शनिवार, 31 मई 2014

लड़कियों से पीछे रहते लड़के !

अखबार में छपी एक खबर पढ़कर हम चौंक गए।मोटी-मोटी हेडिंग में लिखा था,’इस बार भी लड़कियों से पीछे रहे लड़के’।शीर्षक अटपटा-सा लगा, सो पूरी खबर पढ़ी।मालूम हुआ कि बात सीबीएसई के बारहवीं के परीक्षा-परिणामों की हो रही थी।फ़िर भी,हमारा मन अखबार की हेडिंग से इत्तिफाक रखने को तैयार नहीं हुआ।लड़के अगर लड़कियों से आगे रहते तब तो कोई खबर बनती क्योंकि लड़कों ने हमेशा लड़कियों का पीछा ही किया है,कभी अगुवाई नहीं की।

लड़कों के लड़कियों से पीछे रहने की तर्कसंगत वजह भी है।यह लड़कों के डीएनए में ही है कि उन्हें लड़कियों का पीछा करना है।इस काम में उन्हें इतना आनंद आता है कि वो अपनी पढ़ाई-लिखाई क्या,पूरा कैरियर ही दाँव पर लगा देते हैं।यह एक स्वाभाविक और सहज प्रक्रिया है।इसलिए कुछ समय पहले लड़कियों का पीछा करने को लेकर कानून बन रहा था तो समझदार लोगों ने उसका विरोध किया था।स्कूली पढ़ाई से ही लड़के इस काम में इतना तल्लीन हो जाते हैं कि कॉलेज पहुँचते-पहुँचते कुछ को इसमें ‘ब्लैक-बेल्ट’ हासिल हो जाती है और वो पढ़ाई के दौरान ही कारागार को भी पवित्र कर आते हैं।

इन मामलों के अंदरूनी जानकार बताते हैं कि दरअसल लड़कों का पीछा करना लड़कियों को भी भाता है।बस,यह काम ज़रा उनकी च्वाइस का हो ! कई बार इन्हीं पीछा करने वालों में से ही वे किसी एक को अपना जीवनसाथी चुन लेती हैं।लेकिन यह एक लंबी प्रक्रिया होती है।जो लड़का पीछा करने में जल्दी हार मान जाता है,लड़कियाँ भी उसे भाव नहीं देतीं।सबसे ज़्यादा रेटिंग उस लड़के की होती है जो येन-केन प्रकारेण, कूद-फाँदकर अपनी उपस्थिति दर्ज़ करने में सक्षम होता है।इस अभियान में कई बार सम्बन्धित लड़के की हड्डियाँ भी शहीद हो जाती हैं,पर मजाल है कि उसकी हिम्मत का बाल-बाँका भी हो।

ऐसा नहीं है कि लड़के लड़कियों से पीछे इसलिए रहते हैं कि वो उनसे शारीरिक क्षमता में कम होते हैं या दौड़ नहीं पाते।अगर ऐसे लड़कों की भागने की क्षमता देखनी हो तो उन्हें किसी महिला की पर्स या चेन खींचकर भागते हुए देखा जा सकता है।कुछ विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि लड़के इसलिए भी लड़कियों से आगे नहीं होते क्योंकि इससे उनके चूहे होने का संदेश जाता है और वे लड़कियों को कभी भी बिल्ली के रूप में स्वीकार करने को तैयार नहीं हो सकते।बहरहाल,परीक्षा में लड़कों ने लड़कियों से पीछे रहकर अपनी पुरातन परम्परा को ही और समृद्ध किया है और वे इसके लिए बधाई के पात्र हैं।  



शुक्रवार, 30 मई 2014

कहाँ से लाएँ नुक्स !


उम्मीद तो यह थी कि पार्टी हारेगी मगर वो खुद भी खेत रहे।पार्टी को तो पहले ही हारने का अभ्यास रहा है इसलिए उसको हार से ज़्यादा फर्क पड़ा नहीं।कुछ लोग तो यह भी कहते हैं कि पार्टी ने जानबूझकर अपना कबाड़ा किया है ताकि भविष्य में वह उठती हुई दिखाई दे,इसलिए हार पर औपचारिक चिंतन भी नहीं हुआ ।वे चूँकि पार्टी के होनहार और ऊर्जावान नेता हैं इसलिए अपनी हार के बाद बनी नई सरकार से ऊर्जा लेना चाह रहे हैं।कामकाजी आदमी कभी खाली नहीं बैठता ,फ़िर तो वे नेता ठहरे।नई सरकार ने अभी अपना काम ठीक से शुरू भी नहीं किया है पर उन्होंने अपना कामकाज बखूबी संभाल लिया है।
उनकी सबसे बड़ी शिकायत है कि नई सरकार में चुनाव हारे हुए नेताओं को मंत्री बनाया गया है।फ़िर तो वे भी हारे हुए हैं,उन्हें क्यों नहीं ऐसा मौका मिल सकता है ? उनके पास सरकार चलाने का लम्बा अनुभव है और वे काफ़ी पढ़े-लिखे भी हैं।अब यह भी क्या बात हुई कि नई सरकार में छठी-बारहवीं पास किए हुए लोग ऊँची और बड़ी-बड़ी नीतियां बनाएँ ? ऐसा कैसे सम्भव हो सकता है ? कम पढ़े-लिखे लोगों से देश और सरकार को खतरा है और यही चिंता उन्हें खाए जा रही है।
उनकी इस बात में हमें भी दम दिखाई देता है।मंत्रालयों के काम छोटे-मोटे स्तर के नहीं होते।इनमें चलाई जाने वाली परियोजनाएं अरबों-खरबों की होती हैं।ऐसी बड़ी परियोजनाओं में घपलों-घोटालों को टाला जाना अपरिहार्य है।ऐसे में कमीशनबाजी के करोड़ों रुपयों का हिसाब-किताब कम पढ़ा-लिखा व्यक्ति कैसे लगा पायेगा ? सारा खेल अफ़सर कर जायेंगे।कमाई होगी दस करोड़ की,पल्ले में आएँगे हजार दो हजार।इस तरह तो सारा सिस्टम ही बेकार हो जायेगा।ऐसे लोगों के बूते यह सरकार नहीं चलनी है।पढ़ा-लिखा मंत्री होने से घोटाले की सही फीगर भी सामने आएगी और देश तरक्की करता हुआ दिखेगा।
हारे हुए एक और नेता मायूस दिखाई दिए ।नई सरकार ने कई मंत्रालयों को ही खत्म कर दिया है।सबसे कमाऊ कोयला मंत्रालय अब ऊर्जा के अधीन कर दिया गया है।उनकी चिंता है कि अब कोयले के बिना कालिख कैसे पुतेगी ? अगर यह मंत्रालय रहता तो वे भी नई सरकार के मंत्रियों के काले कारनामे गिनाते और खुद के लिए ऊर्जा जुटा पाते पर यह काम वे अब कैसे कर पाएँगे ? नई सरकार ने पहले चुनाव में और अब मन्त्रिमन्डल बनाने में उन्हें कहीं का नहीं छोड़ा।यह सब विपक्ष को पूरी तरह नेस्तनाबूद करने की साज़िश है।
जीते हुए के साथ सारा जमाना रहता है पर हम तो हारे हुओं के साथ हैं।अपने उबरने के लिए वे कुछ समय तो देने को तैयार हैं पर जीते हुए लोग अभी से अगले चुनावों को भी जीता हुआ बता रहे हैं।इतना समय नहीं है उनके पास।इससे पहले कि क्षीण हुई ऊर्जा पूरी तरह से खत्म हो जाय,हारे हुए लोग संकल्पित हो रहे हैं।वे नई सरकार द्वारा की जाने वाली किसी खोट के इंतज़ार में अपना टैम खोटा नहीं करना चाहते हैं।इसलिए कुछ न कुछ नुक्स निकालकर अपना काम शुरू कर दिया है।हम नई सरकार से अपील करते हैं कि विपक्ष की मजबूती के लिए वह कुछ ठोस नुक्स मुहैया कराये !


गुरुवार, 22 मई 2014

आलाकमान के चुनावी सबक !

वर्तमान जनमत से आलाकमान को गहरा धक्का लगा।खुशी की बात तो कोसों दूर,जनता ने गम मनाने लायक नहीं छोड़ा।उनकी पार्टी हारती तो वे इसे अपनी जिम्मेदारी मानकर झट जेब से इस्तीफ़ा निकालकर लहरा देते,पर इस लहर ने उन्हें ही दबोच लिया।वे इस्तीफ़ा दिखाने के लिए भी तरस रहे हैं।विरोधियों ने ऐसी मार मचाई है कि हाथ-पाँव ही नहीं कमर भी टूट गई है।वे देश के लिए परेशान होना चाहते हैं पर मुई उनकी खुद की परेशानी सामने आ खड़ी है।

कार्यसमिति ने चुनावों बाद देश में पैदा हुए इस घोर संकट से निपटने के लिए नियत समय पर बैठक बुलाई,जिसमें हारे हुए कुछ लोगों ने सलाह दी कि संकट पार्टी पर है न कि देश पर,किन्तु आलाकमान ने इस पर तकनीकी अड़चन बताई।उन्होंने बीच का रास्ता निकालते हुए निर्णय लिया कि पार्टी के बारे में सोचने की जरूरत फ़िलहाल नहीं है क्योंकि वह न सत्ता में है न विपक्ष में।देश इस समय चौराहे पर खड़ा है और उसको घसीटकर किनारे लाना बहुत ज़रूरी है।

बैठक में एक ग्रास रूट वर्कर ने चिंता जताई कि अब जनता के पास कौन-सा मुँह लेकर जायेंगे ? अगर  अकेले गए तो कोई उनकी बात भी नहीं सुनेगा क्योंकि उनके सारे कार्यकर्त्ता भी वोटरों के साथ नए घरों में शिफ्ट हो गए हैं।आलाकमान ने बड़ी मुश्किल से अपना मुँह उठाया और उस अदने से कार्यकर्ता का पहली बार सर्वांग निरीक्षण किया।’तुम कबसे हमारी पार्टी से जुड़े हो ? आलाकमान से ऐसे सवाल करना हमारी पार्टी–संस्कृति में नहीं रहे हैं।’आलाकमान ने सचेत होते हुए पूछा।फ़िर स्वयं ही बोले-जनता के सामने जाने में कोई डर नहीं है।हम इस बात के अभ्यस्त हो चुके हैं।रही बात ‘कौन-सा मुँह’ लेकर जाने की,सो इसकी आशंका हमें पहले ही थी इसीलिए हमने कोयले का लेप चुपड़ लिया था।ऐसे में हमें जनता से कोई खौफ नहीं रहा ।’

उस ग्रास रूट वर्कर ने आलाकमान के प्रति अतिरिक्त श्रद्धाभाव उड़ेलते हुए वक्तव्य दिया,’आदरणीय,हम जैसों को न पहचान पाने की कीमत ही पार्टी आज चुका रही है और आप चुक रहे हैं।आज हमें बोलने की ताकत भी इसी हार ने दी है।अब गले के हार को भूलकर इस हार से कुछ सबक लें।अपनी नहीं तो कम से कम हमारे बाल-बच्चों की फिकर कीजिये,साहब’,कहता-कहता वह जमीनी कार्यकर्त्ता आलाकमान के सामने ही जमीन पर लोटने लगा।

आलाकमान ने तुरत अपने कारिंदों से उसे वहाँ से हटाने को कहा।उन्हें अपनी जमीन पर किसी का भी किसी तरह का दखल नामंजूर था।बैठक नए संकल्प के साथ समाप्त हुई कि भविष्य में हार पर कोई चिंतन नहीं होगा क्योंकि अब और हार की गुंजाइश भी नहीं बची है।
....22/05/2014 को 'डेली न्यूज' जयपुर में प्रकाशित। 

संघर्ष का नया तरीका

आंदोलन ख़त्म हो चुका था।आँसू गैस के गोले और लाठी - डंडे तनिक विश्राम के लिए सुस्ताने लगे थे।सड़क का शोर बैरिकेड तोड़कर ...