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रविवार, 27 फ़रवरी 2022

मेरी नई किताब और विश्व-युद्ध !

फागुन की अभी शुरुआत ही हुई थी कि मेरी तीसरी किताब पाठकों पर मिसाइल बनकर टूट पड़ी।लोग कोरोना की तीसरी लहर से ठीक से उबर भी नहीं पाए थे कि मेरे ‘पुतिननुमा’ कृत्य से पूरा साहित्य-जगत दहल गया।वायरस से मरने वालों का सही-सही आँकड़ा सरकार के पास भले न हो,मेरी इस किताबी-मिसाइल से कितने लेखक आहत हुए,इसकी सटीक जानकारी ज़रूर मेरे पास है।अपनी किताब के बहाने साहित्य को क़ब्ज़ाने की मेरी योजना हिट साबित हुई।ख़ास दोस्तों के द्वारा सोशल मीडिया को मैंने पहले ही साध लिया था।हर-एक को आगाह कर दिया था कि मेरी नई किताब के साथ ही अपनी सेल्फ़ी डालें अन्यथा आगामी गोष्ठियों में उठने-बैठने लायक नहीं रहेंगे।इसका असर तुरंत हुआ।जिधर देखो,मेरी किताब की चर्चा।इसका साइड-इफ़ेक्ट भी देखने को मिला।एक वरिष्ठ लेखक ख़ुद को मिले ‘सम्मान’ की बधाइयाँ ठीक तरह से बटोर नहीं पाए थे कि यह हादसा हो गया।जहाँ एक ओर मुझे अनगिन बधाइयाँ मिल रही थीं,वहीं साहित्यिक गलियारों में गिन-गिनकर लोग मेरे प्रकाशक को कोस रहे थे।वे इस बात से चिंतित थे कि यदि मेरे किताबों की ‘डिलिवरी’ इसी तरह जारी रही तो साहित्यिक-कचरे के निपटान में बड़ी समस्या आने वाली है।मेरी किताब की मारक-क्षमता का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि तमाम वरिष्ठों ने अपने फ़ोन ही बंद कर लिए।वे ‘जो बाइडेन’ की तरह सोशल-मीडिया में निंदक-मिसाइलें चलाने लगे।उनकी चिंता यह थी कि यदि यह लेखक इसी रफ़्तार से आगे बढ़ता रहा तो वे अधिक दिनों तक वरिष्ठ नहीं बने रह पाएँगे।उनसे यह ‘ताज’ भी छिन जाएगा।दूसरी ओर युवा-पीढ़ी को तो जैसे काठ मार गया हो।मेरे लेखन का यह आतंक मचा कि उनका छपना बंद हो गया।पलक झपकते ही मैं संभावनाशील लेखक से चर्चित लेखक की कोटि में आ गया।अंदरखाने चर्चा थी कि इस बार का अकादमी त्रिवेदी ही मारेगा।वही बचा है।मुझे ऐसी सूचनाएँ निजी सूत्रों से प्राप्त हो रही थीं।अपने सूत्रों पर मुझे अपने लेखन से अधिक भरोसा था,इसलिए मैंने भी स्वयं को इस योग्य मान लिया।


एक तो फागुन का ख़ुमार,दूसरे ‘वायरल-लेखक’ बनने का नशा;मैं अचानक साहित्य के केंद्र में आ गया।कई व्हाट्स-अप समूहों ने मुझे विशिष्ट अतिथि बना डाला।आख़िरकार ‘साहित्य-धारा’ समूह के न्योते को मैंने बड़ी विनम्रता से स्वीकार किया।समूह के एडमिन से अपनी पुरानी जान-पहचान थी,सो उनका मान रखना पड़ा।उन्होंने भी चर्चा में ‘सुरक्षा-परिषद’ की तरह मेरे ‘सम्मान-रक्षा’ की पूरी गारंटी दी।अंदर की बात यह भी थी कि मेरी नई किताब की भूमिका उन्होंने ही लिखी थी।मेरे लेखक बनने में इस नाते उनकी प्रत्यक्ष भूमिका थी।लेखक उन्होंने ज़रूर बनाया था पर चर्चित अपने कारनामों की वजह से ही हुआ।


बहरहाल,तय समय पर समूह की ‘ज़ूम-वार्ता’ शुरू हुई।विषय था, ‘समकालीन लेखन और विश्व-साहित्य’।विषय से ही आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि मेरी ख्याति अब ‘लोकल’ से ‘ग्लोबल’ स्तर की हो चुकी है।गोष्ठी प्रारंभ होते ही एडमिन ने चर्चा की दिशा तय कर दी।वह मेरा परिचय कराते हुए बोले-‘आज हमारे बीच अंतरराष्ट्रीय स्तर के लेखक मौजूद हैं।ये स्थानीय मुद्दों को बिलकुल नहीं छूते।इनका लेखन ‘एलीट-क्लॉस’ का है।हमें ख़ुशी है कि इतनी बड़ी प्रतिभा आज हमारे गैंग सॉरी ग्रुप में उपस्थित है।अब यह अपने अमूल्य अनुभवों को हमारे साथ साझा करेंगे।’


एक पल को लगा कि मैं फागुन में झूम रहा हूँ,पर तुरंत अहसास हुआ कि ‘ज़ूम-मीटिंग’ में हूँ।दाएँ हाथ की तर्जनी उँगली को उठाते हुए हमने बोलना शुरू किया, ‘इस समय संसार और साहित्य दोनों ख़तरे में हैं।हमें सड़कों और खेतों पर बौराते साँड़ दिख रहे हैं,जबकि विश्व-परिदृश्य में दो साँड़ अचानक भिड़ गए हैं।हमें यहाँ फ़ोकस करना चाहिए।यह महत्वपूर्ण नहीं है कि आप क्या लिखते हैं;किस पाले में हैं,यह ग़ौरतलब है।हमारा लेखक है कि स्थानीय मसलों पर ही उलझा रहता है।सच तो यह है कि लोकल-लड़ाई से विश्व-युद्ध की महत्ता कहीं अधिक है।उसकी रेटिंग हमेशा टॉप पर होती है।उसकी चपेट से बाज़ार,लोकतंत्र और साम्यवाद एक साथ ‘गिर’ जाते हैं।लोकल-लड़ाई में तो केवल सिर-फ़ुटौवल या बहुत हुआ तो जूता-लात की ही नौबत आती है।दो-चार लेखक ही ‘गिरते’ हैं बस।ऐसी छोटी-छोटी बातों को कोई नोटिस तक नहीं लेता अब।इसलिए आदर्शवादी नहीं यथार्थवादी बनो।अंतरराष्ट्रीय लेखक कलम घिसकर नहीं बना जा सकता है।अपने लेखन को ‘इंटरनैशनल-टच’ दीजिए।आप लोग जब तक ‘लोकल’ मुद्दे उठाते रहेंगे,कभी ‘ग्लोबल-राइटर’ नहीं बन पाएँगे।यदि ट्वीट भी करना है तो सीधे पुतिन या बाइडेन के ख़िलाफ़ करो।लंबा खेलो।चीन की तरह ताक में रहो।मौका पाते ही दूसरे के ‘प्लॉट’ में कविता बो दो।इधर-उधर से ‘कॉपी-पेस्ट’ करो पर अपना साहित्यिक-क्षेत्रफल बढ़ाओ।यह आपकी ज़मीन है।यदि अवसर गँवा दिया तो न साहित्य बचेगा न संसार।मेरी नई किताब ‘लाल टोपी का सपना’ इसी का परिणाम है।’

‘पर ‘लाल टोपी’ का उल्लेख करके तो आप ‘लोकल’ मुद्दे पर नहीं आ गए ?’ एक युवा लेखक ने मुझे पकड़ा।उसकी नासमझी पर मेरी हँसी छूट गई।मैं बोला-लगता है कभी पुराने गाने नहीं सुने,नहीं तो ‘लाल टोपी रूसी’ को कैसे भूल जाते !’


लगा चलती मीटिंग में जैसे फिर मिसाइल गिर पड़ी हो !


संतोष त्रिवेदी 


रविवार, 6 फ़रवरी 2022

सावधान,वे ग़रीबों के बारे में सोच रहे हैं !

देश के कई हिस्सों से बेमौसम बरसात की ख़बर है।जहाँ चुनाव होने वाले हैं,वहाँ दोहरी बरसात हो रही है।बादलों का रूप धरकर सब नेता अपने चुनावी-क्षेत्रों में बरस रहे हैं।आम आदमी बरसाती-ओलों से तो फिर भी बच सकता है पर वह चुनावी-गोलों की ज़द में आए बिना नहीं रह सकता।नेताजी महल में बैठकर मँहगाई से संतप्त जनता को कई बार सांत्वना दे चुके हैं पर मुई वोट की ख़ातिर उन्होंने ग़रीबों के बारे मेंसीरियसलीसोचना शुरू कर दिया है।इस बार नेताजी वाक़ईसीरियसहैं।वे पहले भी सोचते रहे हैं पर इस वक्त उसकी तीव्रता और फ़्रीक्वेंसी थोड़ा बढ़ गई है।थोड़े-थोड़े अंतराल के बाद इस सोच को वेरिन्यूकरते रहते हैं।


देश के ग़रीबों के लिए वह और उनकी सरकार हमेशा से समर्पित रही है।ग़रीब हैं तो योजनाएँ हैं।योजनाएँ हैं तो सोच है।सोच है तो वह भी हैं।इस बीच अगर चुनाव गए हैं तो क्या हुआ ? इस सोच को वह रोक तो नहीं सकते ! ऐसा नहीं है कि केवल वही ऐसा सोचते हैं।ग़रीबों पर हर नेता का अधिकार है।उसका वोट सबके लिए खुला है।जो चाहे,लूट ले।ग़रीबों के कल्याण की सोच सर्वव्यापी और सार्वकालिक है।यह किसी चुनाव-फुनाव के आने से नहीं रुक सकती।बक़ौल नेताजी,सरकार ने इस बार भी तय किया है कि वह ग़रीबों का कल्याण करके रहेगी।इससे ग़रीब सोच में पड़ गए हैं।उन्हें आशंका है ,कहीं ग़रीबी का उनका यह तमग़ा भी उनसे छिन जाए ! पर यह महज़ अफ़वाह है।सरकार ने भरोसा दिया है कि उनका राशन-कार्ड कभी बंद नहीं होगा।वे काग़ज़ों में भी गरीब बने रहेंगे।


इस बीच बजट चुका है।सरकार ने इसे दूरदर्शी और विपक्ष ने मंहगाई बढ़ाने वाला बताया है।मुझे जब ख़ुद इसे समझने में दिक़्क़त हुई,तो अख़बार और टीवी ने बताया कि यह दूरगामी बजट है।इसका असल फ़ायदा पचीस साल बाद दिखेगा।इस बार मैं सरकार से सहमत और विपक्ष से असहमत हूँ।सरकार की यह बात सोलह आने सच है कि यह दूरदर्शी बजट है।उसे निकट का दिखता भी नहीं।ऐसा होता तो कम से कम ये चुनाव ही उसे दिख जाते।रही विपक्ष के मँहगाई बढ़ाने की बात,वह बिलकुल बेबुनियाद है।जूते और चार्जर सस्ते हो गए हैं।चीजें तो और भी खूब सस्ती हुई हैं पर ये दोनों आम आदमी से ज़्यादा ताल्लुक़ रखती हैं।आदमी पैदल है तो जूते घिसेंगे ही।यही सोचकर जूते सस्ते किए गए हैं।चार्जर का सस्ता होना भी बड़ा कदम है।हर आदमी रोटी-रोज़गार छोड़कर दिन भर सोशल-मीडिया में बैठा रहता है।वह हर तरह से चार्ज रहे,सरकार की यही मंशा है।और हाँ,सरकार इन दिनोंकैश-लेसपर खूब ज़ोर दे रही है,ग़रीब आदमी को भी इसका भरपूर समर्थन प्राप्त है।इसलिए उसने अपनी क़मीज़ से जेब तक निकाल फेंकी है।उसको आस है कि डिजिटल-रुपया आते ही उसकी भूख भी डिजिटल हो जाएगी।उसका पेट ऑनलाइन ही भर दिया जाएगा।


फ़िलहाल सरकार की जेब बजट से फ़ुल है।ऐसे में कल्याण का ढोल बख़ूबी बज सकता है।सरकार यही करना चाहती है।वह कहती है कि विपक्ष ग़रीब-विरोधी है पर विपक्ष इसे सरासर ग़लत मानता है।वह ग़रीबों से एकजुटता दिखाने के लिए ख़ुद भी कितना ग़रीब है ! उसकी अंदरूनी चाहत है कि ग़रीब बने रहें।इन्हीं से उसका कल्याण हो सकता है।दरअसल  कल्याण की दरकार उसे ग़रीब से ज़्यादा है।सरकार है कि विपक्ष के मंसूबे पूरे नहीं होने देना चाहती।इसलिए वह लगातारग़रीब-कल्याण-योजनालाने को प्रतिबद्ध है।आख़िर उसे भी तो अपना कल्याण करवाना है।


इधर ग़रीब ख़ुश है।उसके दोनों हाथों में लड्डू है जो शून्य की तरह गोल है।उसके कल्याण के लिए पक्ष और विपक्ष में मारामारी मची है।अभी तो कल्याण का प्रथम चरण है।इस बारे में सोचा ही जा रहा है।जब कल्याण को ग़रीब के गले में आधिकारिक रूप से लटकाया जाएगा,तब उसे असल मुक्ति मिलेगी ! यह सोच-सोचकर ही वह रोमांचित है।सोचने पर केवल सरकार का ही अधिकार नहीं है।कभी-कभी ग़रीब भी सोच लेता है।इससे यह बात साफ़ होती है कि सरकार और ग़रीब की सोच में कितनी समानता है ! दोनों चुनाव के समय ही सोचते हैं।यह सौभाग्य की बात है कि सरकार ग़रीबों के लिए सोच ही रही थी कि चुनाव गए।उनका कल्याण होने से अब कोई नहीं रोक सकता।


ऐसे ही एककल्याण-कार्यक्रममें जाना हुआ।बड़ा दिव्य आयोजन था।कोने-कोने से ग़रीब आए हुए थे।नेताजी बेहद उत्साहित थे।बिना जाति पूछे ही घोषणा-पत्र और संकल्प-पत्र बाँट रहे थे।ग़रीबों का कितना कल्याण हुआ है,यह वे नेताजी द्वारा बाँटे जा रहे पैंफलेट से जान रहे थे।इससे पता चलता है कि देश में अभी भी कितनी अशिक्षा है।अख़बारों और चैनलों के दिन-रात बताने के बाद भी लोग शिक्षित नहीं हो पाए हैं।एक भटका हुआ ग़रीब मुझसे भी टकरा गया।कहने लगा कि नेताजी बड़े उदार हैं।मैं भूखा रहूँ इसलिए खाना खाने की बजाय साथ में केवल फ़ोटो खिंचवाई।ऐसे दयालु अब कहाँ मिलते हैं ! भगवान करे,चुनाव कभी ख़त्म ही हों !


संतोष त्रिवेदी