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रविवार, 20 अप्रैल 2025

सम्मान समारोह में एक दिन

अमूमन मैं सम्मान-समारोहों में नहीं जाता।दरअसल दूसरों को दुशाला ओढ़ते देखकर मेरी तबियत ख़राब होने लगती है लेकिन यह बात कोई नहीं जानता।मैं बताता भी नहीं।असली लेखक वही है जो सारी पीड़ा रचनाओं के माध्यम से न निकाले,कुछ आत्मसात भी कर ले।लेकिन यह बात भी हर कोई नहीं जानता।ज़्यादा तकलीफ़ मुझे तब होती है, जब इन समारोहों में सबके साथ ताली बजानी पड़ती है।मेरे भूतपूर्व गुरू कहा करते थे कि हम किसी समारोह में तालियाँ बजाने क्यों जाएँ ! केवल वहीं जाएँ जहाँ हमारे लिए दूसरे तालियाँ बजाएँ।उन्होंने आगे यह नहीं बताया था कि यदि दूसरे भी ऐसा सोच लें फिर हमारे लिए तालियाँ कौन बजाएगा ! मैंने इसका विकल्प उनसे नहीं पूछा था।उस वक़्त गुरू-विहीन रहने का कोई विकल्प मेरे पास था भी नहीं।आज वह गुरू नहीं रहे पर उनके खूब विकल्प मौजूद हैं।दिक्कत बस यही है कि गुरुओं के पास भी खूब विकल्प हैं।छोटे-मोटे गुरू तो अपन भी अब बन गए हैं।यह उपलब्धि मैंने स्वयं अपने पराक्रम से अर्जित की है।इसका प्रमाण है कि वास्तविक वरिष्ठ मुझसे अपनी जान बचाते हैं और समकालीन सहोदर भाव नहीं देते।हाँ,उदीयमान लौंडे ज़रूर साहित्य में मेरी असफलता के राज जानना चाहते हैं ताकि उनका बहुमूल्य समय नष्ट न हो और वे आराम से ‘रील’ बना सकें।


बहरहाल,अभी बात मेरी नहीं हो रही थी।मैं तो सम्मान-समारोहों की ज़रूरत पर बोलना चाह रहा था।आज का समय ‘लिखने’ के बजाय ‘दिखने’ का है।आप कितना भी लिख चुके हों या लिख रहे हों,जब तक सार्वजनिक मंचों और अंतर्जाल की दुनिया में आप ‘लाइव’ रहेंगे,जीवित रहेंगे।इसके उलट आप बिसार दिए जाएँगे।आपको ख़ुद अपने लेखक होने पर संदेह होने लगेगा।इसलिए मैं भले ही सार्वजनिक समारोहों से नदारद रहूँ,अंतर्जाल पर ज़रूर कोई न कोई जाल बुनता रहता हूँ।इससे साहित्य आतंकित रहता है और मैं जीवित।


आए दिन सम्मानों को लेकर हाय-तौबा मची रहती है।लगता है साहित्य केवल सम्मान के लिए ही बना और बचा हुआ है।ठीक वैसे ही जैसे सियासत सेवा के लिए।आज हालत यह है कि लेखक लिखते बाद में हैं, ‘सम्मान’ की गारंटी पहले माँगते हैं।सम्मान के वादे पर इन्हें भरोसा नहीं होता क्योंकि यह शब्द अब अपना अर्थ खो चुका है।साहित्य हो,सियासत हो या निजी जीवन हो,वादे किए ही इसलिए जाते हैं कि उन्हें पूरा करने का कोई नैतिक दबाव नहीं होता।सम्मान-समारोह का ताजा जिक्र इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि तीन दिन पहले इंटरनेट मीडिया पर इसका सामूहिक न्योता परोसा गया था।उस साहित्यिक-भंडारे में सम्मानित होने वालों में चिर-वरिष्ठ से लेकर वर्षों से उभरते हुए रचनाकार शामिल थे।उन्होंने अलग से इस बात का ढोल भी पीटा कि माँ सरस्वती जी की कृपा से उन्हें इस लायक समझा गया।यानी वे भी मानते हैं कि वाक़ई वे हैं नालायक ही पर भोले इतने हैं कि दूसरों से अपने को ‘लाइक’ करवाना चाहते हैं।


इस बार नेताओं की तरह मेरी अंतरात्मा भी अँधेरा गहराते ही जाग गई।मुझे सार्वजनिक जगहों पर दिखे हुए बहुत दिन हो गए थे।किसी को कोई फर्क ही नहीं पड़ा था।अब समारोह में जाकर फर्क महसूस किया जाए,यह सोचकर अँधेरे का फ़ायदा उठाकर मैं हॉल में घुस गया।सबसे पीछे वाली पंक्ति में जगह तलाश रहा था कि अचानक मुझे दो आकृतियाँ नज़र आईं।वे आपस में कुछ फुसफुसा रही थीं।आँखें फटी रह गईं और कान चौंकन्ने हो गए।


बिल्कुल पास में हमारे पुरखे परसाई और जोशी जी फुसफुसा रहे थे।मैंने कान खड़े कर दिए।परसाई जी कह रहे थे, ‘यार जोशी ! काश, अपने समय में इतनी इज्जत होती तो हमारे हिस्से भी थोड़ी आती।मंच पर तुम्हारे और हमारे नाम के बीस-बीस इनाम बाँटे जा रहे हैं।जिसे हमारे नाम का शिखर इनाम दिया जा रहा है,वो राग-दरबारी का मशहूर गायक है।यह सुनकर जोशी जी बोल पड़े ,‘तुम्हारा वाला तो कम से कम व्यंग्य को बाज़ार में ले आया,मेरा वाला तो सम्मानों का शतक बना रहा है।हर गली-मुहल्ले के इनाम से मेरा नाम जोड़ दिया है।सुना है अब त्यागी जी भी उसके क़ब्ज़े में हैं।’


त्यागी का नाम सुनते ही परसाई सतर्क हो गए।मुझे घूरते हुए बोले, ‘अजी,तुम्हीं तो त्यागी नहीं हो ?’ मैंने सकपकाते हुए मंच की ओर इशारा किया।वे जो सबसे किनारे वाली कुर्सी पर सिर टिकाए बैठे हैं,वही त्यागी जी हैं।परसाई और जोशी दोनों एक साथ मंच की ओर देखने लगे।तभी भंडारे के आयोजक ने परसाई और जोशी का नाम ले-लेकर लिफाफे बाँटने शुरू कर दिए।यह देखकर परसाई जी भावुक हो उठे,‘ऐसे प्यार के लिए हम दोनों बार-बार मर सकते हैं !’ 


समारोह एक बार फिर तालियों से गूँज उठा।



रविवार, 6 अक्टूबर 2024

सम्मान की खोज

वह एक सामान्य दिन नहीं था।मैं देर से सोकर उठा था।अभी अलसाया ही था कि ख़ास मित्र का फ़ोन आ गया।ख़ास इसलिए क्योंकि उनसे अमूमन बात नहीं होती।कुछ असामान्य घटित होता है तो वह पहली सूचना मुझे ही देते हैं।इस आशंका से मैं एकबारगी सहम उठा।मैंने डरते-डरते कॉल रिसीव की।उधर से मित्र की भारी सी आवाज़ कानों में पड़ी ‘यार,इस बार भी त्रिपाठी मार ले गया।न जाने साहित्य को कौन-सा ग्रहण लग गया है ! न तो मानवीय संबंधों की कोई कद्र बची है और न नियम-क़ायदों की।साहित्य को गिरने से अब तो मैं भी नहीं बचा सकता।’ यह कहकर उन्होंने गहरी साँस ली।


त्रिपाठी का नाम सुनते ही मेरी चेतना वापस आ गई।मेरा संवेदनशील हृदय ज़ोर-ज़ोर से पंप करने लगा।त्रिपाठी हम दोनों का कॉमन-शत्रु था।अच्छा लिखता था पर वह हमें बिल्कुल अच्छा नहीं लगता था।इस खबर के बाद और भी बुरा लगने लगा।फिर भी स्वयं पर नियंत्रण करते हुए पूछा, ‘ क्या हुआ मित्र ! जरा खुलकर बताओ ताकि मैं भी तुम्हारी चिंता में शरीक़ हो सकूँ ! उसने तुम्हारा क्या अनर्थ कर दिया ?’


वह लगभग डपटते हुए बोले ,‘ भई, तुम स्थिति की गंभीरता नहीं समझ रहे हो।गाज मेरे ऊपर नहीं गिरी है।मैं तो तुम्हारे लिए हलकान हो रहा हूँ।इस बार बड़े लेखक वाला सम्मान जो तुम्हें मिलना चाहिए था, वह ले गया।वह इतना भी बड़ा नहीं हुआ कि सबसे बड़े लेखक के नाम का सम्मान उसे मिले।अभी हम जीवित हैं।’ यह कहते हुए उन्होंने उसके माता-पिता को समुचित आदर दिया।इस मामले में वह पर्याप्त विनम्र थे।आपसी मतभेदों को सादर निपटाते थे।


इस बीच मैं गंभीर हो चुका था और ग़मगीन भी।आज आख़िरी आस भी टूट गई।ऐरे-ग़ैरे रोज़ सम्मान पा रहे हैं और मैं इस श्रेणी के भी लायक़ नहीं।मन को कहाँ तक सांत्वना दूँ पर बात तो करनी थी,सो बोल दिया, ‘किंतु यह हुआ कैसे ? इस बार तो हमने सही फ़ील्डिंग जमाई थी।चयनकर्ताओं की नियमित ख़ैर-ख़बर भी रखते थे।एक की तो हवाई-टिकट के पैसे हमीं ने दिए थे और दूसरे के मोबाइल को तीन बार रीचार्ज कराया था।फिर भी ! मुझे तो (स्साले)शुक्ला पर संदेह है।वह मुझसे तबसे जलता है जबसे उसकी प्रेमिका से मैंने विवाह कर लिया था।वह अभी तक मेरे गले पड़ी है।मुझे कभी सम्मान नहीं नसीब हुआ,न जीवन में,न लेखन में।इस शुक्ला ने ही मुझसे प्रतिशोध लिया है।’


‘तुम कुछ नहीं जानते हो।ऐसे ही अनजान और भोले बने रहोगे तो जीवन भर ‘सम्मानहीन’ का ख़िताब तुम्हारे पास ही रहेगा।इस बार बड़ा खेला हुआ है।आख़िरी क्षणों में रस्तोगी और खन्ना खेल गए।तुम्हारा नाम काटने के लिए दोनों त्रिपाठी के खेमे में चले गए।लखनऊ के विरोध में भोपाल और दिल्ली एक हो गए।सब तुम्हारी ग़लती है।तुम्हीं लाए थे इन्हें साहित्य में।जब दोनों कहानी में नहीं घुस पाए तो कविता का दरवाज़ा खटखटाया।वहाँ भी दाल नहीं गल पाई तो समीक्षक बन गए।अब ये ही तुम्हें सिखा रहे हैं।जड़ के साथ रहोगे तो वह जड़ से काटता है,यह सिद्ध हो गया।रही बात चयनकर्ताओं के साधने की,वहाँ भी त्रिपाठी तुमसे बाजी मार ले गया।एक के बेटे को आईपीएल में सेलेक्ट करा दिया और दूसरे की बेटी के विवाह में ख़ान-पान का पूरा प्रबंध किया।इसे कहते हैं मैनेजमेंट।अब शायद तुम्हें अक़्ल आए !’ इतना कहकर उन्होंने आख़िरी से बहुत पहले वाली साँस ली।


मुझे ‘अटैक’ आते-आते बचा, बिल्कुल ‘सम्मान’ की तरह।मेरी कहीं भी पूछ नहीं है।एक उसे देखो।कल का आया हुआ लड़का है।कभी संघर्ष नहीं किया।आते ही छा गया।साहित्य में अंधेरा उसी की वजह से है।एक हम हैं कि पहले दिन से ही संघर्षरत हैं।पहले छपने के लिए किया,अब ‘सम्मान’ के लिए कर रहे हैं।मुझे समझ में आ गया कि लिखने से ज़्यादा पैंतरे आने चाहिए।मेरे पास जितना बजट था,उसमें कोई ढंग का पैंतरा हो भी नहीं सकता था।यह लगातार तीसरी बार हुआ है जब मेरा सपना टूटा है।कवि पाश ने कहा भी है,‘सबसे ख़तरनाक होता है,हमारे सपनों का मर जाना !’ निश्चित ही उन्हें मेरी दशा का पूर्वानुमान हो गया होगा।यह भी कोई लोकतंत्र है ? एक ही आदमी सारे सुख लिए जा रहा है।कोई कब तक संघर्ष करेगा भाई ! हम जैसे बड़े लेखक अपने सम्मान की रक्षा कर नहीं पा रहे हैं तो आम आदमी की क्या स्थिति होगी ? इस पर भी एक श्वेत-पत्र आना चाहिए।’ मैंने मन ही मन में कहा।


‘अब क्या सोचने लगे ? फ़िलहाल,दिल्ली का एक हवाई-टिकट बुक कर दीजिए।इस त्रिपाठी का तोड़ तलाशता हूँ।’ इतना कहकर बिना मेरा जवाब सुने उन्होंने फ़ोन काट दिया।मुझे इस बार भी अटैक नहीं आया।


संतोष त्रिवेदी 



संघर्ष का नया तरीका

आंदोलन ख़त्म हो चुका था।आँसू गैस के गोले और लाठी - डंडे तनिक विश्राम के लिए सुस्ताने लगे थे।सड़क का शोर बैरिकेड तोड़कर ...