण हुआ है,यह वे नेताजी द्वारा बाँटे जा रहे पैंफलेट से जान रहे थे।इससे पता चलता है कि देश में अभी भी कितनी अशिक्षा है।अख़बारों और चैनलों के दिन-रात बताने के बाद भी लोग शिक्षित नहीं हो पाए हैं।एक भटका हुआ ग़रीब मुझसे भी टकरा गया।कहने लगा कि नेताजी बड़े उदार हैं।मैं भूखा रहूँ इसलिए खाना खाने की बजाय साथ में केवल फ़ोटो खिंचवाई।ऐसे दयालु अब कहाँ मिलते हैं ! भगवान करे,चुनाव कभी ख़त्म ही हों !


संतोष त्रिवेदी