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बुधवार, 12 अगस्त 2015

फाइलों का निपट जाना!

अब कोई भी खबर हैरान नहीं करती पर इधर एक दिलचस्प खबर आई है।उत्तम प्रदेश के सचिवालय की कुछ फाइलों को दो कुत्तों ने कुतर दिया।हैरानी वाली बात यह है कि इसके लिए किसी कुत्ते को न टेंडर दिया गया और न ही वह इसकी पात्रता रखता था।फ़िर भी यह अनहोनी हो गई।जाँच के आर्डर दे दिए गए हैं कि इतनी पुख्ता व्यवस्था होने के बावजूद कुत्ते आखिर फाइलों तक कैसे पहुँचे और उन्होंने किस नीयत से उन्हें कुतरा ?

इस वाकये की जाँच मुस्तैदी से होगी और होनी भी चाहिए।आखिर कुत्तों ने आदमी के काम में दखल दिया है।पुलिस ‘अमानत में खयानत’ के आरोप में कुत्तों को अदालत में घसीट सकती है।नगर निगम को सतर्क कर दिया गया है कि वह साफ़-सफ़ाई जैसे रूटीन कार्यों को छोड़कर इस आपदा में प्रशासन का सहयोग करे।हमें राज्य की पुलिस-व्यवस्था पर पूरा भरोसा है.गुम हुई भैंसों की तरह ये कुत्ते भी जल्द बरामद कर लिए जायेंगे।

यहाँ मुख्य बात यह है कि आखिर कुत्तों को फाइलें चबाने की सूझी ही क्यों ? यह काम अमूमन चूहे करते रहे हैं या ऑफिस का पुराना बाबू।चूहे या कुत्तों द्वारा फाइलें निपटाने का तरीका बिलकुल अलग है।वे अक्सर उन्हीं फाइलों को कुतरते हैं,जिनकी उपयोगिता खत्म-सी हो जाती है।जिनके न रहने से कुछ बनता-बिगड़ता नहीं है पर टेबल पर पड़ी रहने से कभी भी विस्फोटित हो सकती हैं।इसलिए उनका कुतरा जाना ही उनकी नियति है।बाबू किसी भी फाइल को यूँ ही नहीं निपटाता।उसके बनने और चलने का सारा व्यय जोड़ता है,पूरी तरह दुहता है और आगे के लिए बढ़ा देता है।यदि फ़ाइल गैर-दुधारू हुई तो उसे अन्ना(छुट्टा)छोड़ देता है।वह अपने-आप ही धूल-धूसरित होकर निपट लेती है।

सवाल फ़िर भी यही है कि कुत्तों ने ऐसा क्यों किया ? हो सकता है उन्होंने बड़ी बारीकी से सचिवालय की गतिविधियों का अध्ययन किया हो।यह भी हो सकता है कि वे इस बात का रहस्य जान गए हों कि दफ्तर में घुसा दुबला-पतला आदमी बाहर निकलकर अचानक इत्ता मोटा-ताजा कैसे हो जाता है ! इसलिए महज एक प्रयोग करने के लिए यह कदम उठाया हो.जानने वाले बताते हैं कि कुछ आदमियों ने कुत्तों के भौंकने की आवाजें सुनी थीं.कुत्तों से यहीं गडबड हो गई.ऐसे काम परम शान्ति के क्षणों में किए जाते हैं.जाँच का मुख्य विषय यही होना चाहिए।

रही बात फाइलों के कुतरे जाने की,उनको तो हर हाल में निर्वाण की गति को प्राप्त होना ही है ।

 

सोमवार, 22 दिसंबर 2014

गायब होते देश में।

उधर फाइल से दो पन्ने गायब हुए और इधर कोहराम मच गया।देश भर में इस पर गहन चिन्तन शुरू हो गया है कि आखिर वे पन्ने गए कहाँ ? ऐसा भी हो सकता है कि फाइल पर पड़े-पड़े वे ऊब गए हों और हवा-पानी के लिए बाहर चले गए हों।इसका मतलब उनके पाँव आ गए हैं पर कुछ लोग कह रहे हैं कि इसमें किसी का हाथ है।यानी सारा मसला पाँव के आने में हाथ का है।अब जांच एजेंसियां इसी बात पर हाथ-पाँव मार रही हैं।सरकार भी शुक्र मना रही है कि अच्छा हुआ कि पूरी फाइल को पाँव नहीं आये, नहीं तो वह पूरी की पूरी अदृश्य हो जाती।तब वह क्या करती ? बहरहाल,सरकार इस बड़े संकट से बच गई है।

पन्नों के गायब होने पर शोर मचना बहुत बचकाना टाइप का मामला लगता है।जहाँ प्लॉट के प्लॉट ,खेत के खेत और कम्पनी की कम्पनी मिनटों में गायब हो जाने का रिकॉर्ड क़ायम हो चुका हो,वहाँ एक फाइल से दो-चार पन्ने गायब होने से कौन-सा पहाड़ टूट गया ?उल्टे यह तो प्रशासन की साख बढ़ाने वाला कृत्य है।अब कार्यालय के अफसरों और बाबुओं के इतने बुरे दिन आ गए हैं कि वे ऐसी छोटी-मोटी गुमशुदगी करने में इतना टाइम ले रहे हैं।सरकार कहती है कि इस तरह के टुटपुंजिये काम में उसका कोई हाथ नहीं है।यह काम तो हाथ वाली सरकार ही कर सकती है।जाते-जाते उसी ने अपने हाथों का सदुपयोग किया होगा।हम तो बस इस पर जांच बिठा सकते हैं और अगर अगले पाँच साल में पन्ने मिल गए तो केस आगे तक भी ले जायेंगे।हम किसी को छोड़ेंगे नहीं।

जांच समिति पूरे मनोयोग से जांच में जुट गई है।उसे बड़ी-बड़ी फाइलों और दस्तावेजों के गुम होने की जांच करने का तगड़ा अनुभव है।इन पन्नों की खोज-खबर मीडिया और जांच समिति के गायब हो जाने तक जारी रहेगी।वैसे भी दो पन्ने गायब हो जाने से अधिक फर्क नहीं पड़ता है।दिन भर में कितने कार्यालयों से कितनी फाइलें गायब हो जाती हैं,क्या इससे कभी कुछ फर्क पड़ा है ?इससे कम से कम यह तो पता चलता है कि हमारे कार्यालयों में फाइलें धूल ही नहीं खाती हैं ,कभी-कभार टहलने भी निकल जाती हैं।ऐसे ही कभी कोयला फाइलें भी टहलने निकल गई थीं,जो आज तक पर्यटन पर ही हैं।हाँ,उनको टहलाने वाले ज़रूर सड़क पर आ गए हैं।

दरअसल,गायब होते समय में इतना कुछ गायब हो रहा है कि किसी फाइल का या कुछ पन्नों का गायब होना मायने नहीं रखता।गायब होते देश में इनका गायब हो जाना बेहद मामूली बात है। जहाँ रोजाना हजारों बच्चे खेल के मैदान और स्कूल से गायब होते जा रहे हों,चुनाव बाद मुद्दे हवा हो गए हों,लोगों के बीच से भरोसा और सरकार से सरोकार गायब होने लगा हो,वहाँ दो-चार पन्नों का गायब होना खबरों में कितनी देर तक टिक पायेगा,सोचना मुश्किल नहीं है।हमें तो उस दिन का इंतजार है,जिस दिन लिखी हुई इबारत से स्याही और दस्तावेज से तहरीर गायब हो जाएगी।

बुधवार, 28 अगस्त 2013

एक हसरत भरी निगाह चाहिए !

28/08/2013 को जनसंदेश में !

 

देश की अधिकांश फाइलें नाराज़ हैं।इसकी वजह यह है कि कुछ फाइलों पर ज़रूरत से ज़्यादा रोशनी डाली जा रही है,जबकि वे युगों से धूल-धक्कड़ खा रही हैं।उन्हें उड़ते-उड़ते खबर मिली है कि कोयला-फाइलों पर टॉर्च मारी जा रही है । इसकी तात्कालिक वज़ह यह है कि वे अपने मूल स्थान से निकलकर अज्ञातवास को चली गई हैं।बची हुई फाइलें इस बात का शोक मना रही हैं कि वे सालों से बाबुओं और अफसरों की नाक के नीचे पड़ी हैं पर उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है।उन पर कोई टॉर्च तो क्या एक हसरत भरी निगाह भी डालने को तैयार नहीं है।उनकी बेचैनी इसलिए भी है कि वे अच्छी-खासी चिकनी-चुपड़ी हैं,पर सबकी नज़र से बची हुई हैं।उनके अंदर कई विकास-कार्यों की योजनाएं भरी-पड़ी हैं।अगर उन्हें भी बाहर निकलने का मौका दिया जाए तो देश कहाँ से कहाँ पहुँच जाए ! फ़िलहाल तो सारा देश उन कोयला-मुँही फाइलों के पीछे पड़ा है।

इन दबी हुई फाइलों के दर्द अलग-अलग हैं।कोई सीमा पर शहीद हुए उस युवा सैनिक की फ़ाइल है,जिसे सरकार ने पेट्रोल-पम्प आवंटित किया था तो कोई बेरोजगार युवा की है जो अब वृद्धावस्था-पेंशन की पात्रता पा चुका है।ऐसी फाइलें तो अनगिन हैं पर किसी बाबू की नज़र उस पर पड़ती ही नहीं।जिस फाइल पर रुपया गिरता है,वही चलायमान हो जाती है।जो फाइलें अभी ढूंढी जा रही हैं,उन पर तो कोयला गिरा है।उसे काला सोना भी कहते हैं।इस समय जब रोज रूपया गिर रहा है,सोना उछल रहा है,फाइलें भी कोयला-मुँही होना चाहती हैं,पर सभी का नसीब ऐसा कहाँ ?

विपक्ष इस बात पर संसद नहीं चलने दे रहा है कि गुम हुई फाइलों पर प्रधानमंत्री वक्तव्य दें।जिन फाइलों को बाबू तक भाव नहीं देते,उन पर प्रधानमंत्री अपना कीमती मुँह क्यों खोलें ?गुम हुई फाइलें साधारण नहीं हैं।पुरानी कहावत है कि ‘काजल की कोठरी में कैसो हू सयानो जाय,एक लीक काजल की लागि है पै लागि है’।ऐसा नहीं हो सकता कि प्रधानमंत्री के चतुर सलाहकारों ने इस कहावत को उन तक नहीं पहुँचाया हो।विपक्ष बिलावजह हल्ला मचाये हुए है।प्रधानमंत्री समझदार हैं इसलिए ‘एक चुप,हज़ार सुख’ पर अमल कर रहे हैं।  फ़ाइल ढूँढना वैसे भी सरकार का नहीं बाबुओं का काम है। वे बेचारे गिरे हुए रुपये को उठाने में व्यस्त हैं। इससे समय मिले तो फाइलें आगे बढ़ें !

अँधेरी कोठरी में बंद पड़ी फाइलें गुमसुम हैं पर आशावान भी। उन्हें लगता है कि गुम हुई फाइलों का एक न एक दिन पता चल जायेगा,तब उनको भी एक हसरत-भरी निगाह नसीब होगी।  

हिंदुस्तान में ०३/०९/२०१३ को

संघर्ष का नया तरीका

आंदोलन ख़त्म हो चुका था।आँसू गैस के गोले और लाठी - डंडे तनिक विश्राम के लिए सुस्ताने लगे थे।सड़क का शोर बैरिकेड तोड़कर ...