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रविवार, 31 जुलाई 2022

गिरावट के दौर में हम !

मेरे एक परम मित्र हैं जो पहुँचे हुए आलोचक हैं।साहित्य और राजनीति में उनका एक समान दख़ल है।जब भी उन्हें लगता है कि कुछ ग़लत हो रहा है,‘फ़ायरिंग’ करने वे मेरे पास आ जाते हैं।पर कल तो ग़ज़ब हो गया।वे नहीं आए,उनका फ़ोन आ गया।‘हलो’ कहते ही शुरू हो गए,‘भाई,बात ही कुछ ऐसी है कि मिलने का इंतज़ार नहीं कर सकता।जब तक तुम्हें बताने आऊँगा,तब तक सारी ‘गर्मी’ निकल जाएगी।इसलिए सोचा फ़ोन पर ही निपट लेते हैं।’


निपटने का नाम सुनकर मेरे कान खड़े हो जाने थे पर नहीं हुए।फ़ोन को इतना सटा रखा था कि इसके लिए ‘स्पेस’ ही नहीं मिला।इसी  चक्कर में मैंने गंभीरता ओढ़ ली।इन दिनों वैसे भी साहित्य और राजनीति दोनों ने मिज़ाज हल्का कर रखा है।जब भी गंभीर होने की कोशिश करता हूँ,मुँह की खाता हूँ।इन दोनों जगहों से आजकल ऐसी खबरें आ रही हैं कि उनके आगे चुटकुले पानी भरते हैं।इसलिए जब मित्र फ़ोन पर ‘सीरियस’ हो गए तो पशोपेश में पड़ गया।अपने लहज़े में थोड़ा भारीपन लाते हुए मैंने पूछ लिया, ‘क्या बात है दोस्त ? उधर पानी नहीं गिर रहा क्या ?’


मित्र के लहज़े में अचानक तल्ख़ी आ गई।मेरे ऊपर बरसने लगे, ‘पानी गिर रहा हो या न गिर रहा हो,रूपया रोज़ गिर रहा है।बाज़ार गिर रहा है।मीडिया गिर रही है।प्रार्थना और इबादत गिर रही है।हम भी कब तक बचेंगे ?’ ऐसा कहकर वे लंबी-लंबी साँसें लेने लगे।‘तुम भी जल्द गिरने वाले हो मित्र ! सुना है,इस साल का ‘सूरमा भोपाली’ सम्मान तुम पर ही गिरने जा रहा है।बिलकुल अंदर की और सौ टका पक्की ख़बर है।’ मैंने यूँ ही हवा में तीर चलाया।वे कराह उठे-‘कभी तो ‘सीरियस’ रहा करो दोस्त ! रूपया मेरी तरह अस्सी पार कर गया है।जल्द ही ‘सौ टके’ का भी हो जाएगा।होटलों में सरकार गिर रही है और और सड़क पर संगठन।सारे देश में गिरावट का दौर है और तुम्हें मसखरी सूझ रही है।बड़ी गंभीर स्थिति है।देश को बचाने के लिए हमें एक होना होगा।’ उन्होंने अपना फ़रमान सुना दिया।


यह सुनकर मेरा सिर चकरा गया।सनद रहे,यह वही सिर है,जिसके ऊपर ‘ऑलरेडी’ जमाने भर का भार लदा है।उसी पर आलोचक-मित्र ने ‘गिरावट’ बचाने का भार भी लाद दिया।मैंने उन्हें दुरुस्त करते हुए बताया, ‘इससे भी बड़ी और ताज़ी ख़बर हमारे पास है।साहित्य का ‘भुखर-सम्मान’ घोषित हुआ है।इस बार यह सम्मान दूसरे गुट के ‘प्रखर लखनवी’ ले उड़े हैं, जिनकी पिछली किताब की तुमने धज्जियाँ उड़ाई थीं।अब वही तुम्हें गिरा हुआ आलोचक साबित करने पर तुले हैं।वर्तमान में आलोचना क्या इतना गिर चुकी है ?’


यह सुनकर मित्र हिल गए।पास होते तो शायद मुझ पर ही गिर पड़ते।कहने लगे, ‘पहले मुझे संदेह था अब भरोसा हो गया है।तुम भी पूरी तरह गिर चुके हो।मुझ पर भरोसा नहीं रहा ? मैं तो अपनी ‘मानहानि’ की कहीं न कहीं भरपाई कर ही लूँगा।फ़िलहाल,मुझे अपनी नहीं देश और समाज की चिंता है।लोकतंत्र में साहित्य की गरिमा गिरी है।अब से लोकतंत्र के मंदिर में किसी को कोई चोर-उचक्का नहीं कह सकता।यहाँ तक कि पाखंडी,बेशर्म,भ्रष्ट और मूर्ख कहना वर्जित है।ये सारे शब्द अब बेहद शरीफ़ हो गए हैं।सड़क पर किसी को ‘गुंडा’ कह दो तो उसे ‘टिकट’ मिल जाता है।यही टिकट लेकर वह ‘माननीय’ हो जाता है।सड़क पर इन शब्दों से कोई बुरा तक नहीं मानता।ऐसे ‘पवित्र’ शब्दों को सदन में गिरने से रोका जा रहा है।कहते हैं इससे संसदीय गरिमा गिरती है।ऐसे शब्दों के जीते-जागते प्रतिमान वहाँ सशरीर बैठ तो सकते हैं पर ये निर्जीव ‘शब्द’ सदन में नहीं घुस सकते।यह साहित्य के विरुद्ध सियासत की साज़िश नहीं तो और क्या है ? इसके विरुद्ध हमें मिलकर लड़ना होगा।तभी हम अपने हिस्से का सम्मान खींच पाएँगे।’ उनकी आवाज़ कमजोर होती हुई महसूस हुई।


अब तक मुझे आभास हो चुका था कि मैं पता नहीं किस दुनिया में रहता हूँ ! मूल्यों की गिरावट इतनी हो गई और मुझे टमाटर तक के दाम गिरने की ख़बर नहीं मिली।मन ही मन ख़ुद को कोसने लगा।उधर मित्र ने फ़ोन ‘होल्ड’ पर धर दिया।मैं भी ‘वाट्सऐप’ पर अपना ‘स्टेटस’ चेक करने लगा।ख़ुद को गिरा हुआ फ़ील करता तभी उधर से उनकी चहकती हुई आवाज़ सुनाई दी, ‘दोस्त,तुम्हारा लेखन भले ‘टू जी’ स्तर का हो,नेटवर्क बिलकुल ‘फ़ाइव जी’ स्टैंडर्ड का है।तुम्हारी ख़बर पक्की निकली।अभी भोपाल से ही फ़ोन आया था।वे बस मुझे सम्मानित करने की सहमति चाहते थे।अब इतना भी ग़िरा हुआ नहीं हूँ कि सामने से आ रहे सम्मान-प्रस्ताव को ठुकरा दूँ ! यह शिष्टाचार और नैतिकता के विरुद्ध होता।इसलिए मैंने बड़ी विनम्रता से उनको‘हाँ’ कर दी।अब बस बैंक जा रहा हूँ।’


मैंने उन्हें बीच में टोका, ‘मगर इस समय बैंक जाने की क्या जल्दी है ?’ मित्र तुरंत बोल उठे, ‘भई,’आधुनिक सम्मान’ हैं।इनके ‘प्रॉसेस’ होने में ‘तन-मन-धन’ से लगना पड़ता है।यह बस सामान्य प्रक्रिया है।तुम नहीं समझोगे।कभी सम्मानित हुए हो तो जानो !’ इतना कहकर वे निकल लिए और मैं तभी से साहित्य में अपनी गिरावट पर चिंतन कर रहा हूँ।उनकी बात सोलह आना सच निकली।वाक़ई गिरावट की कमी नहीं है देश में !


संतोष त्रिवेदी


रविवार, 9 सितंबर 2018

गिरकर उठने का सुख !

वे फिर से गिर गए।अबकी बार गहरे गड्ढे में गिरे।सड़क पर चलते हुए वे देश के प्रति चिंतन कर रहे थे।इस बीच बरसाती पानी से लबालब छोटे-मोटे गड्ढों ने कई बार उन्हें अपनी गोद में बैठाना चाहा पर वे सफल नहीं हो पाए।वे ज़रा गहरे मिज़ाज के आदमी ठहरे,इसलिए गहराई में चले गए।दृढ़-निश्चयी इतने कि बारिश की तरह उनका चिंतन भी मूसलाधार बरस रहा था।वह बंद नहीं हुआ।वे सोचने लगे,उनके गिरने के पीछे भी कोई उद्देश्य है।ईश्वर ने कुछ सोचकर ही गिराया होगा।सरकार तो उनकी अपनी है।वह उन्हें कैसे गिरा सकती है।हाँ,भले ही कुछ देश-विरोधी ताक़तें सरकार गिराने की साज़िश रचें।उनके गिरने में तो कोई साज़िश भी नहीं है।यह संयोग है।सहमति से ‘गिरना’ वैसे भी कोई अपराध नहीं है।यहाँ तो वे सड़क,सरकार और ईश्वर सब उनके साथ हैं।वे गिरे हैं तो इसमें भी देश का ही भला है।गिरने में काहे की लाज और शर्म ! वे तो फिर भी खुलेआम गिरे हैं।अब वे खुलकर चिंतन करने लगे।

बाज़ार में रुपया गिर रहा है।रोज़ गिर रहा है।पहले जब कभी-कभी गिरता था,ख़ूब चिल्ल-पों होती थी।अब रोज़ गिरता है,कोई नोटिस नहीं लेता।रुपया भी चल रहा है,बाज़ार भी और सरकार भी।कोई दिक़्क़त ही नहीं।सब अपने-अपने ट्रैक पर सरपट हैं।जिसको लगता है कि गिरने से गति बाधित होती है,वे किताबी-दुनिया के जीव हैं।बाहरी दुनिया विज्ञान के भरोसे नहीं चलती।यहाँ सबके अपने-अपने ज्ञान हैं।सोशल मीडिया में ख़ूब चलते भी हैं।गिरावट तो आदमी की मूल प्रकृति है।वह गिरकर ही उठता है।ऐसे में कोई समझदार आदमी गिरने का नोटिस नहीं करता।वह कितना उठा है,यह देखा जाता है।वे भले आज गड्ढे में हैं पर गिरकर उठने के मामले में काफ़ी वरिष्ठ हो चुके हैं।

और ज़्यादा दूर क्यों जाएँ ! पिछली बार साहित्य में गिरे थे।क्या गिरे थे ! पूरे साहित्य-जगत में हाहाकर मच गया था।सारे सम्मान उन्हीं के सिर पर आकर गिरे थे।उनके कलापक्ष की ख़ूब तारीफ़ हुई थी।उन्होंने एक इंटरव्यू में ही एक स्थापित लेखक को उखाड़ फेंका था।ऐसी कलाबाज़ी एक दिन के कमाल से नहीं आती।इसके लिए निरंतर गिरना होता है।गिरना एक कला है,इसे उन्होंने ही स्थापित किया है।जब कलाबाज़ी विकसित हो जाती है,बुद्धिजीवी इसे कलावाद कहते हैं।

‘वाद’ से उन्हें याद आया कि गिरावट का यही प्राणतत्व है।यह ‘वाद’ सेफ़्टी-वॉल्व का काम करता है।हमारी अर्थव्यवस्था बाज़ार के भरोसे रहती तो कब की बर्बाद हो जाती।जब से बाज़ारवाद आया,पीछे मुड़कर देखने का समय ही नहीं मिला।गिरता हुआ रुपया बाज़ारवाद की गोद में उसी तरह सुरक्षित है जैसे वे गड्ढे में।जब तक वे गड्ढे में हैं,साहित्य भी पूरी तरह सुरक्षित है।उनके बाहर आते ही सड़क की तरह साहित्य की भी पोल खुल जाएगी।वे साहित्यप्रेमी हैं।उसके सम्मान के लिए अपना सम्मान दाँव पर लगा देंगे।इस बार का गड्ढा गहरा है तो सम्मान भी गहरा होना चाहिए।सरकार ने अबकी बार ‘पद्म’ सम्मान के लिए खुलेआम आमंत्रण दिया है।कोई किसी का नाम भेज सकता है।सम्मान का हरण ,माफ़ कीजिएगा ,वरण वे ही करेंगे।साहित्य में उनसे ज़्यादा गिरा हुआ कोई दूसरा नहीं।यहीं रहकर वे प्रगतिशील और सहिष्णु बने हैं ।गिरने को लेकर कभी उनके मन में दुविधा नहीं रही।जब मौक़ा मिलता है,गिर लेते हैं।संयोग देखिए कि वे आलरेडी कीचड़ से भरे गड्ढे में हैं।उनसे अधिक सुपात्र कोई और कैसे हो सकता है ! कीचड़वाद के वे ही अगुआ हैं।इस बात की तस्दीक़ वहाँ उपस्थित सभी केंचुओं से की जा सकती है।कुछ केंचुओं ने तो उनके कीचड़ में गिरने को एक क्रांतिकारी क़दम बताया है।अब इससे बाहर वे तभी निकलेंगे,जब उनके कीचड़-सने हाथों में ‘पद्म’ होगा।

अचानक गड्ढे के बाहर हलचल सुनाई देने लगी।उन्हें लगा कि उनके सम्मान में साहित्यिक-बिरादरी भी उनके साथ आ गई है।वे गड्ढे में थे,इसलिए दूर का दिख नहीं रहा था।आँखों में लगे चश्मे को उन्होंने ललाट पर चढ़ा लिया।उन्हें दूरदृष्टि की प्राप्ति हुई।गिद्धदृष्टि से वे मामले को समझने की कोशिश करने लगे।पता चला कि उन्हें उठाने के लिए क्रेन आई हुई है।वे साहित्य में अचानक इतना उठ जाएँगे,नहीं सोचा था।काश और पहले गड्ढे में गिरे होते।वे कुछ और चिंतन करते कि क्रेन के लंबे-लंबे हाथों ने उन्हें बाहर ला पटका।मगर यह क्या ! यहाँ तो साँड़ और गायों का जमघट लगा था।वे इस बात के लिए आंदोलन कर रहे थे कि गड्ढे में आदमी ने कैसे घुसपैठ कर ली।कुछ वरिष्ठ साँड़ तो उन्हें सींग मारने वाले थे,तभी एक बूढ़ी गाय उनके सामने आ गई।उस समय उनकी दशा उससे भी जर्जर थी।आख़िरकार गाय को ही उन पर दया आ गई।बोली,’बेटा तुमने हमें घर से,जंगल से सब जगह से निकाल दिया है।अब सड़क के गड्ढे ही हमारा आसरा हैं।यहाँ भी तुमने क़ब्ज़ा कर लिया तो हम कहाँ जाएँगे ? पर तुम्हारी हालत देखकर तो मुझे तरस आ रहा है।तुम भले हमें भूल जाओ,माँ कभी अपने बेटों को नहीं भूल सकती।उन्हें गड्ढे में गिरा हुआ नहीं देख सकती।’

यह सब सुनकर उनका सारा चिंतन कीचड़ में मिल गया।वे घर की ओर भागे।इस समय उनको अपनी बूढ़ी माँ की बहुत याद आ रही थी।

संतोष त्रिवेदी

बुधवार, 24 जुलाई 2013

सरकार इतनी गिरी नहीं है !


सरकार अब इतना भी नहीं गिर सकती है कि गिरे हुए रूपये को उठाने को और गिर सके। रूपये ने तय कर लिया है कि वह जमींदोज होकर रहेगा पर सरकार का ऐसा कोई इरादा नहीं है। गिरे हुए रूपये को उठाने के लिए उसने कई ताबड़तोड़ फैसले किए हैं। उसने आनन-फानन कई क्षेत्रों को पूरा का पूरा  एफडीआई की झोली में डाल दिया है । सरकार का सोचना है कि उसकी झोली से रिसकर उसके हाथ भी कुछ लगेगा। उसे भरोसा है कि एफडीआई के आने से रुपया भी चहक उठेगा और धरती से उछलकर सीधे उसकी गोद में जा बैठेगा। इसलिए सरकार नाकारा नहीं बड़ी कारसाज है।

सरकार गिरे हुए रूपये को उठाने के साथ ही खुद के उठने के लिए कई कदम उठा रही है। देश भर में गरीबों को ‘खाद्य-सुरक्षा’ के ज़रिये खिला-पिलाकर पुष्ट और मज़बूत बनाना चाहती है ताकि वे इतने अशक्त न रहें कि मतदान-केन्द्र तक ही न जा पाएँ। इस बात को सरकार के विरोधी समझ गए हैं इसीलिए इसका विरोध कर रहे हैं। विरोधी जानते हैं कि अघाए पेट वाला मतदाता कभी भी नीयत बदल सकता है। इस बात का प्रमाण खुद उन्हें साथी दलों के नेताओं से मिल चुका है।  सरकार भले चाहे जितनी गिरी हुई हो,मर नहीं सकती । उसे अपनी प्राणरक्षा की कीमत पता है। वह जानती है कि जब तक उसके तोते में जान है,वह नहीं मरेगी। तोते ने भी अपने मालिक को कभी निराश नहीं किया है,सो ’खाद्य-सुरक्षा’ बिल और सरकार,दोनों को फिलहाल खतरा नहीं है।

सरकार अपने से ज़्यादा जनता के लिए फिक्रमंद है। उसे पता है कि भ्रष्टाचार और मंहगाई से कभी कोई नहीं गिरा है। खुद सरकारों का जब इनसे कुछ नुकसान नहीं होता तो आम जनता की क्या बिसात ? उसे तो विकास चाहिए और इसके लिए पहले सरकार खुद विकसित होना चाहती है। तभी उसने विकसित देशों से एफडीआई और डॉलर को न्योता भेजा है। सरकार हर वो काम करना चाहती है जिसमें उसका हाथ तंग न हो। रुपया वैसे भी हाथ का मैल है,गिर जाय तो भी क्या फर्क पड़ता है ? डॉलर सारी दुनिया का मालिक है,उसका मजबूती से स्थापित होना ज़रूरी है।

सरकार गिरे हुए रूपये की तरह ही गरीब की गिरावट को लेकर भी चिंतित है। वह इसके लिए तन-मन-धन से उसकी सेवा करना चाहती है। सरकार गरीब की झोली भरकर और मीठी गोली देकर उसकी सेहत ठीक करने में जुटी है। अपने बीमार और दागी लोगों को भी वह जीवनदान देने का जतन कर रही है। जनता और नेता के हित में समान रूप से सोचने वाली सरकार गिरी हुई हालत में यह सब कर रही है। अगर कहीं मज़बूती से खड़ी होती तो जनता की अच्छी-खासी सेवा कर डालती। ऐसी सरकार को गिरने देना अपने पैरों में कुल्हाड़ी मारने जैसा होगा। उम्मीद है कि चुनाव तक गरीब इतना तो उठ सकेगा कि पास के मतदान-केन्द्र तक पहुँच सके । यदि इसमें कोई कोताही हुई तो सरकार को मजबूरन इस क्षेत्र में भी एफडीआई बुलानी पड़ेगी। भला कोई गरीब विदेशी-सुन्दरी को कैसे मना कर सकेगा ?

फ़िलहाल ,सरकार को बचाने के लिए रुपया आत्म-बलिदान पर उतारू है। उसके चिथड़े उड़ रहे हैं पर मजाल है कि सरकार को कोई आँच आ जाय। वहीँ तोते ने कड़वे फल कुतरने शुरू कर दिए हैं। मीठे फल उसने अपने आका की झोली में डाल दिए हैं !
 
'जनवाणी' में २४/०७/२०१३ को !

संघर्ष का नया तरीका

आंदोलन ख़त्म हो चुका था।आँसू गैस के गोले और लाठी - डंडे तनिक विश्राम के लिए सुस्ताने लगे थे।सड़क का शोर बैरिकेड तोड़कर ...