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शनिवार, 27 जुलाई 2013

गिनीज़ बुक वाले भारत में !


२७/०७/२०१३ को 'नई दुनिया' में !
 

पहली बार गिनीज़ बुक वालों को महसूस हुआ कि वो रिकॉर्ड्स लेने के लिए अमेरिका और यूरोप में अपना समय व्यर्थ ही जाया कर रहे हैं। उन्हें जब यह खबर मिली कि भारत की आर्थिक राजधानी मुंबई  में बारह रूपये में और राजधानी दिल्ली में महज़ पाँच रूपये में भरपेट भोजन मिलता है तो वे छटपटा उठे। कहीं उनके देश के नागरिक इस बात को लेकर सरकारों का तख्ता न पलट दें,इसलिए पूरा रहस्य जानने के लिए वे तुरंत  भारत आ गए। वे अपने नए संस्करण में इस रिकॉर्ड को शामिल करने के लिए उतावले थे।

सबसे पहले गिनीज़ बुक वाले मुंबई पहुँचे। पूरा दिन वे सड़कों,ढाबों और होटलों में ख़ाक छानते रहे पर बारह क्या पचास रूपये में भी पेट भरने की गुंजाइश न हुई। अलबत्ता,एक सिनेमा हाल में पॉपकोर्न का पैकेट ज़रूर उन्होंने खरीद लिया जो उन्हें एक डॉलर का पड़ा। तभी उनको बारह रूपये वाले नेताजी मिल गए। गिनीज़ बुक वालों ने उनसे पूछा कि वे यह सिद्ध करें कि बारह रूपये में भरपेट भोजन कैसे और कहाँ मिलता है ताकि वे इसे रिकॉर्ड में शामिल कर सकें ?

बारह रूपये वाले नेताजी ने उत्साहित होकर कहना शुरू किया,’बिलकुल जी। मैं अभी प्रमाण देता हूँ। मेरे सामने झुग्गी में एक परिवार रहता है जिसमें एक बच्चा सहित कुल ढाई लोग हैं। पति-पत्नी मेरे यहाँ ही दिहाड़ी पर काम करते हैं,इसके लिए उन्हें महज तीस रूपये देता हूँ। रोज़ काम करने के बाद अगले दिन वे जीवित भी मिलते हैं । इस तरह सिद्ध हो गया कि भरपेट भोजन के लिए बारह रूपये पर्याप्त हैं। ’ ‘पर हो सकता है कि उनकी कोई अन्य आय हो ?’ गिनीज़ वालों ने शंका-समाधान करना चाहा। नेताजी ने भी तुरत समाधान कर दिया,’भई,उनकी बाहरी आय का और कोई स्रोत नहीं है। वे न तो बाबू हैं और न ही नेता। इसलिए अतिरिक्त आय का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। ’गिनीस वाले अब निरुत्तर हो चुके थे। नेताजी को ऐसे अद्भुत रिकॉर्ड के लिए बधाई देकर वे दिल्ली आ गए।

पाँच रूपये वाले नेताजी जामा मस्जिद पर ही टकरा गए। गिनीज़ वालों के कैमरे देखते ही शुरू हो गए,’मुझे खुशी है कि आपको मेरे रिकॉर्ड की जानकारी मिल गई। ’गिनीज़ वालों ने नेताजी की भारी-भरकम तोंद देखते हुए सवाल किया,’आप राजधानी में महज पाँच रूपये में कैसे अपना पेट भरते हैं?’ पाँच रूपये वाले नेताजी हँसते हुए बोले,’आप मेरे पेट के साइज़ पर मत जाइए। यह आलरेडी रुपयों,खदानों और ठेकों से भरा पड़ा है। हम और कुछ खाते ही नहीं। कभी-कभार एक-आध काजू-किशमिश अंदर डाल लेते हैं । सच पूछिए तो मुझे पेट भरने के लिए पाँच रूपये भी खर्चने नहीं पड़ते। ’ पर आपके घर-परिवार और आम आदमी का गुजारा कैसे चलता होगा ?’गिनीज़ वालों ने अभी हार नहीं मानी थी।

‘अरे भई ,हमारे चाहने वाले ही इत्ता राशन-पानी और मेवा देकर सेवा कर देते हैं कि कभी खुद की जेब में हाथ डालना ही नहीं पड़ता। मैं पाँच रूपये से कम खर्चकर आपके सामने हट्टा-कट्टा खड़ा हूँ। इससे बड़ा और सबूत क्या होगा ?रही बात आम आदमी की, उसका पेट पीठ से चिपका हुआ होता है। उसके लिए पाँच रूपये बहुत ज़्यादा हैं। ’

गिनीज़ बुक वालों का रिकॉर्ड बनाने का अभियान पूरा हो चुका था। उन्होंने बीस रूपये देकर पानी की बोतल से सूखे गले को राहत दी और फ़िर वे अगले रिकॉर्ड की तसदीक के लिए निकल पड़े।  

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