रविवार, 7 सितंबर 2014

पान की दुकान पर मास्टर जी !

सरकार ने कामकाज के सौ दिन पूरे कर लिए हैं पर लगता है कि कर्मचारियों के दिन भी पूरे हो गए है।पब्लिक के अच्छे दिन आएं हों या नहीं,पर सरकारी कर्मचारियों के बुरे दिन ज़रूर आ गए हैं।केंद्र सरकार के दफ्तरों में दो-चार छापे क्या पड़े,सुबह नौ बजे से लेकर शाम छः बजे तक कर्मचारी अपने बीवी-बच्चों के मुँह देखने को तरसने लगे हैं ।हद तो तब हो गई जब खबर आई कि स्कूलों से गायब होकर समाज-सेवा करने वाले मास्टर जी की लोकेशन अब पब्लिक और अफ़सरों की निगाह में होगी।सरकार कुछ ऐसा इंतजाम करने जा रही है जिससे बच्चों के अभिभावक केवल एक एसएमएस देकर मास्टर जी का ताजा हाल जान लेंगे।वे स्कूल की कक्षा के बजाय अपनी कक्षा कहाँ चला रहे हैं,यह रहस्य अब खुलकर रहेगा।
कुछ जानकार बता रहे हैं कि मास्टर जी की वास्तविक लोकेशन उनके मोबाइल से पता की जाएगी  तो कुछ अनुभवी कह रहे हैं कि इस योजना में झोल हो सकता है।मास्टर जी ऐसी परिस्थिति में मोबाइल का अपनी देह से त्याग कर सकते हैं।इसलिए ज़रूरी है कि उनकी बाजू में ही एक चिप परमानेंटली फिक्स कर दी जाय।इससे उनकी कार्यालयी ही नहीं पारिवारिक समस्या भी काफ़ी हद तक हल हो जाएगी।घरवाले भी मास्टर जी की तरफ़ से बेफिक्र हो जाएँगे।अगर यह योजना ठीक से सिरे चढ़ती है तो मास्टर जी का सिरदर्द बढ़ने वाला है।उनकी सबसे बड़ी परेशानी तो यह होगी कि ऐसे में वह प्रिंसिपल साहब की सेवा-संभाल कैसे कर पाएंगे ? अभी तक मास्टर जी प्रिंसिपल साहब की,मॉनिटर बच्चों की और प्रिंसिपल साहब मास्टर जी की सालाना गोपनीय रिपोर्ट की अच्छी तरह से संभाल कर रहे थे ।
कल्पना कीजिए,जब स्कूल में मास्टर जी फेसबुक में अपनी नई फोटो ठेल रहे होंगे या नया स्टेटस अपडेट कर रहे होंगे,उनका अपना सार्वजनिक अपडेट हो जायेगा।पैरेंट्स को यह जानने में दिलचस्पी होगी कि मास्टर जी स्कूल आए हैं या आकर भी नहीं आए हैं ।हो सकता है कि मास्टर जी पान,पुड़िया और खैनी के लिए जैसे ही स्कूल चौहद्दी के बाहर निकलें,इस बारे में अभिभावकों के पास मैसेज पहुँच जाए।मास्टर जी की तरह यदि कोई अभिभावक भी निठल्ला हुआ तो वह उनसे कल्लू पानवाले की दुकान में ही मुलाक़ात कर लेगा।इस दुर्लभ भेंट से जो रिजल्ट निकलकर आएगा, अफसरों के बड़े काम का होगा.
जिसने भी सरकार को इस तरह का आइडिया दिया है,वह निश्चित ही कोई बाबू होगा।माना यही जाता है कि बाबू हमेशा मास्टरों के खिलाफ़ रहे हैं।इसका कारण है कि उनकी तुलना में मास्टरों को मोटा वेतन मिलता है ।यह क्या बात हुई कि ऑफिस में आठ-नौ घंटे तो बाबू खटे और महज़ पाँच-छः घंटे में मास्टर जी उनसे ज्यादा पगार झटक ले जाएँ ! वैसे भी पढ़ाना कोई काम नहीं है।पढाई से न तो प्रोडक्टिविटी बढ़ती है और न देश की जीडीपी।राष्ट्र निर्माता कहे जाने वाले मास्टर जी के रहते देश की यह हालत ! समाज के लिए खतरनाक बन चुके ऐसे प्राणी को सबक सिखाने के लिए सरकार को  कोई न कोई अरेंजमेंट तो करना ही था।

1 टिप्पणी:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

जो रोज जाते हैं
वो ही पकड़े जायेंगे
पुरानी आदत वाले
दिमाग लड़ायेंगे
कुछ नई तरकीब
ईजाद कर ले जायेंगे
बाबू के साथ बैठ
क्या पता गिलास
से गिलास लड़ायेंगे?

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